पेरिस ओलंपिक: भारतीय मुक्केबाज़ लवलीना बोरगोहाईं की हार, टूटीं उम्मीदें

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पेरिस ओलंपिक में रविवार को बॉक्सिंग के 75 किलो वर्ग में भारत की लवलीना बोरगोहाईं चीन की ली कियान से हार गई हैं.
यह मुक़ाबला भारतीय समय के मुताबिक़ दोपहर बाद क़रीब 3 बजे शुरू हुआ था.
अगर लवलीना इस क्वार्टरफ़ाइनल मुक़ाबले को जीतने में क़ामयाब होती तो वो सेमीफ़ाइनल में पहुँच जातीं.
सेमीफ़ाइल में पहुँचने पर उनका कांस्य पदक पक्का हो जाता.
असम के गोलाघाट में रहने वाले लवलीना के पिता टिकने बोरगोहाईं ने रविवार को होने वाले मैच से पहले समाचार एजेंसी एएनआई से बात की थी और उम्मीद जताई थी कि लवलीना जीतेंगी.
उन्होंने कहा था, "आज मेडल के लिए खेल शुरू होने वाले है और ये उसके लिए अहम है. मैं चाहता हूं कि वो अपना 100 फ़ीसदी इस मैच को दे, वो अच्छा खेलेगी तो नतीजा अच्छा होगा."

लवलीना से उम्मीदें
रविवार को लवलीना बोरगोहाईं पेरिस 2024 बॉक्सिंग टूर्नामेंट में ओलंपिक खेलों में दो पदक जीतने वाली पहली भारतीय मुक्केबाज़ बनकर इतिहास रचने के लिए उतरी थीं.
उन्होंने महिलाओं के 69 किलो वर्ग में टोक्यो ओलंपिक में साल 2020 में कांस्य पदक जीता था.
मौजूदा ओलंपिक खेलों में वरीयता प्राप्त एकमात्र भारतीय मुक्केबाज़ लवलीना ने इस सप्ताह की शुरुआत में नॉर्वे की सुन्निवा हॉफ़स्टेड को 5-0 से हराकर अपनी जीत की शुरुआत की थी.
क्वार्टरफ़ाइनल में लवलीना का सामना चीन की शीर्ष वरीयता प्राप्त ली कियान से हुआ. यह पहले से माना जा रहा है कि लवलीना को क्वार्टरफ़ाइनल में एक मुश्किल चुनौती का सामना करना होगा.
ली कियान दो बार ओलंपिक पदक जीत चुकी हैं. उन्होंने टोक्यो में साल 2020 में रजत और रियो में साल 2016 में कांस्य पदक जीता था. ये दोनों पदक उन्होंने 69 किलो वर्ग में जीते थे.
चीन की ली कियान पूर्व विश्व चैंपियन हैं और दो बार की एशियाई चैंपियन भी हैं.

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लवलीना बोरगोहाईं ने पिछले साल मार्च में विमेन वर्ल्ड बॉक्सिंग चैंपियनशिप के 75 किलो वर्ग में स्वर्ण पदक जीता था.
इससे पहले भी लवलीना विश्व चैंपियनशिप में भी दो बार कांस्य पदक जीत चुकी हैं. उन्होंने टोक्यो ओलंपिक में भी कांस्य पदक जीता था.
लवलीना बोरगोहाईं टोक्यो ओलंपिक में पदक जीतने वाली इकलौती भारतीय मुक्केबाज़ थीं.
लवलीना को ओलंपिक के फ़ाइनल में भाग लेने का भरोसा था लेकिन वह सेमीफ़ाइनल मुक़ाबले में विश्व चैंपियन बुसेनाज के हाथों हार गई थीं.
सही मायनों में वह अपनी विपक्षी का ढंग से सामना ही नहीं कर पाई और 5-0 से हारकर उन्हें कांस्य पदक से संतोष करना पड़ा था.
उतार-चढ़ाव का दौर

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लवलीना ओलंपिक में कांस्य पदक जीतने के बाद उस कामयाबी को बरक़रार नहीं रख पाई थीं और 2022 के इस्तांबुल विश्व चैंपियनशिप में एकदम फ्लॉप हो गई थीं.
बाद में कॉमनवेल्थ गेम्स के मुक़ाबलों में उनसे बर्मिंघम में स्वर्ण पदक जीतने की उम्मीद की जा रही थी, पर वह क्वार्टरफ़ाइनल से आगे नहीं बढ़ सकी थीं.
इन ख़राब प्रदर्शनों के बाद कहा जाने लगा कि उनकी संभावनाएं ख़त्म हो गई हैं.
इंटरनेशनल बॉक्सिंग एसोसिएशन ने लवलीना के 69 किलो वर्ग को 2024 के पेरिस ओलंपिक में ख़त्म करके उनकी मुश्किलें और बढ़ा दीं. उनके पास 75 किलो वर्ग में जाने के अलावा कोई चारा नहीं बचा था.
किसी भी मुक्केबाज़ का सपना ओलंपिक और विश्व चैंपियनशिप में पदक जीतना होता है. लवलीना ने विश्व चैंपियनशिप में पदक 2018 में ही पा लिया था लेकिन ओलंपिक में क्वार्टरफ़ाइनल में हारकर वो बाहर हो गई हैं.
मुश्किलों में बीता बचपन

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असम के गोलाघाट जिले में दो अक्टूबर 1997 को जन्मीं लवलीना के घर की हालत ऐसी नहीं थी कि वह इस स्तर की मुक्केबाज़ बनतीं. लेकिन उनके पिता अपनी बेटी के सपने को साकार करने में हरसंभव मदद देने को तैयार थे.
लवलीना की दो बड़ी बहनें लीचा और लीमा हैं. यह दोनों ही किक बॉक्सिंग में भाग लेतीं थीं. इनको देखकर वह भी शुरुआत में ही किक बॉक्सिंग में भाग लेने लगीं. स्कूल से साई सेंटर में भी उनका इस खेल के लिए ही चयन हुआ था.
लेकिन वहां कोच पादुम बोरो ने उनकी सही प्रतिभा को पहचाना और उन्हें बॉक्सिंग अपनाने की सलाह दी.
सही मायनों में लवलीना की हिम्मत और जज़्बा का ही कमाल है कि असम के छोटे से शहर से निकली लड़की आज दुनियाभर में भारतीय तिरंगा फहरा रही है.
मोहम्मद अली की कहानी ने दिखाई राह
लवलीना के पिता टिकने एक बार अपनी बेटी के लिए मिठाई लेकर आए. यह मिठाई एक अखबार में लिपटी हुई थी और उसमें जानेमाने मुक्केबाज़ मोहम्मद अली की कहानी छपी हुई थी.
लवलीना ने बहुत चाव के साथ इस कहानी को पढ़ा. उनके मन में यह घर कर गया कि उन्हें भी एक ऐसा मुक्केबाज़ बनना है, जो देश का नाम रोशन करे.
उनकी यह लगन आज उन्हें इस मुकाम तक पहुंचाने में सफल हो सकी है.
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