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बन मस्का, चाय और गरमागरम समोसे...अपने अस्तित्व की जंग लड़ता हैदराबाद का एक ईरानी कैफ़े
- Author, अमरेन्द्र यारलागड्डा
- पदनाम, बीबीसी तेलुगू
बन मस्का से उठती ख़ुशबू,गरमागरम समोसे से भरी प्लेटें और ख़ास तरह की चाय...ये हरेक ईरानी कैफ़े की पहचान है. अपने अलग ज़ायके और अंदाज़ के लिए मशहूर ये ईरानी कैफ़े संकट के दौर से गुज़र रहे हैं.
ख़ासतौर से अपने विशिष्ट संगमरमर टॉप वाली टेबल, पुरानी शैली की घड़ियां, काली सफेद फ़र्श और स्पेशल मेनू वाली पारसी स्टाइल के लिए पहचाने जाने वाला ईरानी कैफ़े सौ साल से भी ज़्यादा समय से भारतीय संस्कृति का हिस्सा रहे हैं.
इन कैफ़े का प्रभाव भारत तक नहीं बल्कि दूर दूसरे देशों तक फैल गया है.
लंदन के मशहूर जाने माने रेस्तराओं में से एक डिशुम भी इसी ईरानी कैफ़े से प्रेरित होकर बनाया गया है.
भारत में सबसे पहले ये कैफ़े मुंबई और पुणे जैसे शहरों में अठारहवीं और उन्नीसवीं शताब्दी में आए जब ईरानी प्रवासियों का भारत में प्रवेश हो रहा था.
मुंबई और पुणे के अलावे भारत में एक तीसरा शहर भी हैं जहां ईरानी कैफ़े खूब भारी संख्या में मौजूद हैं. लेकिन इनके बारे में हैदराबाद से बाहर कम लोग ही जानते हैं.
हैदराबाद के लगभग हर कोने में फैले हुए ईरानी कैफ़े दशकों से भारत के दक्षिणी शहर की स्थानीय संस्कृति का हिस्सा रहे हैं.
लेकिन इन तमाम आकर्षणों और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के बावजूद मुंबई और पुणे के उलट हैदराबाद के ईरानी कैफ़े काफ़ी बुरे दौर से गुज़र रहे हैं.
कैफ़े मालिक इसके लिए बढ़ती महंगाई, फ़ास्ट-फ़ूड रेस्तराओं से प्रतियोगिता और ग्राहकों के बदलते स्वाद को ज़िम्मेदार ठहराते हैं.
उन्नीसवीं शताब्दी के अंत में ईरानी व्यापार का एक प्रमुख केंद्र होने के कारण हैदराबाद में आज भी मुंबई के बाद सबसे ज़्यादा ईरानी कैफ़े हैं.
निज़ाम के शासनकाल में हैदराबाद में बड़े पैमाने पर फ़ारसी भाषा बोली जाती थी.
पुराने हैदराबाद में मशहूर निलोफ़र कैफ़े का नाम भी निज़ाम ने अपनी ईरानी बहू के नाम पर ही रखा था.
ये वो दौर भी था जब आज का पाकिस्तान, भारत का हिस्सा था, और ईरान इसका पड़ोसी था. ऐसे में पारसी कारोबारी आसानी से आवाजाही करते थे.
उत्पीड़न और अकाल से बचने के लिए हैदराबाद और भारत के अन्य शहरों का रुख करने वाले कई परिवार वापस अपने घर लौट चुके थे. कुछ बेहतर नौकरी और व्यापार की तलाश में भी आए थे.
उनका वापस लौटना संयोग से उस औपनिवेशिक शासन के समय हुआ जब अंग्रेज़ भारत में चाय पीने की संस्कृति को खूब बढ़ावा दे रहे थे.
हैदराबाद में कैसे बढ़ा ईरानी कैफ़े
जब ईरानी भारत पहुंचे तो वे अपने साथ एक ख़ास तरह की चाय बनाने की अपनी शैली भी लेकर आए.
हालांकि, ईरान में लोग बिना दूध के, मुंह में चीनी का टुकड़ा रखकर चाय पीते थे. लेकिन भारतीय चाय में स्वाद के लिए दूध और मलाई मिलाते हैं.
ईरानियों के कारण चाय की इस ख़ास शैली को शहर में एक अलग ईरानी चाय संस्कृति के रूप में बढ़ावा मिला.
हैदराबाद के इतिहासकार मोहम्मद सफ़ीउल्लाह कहते हैं, "पहले शहर में चाय 'चाय खाना' के नाम से बेची जाती थी और केवल मुस्लिम ही इस चाय को पीते थे. लेकिन बहुत जल्दी यहाँ के सभी धर्मों के लोग इसके स्पेशल स्वाद को पसंद करने लगे."
20वीं सदी तक, हैदराबाद के हर नुक्कड़ और कोने में ईरानी कैफ़े मौजूद थे.
यहाँ चाय की चुस्कियों के साथ ग्राहक बातचीत के कारण अपना काफ़ी समय यहाँ बिताते थे.
इतिहासकारों का यह भी मानना है कि सामाजिक बाधाओं को पार करने और धार्मिक वर्जनाओं को तोड़ने में इन कैफ़े की बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका रही है.
इतिहासकार पार्वस्तु लोकेश्वर हैदराबाद में इन कैफ़े के नाम का कोई धार्मिक अर्थ नहीं होने के कारण ईरानी कैफ़े को धर्मनिरपेक्षता के प्रतीक के रूप में भी देखते हैं.
