लोकसभा चुनाव 2024: अयोध्या में बीजेपी को क्यों करना पड़ा हार का सामना - ग्राउंड रिपोर्ट

अयोध्या
    • Author, दिलनवाज़ पाशा
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, अयोध्या से

भगवामय और राममय हुई अयोध्या में चौड़ी-ख़ूबसूरत सड़कें शहर में आपका स्वागत करती हैं.

भगवा रंग में रंगी इमारतें, दीवारों पर रामायण के दृश्य और कई जगह चल रहा विकास कार्य.

अयोध्या में दाख़िल होते ही मन में सवाल उठता है कि क्या यहां से भी राम मंदिर के निर्माण का दावा करने वाली सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी हार सकती है?

इस सवाल का जवाब स्थानीय लोगों से बात करके मिल जाता है.

लता मंगेशकर चौक पर विशालाकाय वीणा लगी है. चारों तरफ़ लाइटें हैं. ट्रैफिक पुलिस वाहनों को चेक कर रही है. पास ही पार्क में श्रद्धालु महिलाएं कपड़े सूखने डाल रही हैं.

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बीजेपी की हार

आसपास के ज़िलों से आए ये लोग होटल लेने में आर्थिक रूप से असमर्थ हैं. लेकिन खुले में रुकने के बावजूद, बेहद ख़ुश हैं क्योंकि उन्होंने भगवान राम के दर्शन कर लिए हैं.

चौक से फ़ैज़ाबाद की तरफ़ जाने वाली नव-निर्मित सड़क भी सजी-धजी है. चौड़े साफ़ फुटपाथ नई लगी लाइटों से रोशन हैं. बीच-बीच में दीवारों पर रामायण के दृश्य उकेरे गए हैं.

यहीं एक चाय की दुकान पर बैठे रितिक सिंह अयोध्या में बीजेपी की हार से बेहद निराश हैं.

रितिक कहते हैं, "बीजेपी की हार का सुनकर दिल किया कि मर जाएं, लेकिन परिवार के अकेले बेटे हैं, मर भी नहीं सकते, मगर अफसोस बहुत है. किसी से कह भी नहीं सकते."

रितिक अपनी बात पूरी कर ही रहे थे कि उनके पास बैठे सत्यम त्रिपाठी बोल पड़े, "किस बात का दुख, मुझे तो बहुत ख़ुशी है, ये अयोध्यावासियों को नज़रअंदाज़ करने का नतीजा है."

अयोध्या शहर का लता मंगेशकर चौक
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सत्यम त्रिपाठी कहते हैं, "लोगों को उजाड़ दिया गया, दुकानें तोड़ दी गईं लेकिन ना मुआवज़ा दिया गया और ना पुनर्स्थापित किया गया. बीजेपी नेताओं को घमंड हो गया था कि वो कुछ भी कर लेंगे और जनता ख़ामोश रहेगी."

समाजवादी पार्टी के अवधेश प्रसाद ने यहां 2014 से लगातार सांसद रहे बीजेपी के लल्लू सिंह को क़रीब 40 हज़ार वोटों से हराया है.

22 जनवरी को जब अयोध्या के निर्माणाधीन राममंदिर में भगवान राम की मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा हुई थी तब यह कार्यक्रम टीवी पर लगातार दिखाया गया. पूरे देश में जय श्रीराम लिखे भगवा झंडे लगाए गए.

संविधान में बदलाव पर बयान

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इस मंडल की सभी पांचों लोकसभा सीटों पर केंद्र और उत्तर प्रदेश में सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी की हार हुई है.

यहां स्थानीय लोगों से बात करके इस हार के कुछ कारणों को समझा जा सकता है.

जैसे, अधिकतर लोग ये दावा करते हैं कि फ़ैज़ाबाद (अयोध्या) से बीजेपी प्रत्याशी लल्लू सिंह ने मतदान होने से पहले ही अपने आप को विजेता मान लिया था. अति-आत्म विश्वास में वोट मांगने ही बाहर नहीं निकले.

