ईरान के नए राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान अपने वादों को पूरा कैसे करेंगे?

    • Author, फ़रज़ाद सैफ़ीकरन
    • पदनाम, बीबीसी फ़ारसी सेवा

ईरान के नए राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान ने 30 जुलाई को देश के सांसदों, न्यायपालिका के प्रमुख, संवैधानिक परिषद के सदस्यों, वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों और पूर्व प्रशासन के मंत्रियों की मौजूदगी में शपथ ग्रहण की.

ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह सैयद अली ख़मैनी ने बीते रविवार ही मसूद पेज़ेश्कियान को देश के नए राष्ट्रपति के तौर पर अनुमोदित किया था.

राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान किस तरह की सरकार बनाएंगे और किस तरह काम करेंगे, ये एक ऐसा सवाल है जिसका जबाव हर कोई जानता चाहता है.

उन्होंने हाल ही में कहा था कि “कुछ लोगों को लगता है मुझे कुछ करना चाहिए, लेकिन मैं कुछ भी नहीं कर सकता...मैंने ऐसा कोई वादा नहीं किया था.”

भले ही पेज़ेश्कियान ये दावा करें कि उन्होंने ऐसा कोई वादा नहीं किया था, लेकिन चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने अपने प्रशासन के लिए कई लक्ष्य बताए थे.

इनमें ज्वाइंट कॉम्प्रिहेंसिव प्लान ऑफ एक्शन (जेसीपीओए), ईरान पर लगे प्रतिबंधों को हटाना, फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (एफएटीएफ) की ब्लैक-लिस्ट से बाहर निकलने के साथ ही चीन और रूस से संबंधों को बढ़ाने की बात भी कही गई थी.

सुप्रीम लीडर की भूमिका

पेज़ेश्कियान ने अपने प्रशासन के लक्ष्यों में ये भी कहा था कि ‘समानता और पारस्परिक सम्मान’ के आधार पर यूरोप समेत बाक़ी दुनिया के साथ संबंध कायम किए जाएंगे.

उन्होंने सेंसरशिप का विरोध करते हुए, महिलाओं और लड़कियों की मांगों का सम्मान करने की भी बात कही थी.

चुनाव प्रचार के दौरान पेज़ेश्कियान ने ईरान के सुप्रीम लीडर अयोतुल्लाह सैयद अली ख़मैनी और अवाम दोनों को ही संतुष्ट करने का प्रयास किया था. उन्होंने सोशल फ्रीडम और पश्चिम के साथ तनाव में कमी लाने के लिए, मामूली वादों के साथ बहुत सचेत होकर बात की थी.

मसूद पेज़ेश्कियान को मनोनीत किए जाने से कुछ दिन पहले, सुप्रीम लीडर से जुड़े मीडिया में कई संदेशों के ज़रिए ये दिखाने की कोशिश की गई थी कि मसूद भले ही सुधारवादियों के उम्मीदवार हैं, लेकिन वो ईरान के सर्वोच्च नेता के प्रति समर्पित हैं.

इन संदेशों के ज़रिए ये संकेत दिया गया था कि ‘शासन तंत्र के एकीकरण’ का रास्ता, जो हाल के वर्षों में संसद और न्यायपालिका में रुढ़िवादियों के नियंत्रण से शुरू हुआ, उसमें अब एक सुधारवादी राष्ट्रपति के नेतृत्व में विधायिका को भी शामिल किया गया है.

सुधारवादियों के समर्थन वाले एकमात्र उम्मीदवार और देश के चुनावी इतिहास में, पहले राउंड में सबसे कम मतदान के बावजूद चुनाव जीतने वाले मसूद पेज़ेश्कियान इस बात पर लगातार ज़ोर देते रहे हैं कि उनकी सरकार सिस्टम के बने-बनाए रास्ते का ही अनुसरण करेगी.

उन्होंने घोषणा की थी कि “अगले राष्ट्रपति का ये कर्त्तव्य होगा कि वो पूर्ववर्ती सरकार के रास्ते पर चलना जारी रखें.’’ उनका मुख्य वादा यही था कि “वह मौजूदा तंत्र की आम-नीतियों और सुप्रीम लीडर का अनुसरण करेंगे.”

मसूद पेज़ेश्कियान ने ये भी कहा था कि उनके सिर पर यदि ईरान के सर्वोच्च नेता का हाथ नहीं होता, तो उन्होंने कभी सोचा भी नहीं होता कि मतपेटियों से उनका नाम निकलेगा.

टीवी डिबेट्स के दौरान उन्होंने कहा था कि “मेरे प्रचार के लिए जो भी आना चाहे, उसका स्वागत है क्योंकि मुझे वोट चाहिए, लेकिन चुनाव के बाद मैं सुप्रीम लीडर के विचारों के अनुरूप काम करूंगा.”

सुप्रीम लीडर की ओर से अनुमोदित किए जाने से पहले उनकी वेबसाइट को दिए एकमात्र इंटरव्यू में उन्होंने इसी वादे को दोहराया था.

अब ऐसा प्रतीत होता है कि सुधारवादी आंदोलन से निकले मसूद पेज़ेश्कियान को ईरान के सर्वोच्च नेता का समर्थन हासिल है.

कई लोग ये सवाल उठा रहे हैं कि मसूद पेज़ेश्कियान को आगे क्यों बढ़ाया गया. सवाल ये भी है कि क्या वह मौजूदा सिस्टम की आम नीतियों और पूर्व राष्ट्रपति के रास्ते पर चलने के लिए आए हैं या उन वादों को पूरा करने आए हैं जो उन्होंने लोगों से किए थे.

दमन का नया दौर

मसूद पेज़ेश्कियान के राष्ट्रपति बनने से पहले और चुनाव के बाद के दिनों में न्यायपालिका और सुरक्षा एजेंसियों ने सिविल सोसाइटी के ख़िलाफ़ अपनी पकड़ और मज़बूत की है. महिलाओं के अधिकारों की पैरवी करने वाले कई कार्यकर्ताओं को तलब किया गया, उन्हें जेल भेजा गया और यहां तक कि मौत की सज़ा भी दी गई.

ऐसा लगता है कि न्यायपालिका और सुरक्षाबल ये दिखा रहे हैं कि मसूद पेज़ेश्कियान के आने से सिविल सोसाइटी और सोशल फ्रीडम के मामले में कुछ बदलने वाला नहीं है.

राष्ट्रपति चुनाव में मसूद पेज़ेश्कियान की जीत के एक दिन बाद ही नागरिकों अधिकारों की पैरवी करने वाले कार्यकर्ताओं को समन, गिरफ़्तारियों और क़ैद का सिलसिला दोबारा शुरू हो गया था.

पेशे से वकील और यूनिवर्सिटी प्रोफेसर मोहसिन बोरहानी को जेल भेज दिया गया, जबकि उन्होंने चुनाव के दौरान पेज़ेश्कियान का समर्थन किया था.

14वें राष्ट्रपति चुनाव के बाद के दिनों में, दो महिला कार्यकर्ताओं शरीफ़ेह मोहम्मदी और पख़शान अज़ीज़ी को ‘विद्रोह’ के आरोपों में मौत की सज़ा सुनाई गई. इससे संकेत मिलता है कि नागरिक अधिकारों के लिए आवाज़ उठाने वालों पर एक बार फिर शिकंजा कसा जा रहा है.

इस मामले में ‘विद्रोह’ का मतलब है ईरान के ख़िलाफ़ हथियारबंद कार्रवाई. महिलाओं के अधिकारों की पैरवी करने वाले कई कार्यकर्ताओं को लगता है कि शरीफ़ेह मोहम्मदी और पख़शान अज़ीज़ी को चुनाव के बाद मौत की सज़ा सुनाने का मतलब है कि “सरकार महिलाओं से बदला ले रही है.”

इसके अलावा, ईरान के उत्तरी प्रांत गिलान में चौदह महिला अधिकार कार्यकर्ताओं को भी जेल भेजा गया है. हिजाब की अनिवार्यता का विरोध करने वाले छात्रों और नागरिक अधिकारों के लिए आवाज़ बुलंद करने वाले कार्यकर्ताओं को कड़ी सज़ा दी गई है.

इनमें से कई कार्यकर्ताओं के मामले ‘वीमन, लाइफ़, फ्रीडम’ और हिजाब के मुद्दे पर देशव्यापी विरोध प्रदर्शनों से जुड़े हुए हैं. मौत की सज़ा को अंजाम देने वाले आदेशों में इज़ाफ़ा हो रहा है.

पेज़ेश्कियान की ख़ामोशी

सुधारवादियों का कहना है कि कार्यकर्ताओं पर ये दबाव, सत्ता में मौजूद कट्टर और रूढ़िवादी तत्वों की वजह से है, जिन्हें ईरान में अक्सर ‘शैडो-गवर्मेंट’ कहा जाता है. लेकिन दूसरी ओर, ईरान में कई लोगों को ये भी उम्मीद है सोशल फ्रीडम की बात करने वाले मसूद पेज़ेश्कियान इस बारे में कुछ करेंगे.

