हाई कोर्ट के फ़ैसले के बाद क्या नीतीश के जाति सर्वे की रणनीति कामयाब हो पाएगी?

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पटना हाई कोर्ट ने बिहार सरकार की ओर से 2023 में पारित आरक्षित कोटा बढ़ाने के संशोधन को रद्द कर दिया है, जिसे नीतीश सरकार के लिए एक बड़े झटके के तौर पर देखा जा रहा है.
जातिवार सर्वे कराने के बाद नीतीश कुमार ने राज्य में आरक्षण का दायरा बढ़ा दिया था. तब नीतीश कुमार आरजेडी के साथ थे. तेजस्वी यादव भी इसका श्रेय ले रहे थे और अपनी सरकार की बड़ी उपलब्धि के तौर पर पेश कर रहे थे.
अब नीतीश कुमार बीजेपी के साथ हैं और हाई कोर्ट ने चुनाव के बाद यह फ़ैसला सुनाया है.
नीतीश कुमार और तेजस्वी यादव की सरकार ने जब आरक्षण का दायरा बढ़ाया, तब कहा गया कि वह पिछड़ी जातियों को एकजुट कर बीजेपी को चुनौती देना चाहते हैं. लेकिन नीतीश ने पाला बदल लिया था अब हाई कोर्ट ने फ़ैसला सुना दिया.
जाति सर्वे के आंकड़ों को सामने रखकर नीतीश कुमार ने ‘जिसकी जितनी हिस्सेदारी, उसकी उतनी भागेदारी’ की बात कही थी.
न सिर्फ़ नीतीश कुमार बल्कि विपक्षी गठबंधन इंडिया के नेताओं ने भी इसका श्रेय लेने की कोशिश की और केंद्र की मोदी सरकार पर निशाना साधा.
लेकिन अब हाई कोर्ट के फ़ैसले ने बिहार में आरक्षण को पुरानी स्थिति में ला खड़ा किया है.
क्या है पूरा मामला?

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बिहार सरकार ने साल 2023 में अत्यंत पिछड़ा वर्ग, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (एससी/एसटी) के लिए आरक्षण बढ़ाकर 50 से 65 प्रतिशत कर दिया था.
इसे गुरुवार, 20 जून को हाई कोर्ट ने रद्द कर दिया है.
कई लोगों ने पटना हाई कोर्ट में याचिका दायर कर बिहार में आरक्षण दायरा 50 फ़ीसदी से ज़्यादा करने पर आपत्ति जताई थी.
याचिका दायर करने वालों ने हाई कोर्ट में यह तर्क दिया था कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित 50% की सीमा से अधिक आरक्षण बढ़ाना संविधान के मूल ढांचे का उल्लंघन है.

हाई कोर्ट ने मामले की सुनवाई करते हुए 11 मार्च को फ़ैसला सुरक्षित रख लिया था.
गुरुवार को चीफ जस्टिस के विनोद चंद्रन और जस्टिस हरीश कुमार की बेंच ने बढ़े हुए आरक्षण को रद्द कर दिया.
कोर्ट ने कहा कि यह असंवैधानिक है और संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 16 के तहत समानता के अधिकार का उल्लंघन करता है.
आगे क्या करेगी बिहार सरकार

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फ़िलहाल राज्य में जनता दल (यूनाइटेड) और भारतीय जनता पार्टी की गठबंधन की सरकार है.
सरकार में उप-मुख्यमंत्री और बीजेपी नेता सम्राट चौधरी का कहना है कि वे हाई कोर्ट के फ़ैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देंगे.
मीडिया से बात करते हुए उन्होंने कहा, “भारतीय जनता पार्टी का स्पष्ट मानना है कि बिहार में पिछड़ों, अति पिछड़ों, दलितों और आदिवासियों का आरक्षण बढ़ना चाहिए. बिहार में सबको आरक्षण है. इसलिए बिहार की सरकार सुप्रीम कोर्ट जाएगी और वहां से बिहार के लोगों को न्याय दिलाने का काम करेगी.”
विपक्ष ने क्या कहा?

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हाई कोर्ट के फ़ैसले के बाद राष्ट्रीय जनता दल, नीतीश कुमार के साथ-साथ बीजेपी पर भी हमलावर है.
मीडिया से बात करते हुए बिहार के पूर्व उप मुख्यमंत्री और आरजेडी नेता तेजस्वी यादव ने कहा कि अगर नीतीश सरकार इस फ़ैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती नहीं देगी तो ये काम आरजेडी करेगी.
उन्होंने कहा, “हम लोग आहत हुए हैं. हम लोगों को संदेह पहले भी था. ये भाजपा के लोग किसी भी हालत में आरक्षण को रोकने का काम करेंगे और हम शुरू से ही कह रहे हैं. हमने चुनाव में भी कहा था कि ये बीजेपी के लोग आरक्षण विरोधी हैं. आप लोगों को पता होगा कि जब हमने जाति आधारित सर्वे करवाई थी तब भी बीजेपी के लोगों ने इस तरह से कोर्ट में पीआईएल करवाकर रुकवाने का प्रयास किया था…लेकिन आख़िर में हमारी जीत हुई.”
तेजस्वी ने कहा, “हम लोगों ने इसे शेड्यूल 9 में डालने की मांग की थी ताकि यह तमिलनाडु की तर्ज़ पर सुरक्षित रहे. लेकिन तब से अब तक छह महीने हो गए हैं, भाजपा और केंद्र सरकार ने इसे पूरा नहीं किया है. क्यों माननीय मुख्यमंत्री जी अब चुप्पी साधे हुए हैं.”
उन्होंने कहा, “...अगर बिहार सरकार सुप्रीम कोर्ट नहीं जाएगी तो राष्ट्रीय जनता दल सुप्रीम कोर्ट ज़रूर जाएगी.”
आरजेडी नेता और राज्यसभा सांसद मनोज झा ने कहा, “ऐसे फ़ैसले सामाजिक न्याय की मंजिल को हासिल करने में फासले बढ़ाते हैं. मुझे याद है कि तमिलनाडु को भी बहुत साल लगे थे. संघर्ष करना पड़ा था. हम भी तैयार हैं.”
उन्होंने कहा, “जिन्होंने यह याचिका लगाई है, उनकी सामाजिक पृष्ठभूमि देखिए. पर्दे के पीछे ये कौन लोग हैं, जो ये काम करवाने के लिए उत्सुक हैं. इसमें वो बहुत ज्यादा प्रेरक की भूमिका निभा रहे हैं. तेजस्वी यादव जी हर चुनावी सभा में बोलते रहे कि इसे नौवीं अनुसूची में शामिल कीजिए, देखिए उसे शामिल न करने पर क्या हासिल हुआ.”
जातीय सर्वे के बाद लिया था फ़ैसला

