सिद्धारमैया का शपथ ग्रहण: एक मंच पर जुटेंगे विपक्षी नेता, सिर्फ़ फ़ोटो ऑप या आगे बढ़ेगी बात

    • Author, इमरान क़ुरैशी
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए

सिद्धारमैया शनिवार को कर्नाटक के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेंगे. उप मुख्यमंत्री बनने वाले डीके शिवकुमार समेत दूसरे मंत्री भी इस समारोह में शपथ ग्रहण करेंगे.

बेंगलुरू के कांतिरवा स्टेडियम में होने वाले शपथ ग्रहण समारोह में बड़ी संख्या में विपक्षी दलों के नेता भी मौजूद रहेंगे. हालांकि दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन, आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री जगन मोहन रेड्डी और बहुजन समाज पार्टी की नेता मायावती समारोह से दूर रहेंगे. संभवतः कांग्रेस पार्टी के ख़िलाफ़ उनके पहले से घोषित स्टैंड के कारण उन्हें आमंत्रित नहीं किया गया है.

उपस्थित होने वालों में शरद पवार (एनसीपी), जेडीयू नेता और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, आरजेडी नेता और उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव, समाजवादी पार्टी के नेता और यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव, उद्धव ठाकरे, तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन, झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन, जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती, सीपीआई के नेता डी राजा, सीपीआईएम के नेता सीताराम येचुरी, अभिनेता-राजनेता कमल हसन शामिल हैं.

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी होंगी या नहीं इसकी जानकारी फिलहाल नहीं है. हालांकि उन्हें समारोह में आमंत्रित किया गया है.

कांग्रेस के सभी मुख्यमंत्रियों अशोक गहलोत (राजस्थान), भूपेश बघेल (छत्तीसगढ़) और सुखविंदर सिंह सुक्खू (हिमाचल प्रदेश) के भी उपस्थित रहने की उम्मीद है.

शपथ ग्रहण समारोह

  • वक्त: 20 मई 2023, दोपहर के 12.30 बजे
  • जगह: बेंगलुरू का कांतिरवा स्टेडियम
  • कर्नाटक के गवर्नर थावरचंद गहलोत दिलवाएंगे पद और गोपनीयता की शपथ.
  • साल 2013 में इसी जगह पर सिद्धारमैया ने पहली बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी.

केवल फोटो-ऑप या उससे अधिक?

अब सवाल यह उठता है कि क्या नेताओं के इस जमावड़े से किसी चुनावी गठबंधन के लिए राह खुलेगी या फिर विपक्ष के लिए एक फोटो-ऑप भर रह जाएगा.

इस प्रश्न का जवाब आसान नहीं. क्षेत्रीय या राष्ट्रीय दलों द्वारा छोटे दलों को ऐसे आयोजनों में आमंत्रित करने की प्रथा नई नहीं है. ये एक तरह से ये जताना है कि 'आओ हमारे खुशी के अवसर में शामिल हों.' बेशक, यह अवसर विशुद्ध रूप से राजनीतिक है और कर्नाटक के मामले में स्थिति अलग है.

वरिष्ठ राजनीतिक टिप्पणीकार आनंद सहाय ने बीबीसी हिंदी से कहा, "कांग्रेस की जीत चौंकाने वाली है और बीजेपी का अपमान ऐसा है कि इससे उन्हें ज़रूर परेशानी होगी. बेंगलुरू के मंच से ये मैसेज जाएगा कि विपक्षी पार्टियां कमज़ोर नहीं हैं."

आनंद सहाय कहते हैं, "इसका मतलब यह नहीं है कि वे जल्द ही बीजेपी के ख़िलाफ़ एक मज़बूत दीवार के रूप में काम करेंगे."

एक अन्य राजनीतिक टिप्पणीकार शरत प्रधान ने बीबीसी हिंदी को बताया, "अभी के लिए यह एक फोटो-ऑप ही रहेगा. लेकिन कांग्रेस के पास अब अपनी रणनीति बदलने का मौक़ा है. दूसरे क्षेत्रीय दलों की ओर से किस तरह की प्रतिक्रिया आती है, वह भी महत्वपूर्ण होगी."

