कनाडा से तकरार का भारत के अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ रिश्तों पर क्या होगा असर

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- Author, जुगल पुरोहित
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता नई दिल्ली
कनाडा और भारत के आपसी रिश्ते 14 अक्तूबर को अब तक के अपने सबसे मुश्किल दौर में पहुँच गए.
एक तरफ़ भारत ने कहा कि कनाडा की सरकार की कानून व्यवस्था पर भरोसा न होने के कारण वो अपने राजनयिकों को वापस बुला रहा है, वहीं कनाडा के प्रधानमंत्री ने अपने बयान में कहा है कि उनके देश ने भारत के छह राजनयिकों को निष्कासित किया है.
इसके जवाब में भारत ने भी कनाडा के छह राजनयिकों को निष्कासित कर दिया.
मामला कनाडा के नागरिक हरदीप सिंह निज्जर की पिछले साल हुई हत्या से शुरू हुआ था, जिसमें कनाडा ने भारत की भूमिका पर सार्वजनिक तौर पर सवाल उठाए थे.

तेजी से बदलते इन हालातों का भारत पर किस प्रकार का प्रभाव पड़ेगा? क्या कनाडा के साथ बिगड़ते संबंधों के कारण भारत और अमेरिका के रिश्तों में भी उलझनें पैदा हो सकती हैं?
इन सवालों के जवाबों के लिए हमने कुछ आँकड़ों को समझने की कोशिश की और कई विशेषज्ञों से बातचीत की.
कनाडा में कितना बड़ा है 'भारतीय कुनबा'

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भारत और कनाडा के रिश्तों का दायरा कई क्षेत्रों में फैला हुआ है. यही कारण है कि इन संबंधों में खटास आने का असर इन क्षेत्रों पर पड़ सकता है.
भारत के विदेश मंत्रालय के अनुसार लगभग 4,27,000 भारतीय छात्र कनाडा में पढ़ाई कर रहे हैं.
अन्य देशों की तुलना में भारतीय छात्रों की संख्या कनाडा में सबसे अधिक है. दरअसल पिछले तीन सालों में कनाडा जाने वाले छात्रों की संख्या घटी नहीं है बल्कि सरकारी आंकड़े बताते हैं कि इसमें बढ़ोतरी हुई है.
कनाडा में लगभग 30 लाख भारतीय मूल के लोग रहते हैं, जिससे ये प्रवासी भारतीयों के लिए एक बड़ा ठिकाना बन गया है.
आर्थिक संबंधों की बात करें, तो कनाडा के पेंशन फंड्स ने भारत में बड़े पैमाने पर निवेश किया है.
आंकड़े दर्शाते हैं कि पेंशन फंड्स से भारत में लगभग 75 अरब कैनेडियन डॉलर का निवेश किया गया है. भारत में 600 से अधिक कनाडाई कंपनियां काम कर रही हैं, जबकि 1,000 से अधिक कंपनियां भारतीय बाजारों में व्यापार करती हैं.
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 2023 में भारत और कनाडा के बीच व्यापार में पिछले वर्ष की तुलना में लगभग19 फ़ीसदी की बढ़त देखी गई.
इसके अलावा कनाडा से भारत के निर्यात की दर में भी नौ फीसदी की वृद्धि हुई है.
कनाडा का आरोप और रिश्तों में तल्ख़ी

पिछले साल सितंबर में कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने वहां की संसद में बयान देते हुए कहा था कि कनाडा के नागरिक हरदीप सिंह निज्जर की हत्या में भारत सरकार के एजेंटों के शामिल होने के सबूत सामने आए हैं.
हालांकि भारत ने इन आरोपों को ख़ारिज कर दिया था और कनाडा को भारत-विरोधी शक्तियों को शरण न देने की सलाह दी थी.
कुछ ही दिन बाद भारत ने कनाडाई नागरिकों के लिए वीज़ा प्रक्रिया को निलंबित कर दिया था.
पिछले साल अक्टूबर में, कनाडा ने अपने राजनयिकों के निष्कासन के कारण भारत से वीज़ा प्रक्रिया में बाधा आने की बात कही थी.
अगले महीने हालांकि भारत ने कनाडाई नागरिकों के लिए चुनिंदा ई-वीज़ा सुविधाएं फिर से शुरू कर दी थीं.
अब सवाल ये है कि क्या मौजूदा परिस्थितियां और भी गहरे बदलाव लेकर आएंगीं? और क्या इनका असर भारत-अमेरिका के रिश्तों पर भी पड़ेगा?
भारत-अमेरिका के रिश्तों पर असर

