जयंत चौधरी के भी बीजेपी के साथ आने की चर्चा, अगर ऐसा हुआ तो क्या असर होगा- प्रेस रिव्यू

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कांग्रेस के भारत जोड़ो न्याय यात्रा के उत्तर प्रदेश में प्रवेश करने से ठीक पहले प्रदेश में बड़ी सियासी जोड़तोड़ की कोशिशें नज़र आ रही है.
अंग्रेज़ी अख़बार द हिंदू में छपी एक ख़बर के अनुसार, बीजेपी ने राष्ट्रीय लोक दल (रालोद) के प्रमुख चौधरी जयंत सिंह को एक ऐसा प्रस्ताव दिया है, जिससे इनकार करना उनके लिए आसान नहीं होगा.
पार्टी के सूत्रों के हवाले से अख़बार लिखता है कि फ़िलहाल जयंत सिंह अपने सामने मौजूद विकल्पों के बारे में विचार कर रहे हैं. जयंत, चौधरी चरण सिंह के पोते हैं.
अब तक बीजेपी रालोद पर 'परिवारवादी पार्टी' होने का आरोप लगाती रही है. लेकिन देश में जल्द आम चुनाव होने वाले हैं और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाट-मुस्लिम वोट बैंक के असर को कम करने और विपक्षी समाजवादी पार्टी (सपा) से टक्कर लेने के लिए बीजेपी को रालोद का साथ चाहिए.
इस सियासी जोड़तोड़ की कोशिश के बीच बुधवार को समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव, पार्टी नेता शिवपाल यादव और मैनपुरी से सांसद डिंपल यादव ने जयंत सिंह और उनके परिवार की सेक्युलर छवि की की चर्चा करते हुए पार्टी पर अपना भरोसा जताया. उन्होंने कहा कि उन्हें यक़ीन है कि पार्टी किसानों और मज़दूरों के लिए काम करना जारी रखेगी.
द टेलिग्राफ़ ने पश्चिम उत्तर प्रदेश के एक बीजेपी नेता के हवाले से कहा है कि, "दोनों पार्टियों के बीच समझौता लगभग हो गया है, इंतज़ार करिए राहुल गांधी की भारत जोड़ा न्याय यात्रा के उत्तर प्रदेश में आने के वक़्त इसे लेकर औपचारिक घोषणा की जा सकती है."
इन नेता का कहना था, "जिस दिन राहुल की यात्रा मणिपुर से शुरू हुई, मिलिंद देवरा ने कांग्रेस छोड़ी और वो बीजेपी के साथ आ गए. यात्रा बिहार में प्रवेश करने वाली थी और नीतीश कुमार ने इंडिया गठबंधन का साथ छोड़ दिया. अब उत्तर प्रदेश में इस गठबंधन को एक और झटका मिलने वाला है."
क्यों घबरा रही बीजेपी?

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द हिंदू लिखता है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सहारनपुर और मुरादाबाद डिवीज़न के साथ-साथ मेरठ, अलीगढ़ और आगरा में लोकसभा की कम से कम 18 सीटें हैं, यहां बीजेपी का ट्रैक रिकॉर्ड अच्छा नहीं रहा है.
बीजेपी ने मुज़फ़्फ़रनगर से सांसद संजीव बालियान को केंद्रीय कैबिनेट में जगह दी और मुरादाबाद के बाशिंदे भूपेन्द्र चौधरी को प्रदेश पार्टी अध्यक्ष बनाया, इसके बावजूद इलाक़े में किसानों के नेता के रूप में जयंत चौधरी की पकड़ को वो चुनौती नहीं दे सकी.
सूत्रों के अनुसार, इस बार बीजेपी रालोद के समर्थक रहे जाटों की नाराज़गी की फ़ायदा उठाना चाहती है, जो जनवरी में आवंटित सात में से तीन सीटों पर रालोद के चुनाव चिह्न के साथ अपने उम्मीदवार उतारने के सपा के एकतरफा फ़ैसले से ख़ुश नहीं हैं और ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं.
इसमें मुज़फ़्फ़रनगर की सीट भी शामिल है जो पार्टी के लिए प्रतिष्ठा का सवाल है.
हालात तब और बिगड़ गए जब सपा ने फतेहपुर सीकरी सीट को कांग्रेस के लिए छोड़ने के लिए रालोद पर दबाव डाला.
अख़बार ने बागपत में रहने वाले रालोद के कट्टर समर्थक का बयान छापा है जो कहते हैं कि "हम चौधरी चरण सिंह के परिवार क साथ ज़रूर हैं लेकिन सपा हमें हलके में नहीं ले सकती."
वो इस बात से नाराज़ हैं कि बीते विधानसभा चुनावों में रालोद ने सपा के कई उम्मीदवारों को अपने चुनाव चिह्न के साथ लड़ने दिया था.
रालोद के लिए बीजेपी की इस नरमी ने जाटों के उस वर्ग को एनडीए में लौटने का एक मौक़ा दे दिया है जो नहीं चाहते कि इस समुदाय का वोट बीजेपी और रालोद के बीच बँटे.
पार्टी के एक वरिष्ठ नेता अजय तोमर ने हाल में कहा था, "अगर कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न मिल सकता है, तो चौधरी चरण सिंह को क्यों नहीं, जो उनके गुरु थे?"
रालोद को ख़ुश करने की कोशिश