पहले मिली मिली-जुली प्रतिक्रिया

याद कीजिए तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और बीएसपी प्रमुख मायावती की उस जानी-मानी तस्वीर को जब जनता दल सेक्युलर-कांग्रेस गठबंधन के मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी को विधानसभा के बाहर शपथ दिलाई गई थी. चेहरों पर बड़ी मुस्कराहट के साथ दोनों एकदूसरे को ज़ोर से पकड़े हुए थे.

मई 2018 के इस कार्यक्रम में मंच पर ममता बनर्जी सहित कई नेता थे, क्योंकि गठबंधन ने 'कांग्रेस-मुक्त भारत' के बीजेपी के अभियान को रोक दिया था. उस वक्त जल्दबाज़ी में किए गए इस गठबंधन ने कांग्रेस पार्टी को ख़त्म करने के बीजेपी के अभियान को सच में रोक दिया था.

एक साल बाद, लोकसभा चुनावों ने बीजेपी को वापस सत्ता दिला दी. बीजेपी ने राज्य में अपनी सरकार बनाने के लिए जेडीएस और कांग्रेस दोनों से 17 नेताओं को तोड़कर अपना ऑपरेशन कमल पूरा किया.

लेकिन नेताओं के लिए सभी ऐसा प्लेटफ़ॉर्म विफल नहीं रहे हैं. जुलाई 1984 में, आंध्र प्रदेश में एनटी रामाराव की तेलुगु देशम पार्टी की सरकार को राज्यपाल राम लाल ने बर्खास्त कर दिया था.

यह दल-बदल विरोधी क़ानून के अस्तित्व में आने से पहले का दौर था. टीडीपी विधायकों को बेंगलुरु में रखा गया था. कर्नाटक में रामकृष्ण हेगड़े (जनता पार्टी) की पहली ग़ैर-कांग्रेसी सरकार सत्ता में थी और कांग्रेस पार्टी दल-बदल कर इसे गिराने की पूरी कोशिश कर रही थी.

कांतिरवा स्टेडियम परिसर में हुई एक विशाल बैठक में बीजेपी के लालकृष्ण आडवाणी, सीपीआई के सी राजेश्वर राव और इंद्रजीत गुप्ता, जनता पार्टी के जॉर्ज फर्नांडीस, तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम करुणानिधि सहित कई अन्य नेता शामिल हुए थे. राष्ट्रव्यापी आंदोलन के बाद रामा राव आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में लौट आए.

सहाय कहते हैं, "लेकिन अब जनादेश इतना बड़ा है और हालात भी अलग हो गए हैं. विपक्षी दलों को लगता है कि हवा उनके पक्ष में बदल सकती है. अगर कांग्रेस अपने वादों को पूरा करती है, जैसा कि उनकी पांच गारंटियों का वादा, तो इसका बड़ा असर मतदाताओं पर पड़ेगा. यहां जो होगा उसका असर अखिलेश यादव और ममता बनर्जी पर भी पड़ सकता है."

मौजूदा स्थिति अलग है

शरत प्रधान उत्तर प्रदेश की स्थिति का उदाहरण देते हैं जहां बीजेपी ने हाल ही में स्थानीय निकाय के चुनावों में पहली बार मुसलमानों को मैदान में उतारा और उनमें से 60 चुने गए.

वो कहते हैं, "यह अखिलेश यादव के मोहभंग के बाद उनकी चुप्पी के कारण हुआ. अगर कांग्रेस यहां खुद को पुनर्जीवित करती तो इस वोट का एक हिस्सा कांग्रेस के खाते में जा सकता था. कर्नाटक के चुनाव परिणाम के बाद पार्टियों को यह सोचने की ज़रूरत है कि उन्हें साथ आने के लिए कांग्रेस के छाते की ज़रूरत है भी या नहीं."

इस बहस पर सहाय का अलग नज़रिया है. "फिलहाल, (विभिन्न दलों के शीर्ष नेताओं की सभा का) मूल संदेश यह है कि देश में विपक्ष बिखरा हुआ नहीं है, उनके पास भी लड़ने की ऊर्जा है."

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