बीजेपी को 400 पार सीटें मिलने पर संविधान में बदलाव से जुड़े उनके बयान ने पिछड़ी और दलित आबादी का इंडिया गठबंधन के पक्ष में ध्रुवीकरण किया. दलितों-पिछड़ों को लगा कि संविधान ख़तरे में हैं.

स्थानीय लोगों की एक बड़ी आबादी अपने मुद्दों को नज़रअंदाज़ किए जाने से भी नाराज़ है.

अयोध्या में अब बड़ी तादाद में श्रद्धालु आ रहे हैं. यहां कारोबार बढ़ा है. बहुत से लोग हैरान हैं कि इतना विकास कार्य होने के बाद भी बीजेपी कैसे हार गई है.

लता मंगेशकर चौक पर श्रद्धालुओं के फोटो खींचने का काम करने वाले संदीप यादव कहते हैं, "पूरा माहौल भगवामय था, बीजेपी का ही शोर था, यक़ीन नहीं हो रहा है कि बीजेपी हार गई है."

वीडियो कैप्शन, अयोध्या ज़िले की लोकसभा सीट फ़ैज़ाबाद में बीजेपी की हार, क्या बोले स्थानीय लोग

संदीप यादव कहते हैं, "पहले हम बेरोज़गार थे, फिर ये सरकार आई, अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण हुआ. अब हम फोटो का काम करने के अलावा ट्रैवल एजेंसी भी चलाते हैं. आराम से महीने में 50 हज़ार से अधिक कमा लेते हैं. मेरे जैसे बहुत से लोग हैं जिन्हें काम मिला है. चारों तरफ़ विकास ही विकास है, लेकिन इतना काम करवाने के बाद भी बीजेपी हार गई है."

सरकार का काम नज़र आ रहा है, लेकिन यहां से विस्थापित हुए लोग नाराज़ भी हैं.

एक हिंदूवादी महंत कहते हैं, "यदि मीडिया यहां के स्थानीय लोगों के मुद्दों को जगह देता तो शायद उन पर चर्चा होती और उन्हें गंभीरता से लिया जाता, लेकिन टीवी पर सिर्फ ये दिखाया जाता रहा कि बीजेपी भगवान राम को लायी है, अयोध्यावासियों के क्या मुद्दे हैं, इन पर चर्चा ही नहीं हुई."

अयोध्या श्री राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा के बाद देश भर के हिंदुओं की आस्था का केंद्र बन गया है.

अब यहां पहले के मुक़ाबले बड़ी तादाद में श्रद्धालु पहुंच रहे हैं और यहां की व्यवस्था संभालना प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ है.

बीजेपी के समर्थक और बीजेपी को ही वोट देने वाले एमके मिश्रा कहते हैं, "अयोध्यावासी राम मंदिर के निर्णय से बहुत ख़ुश थे, सभी ने दीपक जलाया था. जब विस्तारीकरण का काम शुरू हुआ तब भी बहुत अच्छा लगा. लेकिन सरकार ने फिर मनमानी की, किसी की नहीं सुनी, लोगों की दुकानें ले लीं लेकिन पर्याप्त मुआवज़ा नहीं दिया. लोगों को उठाकर फेंक दिया गया, बिना उनके लिए कोई व्यवस्था किए. इसे लेकर स्थानीय लोगों में बहुत आक्रोश था, लोगों ने इसे ज़ाहिर किया तो किसी ने नहीं सुनीं."

जगह-जगह पर पुलिस के बैरिकेड

अयोध्या

अयोध्या में सुरक्षा के लिए जगह-जगह पर पुलिस के बैरिकेड हैं. शहर में आने-जाने के लिए पास जारी किए जा रहे हैं. लेकिन स्थानीय लोगों की शिकायत है कि इन बैरीकैड की वजह से उन्हें बहुत दिक़्क़तों का सामना करना पड़ रहा है.

