'जी राम जी' बिल पर विवाद: जानिए, मनरेगा ने गांवों में कैसे बदली रोज़गार की तस्वीर

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- Author, चंदन कुमार जजवाड़े
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
अर्थशास्त्र में नोबेल पुरस्कार पाने वाले जोसेफ़ स्टिग्लिट्ज़ ने साल 2016 में कहा था, "महात्मा गांधी नेशनल रूरल एम्प्लॉयमेंट गारंटी एक्ट (मनरेगा) भारत का एकमात्र सबसे बड़ा मौलिक कार्यक्रम है और पूरी दुनिया को इससे सीखना चाहिए."
अब मोदी सरकार ने 20 सालों से चले आ रहे मनरेगा क़ानून (महात्मा गांधी नेशनल रूरल एम्प्लॉयमेंट गारंटी एक्ट) की जगह लेने के लिए एक नया बिल पेश किया है.
कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार साल 2005 में मनरेगा क़ानून लेकर आई थी जिसके तहत ग्रामीण इलाक़े के परिवारों को साल में 100 दिन रोज़गार की गारंटी थी.
इस योजना को ग्रामीण इलाक़ों में ऐसे मज़दूरों और कामगारों के लिए रोज़गार के लिहाज से मील का पत्थर माना जाता रहा है, जिनके पास कोई ख़ास हुनर नहीं (यानी अनस्किल्ड लेबर) है.

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केंद्र सरकार ने नए अधिनियम को 'विकसित भारत गारंटी फॉर रोज़गार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण)' यानी 'वीबी- जी राम जी' नाम दिया है.
मनरेगा और केंद्र सरकार के नए अधिनियम में नाम के अलावा भी कई बदलाव किए गए हैं और विपक्षी दल सरकार के इस फ़ैसले का विरोध कर रहे हैं.
नए अधिनियम में साल में 125 दिन रोज़गार देने का प्रस्ताव है.
मनरेगा के प्रावधानों के मुताबिक़ मज़दूरों को दी जाने वाली मज़दूरी का पूरा खर्च केंद्र सरकार उठा रही है जबकि सामान वगैरह का खर्च राज्य सरकारें एक निश्चित अनुपात में उठाती हैं. इसके अलावा प्रशासनिक ज़िम्मेदारी में राज्य सरकार की बड़ी भूमिका है.
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मनरेगा कैसे बना गेम चेंजर

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मौजूदा समय में मनरेगा में 12 करोड़ से ज़्यादा सक्रिय कामगार रजिस्टर्ड हैं और इस तरह से यह रोज़गार मुहैया कराने के मामले में एक बड़ी योजना है.
दावा किया जाता है कि मनरेगा की सबसे बड़ी सफलता कोविड-19 के दौरान देखने को मिली जब देश में रोज़गार संकट बहुत बढ़ गया था और मनरेगा के तहत रोज़गार की मांग बढ़ी थी.
साल 2020-21 में मनरेगा के तहत बजट का आवंटन क़रीब एक लाख 11 हज़ार करोड़ रुपये के रिकॉर्ड स्तर पर था.
भारत जैसे बड़ी आबादी वाले देश के लिए रोज़गार या नौकरी एक बड़ी समस्या रही है. इस मामले में ग्रामीण इलाक़ों में रहने वाले लोगों के लिए संकट और भी बड़ा था.
ऐसे में कई संगठनों की तरफ से ग्रामीण इलाक़े की इस समस्या को लेकर लंबे समय से आवाज़ उठाई जा रही थी.
इन इलाकों में रहने वाले परिवारों की रोज़ी-रोटी की समस्या को ख़त्म करने में मनरेगा ने बड़ी भूमिका निभाई. इस योजना ने न केवल अकुशल मज़दूरों के पलायन और रोज़गार संकट को दूर किया, बल्कि ग्रामीण इलाक़े की तस्वीर बदलने में भी बड़ी भूमिका निभाई.
मनरेगा ने ग्रामीण इलाक़ों पर क्या असर डाला इसे समझाने के लिए किसानों और मज़दूरों के अधिकार पर काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता निखिल डे राजस्थान का उदाहरण देते हैं.
निखिल कहते हैं, "राजस्थान में कहीं सूखा, कहीं बाढ़ और कहीं अकाल की समस्या रहती थी. वहां के लोग भीख मांगना नहीं चाहते थे कि कुछ मुफ़्त में मिल जाए और वो खा लें. वो काम करना चाहते थे लेकिन गांवों में सरपंच के पास 50 लोगों के लिए काम होता था, जबकि मांगने वाले एक हज़ार होते थे."
"पूरा गांव सुबह-सुबह सरपंच के घर दिखता था. काम के लिए गांव के लोग सरपंच और वार्ड सदस्य के पास हाथ जोड़कर खड़े रहते थे. उनके पैर पकड़ते थे. वो गांव से पलायन भी नहीं करना चाहते थे. लेकिन मनरेगा ने रोज़गार की गारंटी दी और लोगों को अधिकार दे दिया."
मनरेगा का मक़सद ग्रामीण इलाक़ों में परिवारों को 100 दिन का रोज़गार उपलब्ध कराना है. इसके लिए उन्हें न्यूनतम मज़दूरी दी जाती है, जो उनकी रोज़ी-रोटी (आजीविका) की सुरक्षा को बढ़ाता है.
मनरेगा क्या है

