दावों और वादों के बीच दिल्ली की इस ज़हरीली हवा के लिए ज़िम्मेदार कौन?

इमेज स्रोत, Getty Images
- Author, अभिनव गोयल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
राजधानी दिल्ली जैसे ही धुंध की चादर में लिपटी, वैसे ही राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप शुरू हो गए हैं.
पिछले कई दिनों से दिल्ली में वायु प्रदूषण का स्तर लगातार ‘गंभीर’ श्रेणी में बना हुआ है.
सेंट्रल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड के मुताबिक, 14 नवंबर को देश में सबसे खराब हवा दिल्ली की थी, यहां का एयर क्वालिटी इंडेक्स (एक्यूआई) 400 के पार पहुंच गया था.
करीब तीन करोड़ लोगों को ज़हरीली हवा में सांस लेने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है.
स्थिति यह है कि वायु प्रदूषण नियंत्रण के लिए ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन-3 लागू किया गया है. यह तब किया जाता है जब किसी शहर का एक्यूआई 400 से पार हो जाता है.

राजधानी में रहने वाले लोगों के लिए ये एक ऐसी घटना बन गई है, जो हर साल सर्दियों के मौसम में दस्तक देती है और जिसका उनके पास कोई हल नहीं है.
एयर क्वालिटी लाइफ इंडेक्स के मुताबिक, प्रदूषण की वजह से दिल्ली के लोगों की उम्र में 10 साल की कमी आ रही है, बावजूद इसके कोई भी सरकार इसकी ज़िम्मेदारी लेने के लिए तैयार नहीं है.
सवाल है कि आखिर राजधानी दिल्ली में वायु प्रदूषण के लिए कौन ज़िम्मेदार है? सरकारें क्या कर रही हैं? और क्या आने वाले कुछ समय में दिल्ली के लोगों को कोई राहत मिल सकती है?
प्रदूषण पर राजनीति

इमेज स्रोत, Getty Images
दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, राजस्थान और केंद्र सरकार एक-दूसरे को प्रदूषण के लिए ज़िम्मेदार बता रहे हैं.
दिल्ली के पर्यावरण मंत्री गोपाल राय का आरोप है कि दिल्ली से सटे बीजेपी शासित राज्यों की सरकारों के साथ केंद्र सरकार प्रदूषण से निपटने के लिए कुछ नहीं कर रही है.
उनका आरोप है, “दिल्ली में प्रदूषण सिर्फ यहां के लोगों की वजह से नहीं है. चारों तरफ से दिल्ली में प्रदूषण आ रहा है…बीजेपी सरकारों से निवेदन है कि हमें सहयोग करें, क्योंकि उसी से प्रदूषण का स्तर कम होगा.”
गोपाल राय का कहना है कि केंद्र सरकार चुनावों में व्यस्त है और उसके लिए प्रदूषण कोई मायने नहीं रखता.
वहीं दिल्ली बीजेपी के अध्यक्ष वीरेंद्र सचदेवा का कहना है कि दिल्ली में प्रदूषण के लिए सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी ज़िम्मेदार है.

वे आरोप लगाते हैं, “दिल्ली के लोग ज़हरीली हवा में सांस लेने को मजबूर हैं, जबकि केजरीवाल सरकार अपनी ज़िम्मेदारी से भाग रही है. प्रदूषण को रोकने के उनके दावे खोखले साबित हो रहे हैं.”
सचदेवा दिल्ली में प्रदूषण के लिए पंजाब की सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी की सरकार को भी ज़िम्मेदार मानते हैं.
वो कहते हैं, “दिल्ली की सीएम आतिशी और पर्यावरण मंत्री गोपाल राय अगर पंजाब सरकार से बात करते और पराली जलाने पर रोक लगवाते तो पूरे उत्तर भारत में प्रदूषण का स्तर काबू रहता.”
दूसरी तरफ पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान ने पाकिस्तान में मौजूद पंजाब की मुख्यमंत्री मरियम नवाज़ शरीफ़ की टिप्पणी पर मज़ाकिया अंदाज़ में प्रतिक्रिया दी है.
उन्होंने कहा, “वे कह रही हैं कि मैं भगवंत मान को चिट्ठी लिखूंगी. आपका धुआं लाहौर आता है. इधर दिल्ली वाले कहते हैं कि आपका धुआं दिल्ली आ रहा है. मैंने कहा कि क्या हमारा धुआं चक्कर ही चक्कर काट रहा है?”
भगवंत मान ने कहा कि हर कोई प्रदूषण के लिए पंजाब को परेशान कर रहा है.
दिल्ली के प्रदूषण के लिए कौन ज़िम्मेदार?