मिश्रा कहते हैं, "वीआईपी को शाम सात बजे आना होता है, पुलिस दोपहर 12 बजे बैरीकेड लगा देती है. बच्चों को हम स्कूल तक से नहीं ला सकते. घर सामने है लेकिन हमें चार किलोमीटर घूमकर आना पड़ता है. ये समस्या स्थानीय विधायक और सांसद को बताई तो उन्होंने अनसुना कर दिया. नेताओं को लग रहा था कि वो जनता के बीच जाए बिना सिर्फ़ प्रधानमंत्री मोदी के चेहरे पर जीत जाएंगे. यहां अयोध्या वालों से कोई पूछने वाला नहीं है कि उनकी ज़िंदगी कैसी चल रही है."

सरयू घाट को लता मंगेशकर चौक से होते हुए राम मंदिर से जोड़ने वाले राम पथ को अब चौड़ा कर दिया गया है.

दोनों तरफ़ दुकानें भगवा रंग में रंगी हैं. यहां आ रहे श्रद्धालु आराम से राम मंदिर तक जा सकते हैं. सड़क किनारे फुटपाथ भी बनाया गया है.

इस चौड़ीकरण के लिए सैकड़ों दुकानों को तोड़ना पड़ा, कुछ पूरी तरह सड़क में चली गईं तो कुछ अब बस चंद फुट की रह गई हैं.

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इस मार्ग पर अधिकतर दुकानदारों के पास ज़मीन का मालिकाना हक़ नहीं था. यहां अधिकतर संपत्तियां मंदिरों और महंतों के पास हैं.

लेकिन कई परिवार यहां पीढ़ियों से, कुछ 70 साल से भी अधिक समय से किरायेदार थे. समय के साथ कुछ का ज़मीन पर क़ब्ज़ा हो गया था.

विस्तारीकरण के समय बड़ी तादाद में लोग संपत्ति पर मालिकाना हक़ के दस्तावेज़ नहीं दिखा सके और इसी वजह से अधिकतर को बाज़ार दर पर मुआवज़ा नहीं मिल सका.

ऐसे ही एक दुकानदार अपना नाम न ज़ाहिर करते हुए कहते हैं, "हमारी पूरी दुकान चली गई, मुआवज़ा मिला सिर्फ़ डेढ़ लाख. नई दुकान किराये पर ली तो पगड़ी ही बीस लाख से अधिक है. वो दुकान हमारे पास तीन पीढ़ियों से थी, अब हम सड़क पर आ गए हैं. आजीवन बीजेपी को समर्थन किया, कभी सोचा नहीं था कि अयोध्या में राम आएंगे तो हम ही यहां से चले जाएंगे."

सैकड़ों लोग, जिनके घर और दुकानें विस्तारीकरण में गई हैं, सभी की कहानी ऐसी ही है.

सोशल मीडिया पर...

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अयोध्या का एक बड़ा हिस्सा सरयू किनारे बसा है. यहां दशकों से कॉलोनी बन रही है.

पिछले कुछ महीनों से यहां लोगों को उनके घर के सरयू के रीवरबेड में बने होने के नोटिस मिल रहे हैं.

कई लोग, जिनका दावा है कि उन्हें भी नोटिस मिले हैं, अपना नाम न ज़ाहिर करते हुए कहते हैं, "डर लगा रहता है कि कब बुलडोज़र आएगा और हमारे सिर से छत चली जाएगी. हमें हटाने की तो बात हो रही है, लेकिन हमें कहां बसाया जाएगा, इस पर कोई चर्चा नहीं है."

फ़ैज़ाबाद लोकसभा सीट के अंतर्गत पांच विधानसभा सीटें हैं. इनमें से चार पर बीजेपी को हार मिली है और अयोध्या में लल्लू सिंह ने समाजवादी पार्टी के विजेता उम्मीदवार से क़रीब चार हज़ार अधिक मत हासिल किए हैं.

