जब दुबई तकरीबन भारत का हिस्सा बन गया था

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- Author, सैम डैलरिम्पल
- पदनाम, लेखक
ये 1956 की सर्दियों की बात है. 'द टाइम्स' के संवाददाता डेविड होल्डन बहरीन पहुंचे. बहरीन उस समय तक ब्रिटेन के संरक्षण में ही था.
भूगोल पढ़ा चुके होल्डन को इस पोस्टिंग का इंतज़ार था.
जब वो वहां पहुँचे तो सारे अरब क्षेत्र में 1877 में रानी विक्टोरिया को भारत का सम्राट बनाए जाने की सालगिरह मनाई जा रही थी. उन्हें उम्मीद नहीं थी कि वो इस सम्मान समारोह 'गार्डन दरबार' में शामिल होंगे.
खाड़ी देशों में- दुबई, अबू धाबी और ओमान जहां भी वो गए उन्हें ब्रिटिश भारत के निशान दिखाई दिए.
होल्डन ने लिखा, ''विशालकाय ब्रिटिश राज का जो रुतबा था उसकी अब भी हल्की झलक बरक़रार है.''
उन्होंने कहा, ''यहां सब कुछ असंगत और पुरातनपंथी था. वक़्त से उसका कोई तालमेल नहीं था. सभी नौकर बेयरर ( संदेश वाहक) थे. कपड़े धोने वाले को धोबी और वॉचमैन को चौकीदार कहा जाता था. रविवार को मेहमानों को एक पुराने और बेहतरीन एंग्लो-इंडियन रिवाज का सामना करना पड़ता था. यानी उनके सामने पहाड़ी इलाके़ में प्रचलित 'करी लंच' होता था."
ओमान के सुल्तान, जो राजस्थान में पढ़े थे, अरबी से अधिक फ़रार्टेदार उर्दू बोलते थे.
वहीं, पूर्वी यमन का हिस्सा बने क़ुआइती राज्य में सिपाही अब भी हैदारबादी सेना की पुरानी वर्दियों में मार्च करते दिखते थे.
इस अहसास के साथ हैदराबाद से होते हुए दिल्ली का अरब के दक्षिणी तट से संपर्क भी दिख रहा था.
अरब का बड़ा हिस्सा भारत का था

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यह बात आज भले भुला दी गई हो, लेकिन 20वीं सदी की शुरुआत में अरब प्रायद्वीप का लगभग एक तिहाई हिस्सा ब्रिटिश भारतीय साम्राज्य के अधीन था.
अदन से लेकर कुवैत तक, अरब में ब्रिटिश संरक्षित जितने भी देश (उस समय क्षेत्र या राज्य) थे वो दिल्ली से नियंत्रित होते थे.
इन पर भारतीय राजनीतिक सेवा यानी इंडियन पॉलिटिकल सर्विस के ज़रिये शासन होता था.
इन पर भारतीय सैनिकों की निगाह रहती थी और वो भारत के वायसराय के प्रति जवाबदेह थे.
इंटरप्रटेशन एक्ट, 1889 के तहत ये सभी संरक्षित देश क़ानूनी तौर पर भारत का हिस्सा माने जाते थे.
जयपुर की तरह भारत की अर्द्ध स्वायत्त रियासतों की सूची अंग्रेज़ी के वर्णक्रम के हिसाब से अबू धाबी से शुरू होती थी.
बल्कि वायसराय लॉर्ड कर्ज़न ने तो ये सुझाव दिया था कि ओमान को भी लुस बेल्या या किलात की तरह (आज का बलूचिस्तान) भारत की एक देसी रियासत ही माना जाए.
सुदूर पश्चिम में यानी आज के यमन के अदन तक में भारतीय पासपोर्ट जारी किए जाते थे और यह भारत के सबसे पश्चिमी इलाके़ के बंदरगाह की तरह इस्तेमाल होता था.
और यह बॉम्बे प्रांत के प्रशासन का हिस्सा था. जब 1931 में महात्मा गांधी अदन पहुंचे, तो उन्हें वहां कई अरबी युवा मिले जो ख़ुद को भारतीय राष्ट्रवादी बताते थे.
ब्रिटिश जनता भी इससे अनजान थी

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दिलचस्प ये था कि उस समय ब्रिटेन और भारत के बहुत कम नागरिकों को पता था कि ब्रिटिश राज अरब तक फैला हुआ है.
भारत के वास्तविक नक्शे जिनमें ये क्षेत्र दिखाए गए थे, गुप्त रूप से छपते थे.
सार्वजनिक दस्तावेज़ों में अरब राज्य नहीं दिखाए जाते थे ताकि ऑटोमन या बाद में सऊदी शासन को उकसाने से बचा जा सके.
रॉयल एशियाटिक सोसाइटी के एक लेक्चरर ने तो यहां तक कहा, "जैसे कोई ईर्ष्यालु शेख़ अपनी प्रिय पत्नी को पर्दे में रखता है वैसे ही ब्रिटिश अधिकारी अरब राज्यों की स्थिति को रहस्य बनाकर रखते थे.''
भारत विभाजन के पहले ही अलग हो गई खाड़ी

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1920 के दशक तक राजनीति की हवा बदलने लगी.
भारत के राष्ट्रवादियों ने देश को किसी के साम्राज्य के तौर पर नहीं बल्कि एक ऐसी सांस्कृतिक जगह के तौर पर देखना शुरू किया जिसकी जड़ें महाभारत के भूगोल में थीं.
लंदन ने अच्छा मौक़ा देखा और 1 अप्रैल 1937 को अदन को भारत से अलग कर दिया गया.
किंग जॉर्ज VI की ओर से भेजा गया टेलीग्राम संदेश ज़ोर से पढ़ा गया, "अदन पिछले 100 वर्षों से भारत का अभिन्न हिस्सा रहा है. अब मेरे भारतीय साम्राज्य से इसका राजनीतिक संबंध ख़त्म होगा. अदन अब मेरे औपनिवेशक साम्राज्य का हिस्सा होगा.''
हालांकि खाड़ी क्षेत्र अगले दस साल तक ब्रिटिश भारत सरकार के अधीन रहा.
ब्रिटिश अधिकारियों ने इस बात पर थोड़ा विचार-विमर्श किया कि क्या आज़ादी के बाद भारत या पाकिस्तान को फ़ारस की खाड़ी की ज़िम्मेदारी दी जा सकती है.
लेकिन ब्रिटेन के राजनयिक मिशन के अधिकारी का कहना था, ''दिल्ली के अधिकारियों में इस बात पर सहमति थी कि फ़ारस की खाड़ी में भारत सरकार की कोई दिलचस्पी नहीं है.''
खाड़ी में रहने वाले विलियम हे के मुताबिक़, ''खाड़ी में रहने वाले अरब लोगों का ज़िम्मा भारत और पाकिस्तान पर सौंपना बिल्कुल ठीक नहीं होता.''
1 अप्रैल 1947 को यानी भारत की आज़ादी से पहले ही दुबई से लेकर कुवैत तक के राज्य (देश) भारत से औपचारिक रूप से अलग कर दिए गए.
ये सब भारत और पाकिस्तान के विभाजन से पहले ही हो गया.
फिर कुछ महीनों के बाद भारत और पाकिस्तान की सैकड़ों रियासतों का संबंधित देशों में विलय शुरू हुआ. लेकिन खाड़ी की अरब रियासतें उस सूची से ग़ायब थीं.
बहुत कम लोगों ने इस पर ध्यान दिया. और आज 75 साल बाद भी भारत और खाड़ी देशों में बहुत से लोग नहीं जानते कि यह कितनी बड़ी ऐतिहासिक घटना थी.
अगर यह प्रशासनिक निर्णय न लिया गया होता, तो शायद आज खाड़ी के तेल-समृद्ध देश भारत या पाकिस्तान का हिस्सा होते.
ब्रिटिश भारत के साथ खाड़ी का संबंध कैसे भुला दिया गया