इमेज स्रोत, ANI
मौसम वैज्ञानिकों के मुताबिक दिल्ली में 400 पार एक्यूआई के लिए पहाड़ों पर हुई बर्फबारी और हवा की गति में आई कमी भी ज़िम्मेदार है, जिसकी वजह से वायुमंडल में प्रदूषण के बारीक कण बने हुए हैं और लोगों को स्मॉग की एक परत दिखाई देती है.
पिछले कुछ सालों से अक्टूबर और नवंबर के कुछ हफ्तों में दिल्ली का प्रदूषण स्तर अचानक से बढ़ जाता है, जिसके पीछे किसानों के पराली जलाने को मोटे तौर पर ज़िम्मेदार माना जाता है.
सवाल है कि इस बात में कितनी सच्चाई है.
पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के मुताबिक साल 2023 में जुलाई को छोड़कर कोई भी ऐसा महीना नहीं था जब दिल्ली का एक्यूआई 100 से कम रहा हो.
मंत्रालय के मुताबिक साल के 9 महीने दिल्ली का एक्यूआई 150 से ज़्यादा रहा है, जो अक्टूबर आते-आते 200 के पार जाने लगता है.
वहीं हरियाणा और पंजाब के किसान धान की फसल काटने के बाद पराली में आग लगाते हैं. ये मामले अक्टूबर और नवंबर के कुछ हफ्तों में ही सामने आते हैं.
इसका मतलब साफ है कि दिल्ली के बढ़ते प्रदूषण के लिए सिर्फ किसानों को ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता.
ग्रीनपीस इंडिया के डिप्टी प्रोग्राम डायरेक्टर अविनाश चंचल कहते हैं कि राजधानी में प्रदूषण में पराली जलाने का हिस्सा बहुत कम है.
वो कहते हैं, “आईआईटी दिल्ली की एक रिपोर्ट बताती है कि दिल्ली के प्रदूषण में सबसे बड़ा हिस्सा थर्मल पावर प्लांट का है. दूसरा वाहनों का है. अलग अलग रिपोर्ट्स बताती हैं कि वाहनों की हिस्सेदारी 16 प्रतिशत से लेकर 55 प्रतिशत तक है. इसके बाद कंस्ट्रक्शन और इंडस्ट्री से निकलने वाले प्रदूषण का बड़ा हिस्सा है.”
चंचल कहते हैं, “ये सब मिलकर दिल्ली में प्रदूषण को बढ़ा रहे हैं और ये सिर्फ एक-दो महीने की बात नहीं है. ये सिलसिला साल भर का है. इसलिए राजधानी में इमरजेंसी उपायों और प्रदूषण के लिए किसानों को ज़िम्मेदार ठहराने से इसका हल नहीं निकलेगा.”
ऐसी ही बात गोपाल राय भी करते हैं. एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में विज्ञान एवं पर्यावरण केंद्र (सीएसई) का आंकड़ा रखते हुए वो कहते हैं, “सीएसई ने 12 अक्टूबर से 13 नवंबर के बीच के डेटा का विश्लेषण किया है.
"यह बताता है कि दिल्ली में आज जो प्रदूषण का स्तर है उसमें 30.34 प्रतिशत दिल्ली के लोकल सोर्स हैं. 34.9 प्रतिशत हिस्सेदारी दिल्ली से सटे इलाकों की और 27.97 प्रतिशत हिस्सेदारी एनसीआर से सटे इलाकों की है."
पंजाब का बचाव करते हुए वे कहते हैं, “हमारी सरकार बनने के बाद पराली जलाने के मामलों में करीब 80 प्रतिशत की कमी आई है."
वे केंद्र सरकार के डेटा का हवाले देते हुए बताते हैं कि साल 2022 में पंजाब में 14 अक्टूबर से 13 नवंबर तक पराली जलाने के 45172 मामले सामने आए थे, वहीं इस साल ये मामले घटकर 7492 रह गए हैं.
कैसे कम होगा प्रदूषण

इमेज स्रोत, AFP
पर्यावरण पर काम करने वाली सस्टेनेबल मोबिलिटी वेबसाइट के मुताबिक करीब दस साल पहले चीन के बीजिंग में एक्यूआई का स्तर 100 के पार चला गया था.
वेबसाइट के मुताबिक चीन ने साल 2013 में वायु प्रदूषण से लड़ने के लिए एक बड़ी योजना बनाई और साल 2022 आते-आते बीजिंग का एक्यूआई 30 पर आ गया.
क्लाइमेट एक्सपर्ट अविनाश चंचल कहते हैं कि हमारे सामने चीन का उदाहरण है जब वह अपनी राजधानी का एक्यूआई सुधार सकता है तो भारत क्यों नहीं.
वो कहते हैं, “सरकारों की राजनीतिक सीमाएं होती हैं, लेकिन वायु प्रदूषण इन सीमाओं से बाहर है. सरकारों को आरोप-प्रत्यारोप छोड़कर एक कॉम्प्रिहेंसिव प्लान बनाना होगा.”
चंचल कहते हैं, “हमारी सरकारों को राज्यों की अपनी अपनी सीमाओं को छोड़कर एयर शेड प्रबंधन पर काम करना होगा. इस कॉन्सेप्ट में वह निश्चित एरिया आता है जहां हवा ट्रेवल करती है. यह 200 से 300 किलोमीटर तक भी हो सकता है. इस एरिया में आने वाली सभी सरकारों को हाथ मिलाकर वायु प्रदूषण से लड़ना चाहिए, तभी जाकर कोई हल निकल पाएगा.”
वो कहते हैं कि सरकारों को उन सभी चीज़ों पर एक साथ फोकस करना होगा, जहां से वायु प्रदूषण हो रहा है. अगर सिर्फ एक चीज़ पर ध्यान दिया जाएगा तो बात नहीं बनेगी.
बढ़ते वायु प्रदूषण के बाद दिल्ली सरकार ने पांचवीं तक के स्कूलों को बंद करने के आदेश दिए हैं.
इसके अलावा शहर में चलने वाले वाहनों, निजी निर्माण और अन्य प्रदूषण बढ़ाने वाले कारकों पर कड़े प्रतिबंध लगाए हैं.
गोपाल राय का कहना है कि वायु प्रदूषण को कम करने के लिए राजधानी में पब्लिक ट्रांसपोर्ट को बढ़ाया जा रहा है, जिसके तहत डीटीसी की तरफ से 106 शटल बसें शुरू की गई हैं, जो दिन में 1844 फेरे लगाएंगी.
उन्होंने लोगों से अपील की है कि वे अपने प्राइवेट वाहनों को छोड़कर पब्लिक ट्रांसपोर्ट का इस्तेमाल करें.
क्लाइमेट से जुड़े एक्सपर्ट दिल्ली के इंफ्रास्ट्रक्चर पर भी सवाल उठाते हैं. उनका मानना है कि पिछले तीन दशकों में दिल्ली में बड़े पैमाने पर कंस्ट्रक्शन का काम हुआ है और पब्लिक ट्रांसपोर्ट पर ध्यान नहीं दिया गया है.
अविनाश चंचल कहते हैं, “दिल्ली ट्रांसपोर्ट सिस्टम की हालत बहुत खराब है. आज की तारीख में उनके पास 7600 बसें हैं, जबकि 1998 में सुप्रीम कोर्ट का निर्देश था कि दिल्ली को करीब 10 हज़ार बसों की ज़रूरत है.
वो कहते हैं, “आवासन और शहरी कार्य मंत्रालय के बेंचमार्क के हिसाब से एक लाख की आबादी पर 60 बसें होनी चाहिए. उस हिसाब से दिल्ली को करीब 15 हज़ार बसों की ज़रूरत है. पहले सरकार को पब्लिक ट्रांसपोर्ट मज़बूत करना होगा, तभी जनता प्राइवेट गाड़ियों को छोड़कर पब्लिक ट्रांसपोर्ट का इस्तेमाल कर पाएगी.”
क्या चुनाव में बनेगा मुद्दा

इमेज स्रोत, Getty Images
साल 2025 में दिल्ली में विधानसभा चुनाव होने हैं. ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह भी है कि क्या बढ़ता प्रदूषण चुनावों में मुद्दा होगा?
दिल्ली की राजनीति को दो दशकों से कवर करने वाले वरिष्ठ टीवी पत्रकार कृष्ण मोहन शर्मा कहते हैं कि वायु प्रदूषण को कम करने के लिए राजनीतिक संकल्प की कमी के साथ लोग उस तरह से नेताओं पर दबाव नहीं बना पाते.
वो कहते हैं कि दिल्ली जैसी जगह पर लाखों लोग गरीबी रेखा के नीचे रहते हैं. ऐसे में मतदाताओं की चिंताओं के दायरे में कई दूसरे मुद्दे प्रमुखता से रहते हैं और वायु प्रदूषण पीछे छूट जाता है.
कृष्ण मोहन कहते हैं, “बावजूद इसके आने वाले दिल्ली विधानसभा चुनाव में जो लोअर मिडिल क्लास और मिडिल क्लास है, उसके सामने वायु प्रदूषण एक बड़ा मुद्दा हो सकता है.”
वो कहते हैं, “यहां बात देश की राजधानी की हो रही है. केंद्र सरकार कोई कड़ा नियम लागू कर सकती है और केजरीवाल सरकार को उसे मानने के लिए बाध्य कर सकती है, लेकिन वह ऐसा नहीं कर रही, क्योंकि हर चीज़ के पीछे सियासत है. वो लोगों को दिखाना चाहते हैं कि उन्होंने जो सरकार चुनी है वो दिल्ली को स्वर्ग नहीं बना रही और इन मुद्दों पर उन्हें एक्सपोज़ करना चाहती है.”
वायु प्रदूषण पर हो रहे आरोप-प्रत्यारोप के बीच बच्चे, बुजुर्ग, गर्भवती महिलाओं के साथ फेफड़ों की बीमारी से परेशान लोग राहत की सांस चाहते हैं, क्योंकि इसका सबसे ज़्यादा असर इन्हीं लोगों पर पड़ रहा है. इससे राहत कब मिलेगी, निश्चित तौर पर ऐसा कुछ नहीं कहा जा सकता.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित















