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गुजरात का 'एनआरआई बेल्ट', जहाँ के 50 लोग अहमदाबाद प्लेन क्रैश में मारे गए
- Author, जुगल पुरोहित
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, अहमदाबाद से
"रजनीकांत पटेल और उनका परिवार 16 जून को लंदन जाने वाला था. उनकी बेटी की पढ़ाई पूरी हो चुकी थी और 23 जून को उसका दीक्षांत समारोह होना था. इस कार्यक्रम में परिवार को शामिल होना था. फिर उन्होंने सोचा कि क्यों न पहले जाकर बेटी को सरप्राइज़ दें. इसी वजह से उन्होंने 16 जून की अपनी फ़्लाइट की टिकटें रद्द कर दीं. इसके बजाय, 12 जून की उस एयर इंडिया फ़्लाइट में टिकट बुक करवा ली, जो उड़ान भरने के तुरंत बाद क्रैश हो गई. वे वापस नहीं लौट पाए. हमारे परिवारों के बीच बहुत गहरे संबंध थे और उनकी ऐसी आकस्मिक मृत्यु हम सब के लिए बेहद दुखद है."
ये शब्द रजनीकांत पटेल के परिवार के क़रीबी दोस्त और भारतीय जनता पार्टी के सांसद मितेश पटेल के हैं. उन्होंने बीबीसी हिंदी से आणंद स्थित अपने दफ़्तर में बातचीत की.
उस दिन एयर इंडिया के विमान में 242 लोग सवार थे, जिनमें से 241 की मौत हो गई. आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक़, हादसे में जान गंवाने वालों में रजनीकांत पटेल, उनकी पत्नी दिव्या बेन पटेल और रिश्तेदार हेमांगी बेन पटेल सहित मध्य गुजरात के कम से कम 50 लोग शामिल थे.
इनमें मुख्य रूप से आणंद और खेड़ा ज़िलों के लोग थे. इस क्षेत्र को चरोत्तर भी कहा जाता है. दरअसल, गुजरात में इस इलाक़े को 'एनआरआई बेल्ट' के तौर पर जाना जाता है.
जानकारों की राय में इसकी वजह यह है कि इस क्षेत्र के लोग बड़ी संख्या में विदेश में रहते हैं. और यह सिलसिला कोई नया नहीं है, बल्कि 19वीं सदी से ही इस इलाके़ से प्रवास होता आया है.
ऐसा ही प्रवास रूपल बेन पटेल ने लगभग पंद्रह साल पहले किया था. वह अपने परिवार के साथ खेड़ा के उत्तरसंदा गांव से लंदन रहने के लिए गई थीं.
वह भी उस दिन उसी विमान से लंदन अपने पति और बच्चों के पास लौट रही थीं. इस हादसे में उनकी भी जान चली गई.
बीबीसी हिंदी से बातचीत में उनके पड़ोसी और परिवार के मित्र प्रीतेश ब्रह्मभट्ट बताते हैं, "लगभग दो हफ़्ते पहले ही रूपल बेन इलाज कराने भारत आई थीं. दुर्घटना से तीन-चार दिन पहले पूरा परिवार साथ मिला था. पुरानी यादें ताज़ा कीं. सब लोग काफ़ी ख़ुश थे."
शनिवार, 14 जून को बीबीसी हिंदी की टीम उनके परिजनों से मिलने गई थी. उस समय उनके पति लंदन से भारत पहुंचे ही थे. वह परिवार के बाक़ी सदस्यों के साथ अहमदाबाद के सिविल अस्पताल गए थे, जहां दुर्घटना के बाद शवों को लाया गया था.
'सबसे पहले यहां से लोग फ़िजी और अफ़्रीका गए'
अगर चरोत्तर को गुजरात का 'एनआरआई बेल्ट' कहा जाता है, तो आणंद ज़िले का धर्मज गांव इस बेल्ट का 'एनआरआई गांव' माना जा सकता है.
जानकारों और स्थानीय लोगों के मुताबिक़, यह ऐसा गांव है जहां शायद ही कोई घर ऐसा हो, जिसका कोई सदस्य विदेश में न रह रहा हो.
स्थानीय लोगों के अनुसार, यहां के ज़्यादातर लोग तंबाकू की खेती करते हैं.
धर्मज में सबसे पहले हमारी मुलाक़ात कृष्णराज पटेल से हुई. कृष्णराज ने बताया कि हाल ही में वह अपने प्रवासी पूर्वजों का इतिहास जानने के लिए परिवार के साथ केन्या गए थे.
जिस दिन एयर इंडिया का विमान दुर्घटनाग्रस्त हुआ, उसी दिन वह उसी विमान से दिल्ली से अहमदाबाद आए थे. उनका सफ़र वहीं तक था.
वह बताते हैं, "यह हमारे लिए बहुत डरावना था… आज भी मेरे मन में यही विचार आता है कि जो अहमदाबाद में हुआ, अगर वह दिल्ली में हुआ होता तो क्या होता?"