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जब ब्रिटेन के प्रधानमंत्री क्लेमेंट एटली ने भारत और खाड़ी का शासन एक साथ छोड़ने का प्रस्ताव दिया तो उन्हें चुप करा दिया गया.
और फिर अगले 24 साल तक ब्रिटेन ने खाड़ी पर अपना शासन बनाए रखा. अरब राज अब भारत के वायसराय (यानी दिल्ली) को नहीं बल्कि व्हाइटहॉल (लंदन) को रिपोर्ट करता था.
खाड़ी मामलों के विद्वान पॉल रिच का कहना है, ''यह ब्रिटेन के भारतीय साम्राज्य का अंतिम क़िला था. जैसे गोवा पुर्तगालियों और पॉन्डिचेरी (पुद्दुचेरी) फ़्रांस का था.''
लेकिन अब भी यहां की आधिकारिक मुद्रा रुपया ही थी. परिवहन का सबसे आसान साधन ब्रिटिश इंडिया शिपिंग लाइन (शिपिंग कंपनी) थी और खाड़ी की 30 रियासतें अब भी 'ब्रिटिश रेज़िडेंट्स' चलाते थे जिन्होंने इंडियन पॉलिटिकल सर्विस में अपना करियर बनाया था.
1971 में ब्रिटेन ने खाड़ी से आख़िरी तौर पर वापसी की. ये वो समय था जब उसने स्वेज़ के पूरब में अपनी औपनिवेशिक ज़िम्मेदारियों को छोड़ने का फ़ैसला किया.
उसी साल जुलाई में डेविड होल्डन ने लिखा, ''ईस्ट इंडिया कंपनी के स्वर्णिम युग के बाद पहली बार, खाड़ी के चारों ओर के सभी क्षेत्र ब्रिटिश हस्तक्षेप या सुरक्षा के बिना अपनी राह चुनने के लिए स्वतंत्र होंगे. यह राज का अंतिम बचा टुकड़ा था. जो कुछ सालों से आकर्षक मालूम होता था. लेकिन अब वक़्त ख़त्म हो चुका है.''
ब्रिटिश साम्राज्य के पतन के बाद जितने भी राष्ट्रीय नैरेटिव उभरे उनमें से खाड़ी देशों ने ही सबसे सफलतापूर्वक ब्रिटिश भारत के साथ अतीत के अपने संबंधों को मिटाया.
बहरीन से दुबई तक, लोग ब्रिटेन के साथ पुराने संबंधों को याद करते हैं, लेकिन ये याद नहीं करते कि उन पर दिल्ली से शासन होता था.
प्राचीन संप्रभुता का मिथक बनाए रखना इन राजशाही रियासतों के अस्तित्व के लिए ज़रूरी बन गया. फिर भी व्यक्तिगत स्मृतियां बरक़रार हैं. ख़ासकर उस भयानक वर्ग परिवर्तन का, जिसे खाड़ी ने देखा है.
2009 में पॉल रिच ने क़तर के एक बुज़ुर्ग से बातचीत की थी.
उन्होंने बताया, "जब मैं सात-आठ साल का था तो मैंने एक संतरा चुरा लिया था. इससे पहले मैंने संतरा कभी नहीं देखा था. उस समय ब्रिटिश एजेंट के भारतीय कर्मचारी ने मेरी पिटाई की थी.''
बुज़ुर्ग ने कहा था, ''उस समय भारतीय एक विशेषाधिकार प्राप्त जाति के लोग थे. अब वक्त बदला है और जब भारतीय यहां नौकर बनकर आते हैं तो मुझे बड़ा आनंद आता है.''
आज का दुबई और खोया हुआ वो रिश्ता

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आज दुबई, जो कभी ब्रिटिश भारतीय साम्राज्य का एक मामूली हिस्सा था, नए मध्य पूर्व का चमचमाता केंद्र है.
यहाँ रहने वाले लाखों भारतीय और पाकिस्तानी शायद ही ये जानते हों कि एक समय था जब भारत या पाकिस्तान खाड़ी के उत्तराधिकारी बन सकते थे—जैसे वे जयपुर, हैदराबाद या बहावलपुर के बने.
ये सब साम्राज्य के आख़िरी दिनों में बस चुपचाप लिया गया एक प्रशासनिक फ़ैसला था. इस फ़ैसले ने ब्रिटिश भारत और खाड़ी के रिश्ते को हमेशा के लिए तोड़ दिया जिसकी आज सिर्फ़ गूंज बची है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित















