लेबनान में पेजर और वॉकी-टॉकी धमाकों के बाद लोगों ने कहा, 'जिसने एक आँख खोई वो दूसरी से जारी रखेगा जंग'

    • Author, जोया बरबरी और करीन तुर्बी
    • पदनाम, बीबीसी न्यूज़ अरबी, बेरूत

लेबनान में पेजर विस्फोट में मारे गए लोगों के जनाज़े में बड़ी संख्या में भीड़ जुटी थी लेकिन उसी दौरान फिर से धमाकों की आवाज़ें सुनी गईं.

लेबनान के स्वास्थ्य मंत्रालय का कहना है कि वॉकी-टॉकी के ज़रिए हुए धमाकों में कम से कम 14 लोगों की मौत हो गई और 450 अन्य घायल हो गए हैं.

इन हमलों में मारे गए एक व्यक्ति की अंतिम यात्रा में शोक मनाते लोग बीबीसी से बात करते हुए बाग़ी और गुस्से से भरे सुनाई दे रहे थे.

इस बीच डॉक्टरों ने उन भयानक चोटों के बारे में बताया, जिनका उन्होंने धमाकों के बाद इलाज किया. बीबीसी की टीम लेबनान की राजधानी बेरूत में इस घटना पर नज़र रख रही है:

बेरूत के घोबीरी इलाके का हाल

पहले पेजरों में हुए धमाकों और उसके बाद वॉकी-टॉकी में विस्फोट से अब यहां लोगों को फ़ोन या कोई भी दूसरा उपकरण इस्तेमाल करने में संदेह हो रहा है.

हमले में मारे गए एक बच्चे समेत अन्य लोगों को अंतिम विदाई देने के लिए लोग जुटे हैं और इसी दौरान हमने एक धमाके की आवाज़ सुनी, जिसके बाद लोगों में अफ़रा-तफ़री मच गई. भीड़ में शामिल लोगों को जो भी रास्ता दिखा, वे उसी ओर भागे.

हमें भी ये जनाज़ा छोड़कर एक सुरक्षित ठिकाना खोजना पड़ा.

हालांकि, इससे पहले ही मैंने जनाज़े के लिए आए कुछ लोगों से बात कर ली थी, जिससे ये अनुमान मिला कि आख़िर यहां चल क्या रहा है.

यहां एक 11 साल के बच्चे और हिज़्बुल्लाह के तीन सदस्यों के जनाज़े में लोग आए थे. इनकी मौत मंगलवार को पेजर धमाकों से हुई थी. अंतिम विदाई देने के लिए बड़ी संख्या में लोगों का जमावड़ा लगा था.

हमले में मारे गए 11 वर्षीय लड़के को बच्चों का अलविदा

पुरुष, महिलाएं और यहां तक की स्कूली छात्र भी सड़कों पर थे. इनके हाथों में बैनर और पोस्टर थे, जिसमें हमले की वजह से दम तोड़ने वाले बच्चे की तस्वीर थी.

कुछ के हाथों में हिज़्बुल्लाह के पीले रंग वाले झंडे थे. तो वहीं कइयों के पास बड़े काले झंडे थे, जिसमें हिज़्बुल्लाह के नेता हसन नसरल्लाह की तस्वीर थी.

महिलाएं मरने वालों के ताबूतों पर गुलाब की पंखुड़ियां डाल रही थीं. पहले भी हिज़्बुल्लाह के सदस्यों की अंतिम यात्रा में शामिल हो चुके मेरे जैसे लोगों के लिए ये नज़ारा कुछ नया नहीं था.

कुछ लोग अपने बच्चों को भी साथ लाए थे.

लोगों ने मुझसे कहा कि उनका मानना है जो भी हुआ वो मानवता के ख़िलाफ़ बहुत बड़ा अपराध है. लेकिन इससे उनका प्रतिरोध और दृढ़ता और मज़बूत होगी.

उनका लहज़ा विद्रोह से भरा हुआ था. बड़े-बड़े लाउडस्पीकरों से प्रार्थनाएं हो रही थीं और कुछ बच्चे स्काउट्स के वेश में 11 वर्षीय लड़के को विदाई देने पहुंचे थे.

मैंने एक नौजवान से पूछा कि क्या वह घायलों में से किसी को जानता है.

उन्होंने जवाब दिया, "हर कोई किसी न किसी को जानता है. जिस्म में तो घाव हैं ही लेकिन दिलों में भी पीड़ा भर गई है."

वह कहते हैं, "लेकिन इसकी हमें आदत है और हम अपना प्रतिरोध जारी रखेंगे."

अंतिम यात्रा में मेरे बगल में ही एक 45 साल की महिला थीं. चेहरे पर एक बेख़ौफ़ सी मुस्कुराहट के साथ उन्होंने मुझसे कहा, "ये हमें और मज़बूत बनाएगा. जिस किसी ने भी एक आंख खोई है (हमले में) वो अपनी दूसरी आंख से लड़ेगा और हम सब एक साथ खड़े हैं."

