उत्तर प्रदेश चुनाव : अमित शाह को अचानक मायावती की याद क्यों आई?

    • Author, सरोज सिंह
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

उत्तर प्रदेश में कुल सात चरणों में चुनाव होने हैं, जिसमें से तीन चरण के चुनाव हो चुके हैं.

तीसरे चरण के चुनाव ख़त्म होने के बाद बीजेपी नेता और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने प्राइवेट न्यूज़ चैनल न्यूज़-18 को साक्षात्कार दिया है.

इस साक्षात्कार में उन्होंने बहुजन समाज पार्टी के बारे में कही कुछ बातों पर राजनीतिक विश्लेषकों का ध्यान गया है.

चुनाव के तीन चरण होने के बाद उनके इस बयान के कई मायने निकाले जा रहे हैं.

सवाल बयान की टाइमिंग को लेकर भी उठ रहे है.

पढ़िए उस साक्षात्कार का एक हिस्सा.

एंकर : बीएसपी को इस चुनाव में आप कैसे देखते हैं?

अमित शाह : बीएसपी ने अपनी रेलिवेंसी बनाई हुई है. मैं मानता हूँ कि उनको वोट आएंगे. सीट में कितना कन्वर्ट होगा, वो मालूम नहीं, लेकिन वोट आएंगे.

एंकर : जाटव वोट उनका नहीं खिसकेगा, वो उनके साथ रहेगा?

अमित शाह : (सहमति में सिर हिलाते हैं)

एंकर : और कोई वोट बैंक जुड़ेगा?

अमित शाह : मुसलमान भी काफ़ी बड़ी मात्रा में जुड़ेंगे. काफ़ी सीटों पर जुड़ेंगे.

एंकर : तो क्या उसका फ़ायदा आपको मिलेगा ?

अमित शाह : फ़ायदा- नुक़सान ऐसे नहीं होता है. वो सीट स्पेसिफ़िक होता है. राजनीति में इस तरह के आकलन नहीं होते. परंतु बीएसपी की रेलिवेंसी ख़त्म हो गई है, ये बात ठीक नहीं है.

अमित शाह के बयान की टाइमिंग

अब तक उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को कुछ राजनीतिक विश्लेषक दो-तरफ़ा कांटेस्ट करार दे रहे थे, वहीं अमित शाह के इस बयान ने चुनाव के त्रिकोणीय होने का संकेत दिया है. जानकार उनके इस बयान को मुसलमान वोटर को कन्फ्यूज़ करने वाला बता रहे हैं.

इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के जीबी पंत सोशल साइंस इंस्टीट्यूट के निदेशक प्रोफ़ेसर बद्रीनारायण उन विश्लेषकों में से हैं जिन्होंने मायावती की अहमियत को इस चुनाव में कभी भी नजरअंदाज नहीं किया.

बद्री नारायण कांशीराम द लीडर ऑफ़ दलित्स समेत कई किताबें लिख चुके हैं. पिछले साल छपी उनकी किताब रिपब्लिक ऑफ़ हिंदुत्व भी चर्चा में रही है.

अमित शाह के बयान के बारे में बीबीसी से बातचीत में वो कहते हैं, "बीएसपी के वोटर कैसे वोट करेंगे? इसकी जानकारी राजनीतिक दलों को पहले नहीं होती है और ना ही राजनीतिक विश्लेषकों को. जब पहले तीन चरणों की वोटिंग की समीक्षा राजनीतिक दलों ने की होगी, तब उन्हें अंदाजा लगा होगा कि बीएसपी के वोटर ज़मीन पर हैं और उनको वोट कर रहे हैं. अमित शाह को भी ऐसा फीडबैक मिला होगा. इस वजह से चुनाव के इस मोड़ पर वो इस तरह की बात कर रहे हैं. मैं हमेशा से कह रहा हूँ ये चुनाव त्रिकोणीय हैं."

प्रोफ़ेसर बद्रीनारायण, अमित शाह के बयान को बीजेपी की चुनावी रणनीति से जोड़ कर नहीं देखते.

