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कर्नाटक: 'माइनिंग किंग' कहे जाने वाले जनार्दन रेड्डी की घर वापसी से बीजेपी के लिए क्या बदलेगा
- Author, इमरान क़ुरैशी
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए, बेंगलुरु से
लोकसभा चुनावों में '400 पार' के लक्ष्य को पाने में कहीं कोई कसर न रह जाए, इन्हीं कोशिशों के तहत भारतीय जनता पार्टी ने एक बार फिर से जी जनार्दन रेड्डी को पार्टी में शामिल कर लिया है.
ये वही जनार्दन रेड्डी हैं जिन्हें माइनिंग की दुनिया का बड़ा खिलाड़ी माना जाता है और जिनका नाम भारत में लौह अयस्क के सबसे बड़े अवैध खनन घोटाले से जोड़ा जाता है.
जनार्दन रेड्डी लंबे समय से ख़ासकर हैदराबाद के 'कैश फॉर बेल' स्कैम के बाद से ही हाशिये पर थे.
उन्हें पार्टी में वापस लाने के फैसले को लेकर राजनीतिक गलियारों में मिलीजुली प्रतिक्रिया हुई है.
जनार्दन रेड्डी ने अपनी छोटी सी राजनीतिक पार्टी कल्याण राज्य प्रगति पक्ष (केआरपीपी) का बीजेपी में विलय कर दिया है. साल 2023 के चुनाव में वे केआरपीपी के प्रतिनिधि के तौर पर कर्नाटक विधानसभा के लिए निर्वाचित हुए थे.
अमित शाह से मुलाकात
कर्नाटक बीजेपी के एक नेता ने नाम न जाहिर करने की शर्त पर बीबीसी हिंदी को बताया, "हम किसी को कम करने नहीं आंक रहे हैं. नहीं तो अमित शाह (केंद्रीय गृह मंत्री) जैसा कोई नेता जनार्दन रेड्डी से क्यों मुलाकात करेगा?"
इस नेता का ये बयान इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि अप्रैल, 2018 में कर्नाटक विधानसभा चुनाव के ठीक पहले अमित शाह ने कर्नाटक बीजेपी के नेताओं को जनार्दन रेड्डी से दूरी बनाकर रखने को कहा था.
उस वक़्त मैसूर में एक पत्रकार के सवाल का जवाब देते हुए अमित शाह ने कहा था कि बीजेपी का जनार्दन रेड्डी से कोई लेना-देना नहीं है."
साल 2018 की तुलना में इस बार हालात कितने अलग हैं, इसका अंदाज़ा जनार्दन रेड्डी के कमेंट से भी लगाया जा सकता है.
बीजेपी में शामिल होने के बाद जनार्दन रेड्डी ने संवाददाताओं से कहा, "अमित शाह ने मुझसे कहा कि मेरे बाहर से समर्थन देने का कोई सवाल ही नहीं पैदा होता है. उन्होंने मुझे याद दिलाया कि मेरा राजनीतिक जन्म बीजेपी में हुआ है और उन्होंने मुझसे पार्टी में लौटने के लिए कहा है. बीजेपी मेरी मां की तरह है और मैं पार्टी में वापस लौट रहा हूं."
जर्नादन रेड्डी और बीजेपी के बीच अचानक बढ़ी इस नज़दीकी की वजहें भी हैं.
बीजेपी को इस बात का एहसास है कि पिछले साल हुए विधानसभा चुनाव में गंगावती विधानसभा क्षेत्र में जनार्दन रेड्डी को 67 हज़ार 791 वोट मिले थे. गंगावती विधानसभा सीट कोप्पल लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आता है.
उनकी पत्नी जी लक्ष्मी अरुण को बेल्लारी विधानसभा सीट पर 48 हज़ार 577 वोट हासिल हुए थे और वे बीजपी उम्मीदवार जी सोमशेखर रेड्डी के बाद तीसरे नंबर पर रही थीं.
सोमशेखर रेड्डी जनार्दन रेड्डी के छोटे भाई हैं. इस विधानसभा सीट पर कांग्रेस के उम्मीदवार नरा भारत रेड्डी ने 86 हज़ार 440 वोट के साथ जीत हासिल की थी. बेल्लारी विधानसभा बेल्लारी लोकसभा सीट के अंतर्गत आता है.
जनार्दन रेड्डी की पार्टी के एक अन्य उम्मीदवार केएस दिवाकर को संदूर विधानसभा सीट पर 31हज़ार 299 वोट मिले थे. लेकिन उनकी पार्टी के अन्य 44 उम्मीदवारों में ज़्यादातर ने अपनी ज़मानत ज़ब्त कराई.
हालांकि उनमें से कुछ उम्मीदवारों को 6 हज़ार 659 से 18 हज़ार 538 वोट मिले थे.
संक्षेप में कहें तो बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व की पूरी कोशिश वोटों के बंटवारे को रोकने की है.
बीजेपी के एक अन्य नेता नाम न जाहिर करने की शर्त पर कहते हैं कि "जनार्दन रेड्डी को वापस लाने का केवल यही मक़सद है. अवैध खनन घोटाले से जुड़े एक दागी व्यक्ति के बारे में पूछे जा रहे सवालों को सामान्य रूप से नज़रअंदाज़ किया गया है."
बीजेपी के नेता निजी बातचीत में ये कहते हैं कि जनार्दन रेड्डी बेल्लारी, कोप्पल और रायचूर लोकसभा क्षेत्रों में अभी भी असर रखते हैं.
और कांग्रेस के नेताओं को भी इस बात से इनकार नहीं है.
हालांकि दोनों ही पार्टियों में ऐसे लोग भी हैं जो ये मानते हैं कि जनार्दन रेड्डी का अब वैसा असर नहीं है जो साल 2008 से साल 2013 के बीच हुआ करता था.
जनार्दन रेड्डी कौन हैं?
जनार्दन रेड्डी के पिता एक पुलिस कॉन्स्टेबल थे. वे लोगों की नज़र में उस वक़्त आए जब सोनिया गांधी के विदेशी मूल के मुद्दे पर मरहूम नेता सुषमा स्वराज ने बेल्लारी लोकसभा सीट से चुनाव लड़ने का एलान किया.
जनार्दन रेड्डी और उनके क़रीबी सहयोगी बी श्रीरामुलु सुषमा स्वराज के इतने करीब थे कि वो बेल्लारी आने पर वरामहलक्ष्मी पूजा के लिए बेल्लारी स्थित रेड्डी परिवार के घर जाने से कभी नहीं चूँकी.
कर्नाटक में ये पूजा विवाहित महिलाएं अपने परिवार के कल्याण के लिए करती हैं. रेड्डी बंधु सुषमा स्वराज को ताई कहकर बुलाया करते थे. उन दिनों सुषमा स्वराज से आशीर्वाद लेते दोनों की तस्वीरें बेल्लारी ज़िले में हर जगह देखी जा सकती थी.
साल 1999 से साल 2012 के बीच रेड्डी बंधु- जनार्दन, सोमशेखर और सबसे बड़े भाई करुणाकर रेड्डी कामयाबी की सीढ़ियां चढ़ते हुए माइनिंग के बड़े खिलाड़ी बने.
आंध्र प्रदेश के अनंतपुरम में ओबलापुरम माइनिंग कंपनी के जरिए खनन का काम करने से पहले जनार्दन रेड्डी कोलकाता की एक कंपनी के लिए बीमा बेचा करते थे.
उन्होंने बाद में चिट फंड के धंधे में भी हाथ आजमाया लेकिन कई नियमों के उल्लंघन की वजह से रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया ने उनका ये बिज़नेस बंद कर दिया.
राजनीति और कारोबार दोनों ही मामलों में जनार्दन रेड्डी नए रास्ते खोज निकालने के लिए जाने जाते रहे हैं.
आंध्र प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री वाईएस राजशेखर रेड्डी की मदद से अपनी कंपनी ओएमसी के लिए माइंनिग लाइंसेस हासिल करने के बाद जनार्दन रेड्डी को ये एहसास हुआ कि पड़ोसी राज्य में बेल्लारी की तरह अच्छी क्वॉलिटी का लौह अयस्क नहीं मिलता है.
ख़ासकर चीन को निर्यात के लिहाज से आंध्र से निकलने वाले अयस्क की क्वॉलिटी काफी नहीं थी.
लौह अयस्क के अवैध खनन का मामला 12 मार्च, 2007 को लोकायुक्त को सौंपा गया. इस मामले में जस्टिस संतोष हेगड़े ने अपनी पहली रिपोर्ट दो दिसंबर, 2008 को सौंपी थी.
उस वक़्त एक जांच अधिकारी ने बीबीसी हिंदी को बताया था, "उन्होंने ओबलापुरम माइनिंग कंपनी के अंतर्गत आने वाली खानों के रास्ते दूसरे माइंस का खनन शुरू कर दिया. कई मामलों में तो अन्य खान मालिकों को इसके बारे में ख़बर तक नहीं थी. इसके बाद उन्होंने निष्क्रिय माइंस के मालिकों के साथ अनुबंध किया ताकि वे पास के खानों में दाखिल हो सकें और वहां लौह अयस्क का खनन कर सकें. कुछ ही वक्त में उनके लोगों ने ज़िले में डर का माहौल पैदा कर दिया."
