दिल्ली का प्रदूषण किसकी नाकामी, केंद्र और राज्य सरकारों पर क्यों उठ रहे हैं सवाल
- दिवाली के अगले दिन यानी शुक्रवार को दिल्ली में हवा की गुणवत्ता का स्तर 'बहुत ख़राब' की श्रेणी में दर्ज किया गया.
- केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की वेबसाइट पर मौजूद आंकड़ों के मुताबिक़ दिल्ली में सबसे ज़्यादा प्रदूषित हवा आनंद विहार इलाके में रही. शुक्रवार सुबह छह बजे आनंद विहार में एक्यूआई 395 दर्ज किया गया.
- पटाखों पर पाबंदी के बावजूद बीती दिल्ली और एनसीआर में ख़ूब पटाखे चले हैं.
- उत्तर भारत में इस मौसम में वायु प्रदूषण के बढ़ने को लेकर बीबीसी हिंदी ने पिछले हफ़्ते एक विस्तृत रिपोर्ट की थी. पढ़िए एक बार फिर
- Author, चंदन कुमार जजवाड़े
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
- पढ़ने का समय: 10 मिनट

इमेज स्रोत, Getty Images
मौसम बदलने के साथ ही उत्तर भारत में वायु प्रदूषण का असर बढ़ने लगा है. इस प्रदूषण का सबसे ज़्यादा असर राजधानी दिल्ली और इसके आसपास रहने वाले क़रीब 3 करोड़ लोगों पर पड़ता है.
सर्दियों की दस्तक के साथ ही दिल्ली और इसके आसपास के लोग क़रीब तीन महीने तक एक तरह के गैस चैंबर में ज़हरीली हवा के बीच सांस लेने को मजबूर होते हैं.
इसका असर बच्चों, बुज़ुर्गों, गर्भवती महिलाओं और बीमार लोगों पर सबसे ज़्यादा होता है. हालाँकि इन दिनों दिल्ली में प्रदूषण का असर इतना ज़्यादा होता है कि यह स्वस्थ इंसान को भी गंभीर बीमारियाँ दे सकता है.
दिल्ली के प्रदूषण पर सुप्रीम कोर्ट कई बार नाराज़गी जता चुका है. केंद्र सरकार से लेकर दिल्ली और आसपास की राज्य सरकारें अलग-अलग दावे करती रही हैं, लेकिन इससे प्रदूषण के स्तर में कोई बड़ी राहत नज़र नहीं आती है.

क्या हैं दिल्ली में प्रदूषण के हालात
दिल्ली में वायु प्रदूषण के मुद्दे पर काम करने वाले सीएक्यूएम यानी 'द कमीशन फॉर एयर क्वालिटी मैनेजमेंट' ने बीबीसी को बताया है कि दिल्ली में पूरे साल प्रदूषण होता है, लेकिन यह सर्दियों में ज़्यादा नज़र आता है.
सर्दियों में कम तापमान, हवा नहीं चलने और बारिश नहीं होने से प्रदूषण करने वाले कण ज़मीन की सतह के क़रीब काफ़ी कम इलाक़े में जमा हो जाते हैं.
पर्यावरण के लिए काम करने वाली संस्था ग्रीनपीस की एक हालिया रिपोर्ट के मुताबिक़ भारत की राजधानी दिल्ली दुनियाभर में सभी देशों की राजधानी में सबसे ज़्यादा प्रदूषित शहर है.
इस रिपोर्ट में पीएम 2.5 के आधार पर बताया गया है कि दुनिया के सबसे ज़्यादा प्रदूषित 15 शहरों में 12 शहर भारत के हैं.
विश्व वायु गुणवत्ता रिपोर्ट के मुताबिक़ दुनिया के 30 सबसे ज़्यादा प्रदूषित शहर भारत में हैं जहां पीएम 2.5 की सालाना सघनता सबसे ज़्यादा है.
मेडिकल जर्नल बीएमजे की स्टडी में पाया गया है कि प्रदूषण की वजह से भारत में हर साल 20 लाख से ज़्यादा लोगों की मौत होती है.
क्लाइमेट एक्शन नेटवर्क साउथ एशिया के निदेशक संजय वशिष्ठ कहते हैं, "दिल्ली में प्रदूषण पूरे साल रहता है लेकिन यह सर्दियों में सतह के काफ़ी क़रीब आ जाता है, जिसकी वजह से यह ज़्यादा दिखता है और ज़्यादा नुक़सान भी पहुँचाता है."
उनका कहना है कि प्रदूषण की कई वजहें हैं जिनमें निजी वाहनों की बड़ी तादाद, दिल्ली में निर्माण कार्य की बड़ी भूमिका है, इसमें पराली (खेतों में फसलों के अवशेष) जलाना भी शामिल है.

इमेज स्रोत, Getty Images
सुप्रीम कोर्ट की तीखी टिप्पणी
देश की राजधानी दिल्ली और इसके आसपास के इलाक़ों में दिवाली के पहले ही एक्यूआई 'बहुत ख़राब' स्तर पर पहुँच गई है और इससे लोगों को सांस लेने में परेशानी शुरू हो गई है.
सुप्रीम कोर्ट ने प्रदूषण नियंत्रित करने के लिए बने क़ानूनों को लेकर केंद्र सरकार, पंजाब और हरियाणा की राज्य सरकारों पर तीखी टिप्पणी की है और कहा है कि ये किसी काम के नहीं हैं.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि स्वच्छ और प्रदूषण मुक्त वातावरण में रहना सभी नागरिकों का मौलिक अधिकार है और नागरिकों के अधिकार की रक्षा करना केंद्र और राज्य सरकारों का कर्तव्य है.
कोर्ट ने कहा कि पराली जलाने पर जुर्माने से संबंधित प्रावधानों को लागू नहीं किया गया है.
हालाँकि दिल्ली की इस हालत और प्रदूषण के मामलों पर सुप्रीम कोर्ट पहले भी कई बार तीखी टिप्पणी कर चुका है.

इमेज स्रोत, Getty Images
साल 2019 में दिल्ली सरकार के ऑड-इवन स्कीम पर भी सुप्रीम कोर्ट ने सवाल खड़े किए थे.
सुप्रीम कोर्ट ने इस दौरान वायु प्रदूषण को 'जीने के मूलभूत अधिकार का गंभीर उल्लंघन' बताते हुए कहा था कि राज्य सरकारें और स्थानीय निकाय अपनी 'ड्यूटी निभाने में नाकाम' रहे हैं.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा था- 'हमारी नाक के नीचे हर साल ऐसा हो रहा है. इसे बर्दाश्त नहीं करेंगे, आप लोगों को मरते हुए नहीं छोड़ सकते.' दिल्ली में उस साल हेल्थ इमरजेंसी भी लागू करनी पड़ी थी.
साल 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली-एनसीआर में दिवाली में पटाखों पर पाबंदी लगा दी थी.
कृषि विशेषज्ञ और वकील विजय सरदाना इस मुद्दे पर लंबे समय से नज़र रख रहे हैं. उनका मानना है कि पराली जलाना भारत में एक राजनीतिक समस्या है, इसलिए सरकारें इसके ख़िलाफ़ कदम नहीं उठा सकती हैं.
विजय सरदाना कहते हैं, "सुप्रीम कोर्ट को पराली जलाने की सैटेलाइट तस्वीरें मंगाकर पराली जलाने वालों के ख़िलाफ़ एक्शन लेना होगा. कोर्ट ने प्रदूषण को संविधान के अनुच्छेद 21 यानी जीने के अधिकार के ख़िलाफ़ माना है, तो ऐसा करने वालों के ख़िलाफ़ एक्शन ज़रूरी है."
उनका मानना है पराली जलाने से प्रदूषण की समस्या में अचानक बढ़ोतरी होती है और ऐसा करना अपराध है तो इस तरह के अपराध करने वालों को कोई सरकारी लाभ नहीं मिलना चाहिए.
क्या कर रही है दिल्ली सरकार
दिल्ली सरकार के पर्यावरण विभाग के मुताबिक़ साल 2016 से अक्तूबर से फ़रवरी के बीच क़रीब 150 दिनों में दिल्ली में हवा की गुणवत्ता की स्थिति चिंताजनक रही है.
इस दौरान जहाँ साल 2016 में 143 दिनों तक एक्यूआई ख़राब से लेकर ख़तरनाक (सिवियर) की श्रेणी में रहा, वहीं पिछली सर्दियों 150 में 124 दिन हवा की गुणवत्ता इसी श्रेणी में पाई गई.
डीपीसीसी यानी दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण कमेटी की वेबसाइट के मुताबिक़ दिल्ली में सर्दियों के दौरान पीएम-2.5 को बढ़ाने में बायोमास को जलाने का सबसे बड़ा योगदान रहा जो 25 फ़ीसदी के बराबर है. इसमें पराली जलाना भी शामिल है.
सीएक्यूएम के मुताबिक़ सरकार ने दिल्ली में प्रदूषण को कम करने के लिए जो कदम उठाए हैं उसका असर हुआ है और प्रदूषण का औसत स्तर 2016 के मुक़ाबले कम हुआ है. हालाँकि अक्तूबर महीने के आसपास दिवाली और पराली की वजह से कुछ दिनों के लिए यह ज़रूर बढ़ जाता है.

