जम्मू कश्मीर: बच्चों के यौन शोषण मामले में 'पीर बाबा' कहलाने वाले एक शख़्स को 14 साल की क़ैद, कैसे सामने आया था मामला

- Author, माजिद जहांगीर
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, श्रीनगर से
जम्मू-कश्मीर की एक अदालत ने 'पीर बाबा' कहे जाने वाले एक शख़्स को बच्चों का यौन शोषण करने का दोषी ठहराते हुए 14 साल की सख़्त सज़ा सुनाई है.
कश्मीर में सोपोर की अदालत के चीफ़ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट (सीजेएम) मीर वजाहत ने बीते सोमवार को 125 पन्नों के अपने फ़ैसले में दोषी को रणबीर पीनल कोड (आरपीसी) की धारा 377 के तहत दोषी ठहराया है.
हालांकि दोषी के परिवार वालों ने कहा है कि वो इस फ़ैसले को उच्च न्यायालय में चुनौती देंगे.
यहां ये जानना ज़रूरी है कि महाराजा रणबीर सिंह के नाम पर बने रणबीर पीनल कोड का इस्तेमाल जम्मू कश्मीर की मुख्य आपराधिक दंड संहिता के तौर पर होता आया है.

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सीजेएम मीर वजाहत ने अपने फ़ैसले में लिखा है, "अभियोग पक्ष ने अदालत के सामने जो सामग्री पेश की है, उसका बारीक़ी से जायज़ा लिया गया."
"अदालत के सामने पेश सबूतों के आधार पर अभियुक्त को बच्चों के साथ अप्राकृतिक कृत्य करने के आरोप में धारा 377 आरपीसी के तहत दोषी ठहराया जा रहा है. बच्चों के साथ यौन शोषण का यह सिलसिला कई सालों तक जारी रहा है."
यह मामला अदालत में क़रीब नौ साल तक चला.
अदालत ने पुलिस को ये आदेश दिए हैं कि इस केस में जितने भी सर्वाइवर सामने आए हैं, उनके लिए अलग से क़ानूनी सहायता मुहैया कराई जाए.
इस मामले में अदालत ने आठ गवाहों को रिकॉर्ड किया था, लेकिन आठ में से केवल दो गवाहों के बयानों को सज़ा की बुनियाद बनाया गया है.


दोषी क़रार दिए गए अजाज़ अहमद शेख को पुलिस ने साल 2016 में यौन शोषण का मामला दर्ज़ होने के बाद गिरफ़्तार किया था.
उन पर छोटे बच्चों के साथ यौन शोषण करने का आरोप लगाया था.
उनके ख़िलाफ़ एक सर्वाइवर ने पुलिस में शिकायत दर्ज़ कराई थी.
क़रीब एक महीने जेल में रहने के बाद उसी साल अजाज़ अहमद शेख उर्फ़ पीर बाबा को अदालत ने ज़मानत पर रिहा किया था.
इस के बाद साल 2017 में पुलिस ने इस मामले में अदालत में आरोप पत्र दाख़िल किया था.
अजाज़ अहमद, पीर बाबा का काम करते थे. उनके पास कई सारे मुरीद आते-जाते थे.
उनके घर में उनकी पत्नी, दो बेटे और दो बेटियां हैं.
अजाज़ अहमद ने स्कूलों में शिक्षक के रूप में भी काम किया है और मस्जिद के इमाम भी रहे हैं.

साल 2016 में सोपोर के रहने वाले एक सर्वाइवर के पिता ने पुलिस में शिकायत दर्ज़ कराई थी.
इस बच्चे ने पीर बाबा के पास दोबारा जाने से इनकार कर दिया था. पिता के बार-बार पूछे जाने पर उसने इस घटना के बारे में उन्हें बताया.
पुलिस की विशेष जांच टीम (एसआईटी) ने इस केस की जांच की थी, जिस दौरान कुछ और सर्वाइवर सामने आए थे.
हालांकि एक ही सर्वाइवर की ओर से पुलिस में शिकायत दर्ज़ कराई गई थी. लेकिन उसमें आरोप लगाया गया था कि पीर बाबा ने और भी बच्चों का शोषण किया है.
अदालत ने दो सर्वाइवरों के बयानों पर फ़ैसला सुनाते हुए कहा है कि दूसरे सर्वाइवरों के लिए पुलिस अलग से मामले दर्ज़ करे.


लंबे समय के बाद अदालत में फ़ैसला आने का कारण कई सारी तकनीकी अड़चनों को बताया गया है.
फ़ैसले में बताया गया है कि कोविड महामारी और एक साथ सभी पक्षों का अदालत में न आना, अदालत के अधिकारियों के तबादले और दूसरे कामों की व्यस्तता के चलते इस सुनवाई में देरी हुई.
क़रीब नौ साल तक चली सुनवाई के दौरान छह जजों ने इस मामले की सुनवाई की.
इस केस के सीनियर पब्लिक प्रॉसिक्यूटर मिर्ज़ा ज़ाहिद ने बताया, "इसमें सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि जो दूसरे पीड़ित थे उन्होंने अपनी शिकायत दर्ज़ नहीं करवाई थी. सिर्फ़ एक पीड़ित के पिता ने पुलिस में मामला दर्ज़ करवाया था. उन गवाहों को सामने आने में देर हुई."
"कई पीड़ित ऐसे थे जो सामने ही नहीं आए. जब यह मामला दर्ज़ हुआ उस समय कश्मीर में हालात ख़राब थे, चरमपंथ अपने चरम पर था. हड़तालें होती रहती थीं."
मिर्ज़ा का यह भी मानना है कि धार्मिक पीर बाबा होने के कारण भी अभियुक्त के ख़िलाफ़ कार्रवाई में देरी हुई.
उन्होंने कहा, "इस तरह के पीर बाबा समाज में धर्म की आड़ में लोगों को एक बड़ी तादाद को अपने साथ करने में कामयाब होते हैं. ये लोग इनके मुरीद होते हैं."
"जब ऐसे लोगों पर क़ानून हाथ डालता है तो उनके मुरीदों को झटका लगता है. ऐसे लोग कभी विरोध करने पर भी उतर आते हैं."

इस फ़ैसले पर सर्वाइवर की प्रतिक्रिया आई है.
उन्होंने कहा, "मुझे आश्चर्य होता है कि इतने गंभीर मामले में न्याय होने में नौ साल कैसे लग गए. ये फ़ैसला काफी पहले आ जाना चाहिए था."
"इसकी वजह से मैं और दूसरे पीड़ित बहुत तकलीफ़ और दर्द से गुज़रे हैं. अब ये फ़ैसला आया है, मैं उस जज के प्रति आभारी हूं जिन्होंने ये फ़ैसला सुनाया है. वो इंसान नहीं बल्कि फरिश्ता हैं. उन्हीं जज ने मेरे दर्द को एक कविता में भी समेटा. सलाम हैं उन्हें."


फ़ैसले में बताया गया है कि दो सर्वाइवर की कहानियों को सुनकर एक 'ज्वाइंट ट्रायल' चलाया गया, जिसमें कई और पीड़ित भी सामने आए हैं.
अदालत ने इस बात को साफ़ शब्दों में बताया है कि दूसरे सर्वाइवरों की गवाही का भी अदालत ने संज्ञान लिया है.
फ़ैसले में बताया गया कि दूसरे पीड़ितों के साथ घटी घटनाओं का समय अलग था और अलग-अलग जगहें थीं और वो एक साल की समय सीमा में नहीं थीं इसलिए उन्हें ज्वाइंट ट्रायल में शामिल नहीं किया गया.


शिक़ायत के मुताबिक़ अजाज़ अहमद अपने मुरीदों को उनके बच्चों को (जिनकी उम्र पंद्रह साल से कम हो) अपने पास लाने के लिए कहा करता था.
वह अपने मुरीदों से कहता कि बच्चे यहां जिन्न को देखेंगे और उनसे बातें करेंगे.
बाद में देर रात पीर उन बच्चों का यौन शोषण करते थे.
एक शोषित ने बताया कि पीर बाबा ने रात के अंधेरे में उनका बलात्कार किया था. इस शख़्स ने बताया कि साल 2002 में पीर बाबा ने उनका शोषण किया था, तब वह नौवीं क्लास के छात्र थे.
उन्होंने बताया, "पीर बाबा के कहने पर उस दिन मैं रात को वहां ही ठहरा. मैं अकेला था. पीर बाबा ने जिन्न का झूठा रूप बनाकर मेरा बलात्कार किया. वो रात मेरी ज़िंदगी की सबसे अंधेरी रात थी."

2016 में पीर के ख़िलाफ़ मामला दर्ज़ हुआ था.
उस समय सोपोरे में बोमई थाना इंचार्ज नासिर अहमद ने मामला दर्ज़ किया था.
वह बताते हैं, "यह एक मुश्किल काम था. इस मामले के साथ संवेदनशीलता भी जुड़ी थी. धर्म की आड़ में जब कुछ ग़लत किया जाता है तो फिर उस व्यक्ति के ख़िलाफ़ जांच करना कुछ मुश्किल सा हो जाता है."
"अदालत ने अभियुक्त को सजा सुनाई है. इसका मतलब है कि हमारी जांच सही साबित हुई."

हालांकि पीर के परिवार ने इस फ़ैसले को ऊंची अदालत में चुनौती देने की बात कही है.
बीबीसी के साथ बातचीत में पीर के बेटे समीउल्लाह ने बताया कि वह इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ ऊपरी अदालत में लड़ेंगे.
उन्होंने कहा, "हमारे पिता के ख़िलाफ़ झूठा केस बनाया गया है. अगर हमारे पिता ऐसे होते तो क्या हमें मालूम नहीं होता या हमारी माँ को उन चीज़ों की जानकारी नहीं होती?"
"ऐसा कैसे हो सकता है कि घर में यह सब कुछ चल रहा हो और घरवालों को ख़बर न हो."
वहीं बचाव पक्ष के वकील बशीर अहमद मल्ला ने बताया कि जज जब कोई फ़ैसला सुनाता है तो वह क़ानून के हिसाब से चीज़ों को देखता है और क़ानून को सामने रखकर फ़ैसला करता है.
इस फै़सले को चुनौती देने की बात करते हुए मल्ला कहते हैं कि अदालत के फ़ैसले में कुछ ऐसी बातें हैं जिनको स्पष्ट करना ज़रूरी है.
आरपीसी की धारा 377 के तहत दोषी ठहराए गए व्यक्ति को उम्र क़ैद या जुर्माने के साथ दस साल क़ैद की सख़्त सजा सुनाई जा सकती है.
इस मामले में दो सर्वाइवरों के लिए दोषी पीर को सात-सात साल की सज़ा सुनाई गई है. हालंकि ये दोनों सज़ा वो एक साथ जेल में काटेंगे.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित












