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'इंडिया' में सीटों का बंटवारा बाक़ी, फिर जेडीयू ने क्यों की उम्मीदवार की घोषणा
- Author, चंदन कुमार जजवाड़े
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, बिहार के पटना से
जनता दल यूनाइटेड ने पश्चिमी अरुणाचल प्रदेश की लोकसभा सीट से इस साल होने वाले चुनावों के लिए अपने उम्मीदवार की घोषणा कर दी है.
ख़ास बात यह है कि विपक्ष के गठबंधन ‘इंडिया’ में अभी सीटों की साझेदारी को लेकर कोई फ़ैसला नहीं हुआ है. जेडीयू का कहना है कि उसने पहले ही कांग्रेस को अपनी इच्छा बता दी थी.
जेडीयू ने पश्चिमी अरुणाचल प्रदेश की लोकसभा सीट से अपने प्रदेश अध्यक्ष रूही तागुंग को इस साल होने वाले लोकसभा चुनावों के लिए पार्टी की तरफ से उम्मीदवार बनाया है.
अरुणाचल प्रदेश में लोकसभा की दो सीटें हैं और इन दोनों ही सीटों पर फ़िलहाल बीजेपी का कब्ज़ा है. अरुणाचल (पश्चिम) सीट से बीजेपी के किरेन रिजिजू सांसद हैं जबकि पूर्वी सीट से बीजेपी के ही तापिर गाओ सांसद हैं.
जेडीयू के राष्ट्रीय महासचिव अफ़ाक़ अहमद ख़ान ने बीबीसी को बताया है कि अरुणाचल प्रदेश की एक सीट जेडीयू को लड़नी है यह पहले से तय था और इसके बारे में हमने कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं को बता दिया था.
अफ़ाक़ अहमद ख़ान के मुताबिक़, "कांग्रेस ने एक महीने पहले ही अरुणाचल की पूर्वी लोकसभा सीट से अपने उम्मीदवार की घोषणा कर दी थी. जेडीयू की राज्य इकाई का लगातार दबाव था कि हम भी अपने उम्मीदवार का ऐलान कर दें. हमारी पार्टी अरुणाचल में काफ़ी मज़बूत है, हमें वहां से चुनाव लड़ना ही था."
जेडीयू ने पहली बार अरुणाचल प्रदेश के किसी सीट से लोकसभा चुनाव लड़ने का फ़ैसला किया है.
अरुणाचल में जेडीयू कितनी ताक़तवर
2019 में हुए राज्य विधानसभा चुनाव में जेडीयू ने अपने 15 उम्मीदवार खड़े किए थे, इनमें उसके 7 उम्मीदवार चुनाव जीते थे. हालांकि बाद में जेडीयू के सभी विधायक एक-एक कर बीजेपी में शामिल हो गए थे. कहा जाता है कि इससे जेडीयू के अंदर बीजेपी को लेकर काफ़ी नाराज़गी थी.
इस तरह से अरुणाचल प्रदेश में बीजेपी के बाद विधानसभा में दूसरे सबसे दल के तौर पर जेडीयू उभरी थी. फ़िलहाल राज्य में जेडीयू के पास एक भी विधायक नहीं है. उन चुनावों में बीजेपी ने साठ में से 41 सीटें जीती थीं, जबकि कांग्रेस के खाते में महज़ 4 सीटें आई थीं.
अफ़ाक़ अहमद ख़ान का दावा है कि विपक्ष के गठबंधन ‘इंडिया’ में कोई दरार नहीं है और सीटों की साझेदारी को लेकर लगातार बात चल रही है.
उनका कहना है कि जेडीयू ने विधानसभा चुनावों के बाद अरुणाचल की राजधानी ईटानगर की नगर निगम की 20 में से 9 सीटें भी जीती थीं.
इसके अलावा जेडीयू के कई उम्मीदवार ग्राम पंचायत और ज़िला परिषद में भी जीतकर आए थे. इस तरह से पार्टी वहां अपने प्रदर्शन के आधार पर अपना दावा करती है. लेकिन बिना सीटों की साझेदारी के इस तरह के फ़ैसले से क्या विपक्ष के गठबंधन में कोई दरार नहीं दिखता है?
कांग्रेस के राज्यसभा सांसद और बिहार प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष अखिलेश प्रसाद सिंह के मुताबिक़, "गठबंधन में कोई मतभेद नहीं है. अगर अरुणाचल को लेकर किसी ने कोई बात कही है तो ख़ुद कहा होगा. सीटों की साझेदारी पर गठबंधन के अंदर लगातार बात चल रही है."
‘विपक्ष में कोई दरार नहीं’
अखिलेश सिंह ने उन सभी ख़बरों को ग़लत बताया है जिसमें यह कहा जा रहा है कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार नाराज़ चल रहे हैं. उनका दावा है कि नीतीश लगातार संपर्क में हैं और गठबंधन के तमाम मुद्दों पर बातचीत चल रही है.
इस बीच बीजेपी लगातार यहा आरोप लगाती रही है कि विपक्ष के गठबंधन में सीटों की साझेदारी को लेकर कोई फ़ैसला नहीं हुआ और इसके बग़ैर ही विपक्षी दल ख़ुद अपना उम्मीदवार तय कर रहे हैं.