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मनरेगा के तहत ग्रामीण इलाक़ों में टिकाऊ एसेट्स का निर्माण करना है. इसके तहत महिलाओं, अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों को सामाजिक तौर पर लाभ मिला.
मनरेगा के तहत हर रजिस्टर्ड कार्यकर्ता को 15 दिनों के भीतर अकुशल कार्य (जिस काम में किसी ख़ास हुनर की ज़रूरत नहीं होती है, मसलन कुदाल चलाना, मिट्टी ढोना वगैरह) की मांग करने और रोज़गार हासिल करने का अधिकार है. काम नहीं मिलने पर वो बेरोज़गारी भत्ते का हक़दार है.
मनरेगा के तहत काम करने वालों को समय पर भुगतान का प्रावधान रखा गया है.
इसके सामाजिक असर के लिए समय-समय पर स्वतंत्र एजेंसी के ज़रिए आकलन का भी प्रावधान रखा गया है.
मनरेगा के तहत ग्रामीण इलाक़े में सड़कें, तालाब और सिंचाई सुविधाएं, नदियों का पुनरुद्धार और राष्ट्रीय ग्रामीण मिशन से जुड़े काम कराए जाते हैं. मौजूदा समय में इसके तहत 262 तरह के काम कराए जा सकते हैं, जिनमें 164 काम खेती-किसानी से जुड़े हुए हैं.
ख़ास बात यह है कि मनरेगा के तहत छोटे और सीमांत किसानों की निजी ज़मीन पर भी मदद दी जा सकती है.
वरिष्ठ पत्रकार अरविंद सिंह कहते हैं, "इसमें अनुसूचित जाति, जनजाति और महिलाओं को रोज़गार देने पर जोर दिया गया और फ़िलहाल इस योजना में 56% महिलाओं की भागीदारी है, जो इस योजना से महिला सशक्तिकरण की तरफ संकेत करता है."
मनरेगा का सफर

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मई 2004 में तत्कालीन यूपीए सरकार ने ग्रामीण इलाक़े के लिए एक रोज़गार योजना को अपने न्यूनतम साझा कार्यक्रम में शामिल किया था.
भारत में ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना (साल 2007-12) पर काम शुरू होने से पहले ही इसपर काम करने वाले वर्किंग ग्रुप ने उस समय देश में मौजूद क़रीब 36% ग़रीब आबादी पर ख़ास चिंता जताई थी.
अरविंद सिंह बताते हैं कि उसी समय से ग्रामीण इलाक़ों के लिए एक योजना बनाने पर काम शुरू हो गया था.
हालाँकि इससे पहले ही वीपी सिंह के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने ऐसी योजना पर विचार किया था, लेकिन वह योजना सफल नहीं हो पाई थी.
दरअसल वीपी सिंह ने वादा किया था कि उनकी सरकार अपने बजट का 60% हिस्सा गांवों और खेती पर ख़र्च करेगी.
अरविंद सिंह बताते हैं, "दिसंबर 2004 में नेशनल रूरल गारंटी स्कीम (नरेगा) का विधेयक पेश किया गया. यह योजना मूल रूप से महाराष्ट्र राज्य में चल रही एक रोज़गार योजना से प्रेरित थी. उसके बाद यह विधेयक उस वक़्त ग्रामीण विकास मंत्रालय की संसद की स्थायी समिति के पास भेजा गया. जून 2005 में समिति के अध्यक्ष कल्याण सिंह ने इसे आज़ादी के बाद का सबसे महत्वपूर्ण बिल बताया था."
संसद से पारित होने के बाद इस क़ानून को लागू करने के लिए सितंबर 2005 में अधिसूचना जारी की गई.
फिर 2 फ़रवरी 2006 को आंध्र प्रदेश के बंगलापल्ली गांव से इस योजना को तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और यूपीए की चेयरपर्सन सोनिया गांधी ने शुरू किया था.
शुरू में इस योजना को 200 चुनिंदा ज़िलों में लागू किया गया और अप्रैल 2008 में इसे पूरे देश में लागू कर दिया गया.
शुरुआत में नरेगा का बजट क़रीब 15 हज़ार करोड़ रुपये था, जो फ़िलहाल क़रीब 86 हज़ार करोड़ का हो गया है. इसके तरह ग्रामीण इलाक़ों में 18 साल से ज़्यादा उम्र की महिलाओं और पुरुषों को रोज़गार की गारंटी दी गई.
साल 2010 में इस योजना का नाम बदलकर महात्मा गांधी नेशनल रूरल एम्प्लॉयमेंट गारंटी एक्ट यानी मनरेगा कर दिया गया.
दरअसल इसके पीछे तर्क दिया गया कि इस योजना से ग्रामीण इलाक़े का सशक्तिकरण हुआ और महात्मा गांधी भारत के गांवों को ताक़तवर होते देखना चाहते थे, इसलिए योजना को उनके नाम के साथ जोड़ा गया.
अरविंद सिंह बताते हैं, "साल 2015 में वर्ल्ड बैंक ने इसे दुनिया का सबसे बड़ा रोज़गार कार्यक्रम बताया था."
योजना को लेकर शिकायतें
देश के ग्रामीण इलाक़ों में रोज़गार मुहैया कराने वाली यह योजना कई बार भ्रष्टाचार जैसे विवादों में भी रही.
योजना को लेकर ऐसी भी शिकायत आई कि लोगों को बिना काम दिए कई जगहों पर महज़ कागज़ों पर रोज़गार दिखाया गया.
यूपीए-2 सरकार में ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश के कार्यकाल में इन शिकायतों और अनियमितताओं को दूर करने की कोशिश की गई.
इसके लिए प्लानिंग कमीशन के सदस्य रहे मिहिर शाह को इसके लिए सुझाव देने को कहा गया और कोशिश की गई कि मनरेगा को लेकर उपजे सवालों को ख़त्म किया जाए.
निखिल डे कहते हैं, "पहले ऐसा होता था कि योजना में कम लोग काम करते थे और ज़्यादा दिखाया जाता था. इसके पैसों का दुरुपयोग होता था. लेकिन आरटीआई और जागरुकता ने इसे बेहतर किया है. अब आप आरटीआई डालकर यह भी जान सकते हैं कि किस इलाक़े में कितने लोगों ने और क्या काम किया है."
विपक्ष क्यों कर रहा है विरोध

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नए बिल में प्रस्ताव है कि इसके तहत होने वाले कुल खर्च का 60 प्रतिशत केंद्र सरकार वहन करेगी जबकि 40 प्रतिशत खर्च राज्य सरकार उठाएगी. जबकि पहले राज्यों का ख़र्च क़रीब 10% ही था.
नए प्रावधान के मुताबिक़ पूर्वोत्तर के राज्यों, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और अन्य केंद्र शासित प्रदेशों में केंद्र सरकार इसके तहत होने वाला 90 फ़ीसदी ख़र्च ख़ुद उठाएगी.
निखिल डे कहते हैं, "केंद्र सरकार के प्रस्ताव में कई ऐसे प्रावधान हैं जो इस योजना में रोज़गार की गारंटी को ख़त्म कर रहा है. फ़िलहाल यह योजना पूरे देश में लागू है लेकिन नए प्रस्ताव में सेक्शन 5 (1) में लिखा हुआ है कि यह योजना कहां लागू होगी, यह केंद्र सरकार तय करेगी."
वो कहते हैं, " अब केंद्र सरकार इसके मापदंड तय करेगी कि किस राज्य को कितना पैसा देना है. वो जितना पैसा देगी उसी के मुताबिक़ योजना लागू होगी और अब राज्यों को बजट का 40% हिस्सा ख़र्च करना होगा."
वरिष्ठ पत्रकार रशीद किदवई कहते हैं, "मनरेगा की वजह से ग्रामीण इलाक़ों में लोगों की आर्थिक स्थिति सुधरी. उन्हें काम देकर सरकारी योजना में शामिल किया गया और लोग सकारात्मक गतिविधियों से जुड़े."
"राज्यों की आर्थिक स्थिति पहले से ही ख़राब है और उनपर बोझ बढ़ेगा तो वो डिफॉल्ट करेंगे या योजना में उनकी दिलचस्पी कम होगी, क्योंकि रोज़गार की जितनी मांग होगी, राज्यों का ख़र्च उतना बढ़ेगा."
मनरेगा में बदलाव को लेकर एक विवाद इसके नाम पर जताया गया है. कांग्रेस पार्टी का आरोप है कि इस योजना से महात्मा गांधी का नाम हटा दिया गया है.
अरविंद सिंह के मुताबिक़ आज़ादी के बाद ऐसा पहली बार हुआ है जब किसी योजना से महात्मा गांधी का नाम हटाया गया हो.
अरविंद सिंह कहते हैं, "नए प्रस्ताव में योजना को जल संसाधन, रोड, डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर और रूरल हाउसिंग से जोड़ा गया है, जिनके लिए पहले से मंत्रालय है. ऐसा दिखता है कि सरकार मनरेगा के बजट को डायवर्ट करना चाहती है. इससे यह योजना पूरी तरह पटरी से उतर सकती है."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.















