आरएसएस ने नए बीजेपी अध्यक्ष के चुनाव और बांग्लादेश में हिंदुओं के हालात पर क्या कहा?

    • Author, इमरान क़ुरैशी
    • पदनाम, बेंगलुरू से, बीबीसी हिंदी के लिए

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) ने भारतीय जनता पार्टी का नया अध्यक्ष चुने जाने के सवाल पर पार्टी के साथ असहमति की अटकलों को ख़ारिज किया है.

बेंगलुरू में आरएसएस से जुड़ी फै़सले लेने वाली समिति अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा (एबीपीएस) के सर सहकार्यवाह अरुण कुमार ने कहा कि संघ और बीजेपी के बीच "इस बात के लेकर कोई असहमति नहीं है."

फिलहाल बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा हैं. कहा जा रहा है कि लोकसभा चुनाव से पहले से ही पार्टी के भीतर उनके उत्तराधिकारी की तलाश को लेकर चर्चा शुरू हो गई थी.

21 मार्च को बेंगलुरू में आरएसएस की तीन दिवसीय अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा की बैठक शुरू हुई है. इस दौरान अरुण कुमार ने बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के बारे में तो बात की है, साथ ही बांग्लादेश के हिंदू समुदाय के बारे में चिंता भी जताई है.

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बीजेपी अध्यक्ष के चुनाव पर क्या कहा?

नया बीजेपी अध्यक्ष चुनने के मामले में अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा के सर सहकार्यवाह अरुण कुमार ने कहा कि संघ अपने साथ जुड़े 32 संगठनों के कामकाज में दखल नहीं देता.

उन्होंने कहा, "उन्हें अपने नेताओं को चुनने की प्रक्रिया पर फ़ैसला लेने की आज़ादी है. हम उनके साथ मिलकर राष्ट्रीय मुद्दों पर काम करते हैं. पार्टी जो भी फ़ैसला लेती है वो पार्टी का अंदरूनी मामला है."

साथ ही उन्होंने कहा कि बीजेपी और आरएसएस के बीच कोई असहमति नहीं है, समाज और राष्ट्र से जुड़े मुद्दों पर दोनों आपसी भरोसे के साथ काम करते हैं.

अरुण कुमार से ये सवाल किया गया था कि जब भी जेपी नड्डा की जगह पर किसी को चुनने की बात आती है, तो पार्टी के नेता किसी राज्य के चुनावों या फिर कोई और बात कहकर पार्टी के भीतर चुनाव की बात टालते क्यों हैं.

आरएसएस और उसका राजनीतिक चेहरा माने जाने वाले बीजेपी के बीच तनाव की ख़बरों को उस वक्त हवा मिली जब सार्वजनिक रूप से नड्डा ने एक टिप्पणी की. इसने आलोचकों को इसका गलत अर्थ निकालने का भरपूर मौक़ा दिया.

उनका यह बयान लोकसभा चुनाव से कुछ समय पहले आया जब उनसे पूछा गया कि प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के समय की तुलना में आरएसएस में कितना बदलाव आया है.

इसके जवाब में जेपी नड्डा ने कहा कि "शुरुआत में हम कम सक्षम थे, छोटे संगठन थे और इसलिए हमें आरएसएस की ज़रूरत थी. आज हम एक बड़ा संगठन बन गए हैं और हम अधिक काबिल बन गए हैं. बीजेपी अपना कामकाज खुद चलाती है. ये वो फर्क है जो आया है."

आरएसएस के प्रवक्ता सुनील आंबेकर से जब इसपर सवाल किया गया तो उन्होंने टिप्पणी करने से इनकार कर दिया. उन्होंने कहा कि "परिवार के मसले परिवार में ही सुलझाए जाते हैं."

अक्तूबर में आरएसएस के महासचिव दत्तात्रेय होसबोले ने कहा था कि नड्डा के बयान की भावना वो समझ सकते हैं.

उन्होंने कहा, "वो ये कहना चाहते थे कि बीजेपी को आरएसएस पर निर्भर नहीं रहना चाहिए. सभी संगठनों को अपनी ताकत खुद बढ़ानी चाहिए. नड्डा की टिप्पणी का मतलब ये था कि चुनाव लड़ने के लिए बीजेपी को आरएसएस पर नहीं निर्भर रहना चाहिए. अगर कुछ होता है तो हमें पता है हमें उसे कैसे दुरुस्त करना है."

शुक्रवार देर जेपी नड्डा आरएसएस की इस बैठक में हिस्सा लेना के लिए बेंगलुरू पहुंचे हैं.

जेपी नड्डा के पास कब से है बीजेपी की कमान

जेपी नड्डा जून 2019 में बीजेपी के कार्यकारी राष्ट्रीय अध्यक्ष चुने गए थे. वो जनवरी 2020 तक इस भूमिका में रहे.

उन्हें जनवरी 2020 में औपचारिक तौर पर पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष चुन लिया गया था. तब से वो इस पद पर हैं.

समाचार एजेंसी एएनआई के अनुसार जेपी नड्डा के नेतृत्व में बीजेपी ने 35 राज्यों में चुनाव लड़ा है जिसमें से 16 में उसे जीत हासिल हुई है. वहीं बीता लोकसभा चुनाव भी उनके नेतृत्व में लड़ा गया था, जब तीसरी बार बीजेपी ने सत्ता में वापसी की थी.

2024 के आख़िर में मीडिया में रिपोर्टें आने लगी कि नड्डा ने राष्ट्रीय अध्यक्ष के तौर पर तीन साल का कार्यकाल पूरा कर लिया है और बीजेपी अगले अध्यक्ष की तलाश कर रही है.

सूत्रों के हवाले से आई रिपोर्टों में कहा गया कि फ़रवरी में दिल्ली और कई और राज्यों में विधानसभा चुनाव थे जिसके कारण चुनाव को टाल दिया गया. लेकिन अब उम्मीद जताई जा रही है कि जल्द ही पार्टी इसके लिए चुनाव करवाएगी.

बीजेपी के पार्टी संविधान के अनुसार राष्ट्रीय अध्यक्ष के चुनाव के लिए कम से कम 50 फीसदी राज्य ईकाइयों में संगठनात्मक चुनाव कराए जाने होते हैं.

बांग्लादेश के हिंदू समुदाय को लेकर क्या कहा?

बेंगलुरू में जारी प्रतिनिधि सभा की बैठक के दूसरे दिन आरएसएस ने अपने कार्यकर्ताओं से 'बांग्लादेश के हिंदू समाज और अन्य अल्पसंख्यकों के साथ एकजुटता से खड़े होने' की अपील की.

यहां एक प्रस्ताव भी पारित किया गया जिसमें संयुक्त राष्ट्र से अपील की गई कि वो अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ हिंसा रोकने के लिए बांग्लादेश सरकार पर दबाव बनाए.

सर सहकार्यवाह अरुण कुमार ने शनिवार को एक संवाददाता सम्मेलन में कहा कि "हमें इसे एक राजनीतिक मुद्दे की तरह नहीं देखना चाहिए, ये एक धर्मिक मुद्दा है."

उन्होंने कहा कि बांग्लादेश में हिंदुओं की आबादी 1951 में 22 फ़ीसदी थी, लेकिन अब घटकर 7.9 फ़ीसदी रह गई है.

बैठक के दूसरे दिन संवाददाताओं के बात करते हुए अरुण कुमार ने कहा कि बांग्लादेश के कट्टरपंथी इस्लामी तत्वों के हाथों हिंदुओं और अन्य अल्पसंख्यकों, ख़ासकर अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगों का उत्पीड़न कोई नई बात नहीं है. उन्होंने कहा "हिंसा के चक्र ने बांग्लादेश में हिंदू समुदाय के लिए अस्तित्व का संकट पैदा कर दिया है."

उन्होंने कहा "ऐसा लगता है कि अभी जो हमले हो रहे हैं उन्हें संस्थागत समर्थन हासिल है. जो लोग इसमें शामिल हैं वो केवल हिंदू विरोधी नहीं, बल्कि इसे भारत विरोधी अभियान बना रहे हैं."

अरुण कुमार ने कहा कि कुछ अंतरराष्ट्रीय ताकतें हैं "जो इस पूरे क्षेत्र में अस्थिरता पैदा करने की कोशिश कर रही हैं. उनकी कोशिश इस क्षेत्र में अविश्वास पैदा करने की है."

प्रतिनिधि सभा में जो प्रस्ताव पारित किया गया है उसमें कहा गया है कि "अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा अंतरराष्ट्रीय संबंधों से जुड़े नेताओं और शिक्षाविदों से अपील करता है कि वो भारत विरोधी माहौल पर नज़र रखें, साथ ही पाकिस्तान और डीप स्टेट्स की गतिविधियों पर नज़र रखें और उन्हें दुनिया के सामने लाएं."

प्रतिनिधि सभा ने अपने प्रस्ताव में ये भी कहा है कि "हम ये बताना चाहते हैं कि इस पूरे क्षेत्र की साझा संस्कृति है, साझा इतिहास है और इनके बीच सामाजिक संबंध हैं जिस कारण एक जगह पर अगर हलचल हुई तो इसमें पूरा क्षेत्र इससे चिंतित होता है."

बैठक में इस बात की तारीफ़ भी की गई कि बांग्लादेश के हिंदू समुदाय ने शांतिपूर्ण तरीके से और साथ मिलकर इस स्थिति का सामना किया है.

प्रतिनिधि सभा में वैश्विक स्तर पर इस मुद्दे को उठाने और बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के साथ इस पर चर्चा के लिए भारत सरकार की भी तारीफ़ की गई.

साथ रही ये कहा गया कि भारत सरकार को "बांग्लादेश सरकार के साथ लगातार चर्चा जारी रखनी चाहिए और सार्थक चर्चा करने रहनी चाहिए."

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