अगर चुनाव त्रिकोणीय हुए तो...

लेकिन वरिष्ठ पत्रकार सुनीता एरॉन इस बात से पूरी तरह इत्तेफ़ाक नहीं रखती.

सुनीता एरॉन ने कई किताबें लिखी हैं, जिनमें 'अखिलेश यादव : विंड्स ऑफ़ चेंज़' शामिल है. इस बार के चुनावी कवरेज में वो काफ़ी सक्रिय हैं.

बीबीसी से बातचीत में वो कहती हैं, "अमित शाह के इस तरह के बयान देने से हो सकता है कि कुछ मुसलमान वोट बंट जाए. अगर मायावती को एक मुख्य चैलेंजर के तौर पर पेश किया जाता है, तो मुसलमान हो या फिर जाटव, वो उन्हें वोट देंगे. लोग उसी को वोट देना चाहते हैं, जिनमें वो जीत की संभावना देखते हैं. कोई भी हारने वाले कैंडिडेट के लिए वोट नहीं करना चाहता. एक पर्सेप्शन ये बन रहा है कि इस चुनाव में मुसलमान समाजवादी पार्टी के साथ है. अगर उस वोट में बंटवारा होता है तो बीजेपी को फ़ायदा होगा."

यहाँ ग़ौर करने वाली बात है कि पश्चिम उत्तर प्रदेश में चुनाव ख़त्म हो चुके हैं और अब पूर्वी उत्तर प्रदेश की बारी है. पूर्वी उत्तर प्रदेश के बहराइच, गोंडा, आज़मगढ़, मऊ, वाराणसी जैसे इलाकों में मुसलमान वोटरों की तादाद काफ़ी है.

सुनीता एरॉन उन विश्लेषकों में से एक हैं जो इस बार के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को समाजवादी पार्टी गठबंधन बनाम भाजपा गठबंधन मानती हैं. लेकिन वे साथ ही जोड़ती हैं कि कुछ सीटों पर मुकाबला त्रिकोणीय हो सकता है, जहाँ कहीं कांग्रेस लड़ाई में है और कहीं मायावती के उम्मीदवार टक्कर दे सकते हैं.

वो आगे कहती हैं, "इन चुनावों में सपा-भाजपा की आमने सामने की लड़ाई भाजपा को सूट नहीं करती है. वो हमेशा चाहेगी कि चुनाव में लड़ाई, त्रिकोणीय हो या फिर चौतरफ़ा हो, ताकि विपक्ष के वोट आपस में बंट जाएं. वहीं समाजवादी पार्टी को सूट करता है कि चुनाव भाजपा बनाम सपा हो, ताकि फ्लोटिंग वोटर भी उनकी तरफ़ आ जाएं और उन्हें मज़बूती मिले."

बीएसपी क्यों है रेलिवेंट?

इस बार के चुनाव में मायावती को पूरी तरह दरकिनार नहीं किया जा सकता. ऐसा प्रोफ़ेसर बद्रीनारायण मानते हैं. वो अपने इस बयान के पीछे तीन कारण गिनाते हैं.

"पहली वजह - मायावती का वोट प्रतिशत किसी भी चुनाव में 20 फ़ीसदी से नीचे नहीं गया. साल 2017 के विधानसभा चुनाव में बीएसपी को तक़रीबन 22 फ़ीसदी वोट मिले थे. यानी उनका बेस वोट पिछले चुनाव तक जस का तस बना हुआ था. जिस पार्टी के पास 20 फ़ीसदी के आसपास का बेस वोट हो, उसे चुनाव में कभी दरकिनार नहीं किया जा सकता. मायावती के बेस वोट जाटव वोट माना जाता है, जो 11-12 फ़ीसदी के आसपास माना जाता है.

