उत्तर प्रदेश चुनाव: मायावती पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कितनी मज़बूत हैं?

    • Author, अनंत प्रकाश
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, पश्चिमी उत्तर प्रदेश से लौटकर

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मायावती अब कितनी मज़बूत हैं? ये एक ऐसा सवाल है जो इस चुनाव में बहुजन समाज पार्टी की कथित निष्क्रियता और पिछले चुनाव में पार्टी के कमज़ोर प्रदर्शन से उपजता है.

साल 2017 के विधानसभा चुनाव में बसपा ने मात्र 19 सीटें हासिल की थीं. और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बसपा का प्रदर्शन 2007 के मुकाबले काफ़ी ख़राब रहा.

दिलचस्प बात ये है कि ये उत्तर प्रदेश का वही इलाका है जहां ज़्यादातर सीटों पर दलित और मुसलमान मतदाता निर्णायक स्थिति में हैं.

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पश्चिमी उत्तर प्रदेश की बिजनौर सीट ने जहां मायावती को साल 1989 में पहली बार संसद पहुंचाया था. वहीं, सहारनपुर की हरौड़ा सीट ने 1996 में मायावती को मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचाया था.

इसके बाद धीरे-धीरे इस क्षेत्र में मायावती का राजनीतिक ग्राफ़ और बहुजन समाज पार्टी का ज़मीनी आधार बढ़ता गया. लेकिन अगर मौजूदा दौर की बात करें तो ये एक ऐसा क्षेत्र है जिस पर बीजेपी से लेकर समाजवादी पार्टी और कांग्रेस की नज़र है.

पश्चिमी उत्तर प्रदेश ने पीएम मोदी को प्रधानमंत्री बनाने से लेकर योगी को सीएम बनाने में एक अहम भूमिका निभाई है. और इस बार भी पीएम मोदी से लेकर अमित शाह, जेपी नड्डा समेत बीजेपी के कई नेता पश्चिमी उत्तर प्रदेश का दौरा कर चुके हैं.

लेकिन चुनाव कार्यक्रम की घोषणा से पहले तक मायावती ने इस क्षेत्र में एक भी रैली नहीं की. सवाल उठाए गए कि क्या मायावती ने चुनाव से पहले ही हार मान ली है?

ऐसा समझा जाता है कि चुनावों में रैलियों, जनसभाओं एवं बाइक रैलियों की अहम भूमिका होती है जिनके ज़रिये पार्टियाँ शक्ति प्रदर्शन भी करती हैं और मतदाताओं को लुभाने का भी प्रयास करती हैं.

ऐसे में सवाल उठता है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में रहने वाली तमाम जातियों, समुदायों और धर्मों को मानने वाले मतदाताओं में बहुजन समाज पार्टी के प्रति फिलहाल क्या रुख है?

बीबीसी की टीम ने हाल ही में पश्चिमी उत्तर प्रदेश की कई सीटों का दौरा करते हुए आम लोगों से मुलाक़ात करके उनके रुख को समझने की कोशिश की.

क्या कहते हैं बिजनौर के लोग?

साल 1989 में मायावती को लोकसभा पहुंचाने वाले बिजनौर के मतदाताओं ने 2017 के चुनाव में यहां की आठ विधानसभाओं में से एक भी सीट पर बसपा उम्मीदवारों पर भरोसा नहीं जताया.

इस तरह यहां की छह सीटें बीजेपी और दो सीटें सपा के खाते में गयीं. लेकिन क्या इससे मायावती की साख को कुछ नुकसान पहुंचा है?

बीबीसी ने यहां की नहटौर विधानसभा सीट के रुखोड़ियो गाँव में जाटव बाहुल्य इलाके में कुछ लोगों से इसी मुद्दे पर बात की.

हाल ही में इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करके नौकरी की तलाश कर रहे स्थानीय युवा धनपत राय मायावती को अभी भी यूपी के तमाम नेताओं से बेहतर बताते हैं.

साल 2007 से 2012 तक रही बसपा सरकार का उदाहरण देते हुए राय कहते हैं, "बहन जी की तुलना किसी से नहीं की जा सकती. उनकी बात ही अलग थी. जब वो थीं तो स्कूलों में, दफ़्तरों में कर्मचारी टाइम से पहुंचा करते थे. सख़्त प्रशासन हुआ करता था. वो औचक निरीक्षण किया करती थीं, ज़िलों में आती थीं. अब क्या होता है? बताइए!"

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धनपत राय जिन औचक निरीक्षणों का ज़िक्र कर रहे थे, वह मायावती के काम करने की एक विशेष शैली के रूप में चर्चित हैं.

साल 2007 से लेकर 2012 तक मायावती कई विभागों में औचक निरीक्षण किया करती थीं जिसके बाद अनुपस्थित या लेट-लतीफ़ कर्मचारियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई से लेकर चेतावनी आदि जारी की जाती थी.

दलित जनाधार

साल 2017 के चुनाव में बीएसपी का वोट प्रतिशत लगभग 22 फीसद रहा था जिससे पता चलता है कि ज़मीन पर अभी भी उनकी साख कम नहीं हुई है.

बिजनौर में रहने वाले एक वृद्ध मतदाता इसकी वजह बताते हुए कहते हैं कि "बहन जी बस कोई नेता नहीं हैं. उनकी वजह से हम शिकायत और सुनवाई तक पहुंचे. कोई दलित के साथ खाना खा ले, कोई पैर धो ले, कोई गले लगा ले...ये सब राजनीति है. वोट की ख़ातिर है. लेकिन बहन जी ने समाज के लिए जो किया है, वो चुनाव से ऊपर है."

नाम पूछने पर मुस्कराकर 'रहने दीजिए' कहने वाले ये मतदाता बीजेपी और कांग्रेस की ओर से दलितों को लुभाने की कथित कोशिशों पर संकेत कर रहे थे.

उत्तर प्रदेश की राजनीति को गहराई से समझने वाले वरिष्ठ पत्रकार हरवीर सिंह मानते हैं कि मायावती ने अपने लंबे राजनीतिक सफर में खुद को दलितों के आइकन के रूप में स्थापित किया है.

वह कहते हैं, "बिजनौर एक आरक्षित सीट हुआ करती थी. और मायावती अपने दूसरे चुनाव में यहां से जीतकर संसद पहुंची थीं. तब बहुजन समाज पार्टी नहीं थी. और इनका बेस वोट दलित जाटव समुदाय हुआ करता था. फिर कांशीराम धीरे-धीरे मजबूती से दलित जाटव को साथ जोड़ते हुए अन्य दलित जातियों एवं अति पिछड़ी जातियों को एक साथ लेकर आए. और मायावती शुरू से इस प्रक्रिया का हिस्सा रहीं. और फिर धीरे-धीरे इनके पास उत्तराधिकार आता गया.

ऐसे में मायावती ने उत्तर प्रदेश में दलितों, ख़ास तौर पर जाटवों को एक पहचान दी है, इसलिए ये उनकी आइकन हैं. उन्होंने दलितों को एक तरह का स्वाभिमान दिया कि दलितों के बीच से एक नेता, वो भी महिला इस राज्य की मुख्यमंत्री बनी और कई बार बनी. ऐसे में उत्तर प्रदेश में कांशीराम के जाने के बाद दलितों की राजनीतिक ताक़त की पहचान मायावती हैं. यही वजह है कि भले ही कोई छोटा समूह इधर-उधर जाए लेकिन जाटव मायावती को मजबूती देने के लिए उनके साथ जुटता है."

चंद्रशेखर आज़ाद को लेकर रुझान?

लेकिन इसी पश्चिमी उत्तर प्रदेश और सहारनपुर क्षेत्र से चंद्रशेखर आज़ाद जैसे युवा दलित नेता भी उभर रहे हैं जिनकी युवाओं के बीच ख़ासी अपील है. इसे मायावती के कम होते प्रभाव के रूप में भी देखा जाता है.

इसके साथ ही मायावती पर एक आरोप लगता रहा है कि उन्होंने समय रहते बहुजन समाज पार्टी में अपना उत्तराधिकारी और दलित नेता पैदा नहीं किया. बसपा में फिलहाल मायावती के बाद दूसरा बड़ा नेता सतीश मिश्र को माना जाता है जो पार्टी की ओर से रैलियां कर रहे हैं.

बसपा के नेता इस मसले पर मायावती का बचाव करते हुए अपनी पार्टी को सर्वजन हिताय-सर्वजन सुखाय वाली पार्टी बताते हैं. लेकिन मतदाताओं के लिए ये काफ़ी नहीं हैं.

ऐसे में सवाल उठता है कि क्या चंद्रशेखर जैसे युवा नेता उत्तर प्रदेश में दलितों का नेतृत्व कर सकते हैं.

इस सवाल पर रुखोड़ियो गाँव में कई लोग एक साँस में 'न' कहते हैं. इस प्रतिक्रिया की वजह पूछने पर जवाब आता है कि "उन्हें बहनजी की ताक़त बनना चाहिए था, न कि सत्ता लोलुप."

हालांकि, बीते दिनों में कई बसपा नेता चंद्रशेखर आज़ाद की पार्टी में शामिल हुए हैं.

इस पर हरवीर सिंह कहते हैं कि "दलित विरोधी अपराधों पर मायावती की ओर से कड़ी प्रतिक्रिया न होने से कुछ प्रतिक्रियात्मक लोग चंद्रशेखर के साथ जाते हैं क्योंकि वे सड़क पर उतरकर प्रतिक्रिया देते हैं."

लेकिन क्या चंद्रशेखर आज़ाद मायावती को किसी तरह की चुनौती दे सकते हैं.

इस सवाल के जवाब में हरवीर सिंह कहते हैं, "आने वाले सालों में ये एक बहुत बड़ी चुनौती होगी कि मायावती की विरासत कैसे शिफ़्ट होती है. लेकिन ये भी एक फ़ैक्ट है कि जबतक मायावती सक्षम हैं, कम से कम उत्तर प्रदेश में किसी दूसरे दलित नेता का आधार या प्रभाव इस तरह का नहीं हो सकता."

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