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बेंगलुरु: भारत की 'सिलिकॉन वैली' में अंग्रेजी के ख़िलाफ़ शुरू हुई मुहिम के क्या हैं मायने?
- Author, निखिला हेनरी
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़, दिल्ली
नए साल की पूर्व संध्या पर दक्षिण भारत के शहर बेंगलुरु में कुछ प्रदर्शनकारियों ने अंग्रेजी में लिखे बिल बोर्ड तोड़-फोड़ दिए.
उनकी मांग थी कि बिलबोर्ड पर शहर की स्थानीय भाषा कन्नड़ में लिखा जाए. बेंगलुरु को कई अंतरराष्ट्रीय आईटी कंपनियों का घर होने की वजह से अक्सर भारत की सिलिकॉन वैली कहा जाता है.
कर्नाटक रक्षणा वेदिके (केआरवी) का यह विरोध सरकार पर उस कानून को लागू करने के लिए जोर डालना है जिसके तहत शहर में हर डिसप्ले पर 60 फीसदी संदेश कन्नड़ भाषा में होना अनिवार्य है.
केआरवी को भारत के प्रमुख राजनीतिक दलों का समर्थन मिला जिन्होंने हिंसा की निंदा करते हुए कहा कि कन्नड़ में डिसप्ले की मांग करने में कोई नुकसान नहीं है.
केंद्र में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के एक केंद्रीय मंत्री ने एक स्थानीय न्यूज़ चैनल से कहा,"अंग्रेजी के अलावा कन्नड़ में लिखने में क्या नुकसान है? यह इंग्लैंड नहीं है."
भाषाई पहचान पर ज़ोर
यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है क्योंकि भारत 300 से अधिक भाषाओं का घर है.
यहां भाषाई पहचान का दावा आम बात है. जैसे कर्नाटक के पड़ोसी तमिलनाडु में तमिल भाषा समर्थकों ने 1930 के दशक में 'तमिलनाडु तमिलों के लिए है' का नारा दिया.
साल 1947 में भारत को आजादी मिलने के बाद देश में भाषाई आधार पर एक ही भाषा बोलने वाले क्षेत्रों को एक साथ मिलाकर कई राज्यों का गठन हुआ.
कर्नाटक एक ऐसा ही राज्य है, जिसका गठन 1956 में हुआ था.
केआरवी दशकों से यह दावा कर रहा है कि कन्नड़ और उसे बोलने वालों को इस महानगरीय शहर में हाशिए पर डाल दिया गया है. इस शहर में देश और दुनिया भर के लोग काम करते हैं और रहते हैं.
एक रिपोर्ट के मुताबिक बेंगलुरु में हर 10 में से चार लोग शहर के बाहर से आते हैं, हालांकि शहर की आबादी का दो-तिहाई हिस्सा कर्नाटक के लोगों की है.
प्रवासियों के आने ने कुछ स्थानीय लोगों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि वे शहर में जल्द ही अल्पसंख्यक बन जाएंगे.
केआरवी की 'कन्नड़ फर्स्ट' वाली मांग भाषाई राष्ट्रवाद से उत्पन्न होती है. यह भावना दशकों से बन रही है. सांस्कृतिक इतिहासकार जानकी नायर ने एक शोध पत्र में कहा है कि कन्नड़ भाषियों ने सबसे पहले 1920 के दशक में एक अलग राज्य बनाने की मांग की थी.
कन्नड़ राष्ट्रवाद
जानकी नायर का कहना है कि कन्नड़ राष्ट्रवादी लोग पहले अंग्रेजी समेत अन्य भाषाओं के प्रति उदार थे.
वो लिखती हैं कि कन्नड़ राष्ट्रवादियों में से एक ने यहां तक कहा है,"अंग्रेजी हमारी सांस्कृतिक और राजनीतिक भाषा है, संस्कृत हमारी आध्यात्मिक और शास्त्रीय भाषा है और कन्नड़ हमारी मूल और बोलचाल की भाषा है."
कन्नड़ विद्वान मुज़फ़्फ़र असदी ने बीबीसी से कहा, "शुरुआत में, यह भाषाई आंदोलन कभी भी सशक्त नहीं था, क्योंकि यह मुख्य रूप से कन्नड़ भाषा और साहित्य के विकास के लिए कहता था.
लेकिन हाल में जोरदार विरोध-प्रदर्शन ने इस आंदोलन पर कब्ज़ा जमा लिया है."
विद्वानों का कहना है कि तीव्र विरोध 1980 के दशक में शुरू हुआ. उनका कहना है कि अंग्रेजी का विरोध करने से पहले, कन्नड़ राष्ट्रवादियों ने अन्य भारतीय भाषाओं जैसे संस्कृत, तमिल, उर्दू और हिंदी का विरोध किया.
