मनदीप पुनिया: 'शरीर पर लिख लाया जेल में बंद किसानों से बातचीत के नोट्स, रिपोर्ट में शामिल करूंगा'

बीते शनिवार सिंघु बॉर्डर से गिरफ़्तार किए गए पत्रकार मनदीप पुनिया दिल्ली की रोहिणी कोर्ट से ज़मानत मिलने के बाद बुधवार देर रात रिहा हो गए.

जेल से बाहर आकर मनदीप पुनिया ने कहा है कि वे पत्रकारिता के प्रति अपने कर्तव्य को निभाना पहले की तरह जारी रखेंगे. मनदीप पुनिया दिल्ली की सीमाओं पर चल रहे किसान आंदोलन को कवर कर रहे हैं.

दिल्ली पुलिस ने उन्हें बीते शनिवार सिंघु बॉर्डर से गिरफ़्तार कर लिया था. उन पर सरकारी कर्मचारी के काम में बाधा डालने, सरकारी कर्मचारी पर हमला करने, जान-बूझकर व्यवधान डालने और गै़र-क़ानूनी हस्तक्षेप करने के आरोप लगाए गए थे.

दिल्ली पुलिस ने उनके ख़िलाफ़ भारतीय दण्ड संहिता की धारा -186, 353, 332 और 341 के तहत मुक़दमा दर्ज किया है.

क्या है मामला?

शनिवार शाम एक वायरल वीडियो के ज़रिये पुनिया की गिरफ़्तारी का पता चला जिसमें पुलिस एक व्यक्ति को खींचकर ले जाने की कोशिश करती हुई दिख रही थी.

इसके बाद पत्रकारों ने मनदीप पुनिया के बारे में ट्वीट करना शुरू किया कि पुलिस ने उन्हें गिरफ़्तार कर लिया है. लेकिन लोगों को रविवार सुबह तक ये जानकारी नहीं मिल सकी कि उन्हें कहां ले जाया गया था.

मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट ने रविवार को इस मामले की सुनवाई करते हुए उन्हें 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेज दिया था. इसके बाद से मनदीप पुनिया तिहाड़ के केंद्रीय कारागार संख्या 8 में क़ैद थे.

इस बीच एडिटर्स गिल्ड से लेकर तमाम संस्थानों से जुड़े पत्रकारों एवं स्वतंत्र पत्रकारों ने दिल्ली पुलिस के इस क़दम का विरोध करते हुए मार्च निकाला.

इसके बाद रोहिणी कोर्ट के चीफ़ मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट सतबीर सिंह लांबा ने मंगलवार को उन्हें 25000 रुपये के निजी मुचलके पर ज़मानत दी थी.

जेल से रिहा होकर क्या बोले पुनिया?

तिहाड़ से रिहा होकर मनदीप पुनिया ने अपनी ज़मानत के लिए अदालत का शुक्रिया कहते हुए एक बड़ा सवाल उठाया है.

उन्होंने कहा है कि वह ज़मानत दिए जाने के लिए अदालत के शुक्रगुज़ार हैं लेकिन अहम सवाल ये है कि क्या उन्हें गिरफ़्तार किया जाना चाहिए था?

जेल से बाहर आकर मनदीप पुनिया ने बीबीसी संवाददाता प्रशांत चाहल से बातचीत की.

पुनिया कहते हैं, "मैं उन सभी पत्रकार बंधुओं का शुक्रिया अदा करूंगा जो मेरे साथ खड़े रहे. ईमानदार रिपोर्टिंग की इस वक़्त हमारे देश को बहुत ज़रूरत है. मगर ऐसे समय में, जब सरकार लोगों से कुछ छिपाना चाह रही हो, तब पत्रकारिता करना मुश्किल हो जाता है. सत्ता को सच का पता होता है, पर वह सच लोगों को पता चलना चाहिए. पत्रकारिता का पेशा, कोई ग्लैमर से भरपूर पेशा नहीं है. ये बड़ा मुश्किल काम है और इस मुश्किल काम को भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया के कई देशों में बड़ी ईमानदारी से किया जा रहा है."

जेल से रिहा होने के बाद पुनिया ने एक निजी समाचार टीवी चैनल से बातचीत में अपने पैर पर लिखे नोट्स दिखाएं. उन्होंने कहा कि ये जेल में बंद किसान प्रदर्शनकारियों के नोट्स हैं जिन्हें वे अपने रिपोर्ट में लिखेंगे.

गुरुवार सुबह पुनिया ने ट्वीट करके कहा है कि पुलिस ने उनके साथ जो किया है, उससे उनका क़ीमती समय ख़राब हुआ है.