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जंयत चौधरी इस बात से ख़ासे नाराज़ रहे हैं कि बीजेपी का नेतृत्व गठबंधन के अपने सहयोगियों को अधिक तवज्जो नहीं देता.
सूत्रों के हवाले से द हिंदू लिखता है कि इसी कारण इस बार बीजेपी रालोद के सामने बड़ी पेशकश कर रही है. सरकार बनने पर अगली कैबिनेट में जगह और मौजूदा प्रदेश कैबिनेट में जगह के साथ-साथ बीजेपी केंद्र सरकार की नौकरियों में जाट आरक्षण के संकेत दे रही है.
ये मुद्दा सपा के लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वो यादवों को हितों को ध्यान में रखने वाली पार्टी है और इसके विरोध में है. बीजेपी एक अलग हरित प्रदेश की संभावना को भी हवा दे रही है, जहाँ एक जाट को सीएम बनाया जा सकता है.
मुज़फ़्फ़रनगर से पूर्व सांसद सोहन वीर वर्मा कहते हैं, "400 सीटें हासिल करने की बीजेपी की कोशिश में जयंत सिंह की अहम भूमिका हो सकती है. बीजेपी रालोद को बागपत, कैराना, मथुरा और अमरोहा की चार सीटें देने के लिए तैयार हैं. बीजेपी के साथ मिलकर वो चारों सीटों पर जीत हासिल कर सकते हैं, जबकि सपा के साथ मिलकर वो हमें बस अच्छी टक्कर दे सकते हैं."
मुज़फ़्फ़रनगर को लेकर कश्मकश की स्थिति

