मायावती अकेले चुनाव लड़कर क्या बीजेपी की मदद कर रही हैं?

    • Author, दीपक मंडल
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

मायावती ने 2024 के लोकसभा चुनाव में अकेले लड़ने का अपना पुराना स्टैंड फिर दोहराया है.

हालांकि उन्होंने चुनाव बाद गठबंधन से इनकार नहीं किया है लेकिन फिलहाल उनकी पार्टी लोकसभा का चुनाव अकेले लड़ेगी.

पिछले साल सितंबर में इंडिया गठबंधन की तीसरी बैठक से चंद दिनों पहले भी उन्होंने कहा था कि उनकी पार्टी बीएसपी अकेले चुनाव लड़ेगी.

मायावती का कहना है कि गठबंधन में चुनाव लड़ने से बीएसपी को नुकसान होता है. ज्यादातर पार्टियां बीएसपी के साथ गठबंधन करना चाहती हैं लेकिन वो इस बार लोकसभा का चुनाव अकेले लड़ेगी.

मायावती के अकेले चुनाव लड़ने के इस ऐलान के साथ ही बीएसपी के विपक्षी दलों के इंडिया गठबंधन में शामिल होने की संभावनाएं खत्म हो गई हैं.

कहा जा रहा था कि कांग्रेस के कुछ नेता आखिरी वक्त तक बीएसपी को इंडिया गठबंधन में लाने की कोशिश कर रहे थे.

फिलहाल बीएसपी के अकेले चुनाव लड़ने के ऐलान के बाद उस पर एक बार फिर बीजेपी की ‘बी’ टीम होने का आरोप लगाया जा रहा है.

कहा जा रहा है कि इससे उत्तर प्रदेश में चुनाव को बीजेपी को मिलकर टक्कर देने की इंडिया गठबंधन की कोशिश को झटका लगा है.

मायावती ने अकेले चुनाव लड़ने का ऐलान कर मुकाबला त्रिकोणीय बना दिया है. क्या उनके इस फैसले का फायदा बीजेपी को होगा?

मायावती का ये कदम क्या इंडिया गठबंधन के लिए झटका है?

ऐसा नहीं है कि मायावती की पार्टी पहली बार अकेले चुनाव लड़ने का ऐलान कर रही है.

सिर्फ 2019 के लोकसभा चुनाव को छोड़ कर हर बार बीएसपी अकेले चुनाव लड़ी है.

लेकिन चुनाव के बाद गठबंधन के जरिये उत्तर प्रदेश में चार बार सरकार बनाने में सफल रही है.

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि मायावती का साथ न आना इंडिया अलायंस को फायदा ही पहुंचाएगा.

वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक शरत प्रधान कहते हैं,''1980 के दशक के उत्तरार्द्ध से देखा जा रहा है कि बीएसपी किस तरह का मौकापरस्त राजनीति करती आ रही है.’’

उनका कहना है,‘’ बीएसपी कब किससे पल्ला झाड़ ले और किसके साथ मिल कर सरकार बना ले कहा नहीं जा सकता. मायावती के साथ न आने से मुकाबला त्रिकोणीय भी हो जाता है तो इंडिया अलायंस को कोई नुकसान नहीं होगा’’

वो कहते हैं,''मुझे तो लगता है कि इंडिया अलायंस वालों को खुश होना चाहिए कि मायावती उनके साथ नहीं आ रही हैं. इसमें वो शामिल होतीं तो मायावती को फायदा होता, इंडिया अलायंस को नुकसान.''

शरत प्रधान का कहना है कि इंडिया अलायंस को बीएसपी की मौकापरस्ती की राजनीति का अंदाजा रहा होगा. लेकिन वो मायावती को साथ लाने की कोशिश करती इसलिए दिखना चाहती है कि उसे दलित विरोधी पार्टी न माना जाए.

क्या मायावती बीजेपी की मदद कर रही हैं?

राजनीतिक हलकों में ये कहा जा रहा है बीएसपी अकेले चुनाव लड़कर बीजेपी की मदद कर रही है. इससे एंटी बीजेपी वोट दो खेमों में बंट जाएगा.

वोटरों का एक खेमा समाजवादी और कांग्रेस पार्टी की ओर जाएगा और दूसरा खेमा बीएसपी के पास. इसका फायदा बीजेपी को होगा.

2019 में समाजवादी पार्टी और बीएसपी ने मिलकर लोकसभा की 15 सीटें जीती थीं. लेकिन इस बार अलग-अलग चुनाव लड़ने से दोनों को नुकसान होगा.

