सुनीता विलियम्स स्पेस में कैसे रहीं? ज़ीरो ग्रेविटी में रहना, खाना और रोज़मर्रा का काम कितना अलग?

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नौ महीने के लंबे इंतज़ार के बाद सुनीता विलियम्स पृथ्वी पर लौट आई हैं. इतने लंबे समय तक अंतरिक्ष में रहना चुनौती भरा रहा था.
महीनों तक ज़ीरो ग्रेविटी में रहना, सीमित संसाधनों के बीच काम करना और पृथ्वी से सैकड़ों किलोमीटर दूर रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करना एक बड़ी चुनौती है.
ऐसे में अंतरिक्ष में जीवन कैसा होता है? वहां खाने-पीने से लेकर सोने, एक्सरसाइज़ करने और कपड़े धोने तक की क्या चुनौतियां होती हैं?
इन सवालों के जवाब तलाशने के लिए बीबीसी संवाददाता जॉर्जिया रानार्डने कुछ महीने पहले तीन पूर्व अंतरिक्ष यात्रियों से बातचीत की.

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उन्होंने बताया कि इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन (आईएसएस) पर जीवन कैसा होता है और वहां किन परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है. इन अनुभवों से यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि सुनीता विलियम्स ने इन महीनों में कैसा समय बिताया होगा.
आईएसएस पर कैसे गुजरता है दिन

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अंतरिक्ष यात्रियों के एक दिन को हर पांच मिनट के हिसाब से पृथ्वी पर स्थित कंट्रोल स्टेशन तय करता है.
वो सुबह जल्दी जाग जाते हैं. करीब 6 बजकर 30 मिनट (जीएमटी) पर, अंतरिक्ष यात्री आईएसएस मॉड्यूल में हार्मनी नामक फोन-बूथ आकार के स्लीपिंग क्वार्टर से सोकर निकलते हैं.
पूर्व अंतरिक्ष यात्री निकोल स्टॉट कहती हैं, "ये दुनिया के सबसे बेहतरीन स्लीपिंग बैग हैं."
स्टॉट ने 2009 और 2011 के दो मिशन के तहत अंतरिक्ष में 104 दिन गुज़ारे हैं.
वो कहती हैं कि इन कंपार्टमेंट्स में लैपटॉप होते हैं, ताकि क्रू के सदस्य अपने परिवार से संपर्क कर सकें. एक छोटा कोना तस्वीरें और किताबें रखने के लिए होता है.
बाथरूम एक छोटे डिब्बे जैसा कंपार्टमेंट होता है, जिसमें सक्शन सिस्टम (मशीन) मौजूद रहता है. आमतौर पर पसीना और पेशाब रिसाइकिल होकर पीने के पानी के लिए इस्तेमाल होते हैं. लेकिन अगर स्पेस स्टेशन में किसी तरह की तकनीकी खराबी आ जाए तब भी पेशाब को संग्रहित किया जाता है.
इसके बाद अंतरिक्ष यात्री अपना-अपना काम शुरू करते हैं. स्पेस स्टेशन पर अधिकतर समय मेंटेनेंस और वैज्ञानिक प्रयोग से जुड़े काम होते हैं. इस जगह का आकार बकिंघम पैलेस या अमेरिकी फुटबॉल फील्ड के जितना है.
साल 2012-13 में चले 'एक्सपीडिशन 35' मिशन में काम करने वाले कनाडा के अंतरिक्ष यात्री क्रिस हैडफ़ील्ड कहते हैं, "इसके अंदर देखने पर ऐसा लगता है जैसे कई सारी बसें आपस में सटाकर खड़ी की गई हों. आधे दिन तक आप किसी अन्य शख्स को देख ही नहीं पाते."
वो कहते हैं, "लोग स्टेशन में इधर उधर नहीं घूमते. ये काफ़ी बड़ा और शांत होता है."
इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन में प्रयोग करने के लिए छह लैब हैं. चुनौतीपूर्ण वातावरण से शरीर पर पड़ने वाले प्रभावों को जानने के लिए अंतरिक्ष यात्री हार्ट, ब्रेन और ब्लड मॉनिटर पहनते हैं.
निकोल स्टॉट बताती हैं, "जैसे कि हम गिनी पिग हों. अंतरिक्ष आपकी हड्डियों और मांसपेशियों को उम्र बढ़ने की प्रक्रिया में तेज़ी लाता है, और वैज्ञानिक इससे सीख सकते हैं."

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अंतरिक्ष यात्री चाहें तो मिशन कंट्रोल के अनुमान से भी ज़्यादा तेज़ी से काम कर सकते हैं.
हैडफ़ील्ड समझाते हैं, ''आपके लिए चुनौती होती है पांच मिनट का खाली समय ढूंढना. मैं उस समय में तैरकर विंडो तक जाने में खर्च करता हूं ये देखने के लिए कि बाहर कुछ जा रहा है. या संगीत लिखने में, तस्वीरें लेने में या अपने बच्चों के लिए कुछ लिखने में.''
वो कुछ चुनिंदा ख़ुशनसीब लोगों में थे जिन्हें स्पेस वॉक करने के लिए कहा गया था. इसमें स्पेस स्टेशन को छोड़कर बाहर की ओर जाना होता था. हैडफील्ड ऐसा दो बार कर चुके हैं.
वो बताते हैं, "बाहर गुज़ारे वो 15 घंटे, जब मेरे और ब्रह्मांड के बीच कुछ नहीं था, सिवाए मेरे प्लास्टिक विज़र (हेलमेट जैसा दिखने वाला उपकरण) के. ये मेरे जीवन के बाक़ी 15 घंटों से बहुत अलग थे."
हालांकि इस स्पेसवॉक के साथ ही अंतरिक्ष यात्रियों का सामना वहां आने वाली गंध से भी होता है, जो धातु जैसी होती है.
साल 1991 में सोवियत अंतरिक्ष स्टेशन मीर में आठ दिन गुज़ारने वाली ब्रिटेन की पहली अंतरिक्ष यात्री हेलेन शरमन कहती हैं, "धरती पर तरह-तरह की गंध होती है. जैसे कपड़े धोने वाली मशीन की या ताज़ा हवा की. लेकिन अंतरिक्ष में केवल एक ही तरह की गंध आती है, और हमें जल्दी ही इसकी आदत भी हो जाती है."

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पृथ्वी पर लौटने के बाद हेलेन शरमन अपने सूंघने के अनुभव को अधिक महत्व देने लगीं.
वहां से उन्हें लौटे 33 साल हो गए हैं. वो कहती हैं, "अंतरिक्ष में कोई मौसम नहीं होता. आपके चेहरे पर बारिश की बूंद नहीं गिरतीं और न ही बाल हवा में लहराते हैं. मैं आज तक उन दिनों को याद करती हूं."
आईएसएस पर लंबे वक्त के लिए आने वाले अंतरिक्ष यात्री काम के बीच रोज़ाना दो घंटे व्यायाम करते हैं. ज़ीरो ग्रेविटी में बोन्स डेंसिटी कम होने लगती है. ज़ीरो ग्रेविटी में रहने से शरीर पर पड़ने वाले इसी तरह के प्रभाव को कम करने में मदद के लिए तीन अलग-अलग तरह की मशीनें होती हैं.
स्टॉट कहती हैं कि एआरईडी यानी एडवांस रेसिस्टिव एक्सरसाइज डिवाइस स्क्वाट, डेडलिफ्ट जैसी कसर करने में मददगार है. ये मशीन अंतरिक्ष पर व्यायाम करने के लिए इस्तेमाल होती है.
ट्रेडमिल पर दौड़ते वक्त खुद को कुछ पट्टों से बांधना होता है, ताकि ज़ीरो ग्रेविटी में खुद को हवा में तैरने (स्पेस फ्लोटिंग) से रोका जा सके. एक मशीन साइकिलिंग करने के लिए भी होती है.
''तीन महीने तक एक जोड़ी ट्राउजर''

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स्टॉट कहती हैं कि इन सभी कामों को करने से काफी पसीना आता है. जिससे एक समस्या और खड़ी हो जाती है, वो है कपड़ों को साफ करने की.
वो बताती हैं, "यहां हमारे पास लॉन्डरी नहीं होती. केवल पानी होता है, जिससे कुछ साबुन जैसे बुलबुले पैदा होते हैं. बस उसी से काम चलाते हैं."
बिना ग्रेविटी के शरीर से पसीना हटाना भी आसान नहीं. अंतरिक्ष यात्री पसीने में लथपथ होते हैं, "पृथ्वी के मुक़ाबले वहां अधिक पसीना आता है."
वो कहती हैं, "मैं महसूस करती थी कि मेरे सिर पर पसीना आ रहा है. मुझे अपना सिर नीचे झुकाना पड़ता था. आप उसे झाड़ नहीं सकते क्योंकि ये फिर हर तरफ जाएगा."
ये कपड़े इतने गंदे होते हैं कि इन्हें किसी कार्गो वाहन पर डाल दिया जाता है जो मिशन के ख़त्म होने के बाद पृथ्वी के वातावरण के संपर्क में आने पर जल जाते हैं.
हालांकि उनके रोज़ पहने जाने वाले कपड़े साफ़ रहते हैं.
स्टॉट बताती हैं, "ज़ीरो ग्रेविटी में कपड़े भी शरीर पर तैर रह होते हैं, तेल या कोई और चीज़ उन्हें गंदा नहीं कर पाती. मेरे पास तीन महीने तक एक ही जोड़ी ट्राउजर थे."
इसके अलावा अंतरिक्ष यात्रियों के लिए खाना खाना भी आसान नहीं होता. स्टॉट इस बारे में कहती हैं, "अगर कोई मांस या ग्रेवी का डिब्बा खोलता है तब सभी सतर्क हो जाते हैं क्योंकि ये खाना भी बाहर निकलकर उनके ऊपर गिर सकता है. लोग पीछे की तरफ हटने लगते हैं, बिल्कुल वैसे ही जैसे मैट्रिक्स फ़िल्म में लोग गोलियां से बचते हैं और यहां ऐसा मीटबॉल्स से बचने के लिए करते हैं."
हैडफील्ड कहते हैं कि आईएसएस पर किसी भी समय दूसरा अंतरिक्ष यान आ सकता है, जो नए क्रू और खाने, कपड़े और उपकरणों की सप्लाई के साथ आता है. नासा हर साल सप्लाई के लिए अंतरिक्ष यान भेजता है. इनका पृथ्वी से अंतरिक्ष स्टेशन तक आना "अद्भुत" होता है.
''परिवार भी भेज सकते थे खाना''

