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उषाकिरण खानः जिन्होंने अपनी लेखनी से जड़ सामंती समाज को झकझोरा
- Author, निवेदिता
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
आख़िरी बार उन्हें देखा मैंने. ताबूत में पड़ी. शांत और स्थिर.
मैं देख रही थी उन्हें नम आंखों से. यादें खामोशी से सुलग रही हैं. हवा का हल्का-सा झोंका आया- लगा जैसे वह जाग पड़ेंगी. जड़वत निस्तब्धता-सी घिरने लगी. बाहर अंधेरा घिर रहा है.
मेरी आँखें अनायास ऊपर उठ आईं. वह सचमुच चली गईं. उनके साथ हिन्दी और मैथिली साहित्य की एक दुनिया भी खाली हो गई.
पद्मश्री उषाकिरण खान ने साहित्य की दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाई. एक ज़िंदादिल औरत. जिन्होंने हर मुद्दे पर लिखा और खूब लिखा. अपने अंतिम दिनों तक लिखती रहीं.
मैं कभी-कभी उनसे पूछ बैठती- 'आप इतना कैसे लिख लेती हैं सब कुछ करते हुए?' वो हंसती कहतीं- 'लिखना एक अभ्यास है. एक लेखक को पूरी ज़िंन्दगी अभ्यास करते रहना चाहिए.'
उनके लेखन में सबसे ज़्यादा गांव-घर आया. वह इस बात को मानती थीं कि असली ज़िन्दगी की कहानी गांव के भीतर ही है.
उन्होंने खूब लिखा. बच्चों पर लिखा. नाटक लिखा, कहानियां, उपन्यास और आलेख, संस्मरण.
अदब की दुनिया से परिचय
मैंने इन्हें बहुत नज़दीक से जाना है. गांधीवादी पिता और मां ने इन्हें अदब की दुनिया से परिचय कराया.
नागार्जुन पिता के दोस्त थे. कई साहित्यकारों का आना-जाना लगा रहता था. क्रांतिकारियों की जमात ने इनके मन पर गहरा प्रभाव डाला.
कम उम्र में शादी हो गई. गृहस्थी का भार संभालते हुए इन्होंने पढ़ना जारी रखा. इतिहास की प्रोफ़ेसर हुईं. लिखने की साध मन में थी तो लिखना शुरू किया. ये आसान नहीं था. पर लगन थी. लिखती रहीं.
कई संगठन बनाए. साहित्य के साथ-साथ संस्कृति में गहरी रुचि रही. कई नाटक लिखे और नाट्य संगठनों से जुड़ी रहीं. 'हीरा डोम' जैसे नाटक खूब चर्चित हुए.
'आयाम' संस्था का गठन किया. साहित्य में रुचि रखने वाली स्त्रियों के लिए उन्होंने नई दुनिया रची. जिसमें कोई दरवाज़ा नहीं था. वो जगह थी जहां हम सुकून और मुक्ति के साथ जीते थे.
'आयाम' के गठन के ठीक पहले उन्होंने मुझे घर पर बुलाया और कहा कि उनकी इच्छा है कि वैसी लिखने-पढ़ने वाली महिलाओं के समूह को गोलबंद किया जाए जिसे कहीं जगह नहीं मिलती है. आयाम का गठन हुआ.
उसमें सभी विचारों की महिलाओं के लिए दरवाज़े खुले थे. शर्त सिर्फ़ ये थी कि उनकी रुचि पढ़ने-लिखने में हो. पहली बार आयाम में मुझे संयोजक बनाया उन्होंने. ये जानते हुए भी कि मैं मुख़्तलिफ़ विचार की हूं. उस मंच से हम सब ने रोहित वेमुला से लेकर प्रतिरोध की कविता का पाठ चौराहे पर किया.
दोस्त, हमसफ़र और हमराह
उषा दी मेरे लिए दोस्त, हमसफ़र और हमराह थीं. मुश्किलों में हमेशा साथ रहतीं. मैंने अपने जीवन में इतनी जीवंत और दिलदार औरत को बहुत कम देखा. जिस तरह उन्हें देखा वैसा ही पाया.
उनके पति रामचंद्र खान जितने आस्थावान थे वो उतनी ही अलग थीं. ईश्वर में यक़ीन था पर पूजा-पाठ से मतलब नहीं था.
उनकी कई बातें हैं और यादें. मैं उन्हें उसी तरह याद रखना चाहती हूं. उन्होंने जो महसूस किया वो लिखा.
उनके लेखन प्रक्रिया से जुड़ी रही हूं. उनकी कहानियां और उपन्यास के किरदारों से मिलती रही हूँ. वे सब मेरे बहुत करीब हैं और जाने-पहचाने हैं.
हर किरदार आपको बड़ी हमदर्दी और दर्दमंदी से, बड़ी सफ़्फ़ाकी और हिक़ारत से अपने बीच ले जाता है. इन कहानियों के ज़रिए हम जीवन को नज़दीक से देख सकते हैं. उन्होंने तमाम विषयों पर लिखा. सेक्स जैसे विषय पर भी लिखा.
'पीड़ा के दंश' वैसी ही एक कहानी है. जिसमें सारी नैतिकता के मापदंड बदल गए हैं. जब कहानी का एक पात्र विपिन पत्नी से कहता है – ''मैंने पूरा जीवन तुम्हारे साथ गुज़ार दिया, अब एक बार अनुषा के साथ सोना चाहता हूँ.''
उसकी पत्नी शांता कहती है, ''विपिन आपकी इमेज बिगड़ेगी.'' पति-पत्नी के बीच का ये संवाद बताता है कि किस तरह मध्यवर्ग के मूल्य बदले हैं, रिश्ते बदले हैं. उनकी कहानियों में गाँव की सादगी और शहर का जीवन मिलेगा, प्रेम का अलग रंग मिलेगा.
गांव-घर की भाषा की खुशबू
'अड़हुल की वापसी' जैसी कहानी प्रेम को नई कैफ़ियत, नई लय, भाव के अनोखे ज़ायके से भर देती है. उनकी कई कहानियां ठेठ कोसी क्षेत्र के गांव की कहानी हैं. उनके लेखन में गांव घर की भाषा की खुशबू है.
मुहावरों और लोकोक्तियों की वजह से इनकी कहानियां दूसरों से अलग हैं. आप देखिए कि ये किस तरह रचती हैं- ''चन्दन की बाहों में दुल्हिन अवश होती जा रही थी. तख़्त पर चटाई बिछी थी जहाँ हौले से उसे सुलाया और बांहों में भर कर सो गया. आज सारे गिले-शिकवे दूर हो गए, दोनों के आंसुओं की धार ने सारे कलुष धो दिए. दूर कहीं सतरंगी का समापन हो रहा था, खंजड़ी बजाकर समवेत स्वर में गा रहा था गईन."
उनका सारा लेखन जीवन से उपजा है. कहानियों और उपन्यास के अलग-अलग रंग हैं. आबसूनी, संदली और बादामी रंग है तो कहीं सुरमई. सारे रंग मिलकर अफ़सानों की दुनिया में इस तरह बिखरे हैं जैसे आकाश में बादल.
इनकी कहानियां पढ़-पढ़ कर मेरी स्याह पुतलियाँ सब्ज़ होने लगी हैं. अफ़साने अब उनकी गिरफ़्त से बाहर हैं अदब की दुनिया में चमक रहे हैं. मैं उन्हें याद करती हूं. जैसे कोई याद करता है ज़िन्दगी को, रंगों को. उषा दी हमारी यादों में हैं सदा. मुझे फ़ैज़ याद आते हैं, 'कब याद में तेरा साथ नहीं.'
रंगों से भरी बेहद संवेदनशील उषाकिरण खान को मेरा अंतिम सलाम. दुनिया उन्हें उनके अदबी संसार के लिए हमेशा याद रखेगी.
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