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भारत में चुनावी साल का बजट कैसा होगा, ये आँकड़े हैं चिंताजनक
- Author, अरुणोदय मुखर्जी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
बजट साल की उन घोषणाओं में शामिल है, जिसका सबको बेसब्री से इंतज़ार रहता है. बड़े व्यापारिक घरानों से लेकर किसानों तक.
बजट में सभी भारतीयों के लिए कुछ न कुछ होता ही है.
एक फ़रवरी को सरकार अपना बजट पेश करेगी. ऐसे समय में जब अगले कुछ महीनों में ही नई सरकार के लिए चुनाव होना है, नरेंद्र मोदी सरकार अंतरिम बजट पेश करेगी.
माना जा रहा है कि सरकार मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर पर ख़र्च को बढ़ाएगी, जो कि पूरी भारतीय अर्थव्यवस्था का 17 फ़ीसदी है. सरकार ने 2021 में इस सेक्टर के लिए 1.97 लाख करोड़ के वित्तीय सहायता की घोषणा की थी.
घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देने और नौकरियां पैदा करने की यह योजना पांच साल तक विभिन्न क्षेत्रों को पैसे देने के लिए थी.
उद्योगों को कितना पहुँचा फ़ायदा
सरकार का यह क़दम वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग पावर बनने की महत्वाकांक्षाओं के मुताबिक़ है.
इसकी एक झलक राजस्थान के शहर दूदू में दिखाई देती है. क़रीब एक साल पहले स्थापित भारतीय कंपनी ग्रेव एनर्जी ने एक कारखाना लगाया था. उसमें रोज़ाना करीब 3000 सौर पैनल बनाए जा रहे थे.
इस कंपनी को 560 करोड़ रुपये का सरकारी अनुदान मिला.
कंपनी के सीईओ विनय थडानी कहते हैं, ''यह शुरुआती प्रोत्साहन है और पांच साल बाद जब सरकारी सहायता मिलनी बंद हो जाएगी, तो मेरा मानना है कि तब तक उद्योग आत्मनिर्भर हो जाएगा और अपने दम पर आगे बढ़ने में सक्षम होगा."
सरकार का यह प्रोत्साहन ग्रेव एनर्जी जैसी कंपनियों की चीन पर निर्भरता कम करने में मदद करने के लिए भी है.
थडानी कहते हैं कि इस सेक्टर में 80 फ़ीसदी कच्चा माल अब भी चीन से ही आता है. वो कहते हैं कि हालांकि सही क़दम उठाए जा रहे हैं, लेकिन भारत को ऐसा करने में अब भी कुछ समय लगेगा.
वो कहते हैं, "केवल वित्तीय सहायता ही नहीं, बल्कि सरकार ने जो माहौल बनाया है, उसने सब कुछ तेज़ी से किया है- यही असली फ़ायदा है."
दरअसल, ग्रेव एनर्जी अगले कुछ महीनों में दो कारखाने शुरू करने की प्रक्रिया में है. उसका लक्ष्य इनमें 2000 से अधिक लोगों को रोज़गार देना है.
सरकार ने केवल सौर ऊर्जा सेक्टर को ही नहीं बल्कि टेलिकॉम, फार्मास्यूटिकल्स, फूड प्रोसेसिंग और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे एक दर्जन से अधिक क्षेत्रों की पहचान उत्पादन से जुड़े प्रोत्साहन या पीएलआई योजनाओं के लिए की है.
सरकारी आँकड़ों के मुताबिक़ पिछले दो सालों में इस योजना के तहत छह लाख से अधिक नौकरियां पैदा हुई हैं और उत्पादन 8.61 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया है.
बढ़ती बेरोज़गारी है चिंता का विषय
यह सब ऐसे समय में हो रहा है, जब बढ़ती बेरोज़गारी देश में चिंता का विषय बनी हुई है.
सरकार के ताजा लेबर फोर्स सर्वे के मुताबिक़ पिछले साल स्नातकों में बेरोज़गारी सबसे अधिक 13.4 फ़ीसदी थी.
इसके बाद डिप्लोमाधारियों में 12.2 फ़ीसदी और स्नातकोत्तर में 12.1 फीसदी बेरोज़गारी थी.
बेरोज़गारी के ये चिंताजनक आंकड़े सड़कों पर भी नज़र आ रहे हैं, क्योंकि भारत के युवाओं में काम की तलाश की निराशा दिखाई दे रही है.
ग्रेव एनर्जी के कारखाने से क़रीब साठ किमी दूर जयपुर शहर में कॉलेज से निकले युवा लड़के-लड़कियां हर वो काम कर रहे हैं, जिससे उन्हें नौकरी मिल सकती है. हजारों ग्रेजुएट नौकरी पाने के लिए सबसे अच्छी पढ़ाई करने की उम्मीद में कोचिंग सेंटरों पर आते हैं.
इन कोचिंग सेंटरों के खचाखच भरे क्लासरूम में बैठे युवाओं में से कई गांवों से आते हैं.
वे अपने माता-पिता की जीवन भर की कमाई को महंगी पढाई पर खर्च करते हैं. उन्हें इस बात की उम्मीद रहती है कि उनके बगल में बैठे व्यक्ति की तुलना में उनके पास बेहतर मौक़ा है.
23 साल की तृषा अभयवाल कहती हैं, "यह जीवन और मौत का मामला है."
वो अपने गांव से 150 किलोमीटर दूर जयपुर शहर में किराए के एक कमरे में रहती हैं. वह सरकारी नौकरियों की तैयारी कर रही हैं.
तृषा कहती हैं, "प्रतिस्पर्धा इतनी बढ़ गई है कि हम सभी के लिए पर्याप्त नौकरियां नहीं हैं."
तृषा की ही तरह सुरेश कुमार चौधरी भी चिंता जताते हैं. किसान परिवार से आने वाले सुरेश सरकारी नौकरी के लिए प्रयास करने वाले अपने परिवार के पहले व्यक्ति हैं. इस परिवार की उम्मीदें 23 साल के सुरेश पर टिकी हैं.
वो इस दवाब को महसूस करते हैं. सुरेश कहते हैं, ''लोगों के पास कोई विकल्प नहीं है. यदि बहुत सारे विकल्प होते तो यह समस्या नहीं होती. मेरे जैसे पढ़े-लिखे भारतीय इस उम्मीद में समय और पैसा खर्च करने की कोशिश कर रहे हैं कि उन्हें नौकरी मिलेगी.''
अर्थशास्त्रियों को किस बात की है चिंता
मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को बढ़ावा देना और नौकरियां पैदा करने की योजनाएं सही दिशा में उठाया गया एक क़दम है, लेकिन इसने कुछ अर्थशास्त्रियों को सचेत भी किया है.
प्रोफ़ेसर अरुण कुमार बताते हैं कि 1.97 लाख करोड़ रुपये में से अब तक केवल दो फ़ीसदी ही बांटे गए हैं. इस साल जनवरी में प्रेस सूचना ब्यूरो (पीआईबी) की ओर से जारी पीएलआई पर जारी आखिरी बयान के मुताबिक इस योजना के तहत अबतक 4,415 करोड़ रुपये बांट गए हैं.
प्रोफेसर कुमार का मानना है कि धनराशि को अलग तरीक़े से खर्च किया जाना चाहिए था. वो कहते हैं, ''इसे सही ढंग से लक्षित नहीं किया गया है, क्योंकि भारत में नौकरियां संगठित क्षेत्र नहीं बल्कि असंगठित क्षेत्र पैदा करता है. केवल 6 फ़ीसदी कार्यबल ही संगठित क्षेत्र काम करता है. 94 फीसदी कार्यबल असंगठित क्षेत्र में काम करता है.''
प्रोफेसर कुमार कहते हैं कि फोकस बदलने की ज़रूरत है. हमें संगठित क्षेत्र की जगह असंगठित क्षेत्र को बढ़ावा देने की ज़रूरत है. यह योजना जो कर रही है, वह पूरी तरह से संगठित क्षेत्र के लिए लक्षित है.
भारत के पूरे आर्थिक दृष्टिकोण पर विस्तार से बात की गई है. भारत की पहचान दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्था के रूप में की गई है.
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने कहा है, ''भारत की अर्थव्यवस्था ने 'मज़बूत विकास' दिखाया है. इसका वित्तीय क्षेत्र लचीला और कई सालों से सबसे मज़बूत रहा है. वह साल 2023 की शुरुआत में आई आर्थिक मंदी से काफ़ी हद तक अप्रभावित रहा."
अनुमान के मुताबिक़ भारत में विकास दर के मज़बूत रहने की संभावना है, लेकिन सवाल यह भी है कि क्या सभी भारतीय इस विकास को महसूस कर पा रहे हैं.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार इसी हफ़्ते चुनावी साल में अपनी वित्तीय योजनाएं पेश करने के लिए तैयार है, ऐसे में यह बजट अर्थशास्त्र से अधिक राजनीति से प्रेरित हो सकता है.
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