अपने गांव का इतिहास याद करते हुए पटेल ने कहा, "हमारे गांव से पहले पटेल समुदाय के लोग फ़िजी और अफ़्रीका जाया करते थे. फिर समय के साथ लोग वहां से अमेरिका, इंग्लैंड, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैंड जैसे अन्य देशों में गए. आज भी हमारे गांव के कुछ लोग अफ़्रीका और फ़िजी में हैं, हालांकि उनकी संख्या अब कम है और ज़्यादा लोग बाक़ी देशों में बस चुके हैं."
गांव में घूमने पर कई आलीशान मकान नज़र आए. हालांकि, इनमें से अधिकतर मकानों पर ताले लगे थे. दोपहर का वक़्त था, इसलिए सड़कें सुनसान थीं और लोग अपने घरों के अंदर थे.
धर्मज के निवासी, लेखक और सामुदायिक नेता राजेश पटेल ने बताया कि उनके समुदाय के लोग सबसे पहले ईरान से आए थे.
वह कहते हैं, "वहां से हमारे पूर्वज अफ़ग़ानिस्तान पहुंचे. फिर पंजाब आए. आख़िरकार वे मैदानी इलाकों में बस गए क्योंकि खेती के लिए ये क्षेत्र ज़्यादा उपयुक्त थे. यहीं से हमारी यात्रा आगे बढ़ी और हम यहां तक पहुंचे. फिर ब्रिटिश राज के दौरान, 1890 में हमारे समुदाय के कई लोग अफ़्रीका चले गए. उस समय ये दोनों ही क्षेत्र ब्रिटिश शासन के अधीन थे, इसलिए वहां जाकर बसना अन्य जगहों की तुलना में आसान माना जाता था."
उन्होंने अपने समुदाय के विदेश प्रवास की प्रमुख वजहें भी गिनाईं.
राजेश के अनुसार, "माइग्रेशन आमतौर पर तीन-चार कारणों से होता है. शुरुआती दौर में लोग यहां से रोज़गार की तलाश में बाहर गए. अब शिक्षा और करियर के लिए पुरुष और महिलाएं, दोनों ही विदेश जा रहे हैं."
"एक और कारण यह भी है कि कुछ लोग नया करने की चाह में भी विदेश चले जाते हैं. हमारे जैसे समुदायों के लिए विदेश में बसने की प्रक्रिया कुछ हद तक आसान होती है, क्योंकि वहां कई जगहों पर हमारे अपने लोग पहले से मौजूद हैं जो मदद करते हैं."
आँकड़े क्या बताते हैं?
आधिकारिक आँकड़े बताते हैं कि भारत की नागरिकता त्याग कर दूसरे देशों की नागरिकता लेने वाले लोगों की तादाद हाल के सालों में बढ़ी है.
साल 2011 में एक लाख 22 हज़ार 819 भारतीयों ने अपनी नागरिकता त्याग दी थी.
यह आंकड़ा बढ़कर 2021 में एक लाख 63 हज़ार 370 तक पहुंच गया.
सरकार द्वारा पिछले साल जारी किए गए आंकड़ों के मुताबिक़, 2022 में दो लाख 25 हज़ार 620 और 2023 में दो लाख 16 हज़ार 219 लोगों ने भारतीय नागरिकता छोड़ी.
हालांकि, इनमें से किस राज्य से कितने लोगों ने नागरिकता छोड़ी, इसकी जानकारी उपलब्ध नहीं है.
डॉ. हसित मेहता आणंद में ही रहते हैं और पेशे से प्रोफ़ेसर और लेखक हैं.
हमने उनसे जानना चाहा कि गुजरात का यह 'एनआरआई बेल्ट' और यहां से हो रहा निरंतर प्रवास 'गुजरात मॉडल' और समाज के बारे में क्या संकेत देता है?
माइग्रेशन को लेकर डॉ. हसित कहते हैं, "गुजराती समाज के ज़्यादातर लोगों का रुझान व्यापार की ओर होता है. उनके मन में यही चलता है कि एक रुपया कमाएं या एक डॉलर. डॉलर तो 86 या 88 रुपये देगा. लेकिन वे यह नहीं सोचते कि यहां एक कप चाय 10 रुपये की है, वहीं विदेश में वही चाय पांच डॉलर की हो सकती है."
इसके साथ ही वो बताते हैं कि बढ़ती जनसंख्या के कारण आपसी प्रतिस्पर्धा भी एक कारण है, जिससे विदेश जाने का रुझान बढ़ रहा है.
उनके मुताबिक़, "अगर हम 'गुजरात मॉडल' की बात करें तो वह गुजरातियों के लिए नहीं है. गुजरातियों के लिए असली 'मॉडल' तो माइग्रेशन ही है— कनाडा, अमेरिका और यूरोप. यहां अब सामाजिक स्थिति भी इसी आधार पर तय होती है. लोग पूछते हैं कि परिवार का कोई सदस्य विदेश में है या भविष्य में जाने की योजना है? विदेश में रहना अब एक तरह का सामाजिक दबाव बन गया है."
(अतिरिक्त रिपोर्टिंग - नचिकेत मेहता)
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित