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मायावती की ब्राह्मणों और मुसलमानों को साधने की कोशिश
- Author, समीरात्मज मिश्र
- पदनाम, लखनऊ से, बीबीसी हिंदी के लिए
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में 'प्रबुद्ध सम्मेलन' के साथ प्रचार अभियान की शुरुआत करने वाली बहुजन समाज पार्टी ने मंगलवार को इस सम्मेलन का समापन किया.
अयोध्या से शुरू करके राज्य के सभी ज़िलों में प्रबुद्ध सम्मेलन आयोजित करने के बाद राजधानी लखनऊ में इसका समापन हुआ.
राज्य की पूर्व मुख्यमंत्री और बीएसपी प्रमुख मायावती ने सम्मेलन को संबोधित किया और अपनी पार्टी की सरकार बनने पर ब्राह्मणों को सम्मान और सरकार में सहभागी बनाने का भरोसा दिलाया.
सम्मेलन की सबसे ख़ास बात तो यह रही कि साल 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद यह पहला मौक़ा था जब मायावती किसी सार्वजनिक मंच पर दिखीं .
दूसरी ख़ास बात रही-मायावती का पार्टी महासचिव सतीश चंद्र मिश्र पर पूरा भरोसा जताते हुए उनकी पत्नी कल्पना मिश्रा को पार्टी के साथ महिलाओं को जोड़ने की महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी देना.
सम्मेलन में शंख, त्रिशूल और मंत्रोच्चारण
23 जुलाई को सम्मेलन की शुरुआत अयोध्या से हुई थी और उस सम्मेलन में सतीश चंद्र मिश्र के बेटे कपिल मिश्र मंच पर दिखे थे और बाद में उन्होंने कुछ मंचों पर भाषण भी दिए.
प्रबुद्ध वर्ग सम्मेलन की शुरुआत में बहुजन समाज पार्टी के पारंपरिक नारों के अलावा "जय श्रीराम" जैसे नारे भी लगे थे और मंगलवार को लखनऊ में हुए सम्मेलन में भी इन नारों की धूम रही. सम्मेलन में शंख बजे, मंत्रोच्चारण हुआ, त्रिशूल लहराए गए और जगह गणेश प्रतिमाएं भी नज़र आईं.
बीएसपी प्रमुख मायावती ने ब्राह्मण समाज को आश्वस्त किया कि वो अन्य राजनीतिक दलों के बहकावे में न आएं और बीएसपी पर भरोसा करें.
बीजेपी पर निशाना साधते हुए उन्होंने साफ़तौर पर कहा कि बीजेपी के शासन काल में ब्राह्मणों पर अत्याचार बढ़ा है.
उनका कहना था, "राज्य में बीजेपी की सरकार के दौरान ब्राह्मणों पर जो एक्शन हुआ, उसकी जाँच कराई जाएगी. जो भी अधिकारी दोषी पाए जाएंगे, उन पर कार्रवाई की जाएगी. बीएसपी के शासन में ब्राह्मणों के मान-सम्मान और सुरक्षा का पूरा ध्यान रखा जाएगा."
ब्राह्मणों के साथ हमेशा अत्याचार हुआ: मायावती
मायावती का कहना था, "ब्राह्मणों के साथ हमेशा अत्याचार और अन्याय हुआ. बीएसपी ने ब्राह्मण समाज के सम्मान, उनकी सुरक्षा और तरक़्क़ी के लिए पहले चरण में सभी ज़िलों में उनकी संगोष्ठी करके उन्हें जोड़ा गया है. ब्राह्मण समाज की भागीदारी ने सभी विरोधी पार्टियों को चिंतित किया है.''
उन्होंने कहा, ''ब्राह्मण समाज ने इनके अत्याचार को जवाब देते हुए एक बार फिर बीएसपी की पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने का संकल्प ले लिया है."
मायावती ने अपने भाषण में कृषि क़ानूनों का भी विरोध किया और साफ़ कर दिया कि उनकी पार्टी की सरकार आने पर कृषि क़ानून यहां लागू नहीं किए जाएंगे. किसान आंदोलन का उन्होंने एक बार फिर समर्थन करते हुए केंद्र सरकार पर निशाना साधा.
उनका कहना था, "भाजपा सरकार में किसानों की आय दोगुना तो नहीं हुई, लेकिन तीन काले कृषि क़ानून लाकर उनपर अत्याचार ज़रूर किया गया. किसानों के साथ बहुजन समाज पार्टी संसद से सड़क तक खड़ी है.''
''हरियाणा सरकार ने अत्याचार करते हुए किसानों पर लाठीचार्ज किया, जो घोर निंदनीय है. बसपा सरकार में गन्ने का मूल्य 125 रुपए प्रति कुंतल से बढ़ाकर 250 रुपए प्रति कुंतल किया गया था."
'मुसलमानों से सौतेला व्यवहार क्यों?'
मायावती ने आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के एक बयान पर टिप्पणी करते हुए कहा कि अगर हिंदुओं और मुसलमानों के पूर्वज एक ही थे तो बीजेपी मुसलमानों से सौतेला व्यवहार क्यों करती है?
उन्होंने समाजवादी पार्टी और कांग्रेस पर भी मुसलमानों के साथ भेदभाव करने का आरोप लगाया.
मायावती ने कहा, "मुसलमानों को तबाह और बर्बाद करने के मामले में सपा और कांग्रेस भी कम नहीं रही हैं. पश्चिमी यूपी में मेरठ का मलियाना और मुज़फ़्फ़रनगर कांड मुसलमानों को नहीं भूलना चाहिए."
बीएसपी नेता मायावती ने साफ़ कर दिया कि उनकी पार्टी साल 2007 की तरह सोशल इंजीनियरिंग के ज़रिए अपने सियासी समीकरणों को सुधारना चाहती है.
साल 2007 में मायावती ने दलित-ब्राह्मण गठजोड़ का फ़ॉर्मूला आज़माया था और राज्य में पहली बार बीएसपी की पूर्ण बहुमत की सरकार बनी थी. उस चुनाव में मायावती ने 86 ब्राह्मण प्रत्याशियों को टिकट दिया था, जिसमें से 41 उम्मीदवार जीते थे.
इस बार अन्य दल भी इस फ़ॉर्मूले पर चलने की कोशिश कर रहे हैं.
ब्राह्मणों को लुभाने की कोशिश
भारतीय जनता पार्टी ने भी प्रबुद्ध वर्ग सम्मेलन के बहाने ब्राह्मणों को साधने की शुरुआत की है और समाजवादी पार्टी भी अलग-अलग शहरों में इस तरह के सम्मेलन करने की तैयारी कर रही है और जुलाई महीने से ही इसकी शुरुआत भी कर चुकी है. पार्टी ने प्रमुख ब्राह्मण नेताओं को ये ज़िम्मेदारी सौंप रखी है.
साल 2017 के चुनाव में ब्राह्मणों ने बड़ी संख्या में भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में मतदान किया था लेकिन सरकार बनने के बाद से ही ब्राह्मणों के उत्पीड़न के आरोप लगने लगे.
ख़ासकर तब, जब पिछले साल जुलाई में कानपुर में बिकरू गांव में आठ पुलिसकर्मियों की हत्या के बाद हिस्ट्रीशीटर विकास दुबे और उनके छह साथियों की अलग-अलग पुलिस मुठभेड़ में मौत हुई थी.
बीएसपी नेता सतीशचंद्र मिश्र ने सभी प्रबुद्ध सम्मेलनों में इसकी चर्चा की और मुठभेड़ में मारे गए अमर दुबे की पत्नी ख़ुशी दुबे को जेल में रखे जाने के लिए सरकार को दोषी ठहराया.
सतीश मिश्र की आलोचना
वहीं, बेटे और पत्नी को राजनीति के मैदान में उतारने के लिए पार्टी महासचिव सतीश चंद्र मिश्र की पार्टी के भीतर आलोचना भी हो रही है.
खुले तौर पर भले ही इस पर कोई चर्चा नहीं कर रहा है लेकिन सोशल मीडिया के ज़रिए सतीश चंद्र मिश्र इस बात के लिए लोगों के निशाने पर हैं.
पार्टी के एक बड़े नेता ने नाम न छापने की शर्त पर बीबीसी को बताया कि उत्तराधिकार तय करने के मामले में सतीश चंद्र मिश्र पार्टी प्रमुख मायावती से भी आगे चले गए.
उनका कहना था, "सतीश चंद्र मिश्रा ने बहुत चालाकी से अपने पूरे परिवार को राजनीति में लॉन्च कर दिया है. पार्टी में पत्नी को अहम भूमिका दिला दी, आगे बेटे को भी कुछ न कुछ मिलेगा ही. दामाद और कई रिश्तेदार तो पहले से ही पार्टी में महत्वपूर्ण बने हुए हैं."
साल 2007 में बीएसपी की जब पूर्ण बहुमत की सरकार बनी थी, उस वक़्त भी सतीश चंद्र मिश्र पर अपने क़रीबी लोगों को ही लाभ पहुँचाने के आरोप लगे थे.
उस दौरान कई अहम पदों पर सतीश चंद्र मिश्र के परिवार के कई सदस्यों की तैनाती भी चर्चा में थी.
इस बात को लेकर उस वक़्त पार्टी में काफ़ी असंतोष भी था और बचाव के लिए ख़ुद मुख्यमंत्री मायावती को आगे आना पड़ा था.
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