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मुज़फ़्फ़रनगर सीट को लेकर सोहन वीर का कहना है कि इस सीट पर समझौता नहीं हो सकता क्योंकि 2013 के बाद रालोद के संस्थापक अजित सिंह ने यहाँ जाटों और मुलसमानों को साथ लाने के लिए काफ़ी काम किया था, लेकिन वो 2019 चुनाव में संजीव बालियान से बेहद कम मतों के अंतर से हार गए.
अख़बार ने लिखा है कि जहाँ बीजेपी के सूत्रों के अनुसार, इस सीट पर रालोद ने दावा नहीं किया है, वहीं रालोद के सूत्रों का कहना है कि इस सीट पर पार्टी किसी हाल में समझौता नहीं करेगी.
पार्टी नेता अजय तोमर के अनुसार, "जब हम ये सीट सपा को नहीं दे सकते तो ये सीट बीजेपी को देने का सवाल कहाँ से उठता है?"
मुज़फ़्फ़नगर की पाँच विधानसभा सीटों में से दो-दो पर सपा और रालोद को जीत मिली थी, वहीं एक पर बीजेपी काबिज़ है.
यही सीट वो बड़ा मुद्दा है, जो रालोद के ग़ैर-जाट समर्थकों को ये भरोसा दिला रही है कि सपा के साथ गठबंधन में थोड़ा बहुत ऊपर-नीचे होने के बावजूद जयंत चौधरी अपना बीजेपी विरोधी रवैया नहीं छोड़ेंगे.
पार्टी नेताओं का मानना है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसान और मुसलमान जयंत चौधरी से उम्मीद लगाए बैठे हैं, अगर वो बीजेपी के साथ हाथ मिला लेते हैं तो उनका मुद्दा उठाने वाला कोई नहीं रहेगा. वहीं कुछ स्थानीय जाट नेताओं का मानना है कि जाट किसान भी ऐसा नहीं चाहते.
12 फ़रवरी को रालोद अजित सिंह का जन्मदिन मनाएगी और बीजेपी और रालोद दोनों दलों से जुड़े नेता मानते हैं कि आने वाले वक़्त में रालोद सपा के साथ रहेगी या फिर कमल से हाथ मिलाएगी, ये स्पष्ट हो जाएगा.
मोदी का नारा
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द टेलिग्राफ़ लिखता है कि सोमवार को प्रधानमंत्री मोदी ने लोकसभा में कहा, "अब की बार 400 पार."
उन्होंने कहा कि एनडीए इस बार 400 सीटों का आंकड़ा पार करेगी और 370 सीटें अकेले बीजेपी जीत कर आएगी.
वहीं हाल में बीजेपी के एक नेता ने कहा था कि 400 का आँकड़ा पार करने के लिए हमें उत्तर और पश्चिम के अलावा दक्षिण के प्रदेशों में भी सीटें जीतनी होंगी.
आंध्र में नए गठजोड़ की तलाश
लेकिन अगले लोकसभा चुनावों में 400 का आँकड़ा पार करने की उम्मीद रख रही बीजेपी केवल उत्तर प्रदेश में ही नहीं बल्कि दूसरे राज्यों में भी स्थानीय पार्टियों से हाथ मिलाने की पूरी कोशिश में लगी हुई है.
टाइम्स ऑफ़ इंडिया में छपी एक ख़बर के अनुसार, जहाँ उत्तर प्रदेश में बीजेपी रालोद के साथ चर्चा कर रही है, वहीं बिहार में नीतीश कुमार की जनता दल यूनाइटेड (जदयू) के साथ वो हाथ मिला चुकी है और आंध्र प्रदेश में पार्टी तेलुगू देशम पार्टी (टीडीपी) और पंजाब में अकाली दल से संभावित गठबंधन पर चर्चा में लगी है.
साल 2019 में एनडीए छोड़ चुके टीडीपी प्रमुख चंद्रबाबू नायडू बुधवार को दिल्ली पहुंचे, जहाँ बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा के मुलाक़ात के बाद उनके साथ वो गृह मंत्री अमित शाह से मिलने पहुंचे.
टीडीपी को लेकर अब तक बीजेपी का प्रतिक्रिया ठंडी रही थी क्योंकि अब तक उसे उसके प्रतिद्वंद्वी आंध्र के मुख्यमंत्री सीएम जगनमोहन रेड्डी का लगातार समर्थन मिल रहा था और नायडू से पार्टी की नाराज़गी भी थी.
लेकिन अब बीजेपी शायद अपने क़दम पर फिर से विचार कर रही है और ये इस बात की तरफ़ इशारा है कि जिन इलाक़ों में वो खुद मज़बूत स्थिति में नहीं है, वहां नए सहयोगी बनाना चाहती है.
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पंजाब में एक बार फिर अकाली से चर्चा
सूत्रों के हवाले से टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने लिखा है कि 2022 में बीजेपी के लाए किसानों से जुड़े तीन क़ानून को लेकर अकाली दल से हुए मतभेद के बाद चुनावों से ठीक पहले बीजेपी एक बार फिर पार्टी से बातचीत कर रही है.
अख़बार लिखता है कि अकाली प्रमुख सुखबीर बादल ने पंजाब में गठबंधन के लिए भाजपा के एक वरिष्ठ नेता से बातचीत शुरू की है. पंजाब में ये दोनों की पार्टियां संघर्ष कर रही हैं.
बीजेपी के कई समर्थकों के लिए देश के सीमावर्ती प्रदेश में हिंदुओं और सिखों के बीच संबंध मज़बूत करने के लिए बीजेपी के अकाली दल के साथ गठबंधन अहम है, हालांकि बीते वक्त में अकाली दल से हाथ मिलाना बीजेपी के लिए महंगा पड़ा है.
वित्त मंत्री के हस्ताक्षर की नक़ल कर लिखी चिट्ठी

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अख़बार द इंडियन एक्सप्रेस में छपी एक ख़बर के अनुसार, बुधवार को अधिकारियों ने कहा कि एक अज्ञात व्यक्ति ने कथित तौर पर वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के जाली हस्ताक्षर किए और गृह मंत्रालय को पत्र लिखा.
अधिकारियों ने इस व्यक्ति के ख़िलाफ़ जालसाज़ी का मामला दर्ज कर लिया है.
अख़बार लिखता है कि इस मामले में हुई एफ़आईआर के अनुसार, सीतारमण के अतिरिक्त निजी सचिव, बीएन भास्कर ने बताया, "वित्त मंत्री के जाली लेटरहेड पर उनके जाली हस्ताक्षर किये गए इस पत्र में ऐसी बातें शामिल हो सकती हैं जो नुक़सान पहुंचा सकती है, सरकारी कामकाज़ में हेरफेर कर सकती है या फिर किसी को गुमराह कर सकती है. इस तरह की घटना न केवल इसमें शामिल लोगों की ईमानदारी से समझौता करती है बल्कि हमारे सरकारी संस्थानों की सुरक्षा और कामकाज़ के लिए भी ख़तरा पैदा करती है."
पुलिस ने फ़र्जी पहचान पत्र के ज़रिए गृह मंत्रालय में घुसने की कोशिश कर रहे एक व्यक्ति को गिरफ्तार किया. अधिकारियों के अनुसार इस व्यक्ति के पास "गृह मंत्रालय के जाली लेटरहेड के साथ-साथ एक फर्जी पहचान पत्र बरामद किया गया है."
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