'जितनी आँखें 25 साल में नहीं निकाली उतनी...'

आज सुबह अस्पताल के बाहर के सामने भीड़ थी लेकिन माहौल पहले से शांत था. बहुत से लोग अस्पताल के बाहर बैठकर अपने परिजनों के स्वास्थ्य के बारे में जानकारी मिलने के इंतज़ार में बैठे थे.

ये बीती रात के माहौल से एकदम उलट था- जब धमाके के फ़ौरन बाद अस्पताल में घायलों को लाया जा रहा था और हर तरफ़ रोने-चीखने की आवाज़ें गूंज रही थीं.

इस दौरान मैं किसी तरह वहां के प्रोफ़ेसर इलियास वराक़ से बात करने में सफल रही. वराक़ माउंट लेबनान अस्पताल में आंखों के डॉक्टर हैं. उन्होंने बताया कि मंगलवार को उन्होंने जो भी देखा वह किसी बुरे सपने जैसा था. उन्होंने कहा, "वो मेरे जीवन का सबसे बुरा दिन था."

अपने ऑफ़िस में बैठे हुए उन्होंने मुझसे कहा, "दुर्भाग्य से बीती रात मुझे इतने मरीज़ों की आंखें निकालनी पड़ीं, जितनी मैंने अपने 25 साल के करियर में नहीं निकाली थीं."

"मैं कुछ पीड़ितों की कम से कम एक आंख बचाने की कोशिश में था और कुछ मामलों में मैं ऐसा नहीं कर सका और मुझे दोनों आंखें निकालनी पड़ी क्योंकि उनकी आंख में गहरे तक चोट लगी थी."

मुझसे बात करते समय डॉक्टर वराक़ काफ़ी शांत और संयमित दिख रहे थे लेकिन साथ ही वो उदासी से भरे थे. जो हुआ और उन्होंने जो देखा, उसकी झलक उनके चेहरे पर थी.

उन्होंने कहा, "ये बहुत कठिन था. अधिकांश मरीज़ों की उम्र 20 से 30 साल के बीच में थी और कुछ लोगों की दोनों आंखें निकालनी पड़ीं. मैंने अपनी पूरी ज़िंदगी में ऐसे दृश्य नहीं देखे जो मैंने कल देखे हैं."

डॉक्टर वराक़ 24 घंटे से लगातार मरीज़ों को देख रहे हैं.

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किसी ने आंख, किसी ने उंगलियां खोईं

इस बीच डॉक्टर वराक़ पीड़ितों के नाते-रिश्तेदारों की सराहना करते हैं क्योंकि ये लोग अपने प्रियजनों के साथ हुए इस हादसे के बाद भी संयम के साथ मज़बूती से डटे रहे.

हमलों में करीब 3000 लोग घायल हुए हैं, जिनमें से 200 की हालत गंभीर है.

लेबनान के स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार दूसरे दिन हुए धमाकों में भी कम से कम 14 लोगों की मौत हुई और 450 से अधिक घायल हुए हैं.

ईरान समर्थित हिज़्बुल्लाह का कहना है कि 'पेजर्स हिज़्बुल्लाह की अलग-अलग टुकड़ियों और अन्य संगठनों से जुड़े लोगों के थे'. हिज़्बुल्लाह ने हमलों में अपने लड़ाकों की मौत की पुष्टि की है. इस गुट ने हमलों के लिए इसराइल पर आरोप लगाया है. लेबनान के प्रधानमंत्री ने भी इसराइल को ही ज़िम्मेदार बताया है. वहीं, इसराइली सेना ने इसपर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया है.

धमाकों के कुछ ही देर बाद मैंने कई स्वास्थ्यकर्मियों से बात की.

अस्पताल में काम करने वाले एक शख़्स ने मुझसे कहा, "ये बहुत संवेदनशील है और कुछ दृश्य तो विचलित करने वाले हैं. अधिकांश लोगों को कमर के पास वाले हिस्से, चेहरे के साथ ही आंखों और हाथ में चोट आई है."

मुझे बताया गया, "बहुत से घायलों ने अपनी उंगलियां खोईं. कुछ लोगों की तो एक भी उंगली नहीं बची."

पूरा देश फिलहाल सदमे वाली स्थिति में हैं. लोगों के लिए खुद को ये समझाना मुश्किल हो रहा है कि हक़ीकत में क्या हुआ है.

मैं कह सकती हूं कि इन हमलों का पैमाना और प्रकृति दोनों ही अभूतपूर्व हैं और एक ऐसा देश जो अकल्पनीय घटनाओं का आदी है, उसके लिए भी इसे समझना बहुत मुश्किल है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित

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