उमर ख़ालिद समेत सात अभियुक्तों की ज़मानत पर सुप्रीम कोर्ट सुनाएगा फ़ैसला

    • Author, उमंग पोद्दार
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

सुप्रीम कोर्ट दिल्ली दंगों के मुख्य साज़िश के मामले में सात अभियुक्तों की ज़मानत याचिकाओं पर अपना फ़ैसला सोमवार 5 जनवरी को सुनाएगा.

इन अभियुक्तों में दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र उमर ख़ालिद, शरजील इमाम, गुलफ़िशा फ़ातिमा और चार अन्य अभियुक्त शामिल हैं.

सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एनवी अंजारिया की बेंच ये फ़ैसला सुनाएगी.

इन पर साल 2019 में सीएए (नागरिकता संशोधन क़ानून) विरोध प्रदर्शनों की आड़ में फ़रवरी 2020 में दिल्ली में सांप्रदायिक हिंसा भड़काने की साज़िश रचने का आरोप है.

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अभियुक्तों की दलील है कि वे पांच साल से ज़्यादा समय से जेल में हैं, फिर भी ट्रायल शुरू नहीं हुआ है.

उन्होंने यह भी कहा है कि चूंकि इस मामले में कई अन्य अभियुक्तों को ज़मानत मिल चुकी है, इसलिए उन्हें भी ज़मानत दी जानी चाहिए.

इससे पहले दिल्ली हाई कोर्ट ने सितंबर में इन सभी सात अभियुक्तों की ज़मानत याचिकाएं ख़ारिज कर दी थीं.

बीते पांच सालों से जेल में

छात्र नेता और सामाजिक कार्यकर्ता उमर ख़ालिद सितंबर 2020 से ही जेल में बंद हैं. उन पर आरोप है कि उन्होंने फ़रवरी 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुई हिंसा को भड़काया था. उनके ख़िलाफ़ दो एफ़आईआर दर्ज हैं.

एक मामले में उमर को अप्रैल 2021 में ज़मानत मिल गई थी. दूसरे मामले में उनके ख़िलाफ़ अनलॉफुल एंड ऐक्टिविटिज़ प्रिवेंशन एक्ट यानी यूएपीए के तहत आरोप लगाए गए हैं. इस मामले में अब तक दो अदालतें उनकी ज़मानत याचिका ख़ारिज कर चुकी हैं. सुप्रीम कोर्ट में उनकी ज़मानत याचिका अप्रैल 2023 से लंबित है.

क़ानून के कई जानकारों का कहना है कि उमर ख़ालिद के ख़िलाफ़ जो सबूत हैं वो काफ़ी कमज़ोर हैं इसलिए उन्हें ज़मानत पर बाहर आ जाना चाहिए.

पिछले कुछ महीनों से वकीलों की एक शिकायत थी कि ख़ालिद की ज़मानत याचिका लिस्टिंग के नियमों का उल्लंघन कर एक पीठ के सामने सूचीबद्ध की गई है.

उनके ख़िलाफ़ केस की सुनवाई 2020 से शुरू नहीं हुई है. यहां तक कि उन पर अभी आरोप भी तय नहीं हुए हैं.

उमर ख़ालिद पर आरोप क्या हैं?

नागरिकता कानून में संशोधन (सीएए) के ख़िलाफ़ दिसंबर 2019 में व्यापक पैमाने पर आंदोलन हुआ था. इस संशोधन के बाद मुस्लिमों को छोड़कर हिंदू और जैन जैसे समुदाय के लोगों को नागरिकता दिए जाने की बात थी. उमर ख़ालिद इन विरोध-प्रदर्शनों में शामिल रहे. प्रदर्शन करीब तीन महीने तक चले थे.

फ़रवरी 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में दंगे भड़क उठे थे. इसमें 53 लोग मारे गए. इनमें से अधिकांश मुसलमान थे. अभियोजन पक्ष का आरोप है कि उमर ख़ालिद ने प्रदर्शन के दौरान अन्य लोगों के साथ मिलकर हिंसा की साज़िश रची. इसी वजह से दंगे हुए.

उमर ख़ालिद के ख़िलाफ़ दो एफ़आईआर दर्ज की गईं. एफ़आईआर नंबर 101/2020 को 24 फ़रवरी 2020 को उत्तर पूर्वी दिल्ली में दर्ज कराया गया. इसमें उमर पर दंगा करने, पत्थरबाज़ी और बमबाज़ी करने, दो समुदायों के बीच नफ़रत फैलाने, पुलिस पर हमला करने, सरकारी संपत्ति को नुक़सान पहुंचाने आदि के आरोप हैं.

इस मामले में अभियोजन पक्ष ने आरोप लगाया है कि एक गहरी साज़िश की वजह से दिल्ली में दंगे हुए. अभियुक्तों पर सीएए के ख़िलाफ़ ग़लत जानकारियां फैलाने और सड़क पर चक्का जाम करने का आरोप भी लगाया गया है.

उसका कहना है कि उमर ख़ालिद की पहचान एक गवाह ने की है कि वो इस साज़िश के अभियुक्तों से मिल रहे थे.

वहीं ख़ालिद के वकील का कहना है कि पत्थरबाज़ी के समय वो वहां मौजूद नहीं थे. उनका आरोप है कि उमर ख़ालिद की गिरफ्तारी विरोध की आवाज़ को दबाने की राजनीतिक साज़िश है.

अदालत ने यह देखते हुए कि उमर ख़ालिद हिंसा के समय वहां मौजूद नहीं थे और उनके ख़िलाफ़ कोई ऐसा सबूत नहीं है, जिससे उनकी हिंसा में संलिप्तता साबित कर सके, उन्हें ज़मानत दे दी थी.

अदालत ने ज़मानत देते हुए कहा, ''इस मामले में उमर ख़ालिद को इतनी आधी-अधूरी सामग्री के आधार पर सलाखों के पीछे रखने की इजाज़त नहीं दी जा सकती.'' हालांकि, अदालत ने यह भी कहा कि वह उमर ख़ालिद के ख़िलाफ़ लंबित दूसरे मामले पर कोई टिप्पणी नहीं कर रहा है.

एफ़आईआर नंबर 59

पहले मामले में ज़मानत मिलने के बाद भी उमर ख़ालिद अभी भी जेल में बंद हैं, क्योंकि उनके ख़िलाफ़ एक दूसरी एफ़आईआर दर्ज है. एफ़आईआर संख्या 59/2020 में उमर ख़ालिद और अन्य लोग अभियुक्त बनाए गए हैं.

अन्य धाराओं के अलावा उमर ख़ालिद के ख़िलाफ़ चरमपंथ, साज़िश रचने, यूएपीए के तहत ग़ैर क़ानूनी गतिविधियों और आईपीसी की धाराओं के तहत दंगा फैलाने के आरोप लगाए गए हैं.

सरकार का कहना है कि पिंजरा तोड़ और स्टूडेंट फेडरेशन ऑफ इंडिया जैसे संगठनों ने सीएए के ख़िलाफ़ आंदोलन की साज़िश रची और गतिरोध पैदा किया. इसमें ''पुलिस और अर्धसैनिक बलों पर हमला, सांप्रदायिक हिंसा, गैर मुस्लिमों पर हमला और सरकारी और निजी संपत्ति को नुकसान पहुंचाना'' शामिल है.

सरकार ने उमर ख़ालिद को दंगों का मास्टरमाइंड और दूर से पर्यवेक्षण करने वाला बताया है. इसके लिए सरकार ने अनाम गवाहों के बयान, उन व्हाट्सऐप ग्रुपों जिनसे उमर ख़ालिद जुड़े थे, उनको किए गए फोन कॉल और विरोध-प्रदर्शन के लिए आयोजित बैठकों में उनकी मौजूदगी को आधार बनाया है.

हालांकि उमर ख़ालिद का पक्ष है कि जब दंगे हुए, वो उस समय दिल्ली में मौजूद नहीं थे.

उनका तर्क है कि उन्होंने कोई भड़काऊ भाषण नहीं दिया और न ही हिंसा भड़काई. उनका कहना है कि अभियोजन पक्ष के सबूत किसी भी अपराध को साबित नहीं करते हैं. उनके वकील ने ये भी कहा है कि उमर ख़ालिद के दिमाग़ का आकलन उनके पीएचडी थीसिस से किया जा सकता है, जो उन्होंने झारखंड में आदिवासियों के कल्याण पर लिखी थी.

अदालत का क्या तर्क है?

दिल्ली की कड़कड़डूमा ट्रायल कोर्ट और दिल्ली हाई कोर्ट उमर ख़ालिद की ज़मानत याचिका ख़ारिज कर चुकी हैं. दोनों अदालतों का कहना था कि उमर के ख़िलाफ़ आरोप प्रथम दृष्टया सही थे. अन्य तथ्यों के अलावा न्यायालय ने इन तथ्यों पर भरोसा किया:

  • उमर ख़ालिद कई व्हाट्सऐप ग्रुप का हिस्सा थे, जहां दंगों के अन्य साज़िशकर्ता भी थे जिन्होंने चक्का जाम करने को लेकर चर्चा की थी.
  • दंगे शुरू होने के बाद अन्य अभियुक्तों ने उमर को कई कॉल किए. इससे उनकी दंगों में संलिप्तता का संकेत मिलता है.
  • कई गवाहों, जिनकी पहचान उजागर नहीं की गई है, ने भी ख़ालिद के ख़िलाफ़ आरोप लगाए हैं. उनका कहना है कि ख़ालिद ने 'चक्का जाम' का समर्थन किया, सरकार को उखाड़ फेंकने की अपील की और भड़काऊ भाषण दिया.
  • ख़ालिद ने महाराष्ट्र में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की यात्रा का उल्लेख करते हुए एक भाषण दिया था. एक गवाह के मुताबिक़, उन्होंने लोगों से सड़क पर उतरने को कहा था.

दिल्ली हाई कोर्ट ने यह भी कहा कि उमर ख़ालिद ने क्रांति की अपील की, जिसके बारे में उनका मानना ​​था कि इसका असर उन लोगों पर पड़ सकता है, जो वहां मौजूद नहीं थे और यह ज़रूरी नहीं है कि क्रांति रक्तहीन ही हो.

ज़मानत पर क़ानून क्या हैं?

किसी अभियुक्त को ज़मानत देते समय, अदालत को तीन प्राथमिक बातों को देखना होता है, पहला यह कि क्या अभियुक्त आगे की जांच और मुक़दमे के लिए उपलब्ध होगा, क्या वो भाग सकता है और क्या सबूतों के साथ छेड़छाड़ कर सकता है या गवाहों को डरा-धमका सकता है.

यूएपीए के मामलों में अदालत को आश्वस्त करना होगा कि अभियुक्त के ख़िलाफ़ आरोप प्रथम दृष्टया ग़लत हैं. इसलिए, अक्सर ज़मानत के चरण में ही मामले का एक मिनी-ट्रायल हो जाता है, जहां अदालत यह देखती है कि पहली नज़र में अभियुक्त दोषी लग रहा है या नहीं.

साल 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने यह भी माना था कि ज़मानत पर फै़सला करते समय अदालत सबूतों की जांच नहीं कर सकती है. इसलिए, भले ही अभियोजन पक्ष उन सबूतों पर विश्वास कर रहा है, जो अदालत में अस्वीकार्य हैं, ज़मानत के चरण में उसे ध्यान में नहीं रखा जा सकता है. सुप्रीम कोर्ट के बाद के फै़सलों ने इसे कम करते हुए यूएपीए के तहत ज़मानत दे दी है, इस क़ानून के तहत ज़मानत प्राप्त करना बहुत कठिन है.

इसके बाद भी क़ानून के कई जानकारों का तर्क है कि उमर ख़ालिद के ख़िलाफ़ सबूत अस्पष्ट हैं. इसलिए अदालत को उन्हें ज़मानत देनी चाहिए थी. उनका यह भी तर्क है कि उनके ख़िलाफ़ जो सबूत हैं वो यूएपीए क़ानून लगाने का औचित्य नहीं रखते हैं. उनका कहना है कि केवल व्हाट्सऐप ग्रुप का हिस्सा बनना कोई अपराध नहीं है और चक्का-जाम राजनीतिक दलों द्वारा भी इस्तेमाल किया जाने वाला विरोध का एक वैध रूप है.

उनका कहना है कि कुछ गवाहों के बयान विरोधाभासी थे कि उमर ख़ालिद ने हिंसा भड़काने वाला कोई भाषण नहीं दिया.

वहीं कई लोगों का यह भी कहना है कि हिंसा भड़कने से पहले भाजपा के कई नेताओं ने भड़काऊ भाषण दिए थे, लेकिन उन पर मुक़दमा नहीं चलाया गया.

मामले की लिस्टिंग में क्या कोई ख़ामी है?

उमर ख़ालिद को ज़मानत न देने के अलावा उनकी याचिका को सूचीबद्ध करने के तरीके़ की भी आलोचना हो चुकी है.

उमर ख़ालिद की याचिका पहली बार मई 2023 में सुप्रीम कोर्ट में सूचीबद्ध की गई थी. उस पर सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा गया था. इसके बाद से ही मामला टलता जा रहा है.

पहले मामला इसलिए टला कि दिल्ली पुलिस अधिक समय मांग रही थी. इसके बाद एक जज ने खुद को मामले से अलग कर लिया. इसके अलावा कई बार दोनों पक्षों के वकील उपस्थित नहीं हुए, क्योंकि वे सुप्रीम कोर्ट में संवैधानिक मामलों में शामिल थे.

अक्तूबर 2024 में, उमर ख़ालिद के वकील ने कहा कि उन्हें यह साबित करने के लिए केवल 20 मिनट की दरकार होगी कि ख़ालिद के ख़िलाफ़ कोई मामला नहीं है.

बाद में उनके मामले को यूएपीए की कुछ धाराओं की संवैधानिकता को चुनौती देने वाली याचिकाओं के साथ सूचीबद्ध किया गया.

इस पर उनके वकीलों ने कहा कि इस ज़मानत याचिका की सुनवाई यूएपीए की संवैधानिकता को चुनौती देने वाले मामलों से अलग की जानी चाहिए.

यूएपीए के संवैधानिकता मामले में शामिल वकीलों में से एक प्रशांत भूषण ने सुप्रीम कोर्ट के रजिस्ट्रार को पत्र लिखकर लिस्टिंग में अनियमितता का आरोप लगाया था.

6 दिसंबर 2024 को तत्कालीन वरिष्ठ वकील दुष्यंत दवे ने सुप्रीम कोर्ट के चीफ़ जस्टिस को लिखे पत्र में कहा कि कुछ मामले उन पीठों को आवंटित किए गए हैं, जो लिस्टिंग के नियमों का उल्लंघन कर रहे हैं.

हालांकि दवे ने यह नहीं बताया कि कौन से मामले ग़लत तरीके़ से आवंटित किए गए.

इससे पहले, ट्रायल कोर्ट, जिसने उमर ख़ालिद को ज़मानत देने से इनकार कर दिया था, उसने अपना आदेश सुनाना कम से कम तीन बार टाला था. यह एक असामान्य घटना थी.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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