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मीरा शंकर अमेरिका में भारत की राजदूत रह चुकी हैं.
उनका मानना है कि इस समय भारत और पश्चिमी देशों को आपस में बातचीत करने की ज़रूरत है.
वो कहती हैं,''ये वक़्त मेगाफोन डिप्लोमेसी का नहीं है. ठंडे दिमाग़ से पहले मामलों को सुलझाने की ज़रूरत है. अब तक भारत और कनाडा ने सारी परेशानियों के बावजूद अपने आर्थिक रिश्तों को संभाल कर रखा है और मैं उम्मीद करती हूं कि आगे भी ऐसा ही होगा.''
कूटनीति को क़रीबी से जानने वाले भारत के पूर्व राजदूत राजीव डोगरा का मानना है कि विदेश में भारत के ख़िलाफ़ बयान देने वाले लोगों पर कार्रवाई की बात करना ग़लत नहीं है.
उनका कहना है कि भारत कनाडा या किसी भी देश से ऐसी कार्रवाई की उम्मीद रख सकता है.
''विदेश में अपने कार्यकाल के दौरान मैंने देखा है कि भारत को दुश्मन मानने वाले देश खुलेआम अलगाववादी लोगों को हमारे ख़िलाफ़ भड़काते हैं.''
डोगरा का मानना है कि अमेरिकी प्रशासन का एक वर्ग अभी भी भारत के साथ अच्छे संबंध नहीं चाहता और यही वर्ग विवाद की वजह है.
''मुझे चिंता इस बात की है कि हमारे रिश्ते चाहे वो भारत-कनाडा हों या भारत-अमेरिका और पश्चिमी देशों से, सही दिशा में नहीं जा रहे. इस मामले में अमेरिका ने भारत का साथ देने के बजाय कनाडा का समर्थन किया है. अमेरिका में भी आए दिन अलगाववादी लोग बयान देते रहते हैं, और ऐसा क्यों हो रहा है, ये समझना मुश्किल है. भारत ने कोशिश की है कि इन आरोपों पर अपना पक्ष साफ़ करे, लेकिन इसका कोई ख़ास नतीजा नहीं दिखता.''
डोगरा का कहना है कि अगर ऐसा चलता रहा, तो इस विवाद का असर अन्य मुद्दों पर भी जल्द ही दिखाई देने लगेगा. उन्होंने कहा, ''ये दायित्व अमेरिका और कनाडा पर भी है कि वे भारत पर निराधार आरोप लगाना बंद करें.''
अमेरिका के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जेक सुलिवन ने अगस्त के महीने में कनाडा में एक बयान दिया था, जिसमें उन्होंने कहा था कि अमेरिका कनाडा के साथ हर स्तर पर सहयोग कर रहा है ताकि निज्जर हत्याकांड मामले की तह तक पहुंचा जा सके. उन्होंने निज्जर की हत्या को एक त्रासदी बताया था. इससे पहले भारत ने निज्जर को आतंकवादी घोषित कर दिया है.
हालांकि इस मुद्दे का दूसरा पक्ष भी है.

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डोगरा का मानना है कि अमेरिकी प्रशासन का एक वर्ग अभी भी भारत के साथ अच्छे संबंध नहीं चाहता और यही वर्ग विवाद की वजह है.
''मुझे चिंता इस बात की है कि हमारे रिश्ते चाहे वो भारत-कनाडा हों या भारत-अमेरिका और पश्चिमी देशों से सही दिशा में नहीं जा रहे. इस मामले में अमेरिका ने भारत का साथ देने के बजाय कनाडा का समर्थन किया है. अमेरिका में भी आए दिन अलगाववादी लोग बयान देते रहते हैं, और ऐसा क्यों हो रहा है, ये समझना मुश्किल है. भारत ने कोशिश की है कि इन आरोपों पर अपना पक्ष साफ़ करे, लेकिन इसका कोई ख़ास नतीजा नहीं दिखता.''
डोगरा का कहना है कि अगर ऐसा चलता रहा, तो इस विवाद का असर अन्य मुद्दों पर भी जल्द ही दिखाई देने लगेगा. उन्होंने कहा, ''ये दायित्व अमेरिका और कनाडा पर भी है कि वे भारत पर निराधार आरोप लगाना बंद करें.''
अमेरिका के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जेक सुलिवन ने अगस्त के महीने में कनाडा में एक बयान दिया था, जिसमें उन्होंने कहा था कि अमेरिका, कनाडा के साथ हर स्तर पर सहयोग कर रहा है ताकि निज्जर हत्याकांड मामले की तह तक पहुंचा जा सके. उन्होंने निज्जर की हत्या को एक त्रासदी बताया था. इससे पहले भारत ने निज्जर को आतंकवादी घोषित कर दिया है.
हालांकि, इस मुद्दे का दूसरा पक्ष भी है.
दूसरा नज़रिया

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अनिल त्रिगुणायत भारत के राजदूत रह चुके हैं और अमेरिका में भी काम कर चुके हैं, उनका मानना है कि कनाडा के साथ रिश्ते चाहे जैसे भी हों, इसका भारत के अन्य पश्चिमी देशों के साथ संबंधों पर असर शायद ही पड़ेगा.
वो कहते हैं, ''अन्य देशों के साथ हमारे रिश्ते मज़बूत हैं. मेरी उम्मीद है कि आपसी सम्मान और संवेदनशीलता के साथ चलें तो रिश्ते संभले रहेंगे. फिलहाल जो समस्या है, वो भारत और कनाडा के वर्तमान नेतृत्व के बीच की है. वहां का नेतृत्व बार-बार भारत को उकसाने का काम कर रहा है.''
बीबीसी से बात करते हुए एक विशेषज्ञ ने नाम न बताने की शर्त पर बताया कि भारत और कनाडा के बीच बढ़ते तनाव के कारण भारत और पश्चिमी देशों के बीच ख़ुफ़िया जानकारी साझा करने के हर कदम पर बाधा आ सकती है.
''कनाडा फाइव आईज अलायंस का सदस्य है, जिसमें अमेरिका, यूनाइटेड किंगडम, ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड भी शामिल हैं. वहां वो अन्य देशों के भारत के साथ रिश्तों को बिगाड़ने की कोशिश कर सकता है.''
उन्होंने कहा, '' हो सकता है कि आगे चलकर कनाडा भारत में निवेश कम कर दे या भारतीय छात्रों को वहां आने के लिए बढ़ावा न दे. इसके अलावा दोनों देश वास्तव में एक-दूसरे के रणनीतिक समीकरण में शामिल नहीं हैं. भारत का अन्य पश्चिमी शक्तियों विशेष रूप से इंडो-पैसिफिक में सामान्य रणनीतिक हित वाले देशों के साथ संबंध अपने पैरों पर खड़ा है.''
प्रधानमंत्री मोदी और ट्रूडो के बीच संबंधों पर सवाल करते हुए अनिल त्रिगुणायत ने कहा कि दोनों के बीच कोई ख़ास केमिस्ट्री नहीं दिखती.
उन्होंने कहा, '' जिस तरह से प्रधानमंत्री ट्रूडो बार-बार भारत पर सार्वजनिक रूप से आरोप लगा रहे हैं,मुझे नहीं लगता कि संबंध सुधरेंगे. दोनों नेता आपस में विनम्रता से पेश आते हैं, लेकिन उससे अधिक कुछ नहीं है. फिलहाल उनके स्तर पर किसी हस्तक्षेप की उम्मीद नहीं है. हां, शायद कनाडा में चुनाव के बाद बदलाव हो,तब चीज़ें बदल सकती हैं. ये भी देखना पड़ेगा.’’
मीरा शंकर भी मानती हैं कि दोनों नेताओं को साथ लाने के लिए अधिकारियों को ज़मीन पर काम करना होगा.
उन्होंने कहा, '' ये सोचना कि दोनों नेता आपस में बातचीत करके मसले को सुलझा लेंगे, शायद उचित नहीं है. वे तभी सार्वजनिक रूप से मिलेंगे,जब इस रिश्ते में आई दरार को भर दिया जाएगा.''
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित
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