चुनाव प्रचार के दौरान पेज़ेश्कियान ने अपने प्रतिद्वंद्वी के साथ डिबेट के दौरान, इब्राहिम रईसी की सरकार के समय प्रदर्शनों की वजह से, यूनिवर्सिटी छात्रों और प्रोफेसरों के निलंबन की सिर्फ़ एक बार आलोचना की थी.

सुधारवादी राष्ट्रपति पेज़ेश्कियान पहले ये भी कह चुके हैं कि मोरैलिटी पुलिस, हिजाब की अनिवार्यता को ख़त्म करना और राजनीतिक बंदी जैसे मुद्दे उनके अधिकार क्षेत्र से बाहर हैं.

ईरान में कई लोगों को लगता है कि राष्ट्रपति चुनाव से पहले या चुनाव के दौरान, कुछ क़ैदियों की अस्थायी रिहाई, न्यायपालिका और सिक्योरिटी एजेंसियों की कुछ समय की नीतियां थीं, ताकि “चुनाव के दौरान लोगों का उत्साह बढ़ाया जा सके.’’

जहां तक पेज़ेश्कियान के रुख़ की बात है, तो नागरिक अधिकारों की मांग करने वाले कार्यकर्ताओं और मोहसिन बोरहानी जैसे उनके लिए प्रचार करने वाले लोगों के प्रति वो ख़ामोश ही रहे हैं.

ईरान में कैबिनेट कौन चुनता है?

राष्ट्रपति चुनाव में मसूद पेज़ेश्कियान की जीत के बाद, देश के पूर्व विदेश मंत्री मोहम्मद जवाद ज़रीफ़ की अध्यक्षता में सत्ता हस्तांतरण के लिए एक काउंसिल बनाई गई.

जवाद ज़रीफ़ को परमाणु समझौते के लिए पश्चिमी देशों के साथ वार्ता में अहम भूमिका के लिए जाना जाता है.

ज़रीफ़ के मुताबिक, काउंसिल का काम कैबिनेट गठन और संभावित मंत्रियों के चयन के लिए राष्ट्रपति को परामर्श देना है.

पेज़ेश्कियान को ये भी परामर्श दिया गया है कि नई सरकार की कैबिनेट में कम से कम 20 प्रतिशत मंत्री, महिलाएं और अल्पसंख्यक होने चाहिए.

बहरहाल जवाद ज़रीफ़ की अध्यक्षता वाली काउंसिल, राजनीतिक धड़ों और सत्ता प्रतिष्ठानों के बीच विवाद की वजह बन गई है. मंत्रियों का चयन करने के लिए बनाई गई काउंसिल में कोई नस्ली या धार्मिक अल्पसंख्यक सदस्य नहीं है, हालांकि उन्होंने चुनाव में अच्छा प्रदर्शन किया है. वो अब चाहते हैं कि “सत्ता में उनकी साझेदारी हो.’’

इस संदर्भ में, पेज़ेश्कियान के मुख्य प्रतिद्वंद्वी सईद जलीली ने लिखा है, “तथ्य ये है कि लगभग 1.4 करोड़ लोगों ने एक मकसद के लिए वोट दिया है और ये किसी एक व्यक्ति का नहीं बल्कि सामूहिक प्रयास का नतीजा है.”

प्रस्तावित मंत्रियों के बारे में विचार-विमर्श के दौरान पेज़ेश्कियान ने कहा, “अधिकारियों को चुनना एक दुविधा है और हर कोई अपने लोगों को आगे बढ़ा रहा है.”

सुप्रीम लीडर की वेबसाइट के साथ एक इंटरव्यू में पेज़ेश्कियान ने कहा कि उन्होंने अली ख़मैनी के साथ “कैबिनेट की अंतिम सूची तैयार कर ली है.”

राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी के कार्यकाल के दौरान ये कहा जाता था कि ‘एक अलिखित नियम है’, जिसमें मुताबिक़, गृह, ख़ुफ़िया, संस्कृति, विदेश मामले और रक्षा मंत्रियों को सीधे सुप्रीम लीडर नियुक्त करते हैं.

अब ये देखना बाकी है कि पेज़ेश्कियान के ‘राष्ट्रीय एकता वाली कैबिनेट’ के वादे का क्या होता है, जिसमें उन्होंने अपने मंत्रिमंडल में महिलाओं और अल्पसंख्यकों को शामिल करने की बात कही थी. क्या मौजूदा हालात में ऐसा संभव हो पाएगा?

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और व्हॉट्सऐप पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)