विवादों के आईने में जेएनयू छात्र उमर ख़ालिद

    • Author, टीम बीबीसी हिन्दी
    • पदनाम, दिल्ली

भारत के जाने माने शिक्षण संस्थान जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्र उमर ख़ालिद एक बार फिर सुर्ख़ियों में हैं.

ताज़ा मामला दिल्ली के कॉन्स्टीट्यूशन क्लब के बाहर चाय की दुकान पर हमले का है, जहां सोमवार को एक अज्ञात हमलावर ने उमर ख़ालिद पर कथित तौर पर गोली चलाई.

उमर ख़ालिद वहां 'टूअर्ड्स ए फ़्रीडम विदाउट फ़ियर' नामक कार्यक्रम में शामिल होने गए थे.

प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक़ दिल्ली के रफ़ी मार्ग पर एक चाय की दुकान पर एक सफेद कमीज़ पहने शख़्स ने आकर उमर ख़ालिद को धक्का दिया और गोली चलाई. ख़ालिद के गिर जाने की वजह से गोली उन्हें नहीं लगी.

उसके बाद उनके दोस्तों ने हमलावर को पकड़ने की कोशिश की, लेकिन वो हवा में गोली चलाता हुआ फ़रार हो गया.

उमर खालिद ने इस हमले के बाद कहा, "जब उसने मेरी तरफ़ पिस्टल तानी तो मैं काफ़ी डर गया था. मुझे गौरी लंकेश के साथ जो हुआ था, उसकी याद आ गई थी."

पुलिस ने घटनास्थल से एक पिस्तौल बरामद की है और मामले की जांच की जा रही है.

ये कोई पहली घटना नहीं है जब उमर ख़ालिद विवादों में हैं. आइए उनसे जुड़ी घटनाओं पर नज़र डालते हैं -

देशद्रोह का आरोप

9 फ़रवरी 2016 को संसद पर हमले के दोषी अफ़ज़ल गुरु की फांसी की बरसी पर जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में एक कार्यक्रम रखा गया था, जिसमें कथित तौर पर भारत विरोधी नारे लगाए गए थे.

आरोप था कि कथित नारे लगानेवालों में जेएनयू छात्रसंघ के अध्यक्ष कन्हैया कुमार, उमर ख़ालिद और अनिर्बान भट्टाचार्य समेत छह छात्र शामिल थे.

पुलिस देशद्रोह के मामले में उनकी तलाश कर रही थी. उमर ख़ालिद और उनके साथियों ने सुरक्षा की मांग करते हुए दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दायर की.

उमर ख़ालिद ने कोर्ट के सामने आत्म समर्पण की इच्छा जताई. इस पर सुनवाई करते हुए दिल्ली हाई कोर्ट ने उन्हें पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर क़ानूनी प्रक्रियाओं का पालन करने को कहा.

उनकी गिरफ़्तारी हुई और फिर उन्हें पुलिस रिमांड पर भेजा गया.

जेएनयू ने मामले की जांच के लिए एक उच्च स्तरीय कमेटी बनाई जिसकी रिपोर्ट पर उमर ख़ालिद और दो अन्य छात्रों को विश्वविद्यालय से निकाल दिया गया और उन पर जुर्माना लगाया गया.

वैसे ये मामला अभी भी अदालत में है और उमर ख़ालिद ज़मानत पर हैं.

इस मामले में मीडिया की भूमिका पर भी गंभीर सवाल उठे. मीडिया के एक गुट ने उन्हें 'देशद्रोही' कहा, यहाँ तक कि उनके साथियों को 'टुकड़े-टुकड़े गैंग' कहा गया.

उमर ख़ालिद बार बार कहते रहे हैं कि मीडिया ने उनकी इस तरह की छवि गढ़ी है, जिसके चलते वो कुछ लोगों की नफ़रत का शिकार बन रहे हैं.

बुरहान वानी मामला

उमर ख़ालिद अख़बारों की सुर्खियों में फिर तब आए जब सात जुलाई 2016 को हिज़्बुल कमांडर बुरहान वानी भारत प्रशासित कश्मीर में सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड़ में मारे गए.

इस घटना ने घाटी में बड़े पैमाने पर हिंसा और विरोध प्रदर्शन को जन्म दिया जिसमें कई लोगों की मौत हुई.

उमर ख़ालिद ने बुरहान वानी की तारीफ़ में फ़ेसबुक पर एक पोस्ट लिखा.

कई लोगों की आलोचना के बाद उमर ख़ालिद ने अपनी इस पोस्ट को फ़ेसबुक से हटा दिया. लेकिन तब तक उनके विरोध में कई लोग टिप्पणी कर चुके थे. हालांकि कई लोगों ने उनका समर्थन भी किया था.

दिल्ली यूनिवर्सिटी में कार्यक्रम

फ़रवरी 2017 में दिल्ली यूनिवर्सिटी के रामजस कॉलेज की लिटरेरी सोसायटी ने एक टॉक शो में हिस्सा लेने के लिए उमर ख़ालिद और छात्र नेता शेहला रशीद को बुलाया था.

उमर को 'द वॉर इन आदिवासी एरिया' विषय पर मंगलवार को बोलना था.

लेकिन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के सदस्य उमर ख़ालिद के हिस्सा लेने को लेकर इस कार्यक्रम का विरोध कर रहे थे.

उसके बाद ही रामजस कॉलेज प्रशासन ने उमर ख़ालिद और शेहला रशीद को दिया निमंत्रण रद्द कर दिया था.

इस घटना को लेकर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) और ऑल इंडिया स्टूडेंट एसोसिएशन (आइसा) के सदस्यों के बीच हिंसक झड़प भी हुई थी जिसमें कई पत्रकार भी निशाना बने थे.

उमर ख़ालिद की पीएचडी

कथित देशद्रोही नारेबाज़ी के प्रकरण के बाद उमर ख़ालिद को जेएनयू से निकाल दिया गया. उन्होंने इसके ख़िलाफ़ अदालत का दरवाज़ा खटखटाया. अदालत ने जेएनयू को निर्देश दिया कि उमर ख़ालिद और दो अन्य छात्रों को अनावश्यक रूप से परेशान न किया जाए.

पांच साल की पढ़ाई के बाद उमर ख़ालिद अपनी पीएचडी थीसिस जमा करना चाहते थे. उन्होंने दावा किया कि जेएनयू ने उनकी थीसिस लेने से इनकार कर दिया. जुलाई में ही थीसिस जमा करने की आख़िरी तारीख़ थी.

इसके लिए विश्वविद्यालय प्रशासन ने उनके ख़िलाफ़ की गई अनुशासनात्मक कार्रवाई का हवाला दिया. लेकिन एक बार फिर अदालत के निर्देश पर कुछ दिन पहले उनकी थीसिस जमा हो सकी है.

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