इसका पहला जोरदार विरोध-प्रदर्शन 1982 का गोकक आंदोलन था. इसमें मांग की गई थी कि स्कूलों में संस्कृत की जगह कन्नड़ को एकमात्र पहली भाषा बनाया जाए.
कन्नड़ फिल्म उद्योग ने इस विरोध-प्रदर्शन का समर्थन किया. सुपरस्टार राजकुमार ने इस आंदोलन का नेतृत्व किया था.
इसके बाद 1991 में तमिलनाडु के खिलाफ विरोध प्रदर्शन हुआ. इसने बेंगलुरु और मैसूर शहर को अपनी चपेट में ले लिया.
यह विवाद कावेरी नदी के पानी के बंटवारे को लेकर था. यह नदी दोनों राज्यों से होकर बहती है. न तमिल भाषी और न ही कन्नड़ भाषी यह चाहते थे कि दूसरे को कावेरी के पानी का बड़ा हिस्सा मिले.
भारतीय भाषाओं का विरोध
बाद में जब 1996 में जब दूरदर्शन ने उर्दू भाषा में कार्यक्रम का प्रसारण शुरू किया तो, उसका बड़ा विरोध हुआ. वहीं 2017 में केआरवी के नेतृत्व में कन्नड़ राष्ट्रवादियों ने हिंदी का विरोध किया.
प्रदर्शनकारियों ने बेंगलुरु मेट्रो लाइन पर साइन बोर्ड और सार्वजनिक घोषणाओं से हिंदी हटाने की मांग की. सोशल मीडिया पर कई दिनों तक 'नम्मा मेट्रो, हिंदी बेड़ा' यानी 'हमारी मेट्रो में कोई हिंदी नहीं' ट्रेंड करता रहा.
1990 के दशक में भारत में आईटी उद्योग में आए बूम के दौरान जब अंग्रेजी बोलने वाले कर्मचारियों की मांग बढ़ी तो कन्नड़ राष्ट्रवादियों ने अंग्रेजी का विरोध करना शुरू किया.
कई कन्नड भाषियों की सामान्य चिंता यह थी कि अन्य राज्यों के अंग्रेजी बोलने वाले लोग उनकी नौकरियां छीन रहे हैं.
केआरवी के पदाधिकारियों का कहना है कि वे दूसरों की तुलना में क्षेत्रीय भाषाओं का समर्थन करते हैं, क्योंकि भारत का संघवाद क्षेत्रीय स्वायत्तता में निहित है.
उनका कहना है कि अंग्रेजी में लिखे साइनबोर्ड इसके आड़े आते हैं. वे कहते हैं कि वे उन बहुराष्ट्रीय कंपनियों के खिलाफ नहीं हैं, जहां काम करने के लिए अंग्रेजी अहम है.
केआरवी के संगठन सचिव अरुण जवगाल खुद आईटी क्षेत्र में काम करते हैं. वो कहते हैं, ''हम केवल यही सोचते हैं कि कन्नड़ और कन्नड़ भाषियों को पहली प्राथमिकता मिलनी चाहिए.''
कन्नड़ भाषियों का एक वर्ग केआरवी की मांगों का समर्थन करता है. जवगाल का दावा है कि उनके संगठन को बेंगलुरु सहित राज्य में काफी समर्थन हासिल है.
ब्रांड बेंगलुरु का क्या होगा?
क्या हालिया विरोध-प्रदर्शन और साइनबोर्ड का अंग्रेजी से कन्नड़ में बदलाव ब्रांड बंगलुरु की अंतरराष्ट्रीय छवि को प्रभावित कर सकता है?
इस सवाल पर फेडरेशन ऑफ कर्नाटक चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (एफकेसीसीआई) का कहना है कि ऐसा नहीं होगा. (एफकेसीसीआई राज्य में व्यावसायिक प्रतिष्ठानों का प्रतिनिधित्व करता है.)
एफकेसीसीआई के अध्यक्ष रमेश चंद्र कहते हैं, ''यह बंगलुरु में काम करने वाले मेहनती लोग हैं, जिन्होंने ब्रांड बंगलुरू को बनाया है और साइन बोर्ड बदलने पर भी वे अच्छा काम करना जारी रखेंगे.''
उन्होंने कहा कि मैंने व्यावसायिक प्रतिष्ठानों से कानून का पालन करने और साइन बोर्ड में प्रमुखता से कन्नड़ का उपयोग करने की अपील की है.
साइन बोर्ड बदलने की अंतिम तिथि 28 फरवरी है. जहां तक केआरवी का सवाल है, इसके नेताओं का कहना है कि अगर यूरोपीय देश अपनी स्थानीय भाषाओं में बिलबोर्ड लगा सकते हैं, तो कर्नाटक भी ऐसा कर सकता है. कर्नाटक की आबादी छह करोड़ से अधिक है, जिसका ज्यादातर हिस्सा कन्नड़ भाषी है.
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