दूसरी वजह - जिस तरह से मायावती ने टिकटों का बंटवारा किया है, उसमें जाति और सोशल इंजीनियरिंग दोनों को ध्यान में रखा है. उन्होंने टिकट बंटवारे में दलित, मुसलमान और ब्राह्मण सभी का ख़्याल रखा है. इसी केमिस्ट्री को 2007 में उन्होंने अपनाया था. ये सभी अगर अपने-अपने समाज के 5 प्रतिशत वोट भी ले आते हैं, तो बीएसपी का वोट प्रतिशत 25 के ऊपर भी जा सकता है. कई सीटों पर ये वोट चुनाव के नतीजे बदल सकते हैं. कई जगह जीतने वाले का मार्जिन कम हो सकता है, कई जगह ये जीत दिला सकते हैं या फिर कई सीटें ये जीत सकते हैं.

तीसरी वजह - इस बार के चुनाव में एक बात साफ़ है कि किसी पार्टी की कोई लहर नहीं है. ऐसे में जिस पार्टी के पास काडर है और अच्छा जातिगत गठजोड़ है, उसको फ़ायदा होगा. बीजेपी दोनों मामले में आगे हैं. समाजवादी पार्टी और बीएसपी तीनों के पास इस समय अच्छा काडर है, तो तीनों को इसका फ़ायदा मिलेगा."

इन तीनों आधार पर प्रोफ़ेसर बद्रीनारायण कहते हैं कि मायावती को दरकिनार नहीं किया जा सकता. लेकिन सीटें कितनी मिलेंगी, ये चुनाव के नतीजे ही बताएंगे.

दरअसल अखिलेश यादव भी टिकट बंटवारे में मायावती की ही सोशल इंजीनियरिंग पर फोकस करते दिख रहे हैं. मुस्लिम-यादव वोट बैंक के साथ साथ वो ग़ैर यादव ओबीसी वोट बैंक पर नज़र बनाए हुए हैं.

सुनीता एरॉन कहती हैं कि इस बार अगर बीएसपी का वोट प्रतिशत 20 फ़ीसदी से नीचे जाता है, तो इसका मतलब होगा कि जाटव वोट बैंक शिफ़्ट हो रहा है. ये चुनाव इस लिहाज से मायावती के लिए अहम हैं.

मुखर कांग्रेस और आज़ाद समाज पार्टी

ऐसे में सवाल उठता है कि मायावती का वोट शेयर किन हालात में कम हो सकता है?

माना जाता है कि कांग्रेस के कमज़ोर होने से मायावती को फ़ायदा होता है. तो क्या इस बार यूपी में कांग्रेस के मुखर होने से मायावती को कुछ नुक़सान होगा?

इस पर प्रोफ़ेसर बद्रीनारायण कहते हैं कांग्रेस परसेप्शन की लड़ाई में ही दिख रही है. ज़मीन पर कांग्रेस वैसी नहीं है. सुनीता एरॉन भी इससे सहमत दिखती है. दोनों मानते हैं कि कांग्रेस के पास उत्तर प्रदेश में काडर नहीं है

कांग्रेस के अलावा आज़ाद समाज पार्टी के चन्द्रशेखर भी इस बार चुनाव मैदान में है और 180 सीटों पर उनकी पार्टी के उम्मीदवार भी चुनाव लड़ रहे हैं. मायावती और चन्द्रशेखर एक ही वोट बैंक को टारगेट कर रहे हैं, ऐसे में क्या वोटों का बंटवारा नहीं होगा? ये देखना अभी बाक़ी है.

हालांकि अमित शाह के इस बयान को कुछ जानकार चुनाव बाद गठजोड़ की राजनीति से जोड़ कर भी देख रहे हैं.

न्यूज़ 18 के साक्षात्कार में ही उनसे इस बारे में जब पूछा गया कि चुनाव बाद बीएसपी के साथ भाजपा के गठबंधन की संभावना है? इस पर अमित शाह ने कहा कि पूर्ण बहुमत से बीजेपी सत्ता में वापसी कर रही है इस वजह से उन्हें चुनाव के बाद किसी पार्टी के समर्थन की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी.

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