राजशेखर रेड्डी की मौत के बाद उनके उत्तराधिकारी डी रोसैया ने ओबलापुरम माइनिंग कंपनी का मामला केंद्रीय जांच ब्यूरो को सौंप दिया.
इसके बाद सीबीआई ने पांच सितंबर, 2011 को जनार्दन रेड्डी को गिरफ्तार कर लिया. इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने रेड्डी को 21 जनवरी, 2015 को ज़मानत दी. उन्हें आज भी बेल्लारी ज़िले की सीमा में दाखिल होने की इजाजत नहीं है.
उनके चुनावी हलफनामें में लिखा है कि उनके ख़िलाफ़ 20 आपराधिक मामले दर्ज हैं और इनमें से नौ मामलों में सीबीआई उनके ख़िलाफ़ अवैध खनन की जांच कर रही है.
लोकायुक्त ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि कर्नाटक को अवैध खनन के कारण 16,500 करोड़ के राजस्व का नुकसान हुआ है.
उस समय येदियुरप्पा की कुछ सियासी मज़बूरियां थीं. जनार्दन रेड्डी ने बीजेपी के लिए ऑपरेशन कमल को अंजाम दिया था. कहा जाता है कि उन्होंने ही इस ऑपरेशन के लिए धन जुटाया था. ये ऑपरेशन तब हुआ था जब येदियुरप्पा ने अकेले ही पार्टी को कर्नाटक में जीत दिला दी थी. लेकिन पार्टी को सरकार बनाने के लिए कुछ विधायकों की ज़रूरत थी.
बीजेपी के विधानसभा में सर्वाधिक विधायक थे.
ऑपरेशन कमल का अर्थ था कि विपक्ष के विधायक अपने पद से त्यागपत्र देंगे और उपचुनाव में बीजेपी के टिकट पर मैदान में उतरेंगे. और इस तरह बीजेपी को विधानसभा में बहुमत हासिल हो जाएगा.
लेकिन बाद में येदियुरप्पा और जनार्दन रेड्डी में ठन गई क्योंकि एक वक्त ऐसा भी आया कि रेड्डी येदियुरप्पा की कुर्सी पर नज़र रखने लगे.
लेकिन जैसा कि कहा जाता है राजनीति में कोई स्थाई दोस्त या दुश्मन नहीं होते.
येदियुरप्पा ने भी रेड्डी की वापसी पर सोमवार को पत्रकारों को बताया, "जनार्दन रेड्डी को लौटने से हमारी पार्टी को बहुत अधिक बल मिला है."
इसका मतलब क्या है?
अज़ीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी में राजनीति विज्ञान के प्रोफ़ेसर ए नारायण ने बीबीसी हिंदी को बताया, "दो ट्रेंड हैं. पहला राष्ट्रीय ट्रेंड है जिसमें लोग बीजेपी में शामिल होते हैं और दूध के धुले हो जाते हैं. दूसरा ट्रेंड कर्नाटक में है. लगता है यहाँ बीजेपी को उतना आत्मविश्वास नहीं है जितना बाक़ी राज्यों में है. यहां बीजेपी की झुंझलाहट साफ़ दिखाई देती है. पहले बीजेपी ने जगदीश शेटार से बात की और उन्हें पार्टी में वापस शामिल किया. उसके बाद जनता दल सेकुलर से हाथ मिलाया."
ए नारायण कहते हैं, "बीजेपी टिकटों के वितरण के बाद और भी नर्वस दिख रही है क्योंकि कई सीटों पर प्रत्याशियों के चयन को लेकर रोष है. जनार्दन रेड्डी को वापिस बुलाना भी इसी का एक संकेत है. ये बताता है कि पार्टी का आत्मविश्वास डिगता दिख रहा है."
नारायण 1996 और 2019 के मत प्रतिशत की तुलना करते हुए कहते हैं, "साल 1996 में बीजेपी को कांग्रेस से नौ प्रतिशत मत अधिक मिले थे. और पार्टी हमेशा कांग्रेस से आगे रही है. 2019 में तो ये आंकड़ा 14 प्रतिशत तक चला गया था. ऐसा लगता है कि पार्टी अब इसे भी बचा पाने का आत्मविश्वास खो रही है."
मैसूर यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर मुज़फ़्फ़र असादी ने बीबीसी हिंदी को बताया, "जनार्दन रेड्डी का वो जलवा नहीं रहा जो कभी हुआ करता था. मेरे ख़्याल से बेल्लारी से चुनाव लड़ रहे श्रीरामुलु की धाक अधिक है. वे दलितों और मुस्लमान में भी अपनी पैठ रखते हैं. जनार्दन रेड्डी की वापसी से बीजेपी की इमेज का फ़ायदा नहीं होगा. पार्टी उतनी एकजुट नहीं है जितना कि वो दावा करती है."
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