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नीतीश सरकार ने बिहार में जातीय सर्वे करवाया था. इस सर्वे के बाद राज्य सरकार ने शिक्षा और नौकरी में आरक्षण कोटे को बढ़ाने का फ़ैसला किया था.
इस जाति आधारित सर्वे की रिपोर्ट के आधार पर सात नवंबर को नीतीश सरकार ने विधानसभा में आरक्षण संबंधी विधेयक पेश किया था.
इसमें ओबीसी आरक्षण को 12 प्रतिशत से बढ़ाकर 18 प्रतिशत, अत्यंत पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षण को 18 प्रतिशत से बढ़ाकर 25 प्रतिशत, एससी के लिए 16 प्रतिशत से बढ़ाकर 20 प्रतिशत और एसटी के लिए आरक्षण की सीमा को एक प्रतिशत से बढ़ाकर दो प्रतिशत करने का प्रस्ताव था.
विधानसभा ने इस विधेयक को 9 नवंबर को पास कर दिया और 21 नवंबर को राज्यपाल ने इसे अपनी मंजूरी भी दे दी, जिसके बाद राज्य में ईबीसी, ओबीसी, दलित और आदिवासियों को मिलने वाले आरक्षण की सीमा 65 प्रतिशत हो गई.
वहीं अगर आर्थिक रूप से पिछड़े (सवर्ण) लोगों को मिलने वाला 10 प्रतिशत आरक्षण भी जोड़ लिया जाए तो बिहार में यह सीमा 75 प्रतिशत तक पहुंच गई थी.
जातियों के आंकड़े

बिहार में जातिवार सर्वे के मुताबिक़ राज्य की कुल आबादी 13 करोड़ 7 लाख 25 हजार 310 है.
इसमें सबसे सबसे बड़ी आबादी अत्यंत पिछड़ा वर्ग की है, जो राज्य की कुल आबादी 36.01% फ़ीसदी है.
इसके अलावा राज्य की आबादी में पिछड़ा वर्ग 27.12%, अनुसूचित जाति 19.65%, अनुसूचित जनजाति की आबादी 1.68% और अनारक्षित यानी सवर्ण जातियां क़रीब 15.52% हैं.
नौवीं अनुसूची में होने से क्या फ़ायदा?

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न्यायिक समीक्षा से बचने के लिए क़ानूनों को नौवीं सूची में डाला जाता है.
1951 में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने संविधान में संशोधन करके नौंवी अनुसूची का प्रावधान किया था ताकि भूमि सुधारों को अदालत में चुनौती न दी जा सके.
इस अनुसूची के चलते तमिलनाडु में पिछले 35 सालों से एससी, एसटी, ओबीसी को मिलाकर 69 प्रतिशत आरक्षण दिया जा रहा है.
सुप्रीम कोर्ट ने 1992 में इंदिरा साहनी मामले में फ़ैसला सुनाते हुए आरक्षण की सीमा को 50 प्रतिशत तक ही सीमित रखने का फ़ैसला लिया था. बावजूद इसके तमिलनाडु में 69 प्रतिशत आरक्षण है. यह सिर्फ़ नौवीं अनुसूची के कारण ही संभव हुआ है.
तमिलनाडु की तत्कालीन मुख्यमंत्री जयललिता ने 69 प्रतिशत आरक्षण का विधेयक विधानसभा से पारित करवाने के बाद केंद्र सरकार को मजबूर कर दिया था कि वह संविधान संशोधन कर इस विधेयक को नौवीं अनुसूची में डाले, ताकि यह न्यायिक समीक्षा के दायरे से बाहर हो जाए.
इस वजह से संविधान में 76वां संशोधन हुआ था.
आम तौर पर इस अनुसूची में डाले गए कानून की न्यायिक समीक्षा नहीं होती है लेकिन साल 2007 में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश वाईके सभरवाल की अध्यक्षता में नौ सदस्यीय पीठ ने फैसला सुनाया था कि संविधान में वर्णित मौलिक अधिकारों के विपरीत जाने वाले क़ानूनों की समीक्षा का अधिकार सुप्रीम कोर्ट का है, भले ही वह नौवीं अनुसूची का हिस्सा क्यों न हो.
सुप्रीम कोर्ट ने तब अपने आदेश में कहा था कि 24 अप्रैल 1973 के बाद नौवीं अनुसूची में डाले गए सभी कानूनों की न्यायिक समीक्षा की जा सकती है.
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