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मुइज़्ज़ू ने भारत नहीं तुर्की को चुना, क्या मालदीव को मुस्लिम देशों के क़रीब ले जाना चाहते हैं?
- Author, मोहम्मद शाहिद
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
‘चीन समर्थक’ और ‘भारत विरोधी’ माने जाने वाले मालदीव के नए राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज़्ज़ू ने ऐसा फ़ैसला लिया है, जिसके बाद उनकी कथित भारत विरोधी छवि और मज़बूत हुई है.
मालदीव के नए राष्ट्रपति ने अपने पहले विदेशी दौरे के लिए तुर्की का रुख़ किया है. वो रविवार को तुर्की पहुंचे और उनका दौरा 29 नवंबर तक चलेगा, जिसके बाद वो सीओपी28 में भाग लेने के लिए 30 नवंबर को यूएई जाएंगे.
ऐसी संभावना है कि इस दौरान दुबई में उनकी भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भी मुलाक़ात हो सकती है.
लेकिन फ़िलहाल मुइज़्ज़ू की भारत विरोधी छवि इसलिए मज़बूत हुई है क्योंकि अब से पहले मालदीव का नया राष्ट्रपति शपथ लेने के बाद भारत का दौरा किया करता था.
इसी महीने की शुरुआत में मोहम्मद मुइज़्ज़ू ने राष्ट्रपति पद की शपथ लेने से पहले यूएई का दौरा किया था.
वहां पर उन्हें भरोसा दिलाया गया था कि अबू धाबी फंड के ज़रिए मालदीव को माले एयरपोर्ट परियोजना के लिए 8 करोड़ डॉलर दिए जाएंगे.
उस समय से ये माना जा रहा है कि मालदीव को अब पैसे के लिए भारत पर ज़्यादा निर्भर नहीं होना पड़ेगा.
मालदीव ने तुर्की को ही क्यों चुना?
ऐसा माना जा रहा है कि मुइज़्ज़ू ने अपने पहले आधिकारिक विदेश दौरे के लिए सऊदी अरब को चुना था लेकिन ये कार्यक्रम अंतिम रूप नहीं ले सका.
इसके बाद उन्होंने तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोआन के निमंत्रण पर तुर्की जाने का फ़ैसला किया. कहा जा रहा है कि वो जल्द ही सऊदी अरब का भी दौरा करेंगे.
अब सवाल उठता है कि मालदीव के नए राष्ट्रपति ने अपने पहले दौरे के लिए तुर्की का रुख़ ही क्यों किया?
थिंक टैंक ऑब्ज़र्वर रिसर्च फ़ाउंडेशन (ओआरएफ़) के एसोसिएट फ़ैलो आदित्य शिवमूर्ति कहते हैं कि इसकी वजह आर्थिक मदद है.
वो कहते हैं कि राष्ट्रपति बनने के बाद से ही मुइज़्ज़ू ख़ुद को न ही भारत और न ही चीन समर्थक दिखाना चाहते हैं.
“मुइज़्ज़ू ख़ुद को किसी भी देश का क़रीबी नहीं दिखाना चाहते हैं क्योंकि उन्होंने राष्ट्रपति बनने के बाद अपने पहले इंटरव्यू में कहा था कि वो चीन या भारत समर्थक नहीं बल्कि मालदीव समर्थक हैं. उनकी पहली आधिकारिक मुलाक़ात भी ब्रिटेन के उच्चायुक्त से हुई थी.”
आदित्य कहते हैं, “मुइज़्ज़ू ख़ुद को गुट निरपेक्ष शख़्स के तौर पर पेश कर रहे हैं. उन्होंने शपथ ग्रहण से पहले सिंगापुर और यूएई का दौरा किया था और अब वो तुर्की गए हैं. मुइज़्ज़ू मालदीव की आर्थिक मदद के लिए चीन-भारत की जगह नए विकल्प तलाश रहे हैं.”
वो कहते हैं कि इस्लामी लॉबी का असर भी मुइज़्ज़ू की सरकार पर काफ़ी है, उनके तुर्की जाने की यह भी एक वजह हो सकती है कि वो उस लॉबी की वजह से पहले वहाँ गए हों.