फ़ैज़ाबाद सीट पर बीजेपी की हार के बाद अयोध्या के लोगों को सोशल मीडिया पर हिंदुत्ववादी लोगों की ट्रोलिंग का शिकार होना पड़ रहा है. यहां के लोग इस तरह के संदेशों से आहत हैं.

राजा शर्मा भजन गायक हैं. राजा कहते हैं, "मैंने श्रीराम, मोदी और योगी की महिमा में सैकड़ों भजन गाये हैं. अब बीजेपी की हार के बाद लोग अयोध्यावासियों पर टिप्पणी कर रहे हैं जो ग़लत है. कभी सोचा नहीं था कि राम का नाम लेने वाले अयोध्यावासी गालियां सुनेंगे."

राजा कहते हैं, "अयोध्या के लोगों में प्रत्याशी के लिए ज़बरदस्त नाराज़गी के बावजूद, इस विधानसभा में बीजेपी जीती है. लोगों में आक्रोश था, फिर भी उन्होंने बीजेपी को वोट दिया. हार के लिए यहां के लोग नहीं लल्लू सिंह ज़िम्मेदार हैं, जो लोगों से वोट मांगने ही नहीं गए."

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बीबीसी ने लल्लू सिंह से मुलाक़ात कर उनका पक्ष जानने की कोशिश की. उनके आवास पर मिलने आए अधिकतर लोग उदास हैं. जो कुछ भी बोलने से इनकार करते हैं. लल्लू सिंह भी बीबीसी से नहीं मिले.

बीजेपी की हार को हिंदुत्व की राजनीति की हार के रूप में भी पेश किया जा रहा है.

हनुमानगढ़ी मंदिर से जुड़े हिंदुत्तवादी संत वरुण महाराज कहते हैं, "ये हिंदुत्व की राजनीति की हार नहीं, चुनाव में स्थानीय मुद्दे भी होते हैं, हमारे सांसद के कुछ बयानों की वजह से दलित और पिछड़े वर्ग के लोग अलग हो गए. अयोध्यावासी वीआईपी संस्कृति और बेलगाम अधिकारियों से पीड़ित थे, ये नाराज़गी दिखी है."

वरुण महाराज कहते हैं, "आज अयोध्यावासियों पर टिप्पणियां की जा रही हैं लेकिन लोग ये भूल रहे हैं कि देश में हिंदुत्व की लहर अयोध्या से ही उठी थी. अयोध्या ने ही बीजेपी को सत्ता तक पहुंचाया है. जो लोग अयोध्या के लोगों को गाली दे रहे हैं, वो दरअसल रामभक्तों को गाली दे रहे हैं. जो यहां जीता है, वो भी अयोध्यावासी ही है."

हनुमानगढ़ी मंदिर से जुड़े देवेशाचार्य बीजेपी की हार से हैरान नहीं हैं.

धार्मिक आस्था का विषय

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देवेशाचार्य कहते हैं, "हार से कष्ट है, अफ़सोस है, लेकिन ये हैरानी की बात नहीं है. चुनाव स्थानीय मुद्दों पर हुआ, अयोध्या के लोग वीआईपी कल्चर से त्रस्त हैं. हमारे सांसद ने ना लोगों की बात सुनीं और ना वो वोट मांगने निकले, सिर्फ हिंदुत्व के नाम पर, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चेहरे पर वो कब तक जीतेंगे? लोकतंत्र में लोगों की भी अपनी आवाज़ होती है, जिसे सुना जाना चाहिए."

वरिष्ठ पत्रकार और दो दशकों से फ़ैज़ाबाद में पत्रकारिता कर रहे अरशद अफ़ज़ल ख़ान भी यही राय रखते हैं.

बीजेपी की हार का कारण बताते हुए अरशद ख़ान कहते हैं, "राम मंदिर धार्मिक आस्था का विषय है और अयोध्या के हर व्यक्ति की राम मंदिर में आस्था है. यहां के बाहर के लोगों को ये लग रहा था कि सिर्फ़ राम मंदिर के नाम पर बीजेपी जीत जाएगी. लेकिन इस चुनाव में स्थानीय मुद्दे हावी रहे."