वह लिखते हैं, "एक पत्रकार के रूप में यह मेरी ज़िम्मेदारी थी कि मैं इस आंदोलन को सच्चाई और ईमानदारी से रिपोर्ट करूं. मैं ऐसा करने की कोशिश कर रहा था. मैं आंदोलन स्थल पर किसानों पर हमला करने में शामिल लोगों के बारे में पता लगाने की कोशिश कर रहा था. गिरफ़्तारी से मेरा काम बाधित हुआ और मेरा क़ीमती समय ख़राब हुआ. मुझे लगता है कि मेरे साथ ग़लत हुआ. पुलिस ने मुझे मेरा काम करने से रोका. यही मेरा अफसोस है. उस हिंसा का नहीं जो मेरे साथ हुई. इस घटना ने रिपोर्टिंग करने के मेरे संकल्प को मज़बूत किया है. ग्राउंड ज़ीरो से रिपोर्टिंग करना सबसे जोख़िम भरा, लेकिन पत्रकारिता का सबसे ज़रूरी हिस्सा है."

कोर्ट ने अपने आदेश में क्या कहा?

मनदीप पुनिया को ज़मानत देते हुए कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया है कि अभियुक्त को न्यायिक हिरासत में रखना उचित नहीं है.

कोर्ट ने सिंघु बॉर्डर पर पुनिया और पुलिसकर्मियों के बीच कथित हाथापाई की घटना और एफ़आईआर दर्ज होने के समय के बीच लंबे अंतर पर भी टिप्पणी की.

ज़मानत के आदेश में चीफ़ मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट सतबीर सिंह लांबा ने लिखा है, "यहां ये बताना अहम है कि कथित हाथापाई की घटना लगभग शाम 18:30 बजे हुई, जबकि एफआईआर अगले दिन 1:21 बजे को हुई. यही नहीं, शिकायतकर्ता, पीड़ित, और गवाह पुलिसकर्मी ही हैं. ऐसे में इस बात की बिलकुल संभावना नहीं है कि अभियुक्त/आवेदक किसी पुलिसकर्मी को प्रभावित कर सके. ज़ाहिर है, अभियुक्त एक स्वतंत्र पत्रकार है. कोई भी बरामदगी अभियुक्त व्यक्ति से प्रभावित नहीं होगी. इसलिए अभियुक्त को न्यायिक हिरासत में रखना उचित नहीं है. यह एक क़ानूनी सिद्धांत है कि ज़मानत एक नियम है और जेल एक अपवाद है."

लेकिन पुनिया पहले ऐसे पत्रकार नहीं हैं जिन पर किसान आंदोलन कवर करते हुए एफआईआर हुई हो.

इस समय राजदीप सरदेसाई जैसे वरिष्ठ पत्रकारों से लेकर युवा पत्रकारों के ख़िलाफ़ एफआईआर दर्ज की गई हैं.

ऐसे में ये सवाल उठता है कि भारत में पत्रकारिता करना कितना मुश्किल है.

भारत में कितनी सुरक्षित है पत्रकारिता?

पत्रकारों को उनका काम करने के लिए दी जा रही आज़ादी के लिहाज़ से दुनिया भर के 180 देशों की एक अंतरराष्ट्रीय सूची 'प्रेस फ्रीडम रैंक' में भारत का स्थान लगातार गिरता जा रहा है.

अंतरराष्ट्रीय संस्था 'रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स' की इस सूची में भारत साल 2017 में 136वें स्थान पर था, वहीं साल 2020 में भारत 142वें स्थान पर आ चुका है.

साल 2020 में संस्था ने भारत को लेकर कहा था कि भारत में लगातार प्रेस की आज़ादी का उल्लंघन हुआ है.

संस्था ने बताया कि पत्रकारों पर पुलिस की हिंसा, राजनीतिक कार्यकर्ताओं का हमला, आपराधिक गुटों या भ्रष्ट स्थानीय अधिकारियों की ओर से बदले की कार्रवाई की गई है.

दिल्ली की सीमाओं पर चल रहे किसान आंदोलन को कवर कर रहे पत्रकारों पर आपराधिक मामले दर्ज किए जा रहे हैं.

ताज़ा मामला मनदीप पुनिया का है लेकिन इससे पहले 26 जनवरी को हुई हिंसा के मामले में दिल्ली और उत्तर प्रदेश पुलिस ने कई पत्रकारों पर आपराधिक मामले दर्ज किये हैं. इन पत्रकारों के ख़िलाफ़ राष्ट्रद्रोह के तहत मामला दर्ज किया गया है.

इन पत्रकारों में इंडिया टुडे के पत्रकार राजदीप सरदेसाई, नेशनल हेराल्ड की वरिष्ठ सलाहकार संपादक मृणाल पांडे, क़ौमी आवाज़ के संपादक ज़फ़र आग़ा, द कारवां पत्रिका के संपादक और संस्थापक परेश नाथ, द कारवां के संपादक अनंत नाथ और इसके कार्यकारी संपादक विनोद के. जोस शामिल हैं.

इन हमलों पर प्रेस क्लब ऑफ इंडिया ने अपने बयान में कहा है कि "कोई स्टोरी जब घटित हो रही होती है तो चीज़ें अक्सर बदलती रहती हैं. उसी तरह जो स्थिति है, वही रिपोर्टिंग में दिखती है, जब इतनी भीड़ शामिल हो और माहौल में अनुमान, शक और अटकलें हों तो कई बार पहली और बाद की रिपोर्ट में अंतर हो सकता है. इसे मोटिवेटेड रिपोर्टिंग बताना आपराधिक है जैसा कि किया जा रहा है."

किसान आंदोलन से पहले पिछले डेढ़ सालों में कई पत्रकारों के ख़िलाफ़ ख़बर लिखने के मामलों में मुक़दमे दर्ज कराए गए हैं जो कि निम्न लिखित हैं -

  • मिर्ज़ापुर में पत्रकार पंकज जायसवाल के ख़िलाफ़ सरकारी स्कूल में व्याप्त अनियमितता और मिड डे मील में बच्चों को नमक रोटी खिलाए जाने से संबंधित ख़बर छापने पर 31 अगस्त 2019 को एफ़आईआर दर्ज कराई गई.
  • सीतापुर में रवींद्र सक्सेना के ख़िलाफ़ क्वारंटीन सेंटर पर बदइंतज़ामी की ख़बर लिखने पर सरकारी काम में बाधा डालने, आपदा प्रबन्धन के अलावा एससी/एसटी ऐक्ट की धाराओं के तहत 16 सितंबर, 2020 को मुक़दमा दर्ज किया गया.
  • आज़मगढ़ में पत्रकार संतोष जायसवाल के ख़िलाफ़ स्कूल में छात्रों से झाड़ू लगाने की घटना पर ख़बर लिखने के बाद सरकारी काम में बाधा डालने और रंगदारी मांगने संबंधी आरोपों के साथ 10 सितंबर, 2019 को एफ़आईआर की गई.
  • बिजनौर में पांच पत्रकारों के ख़िलाफ़ दबंगों के डर से वाल्मीकि परिवार के पलायन करने संबंधी ख़बर छापने के मामले में सात सितंबर, 2020 को एफ़आईआर दर्ज हुई.
  • न्यूज़ वेबसाइट स्क्रॉल की कार्यकारी संपादक सुप्रिया शर्मा और वेबसाइट की मुख्य संपादक के ख़िलाफ़ वाराणसी पुलिस ने एक महिला की शिकायत पर जून महीने में एससी-एसटी एक्ट में एफ़आईआर दर्ज की थी.
  • द वायर के संस्थापक संपादक सिद्धार्थ वरदराजन के ख़िलाफ़ भी उत्तर प्रदेश के अयोध्या में दो एफ़आईआर दर्ज की गईं.
  • द फ्रंटियर मणिपुर के दो एडिटर्स और एक रिपोर्टर पर देशद्रोह और यूएपीए का मामला दर्ज किया गया.

इनमें से ज़्यादातर मामलों में ये पाया गया है कि पुलिस की ओर से बेहद कमज़ोर दलीलों के साथ मुख्यत: सरकारी काम में बाधा पहुंचाने जैसी धाराएं लगाई गईं.

उदाहरण के लिए, मिर्ज़ापुर के मामले में ज़िलाधिकारी का तर्क था कि 'प्रिंट मीडिया का पत्रकार वीडियो कैसे बना सकता है?' इस मामले में प्रेस काउंसिल ऑफ़ इंडिया को हस्तक्षेप करना पड़ा था.

बीते साल हाथरस गैंगरेप मामले में रिपोर्टिंग करने गए पत्रकार सिद्दीक कप्पन अभी भी पुलिस की गिरफ़्त में हैं.

मनदीप पुनिया ने अपनी रिहाई के बाद कहा है कि पत्रकार सिद्दीक कप्पन को भी जल्द रिहा किया जाना चाहिए.

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