मुइज़्ज़ू की तुर्की के राष्ट्रपति अर्दोआन से मुलाक़ात ज़रूर हुई है लेकिन इसमें किस तरह की कोई मदद का आश्वासन दिया गया है या नहीं.. यह अभी तक साफ़ नहीं हो सका है.
हालांकि, मुइज़्ज़ू ने ये ज़रूर कहा है कि उनकी सरकार तुर्की प्रशासन से तुर्की में मालदीव का दूतावास खोलने पर चर्चा शुरू करेगी.
मुस्लिम देशों के क़रीब जा रहा है मालदीव?
मालदीव हिंद महासागर में क़रीब 1200 द्वीपों वाला एक देश है, जिसकी लगभग 98 फ़ीसदी आबादी सुन्नी मुस्लिम है. अगर किसी को मालदीव की नागरिकता चाहिए तो उसके लिए मुसलमान होना ज़रूरी है.
मालदीव एक गणतंत्र है, जिसकी आबादी पांच लाख से बस थोड़ी सी ही ज़्यादा है.
2004 में आई सुनामी के बाद मालदीव में सऊदी अरब और यूएई का प्रभाव बढ़ा है. इन देशों ने मालदीव के पुनर्निर्माण में काफ़ी मदद की और वहां की इमारतों में उसका प्रभाव भी दिखता है.
भारत और चीन के बाद मालदीव के संबंध खाड़ी देशों के साथ सबसे अच्छे रहे हैं. मुइज़्ज़ू कहते भी रहे हैं कि वो मुस्लिम देशों के साथ अपने रिश्ते और बेहतर करने की कोशिश करेंगे.
दक्षिण एशिया के जानकार और नीति विश्लेषक सत्यमूर्ति कहते हैं कि मालदीव की अर्थव्यवस्था इस समय बेहद बुरी स्थिति में है और मालदीव की अर्थव्यवस्था सिर्फ़ पर्यटन और मत्स्य पालन पर निर्भर है.
वो कहते हैं कि उसके पास न ही प्राकृतिक संसाधन हैं और न ही कोई उद्योग है, इस वजह से वो दूसरे देशों पर निर्भर है.
सत्यमूर्ति का कहना है कि ऐसी संभावना है कि जो भी देश मुइज़्ज़ू को आर्थिक मदद का आश्वासन दे रहा है वो उसके पास जा रहे हैं, इसी कड़ी में हो सकता है कि वो तुर्की के पास गए हों.
आदित्य शिवमूर्ति कहते हैं कि मुस्लिम देशों के क़रीब जाना उनको दो स्तरों पर लाभ दे सकता है, पहले घरेलू और दूसरे विदेश स्तर पर.
“घरेलू स्तर पर जहां वो लोगों को इस नीति से ख़ुश कर सकते हैं क्योंकि मालदीव के लोगों को लगता है कि खाड़ी के देश उनके काफ़ी अच्छे दोस्त हैं. वहीं विदेश नीति के स्तर पर वो आर्थिक मदद हासिल कर सकते हैं क्योंकि खाड़ी देशों के पास बेतहाशा पैसा है.”
भारत से दूर हो जाएगा मालदीव?
मुइज़्ज़ू का पूरा चुनाव अभियान ‘इंडिया आउट’ या कहें भारत विरोध पर केंद्रित था. उन्होंने चुनाव प्रचार के दौरान घोषणा की थी कि वो मालदीव की ज़मीन पर विदेशी सैनिकों को नहीं रहने देंगे.
मालदीव में भारत के क़रीब 70 सैनिक हैं जो भारत के लगाए हुए रडार और विमानों की निगरानी करते हैं.
सत्ता में आने के बाद मुइज़्ज़ू के सुर बदले हैं पहले वो मालदीव में 100 से ज़्यादा विदेशी सैनिकों की बात करते थे लेकिन सत्ता में आने के बाद अब कह रहे हैं कि 60-70 सैनिक हैं.
आदित्य कहते हैं कि भू-राजनैतिक स्थिति को देखें तो लगता है कि मालदीव भारत या चीन के ख़िलाफ़ नहीं जा सकता है.
“मुइज़्ज़ू से पहले भी बहुत सारे मालदीव के दूसरे राष्ट्रपतियों ने खाड़ी देशों का दौरा किया है और उनसे बेहतर रिश्ते बनाए हैं. लेकिन ये देश भारत की जगह नहीं ले सकते हैं क्योंकि मालदीव ऐसी जगह मौजूद है जिसकी वजह से दोनों एक-दूसरे के लिए महत्वपूर्ण हो जाते हैं.”
सत्यमूर्ति मालदीव की भारत को लेकर सख़्त रुख़ दिखाने को अस्थाई मुद्दा बताते हैं. वो कहते हैं कि द्विपक्षीय संबंधों में ये मुद्दा बहुत जल्द ही सुलझ जाएगा.
वो कहते हैं कि मुइज़्ज़ू के शपथ ग्रहण समारोह में केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू गए थे और इस दौरान सहमति बनी थी कि दोनों देश बातचीत से मतभेदों को सुलझा लेंगे.
वहीं, आदित्य कहते हैं कि मालदीव को इस समय अपने क़र्ज़ का पुनर्गठन करना है क्योंकि उस पर भारी क़र्ज़ है. इस वजह से मालदीव को भारत की बेहद ज़रूरत है इसलिए वो भारत सरकार को अलग-थलग नहीं कर सकते हैं.
भारत ने माले एयरपोर्ट के विस्तार के लिए 13.4 करोड़ डॉलर का अतिरिक्त क़र्ज़ देने की घोषणा की थी.
भौगोलिक रूप से मालदीव भारत के सबसे क़रीब है और उसका सबसे अधिक व्यापार भारत से या भारत के रास्ते ही होता है. इसके साथ ही उसके भारत के साथ कई रक्षा समझौते हैं.
आदित्य कहते हैं कि भारत की मालदीव में आर्थिक और विकास प्रतिबद्धताएं हमेशा बनी रहेंगी. भारत ने जो भी परियोजनाएं वहां शुरू की थीं वो जारी हैं, उन्हें अभी और चलना है.
मालदीव के अधिकतर लोग नौकरी, पढ़ने और इलाज के लिए भारत ही आते हैं क्योंकि वो सबसे क़रीब है. ये सभी फ़ैक्टर हैं जो मालदीव को भारत के पास ही रखता है. मालदीव के लिए भारत की आर्थिक मदद कम हो सकती है लेकिन भारत का प्रभाव कम नहीं हो पाएगा.
कौन हैं मुइज़्ज़ू?
45 साल के मुइज़्ज़ू ने सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की है. वो राजधानी माले के मेयर रह चुके हैं. वो सात साल तक देश के कंस्ट्रक्शन मंत्री थे.
मेयर रहते हुए उन्होंने तुर्की का दौरा किया था. उनको तुर्की ने ही निमंत्रण दिया था.
साल भर पहले उन्होंने कहा था कि अगर 2023 में उनकी सरकार बनी तो वो चीन के साथ 'रिश्ते मज़बूत' करेंगे. मालदीव में चीन बड़े पैमाने पर निवेश करता है.
उस वक्त उन्होंने कहा था, "हम उम्मीद करते हैं कि हम पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन के मार्गदर्शन में 2023 में सत्ता में लौटेंगे और हम घरेलू स्तर पर और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चीन के साथ मज़बूत रिश्ते का एक और अध्याय लिखेंगे."
मुइज़्ज़ू देश के आठवें राष्ट्रपति हैं. वो पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन के क़रीबी माने जाते हैं, जिनके शासनकाल के दौरान मालदीव और चीन के रिश्ते बेहद गहरे हो गए थे.
बीते साल दिसंबर में अब्दुल्ला यामीन को कोर्ट ने भ्रष्टाचार के आरोप में 11 साल की जेल की सज़ा सुनाई. उन पर 50 लाख डॉलर का जुर्माना भी लगाया गया.
यामीन ख़ुद 2023 के चुनाव में बतौर उम्मीदवार शामिल होना चाहते थे लेकिन आपराधिक मामले के कारण उन पर रोक थी. माना जाता है कि ऐसे में उन्होंने अपने प्रॉक्सी के तौर पर मुइज़्ज़ू को चुनावी मैदान में उतारा.
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