पिछले ही हफ़्ते 29 दिसंबर को राजीव रंजन सिंह उर्फ़ ललन सिंह ने जेडीयू अध्यक्ष पद से इस्तीफ़ा दे दिया था. उस वक़्त जेडीयू की तरफ से कहा गया था कि ललन सिंह मुंगेर की अपनी लोकसभा सीट पर ज़्यादा समय देना चाहते हैं.
हालांकि मुंगेर सीट को लेकर भी अभी कोई फ़ैसला नहीं हुआ है कि यह सीट ‘इंडिया’ के किस दल के हिस्से में जाएगी. बिहार की 40 लोकसभा सीटों में 16 पर जेडीयू का कब्ज़ा है. यहां कांग्रेस के पास एक सीट जबकि आरजेडी के पास कोई लोकसभा सीट नहीं है.
राष्ट्रीय जनता दल के प्रवक्ता मृत्युंजय तिवारी का कहना है कि हम बिहार की सभी 40 सीटों पर अपनी तैयारी कर रहे हैं ताकि साझेदारी के बाद अपने सहयोगी दल को चुनाव के समय मदद कर सकें. इसका मतलब यह नहीं है कि हम सभी सीटों पर चुनाव लड़ेंगे.
मृत्युंजय तिवारी ने बीबीसी से कहा है, "यह तय है कि विपक्ष क़रीब 450 सीटों पर अपना एक उम्मीदवार उतारेगा. अभी जेडीयू ने अरुणाचल की एक सीट से उम्मीदवार बनाया है, अगर सीट साझेदारी में उनके पास रहती है तो अच्छा होगा, उसकी तैयारी अच्छी रहेगी. अगर ऐसा नहीं हुआ तो इससे सहयोगी को मदद मिलेगी."
‘विपक्ष में भ्रम की स्थिति’
मृत्युंजय तिवारी आरोप लगाते हैं "विपक्ष में दरार की अफ़वाह बीजेपी की साज़िश है, दरअसल उनको डर सता रहा है इसलिए ऐसी बात कर रहे हैं. वो यह नहीं बताते कि एनडीए में क्या हो रहा है, चिराग पासवान कहाँ हैं, कुशवाहा कहा हैं? उनको हमसे ज़्यादा मतलब रहता है कि हम क्या कर रहे हैं."
वरिष्ठ पत्रकार लव कुमार मिश्रा कहते हैं, "अरुणाचल में उम्मीदवार की घोषणा कांग्रेस पर दबाव बनाने की जेडीयू की कोशिश हो सकती है. दरअसल विपक्ष में पूरी तरह भ्रम की स्थिति है. इससे पहले जेडीयू ने देवेश चंद्र ठाकुर को सीतामढ़ी से जबकि संजय झा को दरभंगा से अपना उम्मीदवार बता दिया है."
देवेश चंद्र ठाकुर जेडीयू के विधान परिषद सदस्य और बिहार विधान परिषद के सभापति भी हैं. वो सीतामढ़ी से ताल्लुक रखते हैं. जबकि संजय झा को नीतीश के काफ़ी क़रीबी माना जाता है, वो भी बिहार विधान परिषद के सदस्य और बिहार सरकार में मंत्री हैं.
लव कुमार मिश्रा के मुताबिक़ लालू प्रसाद यादव 29 दिसंबर के बाद से रहस्यमय तरीके से खामोश हैं. न एक जनवरी को नीतीश ने राबडी देवी को जन्मदिन की बधाई दी. न नीतीश और लालू ने एक-दूसरे को नये साल की शुभकामनाएं दीं और ऐसे हालात का सीधा लाभ बीजेपी को मिल रहा है.
इस बीच लोकसभा चुनावों की तैयारी के लिहाज से बीजेपी ने बिहार में अगले कुछ हफ़्तों में अपने शीर्ष नेताओं की क़रीब दर्जनभर रैलियों की योजना बनाई है. जनवरी और फ़रवरी में होने वाली इन रैलियों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा शामिल होंगे.
हालांकि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भी जनवरी में झारखंड के रामगढ़ से अपनी यात्रा की योजना बनाई है. झारखंड में फ़िलहाल बीजेपी विरोधी दलों का शासन है, जिसमें झारखंड मुक्ति मोर्चा और कांग्रेस अहम सहयोगी हैं.
लेकिन झारखंड में भी मुख्यमंत्री हेमन्त सोरेन के भविष्य को लेकर लगातार अटकलें लगाई जा रही हैं, ऐसे में रामगढ़ में नीतीश को कितना समर्थन मिलेगा और इसमें ‘इंडिया’ से सहयोगी हेमन्त सोरेन या कांग्रेस की क्या भूमिका होगी यह भी फ़िलहाल पूरी तरह स्पष्ट नहीं है.
इससे पहले हाल ही में हुए पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में भी विपक्षी दलों के ‘इंडिया’ गठबंधन में एकता का अभाव साफ दिखा था. उस दौरान कांग्रेस ने अकेले ही विधानसभा चुनाव लड़ने का फ़ैसला किया था और मध्य प्रदेश में बिना साझेदारी के अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी ने भी अपने उम्मीदवार उतारे थे.
इस तरह से विपक्षी गठबंधन के एक नहीं होने से कांग्रेस को बड़ा नुक़सान हुआ था. कांग्रेस मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनावों में बुरी तरह पराजित हुई थी. अब लोकसभा चुनावों के पहले भी बिना साझेदारी के उम्मीदवारों की घोषणा से भी भ्रम की यह स्थिति और बढ़ सकती है.
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