इमेज स्रोत, Getty Images
डीपीसीसी के आंकड़ों के मुताबिक दिल्ली में प्रदूषण के पीछे दूसरे नंबर पर वाहनों का योगदान होता है और यह क़रीब 25 फ़ीसदी है.
दिल्ली के वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक ने अपना नाम न ज़ाहिर करने की शर्त पर बीबीसी से प्रदूषण की समस्या पर बात की है. उनका कहना है कि बीते कुछ साल में खेती में मशीनों के इस्तेमाल की वजह से यह समस्या बढ़ी है.
वो कहते हैं, "मशीनों से खेती की लागत कम होती है और मज़दूरों की ज़रूरत भी कम हो जाती है. इससे खेती में पशुओं की ज़रूरत ख़त्म हो गई और अब उन्हें खिलाने के लिए पराली की ज़रूरत नहीं पड़ती है."
उनका कहना है कि बीजों की नई नस्ल, ज़्यादा गर्मी में सिंचाई के लिए पानी की ज़्यादा ज़रूरत से बचने के लिए भी एक फसल के बाद दूसरी फसल के लिए खेतों को जल्दी तैयार करना पड़ता है, इसलिए पराली को जला दिया जाता है.
विजय सरदाना भी इस बात से सहमत दिखते हैं. उनका कहना है कि ज़्यादा मज़दूरी देने से बचने के लिए पराली को जला दिया जाता है और यह समस्या क़रीब 10 साल पहले ज़्यादा बड़े स्तर पर शुरू हुई है.

इमेज स्रोत, Getty Images
विजय सरदाना कहते हैं, "जब से पंजाब सरकार ने जून के महीने में अंडर ग्राउंड वॉटर से सिंचाई पर पाबंदी लगाई है, तब से किसान धान की कटाई के बाद अक्तूबर महीने के आसपास धान की कटाई के बाद पराली को जला देते हैं ताकि अगली फसल के लिए खेत जल्दी तैयार हो जाए."
उनका मानना है कि यह प्रदूषण के पीछे एक बड़ी वजह है चाहे इसे कोई स्वीकार करे या न करे.
दिल्ली में वायु प्रदूषण को कम करने के लिए 200 मोबाइल एंटी स्मॉग गन भी लगाए गए हैं जो पानी का छिड़काव कर धूल को नियंत्रित करता है. इनमें से क़रीब 100 एएसजी ऊंची इमारतों पर लगाए गए हैं. इसके अलावा सड़कों पर 100 से ज़्यादा एएसजी लगाए गए हैं.

इमेज स्रोत, ANI
दिल्ली सरकार इस प्रदूषण को रोकने के लिए ग्रेडेड एक्शन प्लान भी लागू करती है. इसके तहत प्रदूषण के स्तर के हिसाब से निर्माण के काम पर रोक, होटलों और अन्य खान-पान की दुकानों पर कोयला जलाने पर पाबंदी लगाई जाती है.
इसले अलावा इसमें आपातकालीन सेवाओं को छोड़कर डीज़ल जेनरेटर के इस्तेमाल पर रोक जैसे कदम शामिल हैं.
दिल्ली सरकार में मंत्री गोपाल राय ने आरोप लगाया है कि उत्तर प्रदेश से बड़ी संख्या में आने वाली डीज़ल बसों की वजह से दिल्ली में प्रदूषण पर असर पड़ता है.
उनका कहना है, "दिल्ली में अब सीएनजी और इलेक्ट्रिक बसें चल रही हैं, लेकिन उत्तर प्रदेश से बड़ी संख्या में डीज़ल बसें अभी भी आनंद विहार और कौशांबी डिपो पर चल रही हैं."
सरकारों के बीच खींचतान और राजनीति
ख़बरों के मुताबिक़ इस साल फिर से दिल्ली में बढ़ते प्रदूषण पर दिल्ली के उपराज्यपाल वीके सक्सेना ने मुख्यमंत्री आतिशी को चिट्ठी लिखी है.
जबकि बीजेपी प्रवक्ता शहज़ाद पूनावाला ने आम आदमी पार्टी के प्रमुख अरविंद केजरीवाल को ज़िम्मेदार ठहराया है, जो बीते 10 साल में ज़्यादातर समय के लिए दिल्ली के मुख्यमंत्री थे.
लाइव लॉ के मुताबिक़ साल 2021 में केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में जो हलफ़नाम दाखिल किया था उसके मुताबिक़ सर्दियों में दिल्ली में पीएम-2.5 की मात्रा बढ़ाने में सबसे बड़ी भूमिका उद्योगों की है जो कि 30% है. जबकि इसमें दिल्ली की सड़कों पर चल रहे वाहनों का योगदान क़रीब 28% है.
दिल्ली सरकार पड़ोसी राज्यों में पराली जलाने की घटना को एक बड़ी वजह बताती रही है, जबकि केंद्र सरकार इसके पीछे दूसरी वजहों को ज़्यादा ज़िम्मेदार मानती है.
इसके अलावा डीपीसीसी की वेबसाइट पर दी गई जानाकारी के मुताबिक़ भारत में 10 जनवरी 2019 को नेशनल क्लीन एयर प्रोग्राम की शुरुआत की गई. हालाँकि दिल्ली सरकार का आरोप है कि दिल्ली को साल 2019-20 और साल 2020-21 के दौरान एनसीएपी के तहत कोई फंड नहीं मिला.
दिल्ली सरकार का कहना है कि उसे साल 2021-22 में क़रीब 11 करोड़ और साल 2022-23 में इसके तहत क़रीब 23 करोड़ रुपये का फंड मिला.

इमेज स्रोत, Getty Images
क्या है समाधान?
पीएम यानी पार्टिकुलेट मैटर प्रदूषण की एक किस्म है. इसके कण बेहद सूक्ष्म होते हैं जो हवा में बहते हैं. पीएम 2.5 या पीएम 10 हवा में कण के साइज़ को बताता है.
हवा में मौजूद यही कण हवा के साथ हमारे शरीर में प्रवेश कर ख़ून में घुल जाते है. इससे शरीर में कई तरह की बीमारी जैसे अस्थमा और साँसों की दिक्क़त हो सकती है.
संजय वशिष्ठ कहते हैं, "प्रदूषण की वजहों और इसके असर की सारी जानकारी हर सरकार को है, उनके पास हमसे ज़्यादा जानकार लोग बैठे हैं. लेकिन प्रदूषण को कम करने के लिए अगर पब्लिक ट्रांसपोर्ट को ठीक किया जाता है तो इसका असर कार और बाक़ी वाहनों के बिज़नेस पर पड़ेगा."
संजय वशिष्ठ इस मामले में ट्रांसपोर्ट सेक्टर के हितों और उसमें आई गिरावट का रोज़गार पर असर तो मानते ही हैं, साथ ही पब्लिक ट्रांसपोर्ट को बेहतर करने के लिए बड़े निवेश की ज़रूरत को भी सरकारों के लिए एक बड़ी समस्या मानते हैं.
इसके अलावा निर्माण कार्य के ख़िलाफ़ सख़्त कदम उठाने से इस सेक्टर पर भी असर पड़ सकता है.
हालांकि वो मानते हैं कि निर्माण कार्य में धूल कम निकले इसके लिए नई तकनीक की ज़रूरत भी है.
सीएक्यूएम भी इस बात को मानती है कि दिल्ली के प्रदूषण को कम करने के दूरगामी उपायों में ज़्यादा से ज़्यादा इलेक्ट्रिक वाहन, निर्माण के कार्य में उड़ने वाली धूल को रोकना और जीवनशैली को बदलना शामिल है.
सीएक्यूएम के मुताबिक़ अक्सर लोग रोज़मर्रा की ज़िंदगी से प्रदूषण में योगदान को भूल जाते हैं जिसमें वाहनों के इस्तेमाल से लेकर कई कार्यों में लकड़ी को जलाना शामिल है, जैसे सर्दियों के दौरान ठंढ से बचने के लिए अलाव जलाना.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित














