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CAA: दो साल का हुआ क़ानून, मगर पाकिस्तान से आए हिंदुओं की नागरिकता का क्या हुआ
- Author, सलमान रावी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
पूरे देश में विरोध प्रदर्शनों के बीच दो साल पहले दिसंबर के महीने में जब संसद ने नागरिकता संशोधन क़ानून को संवैधानिक मान्यता दी थी तो दिल्ली के 'मजनूं का टीला' के इलाक़े में बसी हुई श्री राम कालोनी में पाकिस्तान से आए हिंदू शरणार्थी परिवारों ने जमकर जश्न मनाया था.
ढोल, नगाड़ों और गीतों के साथ सरकार के इस फ़ैसले का स्वागत गर्म-जोशी के साथ किया गया.
उम्मीद की जाने लगी कि अब इन सबकी परेशानियां दूर हो जाएंगी.
दयाल दास, पाकिस्तान के सिंध हैदराबाद के रहने वाले हैं जो वर्ष 2013 में अपने परिवार के साथ भारत आये थे.
वो कहते हैं, "बस यही मत पूछिए हम क्यों आये थे. वहां इतनी प्रताड़ना झेली फिर भी हम और हमारे बाप दादा सब्र करते रहे. लेकिन जब चीज़ें ऐसी हो गयीं कि हम और बर्दाश्त करने की हालत में ही नहीं थे तो फिर हम यहाँ आ गए. ये सोचते हुए कि हम हमारी बेटियाँ और बहने सुरक्षित रहेंगे."
दो साल बाद भी नागरिकता नहीं
लेकिन नए क़ानून को बनने के दो साल बाद भी इनको नागरिकता नहीं मिल पाई.
दिल्ली के मजनूं का टीला स्थित हिंदू शरणार्थियों की बस्ती के प्रधान सोना दास बताते हैं कि सिर्फ़ देश की राजधानी में पाकिस्तान से आये हिंदू शरणार्थियों की पांच बस्तियां हैं जबकि इनकी आबादी दस हज़ार के आस पास की है. ये बस्तियाँ मजनूं के टीले के अलावा रोहिणी, नांगलोई, आदर्श नगर और फ़रीदाबाद में बसी हुई हैं.
सोना दास कहते हैं, "कोई परिवार 2010 में आया. कोई उससे पहले. कोई उसके बाद. हर परिवार जो यहाँ आया है वो सिर्फ़ इसलिए आया है कि वहां पर जीना मुहाल हो गया था. हर तरह से जब हम प्रताड़ित होने लगे. जब हमें हमारे धर्म पर चलने में परेशानी होने लगी. जब हमें अपनी बहनों और बेटियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने में परेशानियाँ होने लगीं. तब हम मजबूर होकर यहाँ चले आये."
यहीं के रहने वाले धरमवीर बताते हैं कि इन बस्तियों में रहने वाले ये वो लोग हैं जो 'पूरी तरह से क़ानूनी तरीक़े से' भारत आये हैं. यानी पासपोर्ट और वीज़ा के साथ.
बीबीसी से बात करते हुए धर्मवीर का कहना था, "अब हम सिर्फ़ इसके सहारे रह रहे हैं कि हमारे वीज़े की अवधि हर 6 महीनों में बढ़ाई जाती है. हर 6 महीनों में हमें फिर से सभी परिवार के सदस्यों के लिए वीज़े के फार्म भरने पड़ते हैं."
सरकारी दस्तावेजों में 'अवैध' हैं बस्तियां
आदर्श नगर से अपने परिवार वालों को मिलने आये धनराज कहते हैं कि क़ानून आने के बाद हमें भरोसा हुआ कि सबको नागरिकता मिल जायेगी और बार-बार फॉर्म भरने से छुटकारा मिल जाएगा. उनका कहना था, "सिर्फ़ फॉर्म ही नहीं, इसके लिए फ़ीस भी जमा करनी पड़ती है. न हमारे पास रोज़गार का ठिकाना है. ना घर और ना ही दूसरे संसाधन. फ़ीस के पैसे कहाँ से जुगाड़ करेंगे."
दिल्ली में हिंदू शरणार्थियों की जो बस्तियां हैं वो सरकारी दस्तावेजों में अभी तक 'अवैध' ही हैं. दिल्ली सरकार के एक अधिकारी बीबीसी से बात करते हुए इसकी वजह बताते हैं.
उनका कहना है कि जबतक इन बस्तियों में रहने वालों को भारत की नागरिकता नहीं मिल जाती है तब तक कोई भी ज़मीन का पट्टा इनको आधिकारिक रूप से आवंटित नहीं किया जा सकता है.
