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मोदी सरकार हो या कांग्रेस, नहीं ख़त्म हुआ इस क़ानून का मोह
- Author, राघवेंद्र राव
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
साल 1975 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी के शासनकाल में देश में इमर्जेंसी लागू होने के साथ ही 21 महीनों का एक ऐसा दौर शुरू हुआ, जिसमें सरकार ने क़ानून के नाम पर भरपूर मनमानियाँ कीं.
यही वजह थी कि जब 1978 में इंदिरा गांधी के सत्ता से बेदख़ल होने के बाद संविधान का 44वां संशोधन किया गया तो उसमें अन्य मुद्दों के साथ इस बात पर भी ख़ास ग़ौर किया गया कि भारतीय नागरिकों के स्वतंत्रता के अधिकार को और मज़बूत बनाया जाए.
इसी मंशा से इस संशोधन में ये कहा गया कि प्रिवेंटिव डिटेंशन या एहतियातन हिरासत के क़ानून के तहत किसी भी व्यक्ति को दो महीने से ज़्यादा हिरासत में रखने की अनुमति तब तक नहीं दी जा सकती, जब तक एक एडवाइज़री या सलाहकार बोर्ड ऐसा करने के लिए ठोस और पर्याप्त कारण न दे.
इस क़ानून के दुरुपयोग को रोकने के इरादे से संविधान संशोधन में ये भी कहा गया कि एडवाइजरी बोर्ड का अध्यक्ष हाई कोर्ट का एक सेवारत न्यायाधीश होगा और इस बोर्ड का गठन उस उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की सिफ़ारिशों के अनुसार किया जाएगा. संशोधन के अनुसार इस बोर्ड के अन्य सदस्य किसी भी उच्च न्यायालय के सेवारत या सेवानिवृत्त न्यायाधीश होंगे.
43 साल बाद भी संशोधन लागू नहीं
इस संविधान संशोधन के 43 साल गुज़र जाने के बाद भी इसके प्रावधानों को लागू नहीं किया जा सका है क्योंकि इन 43 सालों में बनी किसी भी सरकार ने संशोधन की धारा तीन को प्रभावी करने के लिए नोटिफ़िकेशन जारी नहीं किया है.
अब भारत के 100 रिटायर्ड प्रशासनिक अधिकारियों ने केंद्रीय कानून मंत्री किरण रिजिजू को एक खुली चिट्ठी लिखकर कहा है कि सरकार इस धारा को प्रभावी बनाने की तारीख़ तय करे.
जिन लोगों ने इस चिट्ठी पर दस्तख़त किए हैं उनमें पूर्व विदेश सचिव श्याम सरन, इंटेलिजेंस ब्यूरो और रॉ के पूर्व वरिष्ठ अधिकारी एएस दुलत, पूर्व मुख्य सूचना आयुक्त वजाहत हबीबुल्लाह, प्रधानमंत्री के पूर्व सलाहकार टीकेए नायर और पूर्व गृह सचिव जीके पिल्लई जैसे बड़े नाम शामिल हैं.
ये सेवानिवृत अधिकारी कॉन्स्टिटूशन कंडक्ट ग्रुप के सदस्य हैं और अपनी चिट्ठी में उन्होंने लिखा है कि उनका "किसी भी राजनीतिक दल से कोई संबंध नहीं है" लेकिन वे भारत के संविधान के अनुरूप निष्पक्षता, तटस्थता और प्रतिबद्धता में विश्वास करते हैं.
क़ानून मंत्री को लिखी अपनी चिट्ठी में इस समूह ने कहा है कि वर्तमान में कोई भी वकील जो किसी उच्च न्यायालय के न्यायाधीश बनने के योग्य है, उसे सलाहकार बोर्ड में नियुक्त किया जा सकता है और इसका मतलब यह है कि दस वर्ष या उससे अधिक अनुभव वाला कोई भी वकील सलाहकार बोर्ड में बैठ सकता है.
इन सेवानिवृत अधिकारियों का कहना है कि "इस प्रकार यह प्रावधान सरकारी दुरुपयोग की चपेट में है, जो बोर्ड में तटस्थ, स्वतंत्र सदस्यों को नियुक्त करने के बजाय, अपनी पसंद के व्यक्तियों को नियुक्त कर सकते हैं, जिनमें सत्ता या राजनीतिक दल के प्रति निष्ठा रखने वाले भी शामिल हैं".
चिट्टी में कहा गया है कि इस अधिसूचना को जारी करने में 43 वर्षों की देरी की वजह से मानवाधिकारों का घोर उल्लंघन हुआ है.
क्या है प्रिवेंटिव डिटेंशन?
एहतियातन हिरासत का मतलब ये है कि पुलिस किसी भी व्यक्ति को इस शक के आधार पर हिरासत में ले सकती है कि वो अपराध करने वाला है.
भारत के संविधान के अनुच्छेद 22 के अनुसार गिरफ्तार किए गए किसी भी व्यक्ति को ऐसी गिरफ्तारी के कारणों के बारे में जल्द से जल्द सूचित किए बिना हिरासत में नहीं रखा जाएगा और न ही उसे परामर्श करने और बचाव करने के अधिकार से वंचित किया जाएगा.
साथ ही, ये अनुच्छेद ये भी कहता है कि गिरफ्तार किए गए और हिरासत में लिए गए प्रत्येक व्यक्ति को गिरफ्तारी के स्थान से मजिस्ट्रेट की अदालत तक यात्रा के लिए आवश्यक समय को छोड़कर ऐसी गिरफ्तारी के चौबीस घंटे की अवधि के भीतर निकटतम मैजिस्ट्रेट के सामने पेश किया जाएगा और ऐसे किसी भी व्यक्ति को मैजिस्ट्रेट के आदेश के बिना 24 घंटे के बाद हिरासत में नहीं रखा जाएगा.
लेकिन संविधान का अनुच्छेद 22 ये साफ़ कहता है कि ये प्रावधान उस व्यक्ति पर लागू नहीं होंगे जिसे एहतियातन हिरासत में लिया गया है.
इसका सीधा मतलब ये है कि पुलिस को एहतियातन हिरासत में लिए गए व्यक्ति को न तो कारण बताने की ज़रूरत है, न ही उसे वकील से परामर्श करने देने की ज़रूरत है और न ही मैजिस्ट्रेट के सामने 24 घंटे में पेश करने की ज़रूरत होती है.
क्या कहता है सुप्रीम कोर्ट?
इसी साल अगस्त में एक मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि प्रिवेंटिव डिटेंशन या एहतियातन हिरासत "केवल सार्वजनिक अव्यवस्था को रोकने के लिए एक आवश्यक बुराई है."
साथ ही, अदालत ने ये भी कहा था कि सरकार को क़ानून-व्यवस्था की समस्याओं से निपटने के लिए मनमाने ढंग से एहतियातन हिरासत का सहारा नहीं लेना चाहिए और ऐसी समस्याओं को सामान्य क़ानूनों से निपटाया जा सकता है.
सुप्रीम कोर्ट ने ये भी कहा था कि नागरिक की स्वतंत्रता एक सबसे महत्वपूर्ण अधिकार है जिसे हमारे पूर्वजों ने लंबे, ऐतिहासिक और कठिन संघर्षों के बाद जीता है और एहतियातन हिरासत की सरकार की शक्ति को बहुत सीमित होनी चाहिए.
क्या कहते हैं आंकड़े?
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2020 में कुल 89,405 लोगों को विभिन्न क़ानूनों के तहत प्रिवेंटिव डिटेंशन में रखा गया. इसमें से 68,077 व्यक्तियों को एक महीने में, 2,651 व्यक्तियों को एक से तीन महीने के बीच और 4,150 व्यक्तियों को तीन से छह महीने के बीच एडवाइजरी बोर्ड की सिफ़ारिश पर रिहा किया गया. फिर भी वर्ष के अंत में 14,527 व्यक्ति फिर भी प्रिवेंटिव डिटेंशन में रहे.
लोगों को प्रिवेंटिव डिटेंशन में रखने के लिए जिन क़ानूनों का इस्तेमाल हुआ उनमें मुख्यतः राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून, कालाबाज़ारी की रोकथाम का कानून, आवश्यक सेवा रखरखाव अधिनियम और गुंडा एक्ट शामिल थे.
अगस्त 2019 में जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद से सैकड़ों लोगों को एहतियातन हिरासत में रखा जा चुका है.
आलोचकों का कहना है कि इन क़ानूनों का दुरुपयोग करके लोगों को हिरासत में ले लिया जाता है और बिना किसी सुनवाई के उनकी आज़ादी छीन ली जाती है. वे कहते हैं कि इस मनमानी पर अदालतें कभी-कभी ही सख़्त रवैया अपनाती हैं.
इस साल अप्रैल में छपी एक पड़ताल में अंग्रेजी अख़बार 'द इंडियन एक्सप्रेस' ने पाया कि जनवरी 2018 और दिसंबर 2020 के बीच इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने नेशनल सिक्यॉरिटी एक्ट या राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम के तहत एहतियातन हिरासत को चुनौती देने वाली 120 बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिकाओं पर फ़ैसला सुनाया और 94 मामलों में ज़िलों में डीएम के आदेशों को रद्द करते हुए बंदियों को रिहा करने का आदेश दिया.
'रूल ऑफ़ लॉ के खिलाफ'
सेवानिवृत आईएएस अधिकारी वजाहत हबीबुल्लाह भारत के पहले मुख्य सूचना आयुक्त थे. वे राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष भी रह चुके हैं.
हबीबुल्लाह उन 100 पूर्व अधिकारियों में शामिल हैं जिन्होंने कॉन्स्टिटूशनल कंडक्ट ग्रुप की इस मसले पर लिखी चिट्ठी पर दस्तख़त किए हैं.
हबीबुल्लाह ने बीबीसी से बात करते हुए कहा कि एहतियातन हिरासत के प्रावधान असंवैधानिक है क्योंकि इन पर रूल ऑफ़ लॉ या क़ानून के शासन के सिद्धांत लागू नहीं होते और इनका दुरुपयोग होता है.
वे कहते हैं, "हम अपने अनुभव के आधार पर कहना चाहते हैं कि इन चीज़ों की आवश्यकता लोकतंत्र में नहीं है. अगर हम ख़ुद को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र समझते हैं तो इस तरह के क़ानून हमारे विचार में अनुचित हैं."
हबीबुल्लाह का कहना है कि इस तरह के क़ानूनों की ज़रूरत तब थी जब भारत एक नए राष्ट्र के तौर पर उभर रहा था और बहुत सारी सुरक्षा की चुनौतियाँ थीं. "हम ये नहीं कहते कि ऐसे क़ानूनों के पीछे देश की सुरक्षा से जुड़े कारण गलत हैं. लेकिन अब ऐसे क़ानूनों की ज़रूरत नहीं रही है."
वे मानते हैं कि सर्वोच्च न्यायलय ने भी इन क़ानूनों को जायज़ ठहराया है लेकिन उनका कहना है कि "ये सब होते हुए भी हम अपने अनुभव के आधार पर ये कहना चाहते हैं कि अब एक लोकतंत्र के लिए ये अनुचित है क्यूंकि ये रूल ऑफ़ लॉ का उल्लंघन है".
'विरोध करने वालों को चुप कराने की कोशिश'
रेबेका जॉन सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ वकील हैं. बीबीसी से बात करते हुए उन्होंने कहा कि उन्हें ये समझ नहीं आता कि एक लोकतांत्रिक देश में एहतियातन हिरासत जैसे क़ानून कैसे हो सकते हैं.