अरशद ख़ान कहते हैं, "अयोध्या में बहुत विकास हुआ, लेकिन ये सिर्फ़ राम मंदिर के तीन-चार किलोमीटर के दायरे तक सीमित रहा. ये फ़ैज़ाबाद के गांवों तक नहीं पहुंचा. पिछले तीन-चार साल से यहां पूरा फोकस राम मंदिर पर था. अधिकारियों और सरकार का पूरा ध्यान मंदिर के जल्द से जल्द निर्माण और चुनावों से पहले उसके उद्घाटन पर था. इसकी वजह से अयोध्या के बाहर, गांवों के, लोगों के मुद्दे पीछे छूट गए. बड़ी आबादी को ये लगा कि उसे नज़रअंदाज़ किया जा रहा है और एक नाराज़गी पैदा हुई. यह बीजेपी की हार का एक कारण है."

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फ़ैज़ाबाद सीट पर पिछड़ों और दलितों वोटों का दलित उम्मीदवार अवधेश प्रसाद के पीछे एकजुट होना उनकी जीत का सबसे बड़ा कारण माना जा रहा है.

अरशद ख़ान कहते हैं, "अखिलेश यादव का पीडीए नारा यहां काम कर गया है. बीएसपी लगातार कमज़ोर हो रही है, उसका वोट इंडिया गठबंधन में शिफ्ट हो गया. मतदान में हिंदुत्ववादी मतदाता उदासीन रहे लेकिन मुसलमानों ने एकजुट होकर मतदान में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया, ये भी इंडिया गठबंधन की जीत का बड़ा कारण है."

फ़ैज़ाबाद से चुनाव जीतने वाले अवधेश प्रसाद मिल्कीपुर सीट से मौजूदा विधायक हैं. वो 9 बार विधायक और समाजवादी सरकार में कई बार मंत्री रह चुके हैं.

79 साल के अवधेश प्रसाद कहते हैं, "भगवान राम ने बता दिया है कि उनका आशीर्वाद किसके साथ है. ये बीजेपी के अहंकार की हार है. ये लोग दावा कर रहे थे कि हम राम को लाये हैं, ये उन राम को लाने का दावा कर रहे थे जो सदियों से अयोध्या में हैं."

अयोध्या के कुछ स्थानीय युवकों के साथ बीबीसी संवाददाता दिलनवाज़ पाशा (तस्वीर में सबसे बायें)
इमेज कैप्शन, अयोध्या के कुछ स्थानीय युवकों के साथ बीबीसी संवाददाता दिलनवाज़ पाशा (तस्वीर में सबसे बायें)

अपनी जीत से बेहद ख़ुश अवधेश प्रसाद कहते हैं, "मोदी जी ने अयोध्या में कई रोड शो किए थे, मुझे लगा था कि मोदी जी अयोध्या से लड़ेंगे, अगर मेरे सामने मोदी जी भी होते तो हार जाते, क्योंकि ये चुनाव मैंने नहीं, अयोध्या की जनता ने लड़ा है. जिस जनता ने बीजेपी को हराया है, वो मोदी को भी हरा देती."

अयोध्या के पास एक पासी (अनुसूचित जाति) बहुल गांव में युवा बेहद ख़ुश हैं.

अपना नाम ना ज़ाहिर करते हुए एक युवा कहता है, "ये हमारे सम्मान का चुनाव था. अखिलेश यादव ने हमारी जाति के अवधेश प्रसाद को टिकट दिया. उन्हें जिताना हमारी अस्मिता से जुड़ा था, मेरे जैसे सैकड़ों दलित युवा, समाजवादी पार्टी को जिताने के लिए दिन-रात लगे थे. हम ख़ुश हैं, हमने संविधान बदलने की बात करने वालों को सबक़ सिखा दिया है, अब कोई संविधान से खिलवाड़ की हिम्मत नहीं कर सकेगा."

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