अहमदाबाद: 21 साल बाद बम बनाने के आरोप से बरी हुए लोगों ने क्या कहा?

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- Author, भार्गव पारिख
- पदनाम, बीबीसी गुजराती के लिए
“वो जीवन का सबसे दुखद दिन था. पुलिस मुझे और मेरे दोस्त को ले गई. पुलिस स्टेशन पहुंचने पर हमें बताया गया कि हमारे घर से बम बनाने का सामान मिला है और हम गुजरात में सांप्रदायिक हिंसा भड़काने के लिए बम बना रहे थे.'
60 साल के इकलाब ढिबड़िया 21 साल तक अदालतों के चक्कर लगाते रहे और इस दौरान उनका घर भी बिक गया. बाबूलाल चाल अहमदाबाद शहर के सरखेज क्षेत्र में स्थित है. दो दशक बाद भी इसकी संकरी गलियों में अभी भी शांत माहौल है.
विस्फ़ोटक मामले में बरी होने के बाद भी एक समय यहां रहने वाले अभियुक्तों का संघर्ष ख़त्म नहीं हुआ. उनका कहना है कि कई लोगों के घर और गहने बिक गए हैं, जबकि कई लोगों को रोजगार की समस्या का सामना करना पड़ रहा है.
दरअसल, साल 2002 में सांप्रदायिक हिंसा के सिलसिले में कथित तौर पर बम बनाने के मामले में ताज मोहम्मद पठान, इकबाल ढिबड़िया, हैदर खान दीवान, मोहीन खान पठान, अशरफ मकरानी और शहजाद शेख को गिरफ़्तार किया गया था.
उन पर विस्फ़ोटक सामग्री रखने से संबंधित धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया था.
लेकिन 21 साल तक चले इस मामले में आखिरकार सितंबर महीने में अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने सभी छह अभियुक्तों को बरी कर दिया.
मामले की सुनवाई के दौरान ताज मोहम्मद पठान, अशरफ मकरानी और शहजाद शेख की मृत्यु हो गई. जबकि मोहिन खान पठान गुजरात छोड़ चुके हैं.
'2002 के बाद ज़िंदगी तबाह हो गई'

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इक़बाल ढिबड़िया कभी शर्बत और फल-जूस की दुकान चलाते थे. लेकिन आज वह एक होटल में बर्तन साफ करने का काम करते हैं. लेकिन चूंकि पुरानी इमारत के प्रति उनके मन में अभी भी भावनाएं हैं, इसलिए वह दिन में एक बार पैदल ही संकरी गलियों से होते हुए इसे देखने जाते हैं.
इकबाल और उनके दोस्त यहां चाल में रहते थे. लेकिन 2002 में सांप्रदायिक हिंसा के बाद उनकी ज़िंदगी बदल गई.
8 मई-2002 को शहर में कर्फ्यू था. दोपहर के वक्त अचानक पुलिस उनके घर आई और उन्हें थाने ले गई. इस तरह कुल छह लोगों को पुलिस ने हिरासत में लिया.
इक़बाल ढिबड़िया ने उस दिन को याद करते हुए बीबीसी से कहा, ''मुझे नहीं पता था कि पुलिस मुझे और मेरे दोस्तों को क्यों उठा रही है. जब हम पुलिस स्टेशन पहुंचे तो हमें बताया गया कि हमारे घर से बम बनाने के उपकरण मिले हैं और हम गुजरात में सांप्रदायिक हिंसा भड़काने के लिए बम बना रहे थे. फिर उन्होंने हमें जेल में डाल दिया.”
इक़बाल आगे बताते हैं, “मेरी पत्नी ने घर की बचत से कुछ पैसे लेकर अदालत में एक वकील को नियुक्त किया और उसके बाद हमें जमानत मिल गई. करीब एक महीने तक जेल में रहने के बाद जब मैं जमानत पर बाहर आया तो मेरी लगभग सारी बचत ख़त्म हो गई. सांप्रदायिक हिंसा के कारण मार्च से कर्फ्यू के कारण मेरा व्यवसाय बंद था, पांच बच्चों और एक पत्नी यानी कुल मिलाकर सात लोगों का परिवार चलाने में बहुत मेहनत करनी पड़ी.”
इक़बाल ने बाहर आकर शर्बत और जूस का कारोबार दोबारा शुरू किया. लेकिन ग्राहक आने बंद हो गए.
इक़बाल बताते हैं, ''लोग कहने लगे थे कि ये चरमपंथी है, बम बनाते हुए पकड़ा गया है, वहां जूस पीने मत जाइए. फिर काम मांगने पर कोई मुझे काम पर नहीं रखता था. उधर, अदालती कार्यवाही जारी रही. कोई उधार नहीं दे रहा था. आख़िरकार कुछ दिनों तक पत्नी के गहने बेचने का काम किया. मुझे घर से कुछ ही दूरी पर एक लकड़ी के चबूतरे पर जलाऊ लकड़ी उठाने का काम मिला, लेकिन अदालत मुझे में जाना होता था, इसलिए बार-बार छुट्टी लेने के कारण मेरी वह नौकरी भी छूट गई.”

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इस मामले ने उन पर और उनके परिवार पर क्या प्रभाव डाला, इस पर उन्होंने बताया, “लड़कों ने पढ़ना बंद कर दिया. ताकि पैसों की बचत हो. फिर बच्चे बड़े हो गए और मुझे उनकी शादी के लिए रिश्तेदारों से पैसे उधार लेने पड़े. जैसे-जैसे कर्ज बढ़ता गया, लोगों की परेशानी बढ़ती गई. इसलिए घर बेचने का फ़ैसला किया. घर बेच दिया और काफ़ी क़र्ज चुका दिया. हमारे पास कोई घर नहीं था इसलिए मेरे जीजा ने हमें अपने घर में आश्रय दिया.”
अदालत की ओर से बरी किए जाने के बाद इकबाल बताते हैं, ''आज, यह ताना मिलना बंद हो गया है कि मैं चरमपंथी हूं. लेकिन अपने जीवन के 21 वर्षों तक 'चरमपंथी' था. आज मैं होटल में बर्तन साफ़ करता हूं, शाम को रिक्शे में सामान लादने का छोटा-मोटा काम करता हूं, खाने का इंतजाम भी मुश्किल से हो पाता है. मुझ पर अब भी ढाई लाख का कर्ज है, पता नहीं कब पूरा होगा. लेकिन जब मैं अपने जीवन के अच्छे दिनों को याद करता हूं, इस गली में अपने पुराने घर के पास बैठकर अच्छे दिनों को याद करता हूं, तो दर्द थोड़ा कम हो जाता है.'
इस मामले में ताज मोहम्मद पठान भी बरी हो गए हैं.
मामले में ताज मोहम्मद भी बरी

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ताज मोहम्मद पठान बचपन से ही एक गैराज में मैकेनिक का काम करते थे. उनके परिवार में चार बेटियां और एक बेटा है. उनकी पत्नी घर की आर्थिक स्थिति को पूरा करने के लिए ब्लीचिंग पाउडर को पानी में घोलकर बेचती थीं.
लेकिन आठ मई 2002 को ताज मोहम्मद घर पर सो रहे थे और अचानक उनके घर पर पुलिस आ गई. उन्हें यह कहकर थाने ले जाया गया कि उनके घर के बाहर पड़ा बम बनाने जैसा सामान मिला है.
इसके बाद ताज मोहम्मद पठान पर मुक़दमा चलाया गया. हालाँकि, उन्हें दिल का दौरा पड़ा. जमानत से रिहा होने के बाद वह काफ़ी समय तक बीमार रहे और चार साल पहले उनकी मौत हो गई.
ताज मोहम्मद की पत्नी धारणा मोहम्मद कहती हैं, ''मेरे पति निर्दोष थे और उन्होंने आख़िरी सांस तक कहा कि मैं देशभक्त हूं. मैंने बम बनाने का कोई अपराध नहीं किया है. उसने कई बार कसम खाई. लेकिन उसके गुज़र जाने के बाद ही उन पर से 'चरमपंथी' होने का आरोप हट पाया.''
धारणा बताती हैं, “उस समय मेरे लड़के छोटे थे, अचानक आई पुलिस को देखकर लड़के डर गए. जब पुलिस हमारे घर आई तो घर के बाहर ब्लीचिंग पाउडर पड़ा हुआ था जिसे मैं तरल रूप में बेच रहा था. उस समय घर में गैस नहीं थी, इसलिए ईंधन लकड़ी और कोयला था. हमारे बगल वाले घर में रहने वाले शहजाद शेख के आँगन में कीलें लगी हुई थीं. तो पुलिस ने उसे भी पकड़ लिया.
"वह बढ़ई का काम करता था. उनके ख़िलाफ़ मुक़दमा दायर किया गया और लोगों ने उन्हें 'चरमपंथी' कहा. इसलिए उन्हें कहीं काम नहीं मिला. अदालत की अवधि पूरी होने के बाद उनकी मृत्यु हो गई. उनका परिवार हमारा पड़ोस छोड़कर कहीं और रहने चला गया.”
'खुशी से मरने का मौका भी नहीं मिला'

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परिवार की मुश्किलों के बारे में धारणा मोहम्मद बताती हैं, "मेरे पति को पुलिस ने पकड़ लिया, इसलिए मैं जो ब्लीचिंग बेच रही थी वह बंद हो गया. मैंने लोगों से भीख मांगकर सिलाई शुरू कर दी. मैं कुछ पैसे कमा रही थी और घर चला रही थी. जब मेरे पति जमानत पर बाहर आए, तो कोई भी मुझे काम नहीं देता था."
"वह एक दिहाड़ी मजदूर थे, लेकिन हृदय रोग के कारण काम नहीं कर सके. मैंने अपनी चार बेटियों की शादी कर दी और अदालत के दबाव के कारण मेरे सारे गहने बिक गए. मेरे बेटे की पढ़ाई छूट गई और उसे मजदूरी करनी पड़ी.”
“मेरे पति को दिल की बीमारी थी. फेफड़ों में पानी भर जाने के कारण उनकी दवाइयों का ख़र्चा भी था. वर्षों तक हमें दाल-रोटी तक नसीब नहीं हुई. ईद पर नये कपड़े नहीं मिले. हमारी हालत ऐसी थी कि सुबह खायें तो शाम को क्या खायें यह समस्या थी. जब मेरे भाई को पता चला कि हम ईद नहीं मना सकते तो उन लोगों ने हमारी मदद की.”
“मेरे पति पर लगे आरोपों के कारण मेरी बेटियों की शादी करना मुश्किल हो गया था. मेरा बेटा अब अच्छा कमाता है इसलिए घर चलता है. अगर उनकी मौत से पहले कोर्ट से फ़ैसला आ गया होता तो वह खुशी-खुशी मर पाते.''
ताज मोहम्मद के बेटे मजार ख़ान ने बीबीसी से कहा, ''अगर मेरे पिता पर बम बनाने का झूठा आरोप नहीं लगा होता तो मैं पढ़ पाता. मेरा बचपन भूख और बेबसी में न बीता होता. आज हमें 21 साल बाद निर्दोष घोषित करने का क्या फ़ायदा? मेरे पिता जीवन भर अपराधी होने का बोझ ढोते रहे. आज मैं एक ट्रांसपोर्ट कंपनी में काम करता हूं. लेकिन पढ़ता लिखता तो अच्छी नौकरी करता और इतने कच्चे घर में नहीं रहना होता.”

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बीबीसी गुजराती ने मामले में बरी हो चुके हैदर खान पठान से भी बात करने की कोशिश की.
लेकिन वे इस बारे में इससे ज़्यादा कुछ नहीं कहना चाहते. उनका यही कहना है कि सरकार के हाई कोर्ट जाने से उन्हें परेशानी होने का डर है. साथ ही, अशरफ़ मकरानी और शहजाद शेख का परिवार अब अतीत पर ध्यान नहीं देना चाहता.
इन सभी छह अभियुक्तों का केस लड़ने वाले वकील उस्मानगी मंसूरी ने बीबीसी गुजराती से बातचीत में कहा, ''फॉरेंसिक रिपोर्ट से साबित हुआ कि पुलिस ने जिसे बम बनाने में इस्तेमाल किया गया ज्वलनशील पदार्थ माना था, वह ब्लीचिंग पाउडर से बना तरल पदार्थ था. जिसका उपयोग बम बनाने में नहीं किया जाता है. वहीं पुलिस यह भी साबित नहीं कर पाई कि चार लीटर पेट्रोल किसका मिला. इसलिए इन छह लोगों को बरी कर दिया गया है. इस मामले में 21 साल में नौ जज बदले गए, इसलिए फ़ैसला आने में काफ़ी वक्त लग गया.'
अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट विपिनकुमार बंसल, जिन्होंने मामले में सभी अभियुक्तों को बरी कर दिया, ने कहा, “इन सभी छह लोगों को विस्फोटकों के विस्फोट के बारे में जानकारी के आधार पर गिरफ़्तार किया गया था. यह स्पष्ट नहीं है कि अपराध में उनकी क्या भूमिका थी, इसलिए सभी को बरी कर दिया गया है.”
बीबीसी गुजराती ने सरकारी अभियोजन पक्ष के वकील से भी बात करने की कोशिश की लेकिन उनसे कोई प्रतिक्रिया नहीं मिल सकी.
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