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दिनभर काम करने के बाद वक्त आता है रात के खाने का. खाना पैकेट में बंद होता है. ये सभी देशों के हिसाब से अलग-अलग कंपार्टमेंट्स में बंटा होता है.
स्टॉट कहती हैं, "ये कैंपिंग के खाने या मिलिट्री राशन की तरह होता है. अच्छा लेकिन स्वास्थ्य के हिसाब से लाभदायक भी. मेरी पसंदीदा खाने की चीज़ें जापानी करी या रूसी सूप हुआ करता था."
अंतरिक्ष यात्रियों के परिवार भी उनके लिए खाना भेज सकते थे. स्टॉट ने बताया कि उनके बेटे और पति ने उनके लिए चॉकलेट की परत वालीं अदरक के आकार की चीज़ें भेजी थीं और ज़्यादातर समय लोग अपने खाने को एक दूसरे के साथ शेयर करते हैं.
वहीं शरमन बताती हैं कि अंतरिक्ष यात्रियों को शुरुआत में ही उनके व्यक्तिगत गुणों के आधार पर चुन लिया जाता है. जैसे कि उनमें कितनी सहनशीलता है, वो शांत रह सकते हैं या नहीं और फिर उन्हें एक टीम के रूप में काम करने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है. इससे संघर्ष होने की आशंका कम हो जाती है.
वो कहती हैं, "इसका मतलब किसी के बुरे व्यवहार को सहन करना नहीं होता, बल्कि उसका पता लगाना होता है. और हम सभी एक दूसरे का साथ देने के लिए एक दूसरे की पीठ थपथपाते हैं."
दिनभर शोरगुल वाले वातावरण में काम करने के बाद अंतरिक्ष यात्री सोने के लिए जाते हैं. (कार्बनडाइऑक्साइड के प्रभाव को कम करने के लिए पंखे चलते हैं, ताकि अंतरिक्ष यात्री सांस ले सकें. इससे काफ़ी शोर होता है.)
स्टॉट ने कहा, "हम आठ घंटे तक सो सकते हैं लेकिन अधिकतर लोग अपनी खिड़की की तरफ़ पृथ्वी की ओर देखते रहते हैं."
धरती की तरफ़ देखकर क्या सोचते थे पूर्व अंतरिक्ष यात्री

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तीनों पूर्व अंतरिक्ष यात्रियों ने बताया कि अपने ग्रह की तरफ देखने का मनोवैज्ञानिक प्रभाव कैसा होता है.
इस पर शरमन कहती हैं, "मैं अंतरिक्ष की विशालता में काफ़ी छोटा महसूस कर रही थी. पृथ्वी को स्पष्ट रूप से देखना, बादलों और महासागरों को निहारना, इसने हमने पृथ्वी पर जो सीमाएं बनाई हैं, उनके बारे में सोचने पर मजबूर कर दिया और ये भी कि हम कैसे पूरी तरह एक दूसरे से जुड़े हुए हैं."
स्टॉट का कहना है कि उन्हें अलग-अलग देशों के लोगों के साथ रहना पसंद है.
वो कहती हैं, "पृथ्वी पर सभी लोगों की तरफ़ से से यह काम करना, एक साथ काम करना और यह पता लगाना कि समस्याओं से कैसे निपटना है."
वो पूछती हैं, "ऐसा हमारी पृथ्वी पर क्यों नहीं हो सकता?"
आख़िरकार सभी अंतरिक्ष यात्रियों को आईएसएस छोड़ना होगा लेकिन इन तीनों का कहना है कि वे मन मारकर वापस लौटेंगे.
तीनों को ये समझ नहीं आ रहा कि आखिर क्यों लोग ऐसा बोल रहे हैं कि नासा के अंतरिक्ष यात्री सुनीता विलियम्स और बुच विल्मोर वहां "फंस" गए हैं.
हैडफील्ड कहते हैं, "हमने अंतरिक्ष में लंबे वक़्त तक रहने की उम्मीद में ज़िंदगी भर सपने देखे, काम किया और प्रशिक्षण लिया. आप किसी प्रोफे़शनल अंतरिक्ष यात्री को जो सबसे बड़ा तोहफा दे सकते हैं, वो है उसे लंबे समय तक वहां ठहरने देना."
स्टॉट कहती हैं कि जब वो इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन छोड़ रही थीं तब मन ही मन बोल रही थीं, "आपको मेरे हाथ खींचने होंगे. मुझे नहीं पता कि मैं वापस आ पाऊंगी भी या नहीं."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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