यही कारण है कि इन बस्तियों में न बिजली है, ना पीने के पानी का कोई स्रोत. इन परिवारों को कम दर पर अनाज की सुविधा भी मुहैय्या नहीं कराई गयी है. दूसरी मूलभूत सुविधाएं भी यहाँ लागू इसलिए नहीं हो रहीं हैं क्योंकि इन लोगों को मान्यता नहीं मिल पायी है. बस, सिर्फ़ इतना हुआ है कि इनके बच्चे पास के सरकारी स्कूल में पढ़ने जा रहे हैं.
पकिस्तान के हैदराबाद से आईं गूमती देवी बताती हैं कि जो पैसे लेकर वो पकिस्तान से वर्ष 2011 में आयी थीं वो कई सालों पहले ही ख़त्म हो गए थे. फिर वो मुझे लेकर उन टूटी-फूटी दुकानें दिखाने ले जाती हैं जिनके सहारे यहाँ के रहने वालों का गुज़र बसर हो रहा है. कोई चाय बेचता है. किसी की छोटी सी परचून की दुकान है.
फिर बातचीत में वो बताती हैं, "कुछ पास वाली मंडी में रेहड़ी लगाते हैं. लेकिन पुलिस खदेड़ देती है. कभी कभी तो ऐसा होता है कि कई दिनों तक रेहड़ी नहीं लगा पाते हमारे लोग. कुछ मज़दूरी करते हैं. लेकिन पैसे कम मिलते हैं जब काम देने वाले को पता चलता है कि हम शरणार्थी हैं."
मीरा दास भी यहीं अपने परिवार के साथ रहती हैं. वो कहती हैं कि बिजली नहीं होने और बस्ती में दूसरी सुविधाएं नहीं होने की वजह से सबसे ज़्यादा परेशान औरतें ही हैं. उनका कहना है कि आये दिन सांप निकलने की वजह से ख़तरा भी है और साफ़ सफाई का ज़िम्मा यहाँ के लोगों ने खुद पर ही ले रख है क्योंकि नगर निगम का कोई कर्मचारी यहाँ नहीं आता.
हालांकि बस्ती के प्रधान सोना दास बताते हैं कि इन दो सालों के बाद सरकार की तरफ़ से इतनी पहल ज़रूर हुई है कि अब आधार कार्ड बनाने का सिलसिला शुरू हो रहा है.
बस्ती में हमारी मुलाक़ात दिल्ली पुलिस की महिला अधिकारी से भी हुई जो आधार के लिए सबके दस्तावेज़ सत्यापित करने आई थीं.
नागरिकता मिले तो ज़िंदगी बेहतर हो
मगर सोना दास कहते हैं कि इससे भी ज़रूरी नागरिकता है क्योंकि ये लोग देश के दूसरे इलाकों में इस लिए काम करने नहीं जा सकते हैं क्योंकि जो वीज़ा इनके पास है वो सिर्फ़ दिल्ली तक के लिए ही हैं.
उनका कहना था, "हम तो बहुत खुश हुए थे कि अब क़ानून आ गया है. अब हमारी ज़िन्दगी बेहतर हो जायेगी. हमारे बच्चों का भविष्य संवर जाएगा. हमने सरकार का हर दरवाज़ा खटखटाया. लेकिन कहीं भी हमारी गुहार नहीं सुनी गयी. आज भी हम वहीं पर खड़े हैं जहाँ हम तब थे जब हम पकिस्तान से यहाँ 11 साल पहले आये थे. पता नहीं कब हमें नागरिकता मिलेगी."
नागरिकता संशोधन क़ानून के संसद में पारित होने के बाद दयाल दास इतने उत्साहित हुए थे कि उसी समय पैदा हुई अपनी बेटी का नाम ही उन्होंने 'नागरिकता' रख दिया था.
'नागरिकता' अब दो साल की हो गई है. यानी उतनी ही बड़ी हो गई है जितना कि ये नागरिकता क़ानून हो गया है. लेकिन 'नागरिकता' को फिर भी उसकी नागरिकता नहीं मिली.
दयाल दास कहते हैं,"चलो बेटी का नाम तो नागरिकता है न. हम सब तो इसपर ही खुश हो लेते हैं."
भारतीय जनता पार्टी ने जब नागरिकता संशोधन बिल संसद में पेश किया था तो इसको लेकर देश भर में विरोध प्रदर्शन हुए थे.
लेकिन सरकार का कहना था कि इस क़ानून का इस्तेमाल किसी को प्रताड़ित करने क लिए नहीं किया जाएगा.
सरकार का कहना था कि क़ानून आने के बाद पड़ोसी देशों में धर्म के नाम पर प्रताड़ित किये जाने वाले हिंदू,सिख और बौद्ध लोगों को भारत की नागरिकता दी जा सकेगी.
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