वे कहती हैं, "मुझे लगता है कि ये बात क़ानूनी और संवैधानिक दृष्टि से घिनौनी है. सलाहकार बोर्डों की जो भी खामियां हों, तथ्य यह है कि एक रोकथाम के उपाय के रूप में मैजिस्ट्रेट के सामने पेश किए बिना लोगों को हिरासत में लेने की शक्ति का इस तरह से दुरुपयोग नहीं किया जाना चाहिए."
जॉन कहती हैं कि नज़रबंदी के क़ानून को "दिक्क़त पैदा करने वाले लोगों" को एहतियातन हिरासत में लेने के लिए इस्तेमाल किया जाता है. "दिक्क़त पैदा करने वालों से मेरा आशय ऐसे लोगों से है जो किसी भी प्रकार के उत्पीड़न के ख़िलाफ़ आवाज उठाते हैं."
वे कहती हैं कि सलाहकार बोर्ड अपना काम करे या नहीं, लेकिन अंततः इन एहतियातन हिरासत के आदेशों हाई कोर्ट रद्द कर देता है क्योंकि वे न्यायिक जांच में खरे नहीं उतरते.
जॉन के मुताबिक़ सलाहकार बोर्डों के सदस्यों की नियुक्ति की प्रणाली का पारदर्शी न होना एक समस्या है. वे कहती हैं, "समस्या इस तथ्य से उपजी है कि आपके पास एहतियातन हिरासत के क़ानून हैं, और फिर इन क़ानूनों को सही ठहराने के लिए सरकार वह सब कुछ करेगी जो वह कर सकती है."
जॉन कहती हैं कि एडवाइजरी बोर्ड की भूमिका यह होती है कि वह ग़ैर ज़रूरी इस्तेमाल और दुरुपयोग को रोके लेकिन वे ऐसा कभी नहीं करते.
उनके अनुसार मूल समस्या ये है कि आज़ादी के 74 साल बाद भी एहतियातन हिरासत के क़ानूनों की आवश्यकता क्यों है?
वे कहती हैं, "ऐसे क़ानून पुराने दौर की विरासत हैं. हैरानी की बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने इसकी संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा है."
'निष्पक्षता सिर्फ काग़ज़ पर'
जॉन का कहना है कि चूँकि किसी की नज़रबंदी की पुष्टि करनी होती है इसलिए कागज़ पर ये सलाहकार बोर्ड निष्पक्ष दिखते हैं लेकिन व्यवहार में ये बोर्ड केवल नज़रबंदी का ही समर्थन करते हैं.
वे कहती हैं, "कुल मिलाकर नज़रबंदी की पुष्टि करने की प्रक्रिया निष्पक्ष और स्वतंत्र नहीं है. एहतियातन क़ानूनों में ज़्यादातर देखा गया है कि दुरुपयोग रोकने की ज़िम्मेदारी वाले लोग अपना काम नहीं करते.
बड़ा सवाल यह है कि संवैधानिक संशोधन के 43 साल बाद भी आज तक किसी सरकार न इन बदलावों को लागू क्यों नहीं किया?
जॉन कहती हैं, "इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि कौन-सी सरकार सत्ता में है लेकिन ये साफ़ है कि इस मसले में बहुत स्पष्ट राज्य हित शामिल है, सभी सरकारें ऐसे क़ानूनों को पसंद करती हैं, जिनका व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर सीधा असर पड़ता है. आप देखिए कि कश्मीर में इसका इस्तेमाल कैसे किया गया, खासकर अनुच्छेद 370 हटने के बाद."
वे मानती हैं कि एहतियातन हिरासत के क़ानून और उन्हें असंवैधानिक घोषित करने में अदालतों की विफलता स्वतंत्र भारत की संवैधानिक स्थिति पर एक धब्बा है.
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