शरत प्रधान कहते हैं, "पिछले दो साल से मायावती के जो बयान और कार्यकलाप रहे हैं वो निश्चित रूप से बीजेपी को फायदा पहुंचाने वाले रहे हैं.''

वो कहते हैं, ''इसमें कोई शक नहीं है कि वो बीजेपी और नरेंद्र मोदी के कहने पर काम करती हैं.''

वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक शरद गुप्ता भी शरत प्रधान की राय से इत्तफ़ाक रखते हैं.

वो कहते हैं,''अकेले लड़ कर वो बीजेपी की मदद कर रही हैं. यही काम उन्होंने 2022 के विधानसभा चुनाव में किया था. कांग्रेस के वोट गिर कर दो फीसदी पर आ गए. उसे सिर्फ एक सीट मिली. समाजवादी पार्टी को भी नुकसान हुआ और बीएसपी को भी.''

शरद गुप्ता कहते हैं,‘’जब भी अपोजिशन में यूनिटी कम होगी उससे सत्तारुढ़ दल को भी फायदा होगा. मायावती का ये कदम साफ तौर पर बीजेपी को फायदा पहुंचाने वाला साबित होगा.’’

मायावती कहती हैं कि उनकी पार्टी अकेले चुनाव लड़ेगी क्योंकि बीएसपी का वोट दूसरों को तो ट्रांसफर हो जाता है लेकिन दूसरी पार्टियों का वोट इसे ट्रांसफर नहीं होता.

लेकिन शरद गुप्ता कहते हैं,''2019 के लोकसभा चुनाव में बीएसपी को दस सीटों पर जीत मिली थी, जबकि समाजवादी पार्टी की पांच सीटें आई थीं. 2014 के चुनाव बीएसपी अकेले लड़ी थी और वो एक भी सीट नहीं जीत पाई थी.''

''इसलिए उनका ये कहना गलत है कि बीएसपी का वोट ट्रांसफर होता है दूसरों का नहीं. ऐसा नहीं होता तो बीएसपी शून्य से दस सीटें पर नहीं पहुंचती.’''

शरद गुप्ता बताते हैं कि 2019 के चुनाव में मिलकर चुनाव लड़ने में समाजवादी पार्टी को ज्यादा नुकसान हुआ था. इसलिए समाजवादी पार्टी ने इस बार कांग्रेस के सामने ये शर्त रखी कि यूपी में किसी भी पार्टी को इंडिया अलायंस में शामिल करने से पहले वो इससे पूछेगी.

वो कहते हैं इसके लिए कांग्रेस को कुछ हद तक तैयार भी है. दोनों का तालमेल लगभग हो चुका है सिर्फ औपचारिक घोषणा बाकी है. देखा जाए तो मायावती के पास अब कोई ऑप्शन नहीं है. इसीलिए उन्होंने घोषणा की कि वो किसी से अलायंस नहीं करेंगीं.

मायावती ने 2017 के विधानसभा में 100 मुस्लिम उम्मीदवारों को उतार कर चौंका दिया था. राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि उन्होंने इसके जरिये बीजेपी के पक्ष में हिंदू वोटों के ध्रुवीकरण की कोशिश की थी.

मायावती की बीजेपी की मदद करने के ऐसे ही कदमों की वजह से गैर जाटव दलितों जैसे धोबी, पासी, खटिक, दुसाध, पासवान और नोनिया जाति के वोटरों ने दूसरी पार्टियों में अपना भविष्य तलाशना शुरू कर दिया.

क्या बीजेपी मायावती को डरा रही है?

राजनीतिक हलकों में इस बात की चर्चा है आय से अधिक संपत्ति को लेकर मोदी सरकार ने मायावती पर शिकंजा कस रखा है. इसलिए उनका बीजेपी का साथ देना मजबूरी बन गई है.

शरत प्रधान कहते हैं,'' इसमें कोई शक नहीं है कि मोदी सरकार में ईडी और सीबीआई का जिस तरह इस्तेमाल होता है, उसमें दौलतमंद राजनीतिक नेताओं को डरना पड़ता है. मायावती के पास आय से अधिक संपत्ति कुछ ज्यादा है इसलिए उन्हें ज्यादा डर है.''

शरद गुप्ता भी इसी ओर इशारा करते हुए कहते हैं कि कुछ न कुछ ऐसी चीजें हैं जो उनके हाथ में नहीं है. इसलिए उन्होंने अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया है. आकाश आनंद को प्रोजेक्ट करने के लिए मायावती ने खुद को पीछे कर लिया है.

वो कहते हैं,‘’ लेकिन इस बार ऐसा लग रहा है कि बहुजन समाजवादी पार्टी और समाजवादी पार्टी से अल्पसंख्यक वोटर खुश नहीं हैं.ऐसी स्थिति में ये वोटर कांग्रेस की ओर जा सकते हैं. ऐसे में कांग्रेस को फायदा होगा. इस हालात का निश्चित तौर पर बीएसपी को नुकसान होगा. ‘’

लेकिन वरिष्ठ पत्रकार सुनीता ऐरन कहती हैं, ''मायावती का व्यक्तित्व ईडी से डरने वाला नहीं है. उन्होंने सिर्फ अपनी राजनीतिक शैली बदली है.’’

बहुजन समाज पार्टी की ढलान

2014 के लोकसभा चुनाव में बहुजन समाज पार्टी एक सीट भी जीत नहीं पाई थी. इसके बाद से उनकी चुनावी ताकत लगातार कमजोर होती रही है.

2017 के विधानसभा चुनाव में उसे 403 सीटों में से सिर्फ 19 सीटें ही मिल पाईं.

ये 1991 के बाद उसका सबसे खराब प्रदर्शन था जब उसने 12 सीटें जीती थीं. 2012 के विधानसभा चुनाव में इसने 80 सीटें जीती थीं.

2022 के विधानसभा चुनाव में बहुजन समाज पार्टी सिर्फ एक सीट जीत सकी. विधानसभा चुनावों में बीएसपी का वोट प्रतिशत घट कर तब तक 12.88 फीसदी पर आ पहुंचा था.

पंजाब, राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में बीएसपी के पास चार से आठ फीसदी वोटरों का आधार है लेकिन पार्टी यहां भी इसका इस्तेमाल नहीं कर पा रही है.

कई राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि मायावती की पार्टी अब उतार पर और धीरे-धीरे ये लोगों को दिलोदिमाग से पूरी तरह उतार जाएगी.

लेकिन वरिष्ठ पत्रकार सुनीत ऐरन कहती हैं मायावती को इतनी जल्दी खारिज नहीं करना चाहिए क्योंकि यूपी में अभी भी उनके पास 12 फीसदी वोट हैं. उनकी ताकत का पता 2024 के चुनाव में चलेगा.

इससे पता चलेगा कि उनके कोर वोटर किस हद तक उनके साथ खड़े हैं. अभी भी दलितों वोटरों का एक बड़ा हिस्सा उनका समर्थन करता है.

कहा जा रहा है कि मायावती अब जमीनी राजनीति नहीं करतीं. उनका अपने समर्थकों से संपर्क कम हो गया है. अब वो सिर्फ आर्मचेयर राजनीति करती हैं. कभी-कभार एक-आध रैली में हिस्सा ले लेती हैं या फिर एक बंधा-बंधाया बयान जारी कर देती हैं.

उनके इस अंदाज पर सुनीता ऐरन कहती हैं.’’ 2007 में चौथी बार मुख्यमंत्री बनने से पहले वो लोगों से काफी मिलती-जुलती थीं. इस दौरान उनके दिमाग में ये बिठाया गया कि उनकी जान को खतरा है. सिक्योरिटी के नाम पर वो घर और दफ्तर में कैद हो गईं.’’

सुनाती ऐरन कहती हैं, ''2012 से उनकी राजनीति में बदलाव देखने को मिला. उन्होंने उग्र नारे देना बंद कर दिया था. बिना कहीं गए उन्हें 19 से 20 फीसदी वोट मिल जाया करते था. उनका वोट भी ट्रांसफर हो जाता था. इसलिए उनसे लोग गठबंधन करने के लिए उत्सुक रहते थे होते थे. एक समय था जब अटल बिहारी वाजपेयी सिर्फ यूपी में नहीं पूरे देश में बीएसपी से अलायंस चाहते थे.''

वो कहती हैं,''बीजेपी बहुत कोशिश कर रही है कि दलित वोट उसके पास आ जाए. जो पहले कांग्रेस और बीएसपी के साथ था. लेकिन वो चाहती है कि दलित वोट बगैर बीएसपी के उसके पास आए. 2024 का इंतजार करिये अगर उनका वोट छह से सात फीसदी रह जाए तो कह सकते हैं कि अब वो राजनीतिक तौर पर अप्रासंगिक हो रही हैं.''

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