इसलिए इन कैफ़े को सभी धर्मों और जातियों के लोगों ने संरक्षण दिया.
लेकिन अब वो ख़तरे में हैं
ईरानी कैफे़ 'द ग्रैंड होटल' के मालिक जलील फ़ारूक़ रूज़ ने कहा कि दो दशक पहले जहां क़रीब 450 कैफे़ थे, वहीं अब मात्र 125 कैफे़ बचे हैं.
इस कैफे़ को 1935 में 12 ईरानियों ने मिलकर शुरू किया था. जिसे बाद में 1951 में ईरान से आए रूज़ के नाना ने ख़रीद लिया.
बीबीसी से बातचीत में इस कैफे़ के मालिक जलील फ़ारूक़ रूज़ कहते हैं, “हम पहले रोज़ाना 8,000 से 9,000 कप ईरानी चाय बेचते थे लेकिन अब मुश्किल से 400 कप ही बेच पाते हैं.”
इसके लिए रूज़ फास्ट-फूड चेन से प्रतिस्पर्धा को एक कारण बताते हैं.
वर्तमान में तेज़ी से तरक्की करते भारतीय शहरों में से एक हैदराबाद शहर नब्बे के दशक में एक छोटा और शांत शहर था.
नब्बे के दशक के मध्य में भारत में आईटी बूम के दौरान कई चीज़ों के बदलने के साथ हैदराबाद भी आईटी इंडस्ट्री का पावरहाउस बन गया.
उस समय भारत में कई आर्थिक सुधार कार्यक्रमों के तहत देश के अन्य शहरों की तरह हैदराबाद में भी ग्लोबल फ़ास्ट फ़ूड चेन और अन्य दूसरे कैफे़ के लिए बाज़ार खुल गए.
ईरानी कैफे़ की तरह हैदराबाद में लोगों को अब इन नए कैफे़ और फास्ट फूड रेस्तराओं में भी खाने के साथ-साथ ज्यादा जगह और अन्य सुविधाएँ भी मिलने लगीं.
रूज़ कहते हैं कि ईरानी कैफे़ में आने वाले लोग आराम से चाय की चुस्की ले सकें इसके लिए बड़ी जगह की ज़रूरत के मद्देनज़र शहर में अधिकतर ईरानी कैफे़ किराए के परिसर में चलाए जाते रहे हैं.
लेकिन हैदराबाद में रियल एस्टेट की बढ़ी कीमतों के कारण बड़ी जगह लेने में दिक्कतों के कारण कई कैफे़ मालिक दूसरे काम पर जाने के लिए मजबूर हो गए.
वो कहते हैं, "महंगाई का भी असर पड़ा है. पांच साल पहले की तुलना में चाय पाउडर और दूध की कीमतें अब तीन गुना बढ़ गई हैं."
लोगों का यह भी कहना है कि अब ईरानी परिवारों की संख्या भी इस व्यवसाय में कम हो गई है.
शहर के एक अन्य मशहूर रेस्तरां फ़राशा के मालिक महमूद कहते हैं कि कैफ़े और रेस्तरां इंडस्ट्री में अब वर्तमान पीढ़ी दिलचस्पी नहीं रखती है. इसके बजाय वो अब अन्य नौकरियों को पसंद करने लगे हैं जिसकी खोज में दूसरे देश भी चले जाते हैं.
चुनौतियों के बावजूद कुछ लोग बने हुए हैं
लेकिन इन चुनौतियों के बावजूद, इस व्यवसाय में अभी भी कुछ लोग बने हुए हैं.
शहर के रेड रोज़ रेस्तरां के मालिक सैयद मोहम्मद रज़्ज़ाक़ हैं.
रज़्ज़ाक़ के दादा ने 70 के दशक में तेहरान से आकर यहाँ सिटी लाइट होटल की स्थापना की थी और उसके बाद रज़्ज़ाक़ के पिता ने रेड रोज़ रेस्तरां शुरू किया, जिसे अब वो खुद संभालते हैं.
पेशे से इंजीनियर और ग्राफिक डिज़ाइनर रज़्ज़ाक़ कहते हैं, "सिर्फ चाय और बिस्कुट बेचना न तो आसान है और न ही मुनाफे वाला धंधा है."
चुनौतियों से निपटने और अधिक ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए उन्होंने अब मेनू में नए व्यंजन शामिल किए हैं और व्यवसाय को बढ़ाने के लिए अपने ग्राफिक डिज़ाइनिंग के ज्ञान का उपयोग करते हुए ऑनलाइन माध्यम से प्रचार प्रसार कर रहे हैं.
वो कहते हैं, “हाँ, मैं अपने परिवार की विरासत को जारी रखना चाहता हूँ.”
इन कैफ़े मालिकों के साथ ही शहर में वफ़ादार ग्राहकों की भी कमी नहीं है जो पीढ़ियों से इन कैफ़े में ईरानी चाय की चुस्की लेने आते रहे हैं.
वो कहते हैं कि वे "ईरानी चाय के एक और कप" के लिए तो हमेशा आते रहेंगे.
ग्रैंड होटल में ही नियमित तौर पर आने वालीं एक महिला कहती हैं कि ईरानी चाय उनके जीवन का हिस्सा है क्योंकि उन्हें इसका स्वाद पसंद है और जब भी वो बाहर निकलती हैं तो इसे पीती जरूर हैं.
वो कहती हैं, “आज भी ईरानी चाय जैसा कुछ और भी नहीं है.”
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित