सुनील कनुगोलू की सुनी होती तो कांग्रेस तेलंगाना की तरह बाक़ी राज्यों में करती कमाल?

    • Author, इमरान क़ुरैशी
    • पदनाम, बेंगलुरु से, बीबीसी हिन्दी के लिए

तेलंगाना में कांग्रेस पार्टी की जीत का श्रेय उन मुद्दों को दिया जा रहा है, जिनकी पहचान कांग्रेस के मुख्य रणनीतिकार सुनील कनुगोलू ने की थी.

सुनील ने कर्नाटक में भी उन मुद्दों की पहचान की थी, जिन्हें लेकर लोग बीजेपी सरकार के नाराज़ थे. इसके बाद पार्टी वहां पांच गारंटियां लेकर आई थी, जिनके दम पर उसे चुनाव जीतने में मदद मिली थी.

ऐसी ही रणनीति पड़ोसी राज्य तेलंगाना में भारत राष्ट्र समिति (बीआरएस) की सरकार के ख़िलाफ़ चल रही सत्ता-विरोधी लहर का लाभ उठाने को लेकर अपनाई गई.

लेकिन दिलचस्प बात यह है कि सुनील कनुगोलू की रणनीति तेलंगाना में तो बीआरएस को सत्ता से हटाने में मददगार रही, लेकिन मध्य प्रदेश और राजस्थान में उनकी इसी तरह की सलाह को नज़रअंदाज़ कर दिया गया और पार्टी को इसका नुक़सान भी उठाना पड़ा.

कर्नाटक कांग्रेस के अध्यक्ष और राज्य के उप मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने कहा, “सुनील ने तेलंगाना में भी शानदार काम किया है. उनकी रणनीति हमारे लिए कारगर रही है. हां, यह ज़रूरी है कि पार्टी के अध्यक्ष का उनसे अच्छा तालमेल हो और उनकी ओर से मिलने वाली जानकारियों पर काम किया जाए.”

शिवकुमार तेलंगाना में भी पार्टी के चुनाव प्रचार अभियान से जुड़े हुए थे.

सुनील ने चुनावी रणनीति बनाने में उस समय महारत हासिल की, जब वह प्रशांत किशोर की उस टीम में शामिल थे, जिसने 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी का प्रचार अभियान संभाला था.

उस दौरान नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने थे. इसके बाद, सुनील ने 2019 लोकसभा चुनाव में डीएमके के साथ काम किया, फिर 2021 के तमिलनाडु विधानसभा चुनावों में एआईएडीएमके साथ जुड़े.

दो साल पहले सुनील को बीआरएस के अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव ने भी बुलाया था, ताकि उन्हें चुनाव से जुड़ा काम सौंप सकें. लेकिन यह योजना सिरे नहीं चढ़ पाई. फिर सुनील कांग्रेस पार्टी के सदस्य बन गए और इसकी रणनीतिक टीम को संभालने लगे.

पहचान ज़ाहिर न करने की शर्त पर कांग्रेस के एक पदाधिकारी ने बताया, “वह ख़ामोशी से काम करते हैं और वोटरों की चिंताओं और मुद्दों का अध्ययन करके पार्टी के लिए ऐसे नैरेटिव तैयार करते हैं, जिनपर काम करना चाहिए. वह एक अनुभवी विश्लेषक हैं और मुद्दों की पहचान कर पाते हैं.”

सभी लोग सुनील को एक चुपचाप रहने वाला शख़्स बताते हैं जो ज़्यादा ध्यान खींचे बिना काम करते रहते हैं.

पार्टी के लोग उदाहरण देते हैं कि कर्नाटक में सुनील की सलाह पर ही बीजेपी की सरकार के ख़िलाफ़ भ्रष्टाचार को लेकर अभियान छेड़ा था.

राज्य के ठेकेदारों के संघ की शिकायत थी कि सरकारी ठेकों में 40 फ़ीसदी घोटाले होते हैं. इस आरोप को एक कमाल के अभियान की शक्ल दे दी गई थी.

राज्य की राजधानी बेंगलुरु में एक क्यूआर कोड के साथ पोस्टर लगा दिए गए थे, जिनमें लिखा था, “पे सीएम.” यह अभियान बहुत चर्चा में रहा था.

कैसे बनाई जाती है रणनीति

जैसे जैसे चुनाव पास आए, सुनील ने कर्नाटक में जो सर्वे करवाए, उनसे ऐसे अहम मुद्दों का पता चला, जिनके चलते लोग सरकार से परेशान हैं.

सुनील की टीम ने वॉर रूम में इन मुद्दों की चर्चा की. वॉर रूम का नेतृत्व पूर्व आईएएस अधिकारी शशिकांत सेंथिल कर रहे थे, जिन्होंने नौकरी छोड़ कांग्रेस की सदस्यता ले ली थी.

एआईसीसी के महासचिव रणदीप सिंह सुरजेवाला दोनों टीमों के बीच समन्वय बना रहे थे. इसके बाद पांच मुख्य मुद्दे निकलकर आए.

इन कोशिशों का नतीजा पांच गारंटियों के रूप में निकला- 200 यूनिट फ्री बिजली, महिलाओं को सरकारी बसों में मुफ़्त यात्रा की सुविधा, हर परिवार की महिला मुखिया को हर महीने 2000 रुपये, अन्न भाग्य योजना (पांच किलो चावल मुफ़्त), और बेरोज़गार युवाओं को ग्रैजुएशन के दो साल बाद तक बेरोज़गारी भत्ता.

ये गारंटियां शोध के आधार पर दी गईं. इसके बाद यह वॉर रूम की ज़िम्मेदारी थी कि पार्टी नेताओं को बताया जाए कि इन गारंटियों को लेकर कैसे बात करनी है.

कांग्रेस के एक नेता ने इस बारे में मीडिया से बात करने के लिए अधिकृत न होने के कारण नाम प्रकाशित न करने की शर्त पर बताया कि तेलंगाना में भी ऐसा ही किया गया.

इन वरिष्ठ कांग्रेसी ने कहा, “ग्राउंड रिपोर्ट के आधार पर, कौन सा उम्मीदवार सही रहेगा और अभियान कैसे चलाया जाएगा, सब कुछ सुनील ने ही सुझाया. कर्नाटक और तेलंगाना में इसी तरह हम जीते.”

तेलंगाना में बीआरएस सरकार और मुख्यमंत्री के चंद्र शेखर राव (केसीआर) के वादों को लेकर कहा जा रहा था कि इनका मुक़ाबला नहीं किया जा सकता. मगर उन वादों के टक्कर में भी कांग्रेस ने गारंटियां पेश कीं.

एक बीआरएस नेता ने गोपनीयता की शर्त पर बताया, “हमारी पार्टी की सरकार ने कई वादे पूरे किए थे, लेकिन किसानों को लगा कि पैसे उन्हें मिल रहे हैं, जिनके पास ज़्यादा ज़मीन है. ऐसे में, कइयों को जलन हुई. बात यह है कि हमारे वादे ज़मीन पर ढंग से लागू नहीं किए गए.”

बीआरएस के वादों से मुक़ाबले के लिए कांग्रेस की रणनीतिक टीम ने छह गारंटियां दी थीं.

इनमें महालक्ष्मी (हर महिला को 2500 रुपये), 500 रुपये में एलपीजी सिलेंडर, सरकारी बसों में मुफ्त यात्रा, 10 ग्राम सोना और एक लाख रुपये नक़दी और योग्य महिलाओं को मुफ़्त इलेक्ट्रिक स्कूटी देना शामिल था.

इसी तरह रायतु भरोसा गारंटी योजना के तहत किसानों और पट्टे पर खेती करने वालों को हर साल 15000 रुपये, कृषि मज़दूरों को 15000 रुपये और धान उगाने वाले किसानों को 500 रुपये बोनस दिए जाने का वादा किया गया.

गृह ज्योति योजना के तहत हर घर को 200 यूनिट बिजली निशुल्क देने और खेती के लिए चौबीस घंटे बिजली उपलब्ध करवाने का वादा किया.

इंदिरम्मा इंदुलु गारंटी योजना के तहत उन लोगों को पांच लाख देने का वादा किया गया, जिनके पास अपना घर नहीं है.

तेलंगाना आंदोलन में शामिल रहे लोगों को 250 स्क्वेयर यार्ड का प्लॉट, इस दौरान जान गंवाने वालों के परिजनों को हर महीने 25000 रुपये की पेंशन और एक सदस्य को नौकरी देने का वादा किया गया.

युवा विकासम गारंटी के तहत छात्रों को पांच लाख का ‘विद्या भरोसा’ कार्ड देने और हर मंडल में तेलंगाना इंटरनेशनल स्कूल स्थापित करने का वादा किया गया. इसके अलावा 10 लाख का स्वास्थ्य बीमा और गरीबों को 4000 रुपये पेंशन देने की भी गारंटी दी गई.

बाक़ी राज्यों में क्या हुआ

सुनील की टीम ने मध्य प्रदेश और राजस्थान में भी ऐसे ही सर्वे किए थे, लेकिन कहा जा रहा है कि शीर्ष नेतृत्व ने इन सभी को नज़रअंदाज़ कर दिया.

एक वरिष्ठ कांग्रेस नेता ने कहा, “बीजेपी के अभियान को चुनौती देने के कई तरीक़े थे, मगर समन्वय का अभाव रहा. मध्य प्रदेश में देखा जाए तो ज़मीनी हालात पर ध्यान दिए बिना एक ही व्यक्ति ने फैसले लिए. मुझे बताया गया कि राजस्थान में भी यही रवैया देखने को मिला.”

वहीं, शिव कुमार से जब पूछा गया कि मध्य प्रदेश में कांग्रेस की रणनीति क्यों असरदार नहीं रही, जबकि वहां तो बीजेपी चार कार्यकाल से बनी हुई है. इस पर उन्होंने कहा, “मुझे मध्य प्रदेश के बारे में नहीं पता.”

एक अहम पद पर बैठे एक अन्य कांग्रेस नेता, जो कई साल पहले एआईसीसी में भी थे, उन्होंने बीबीसी को नाम न छापने की शर्त पर बताया, “छत्तीसगढ़ में सर्वे के बाद कहा गया था कि पार्टी को सर्व आदिवासी समाज के साथ गठबंधन बनाना चाहिए. ये एक नई पार्टी है, जिसका नेतृत्व कांग्रेस के एक पूर्व केंद्रीय मंत्री कर रहे हैं. वह तो अपनी पार्टी का विलय करने को भी तैयार थे. लेकिन हमें ट्राइबल इलाक़ों में हार का सामना करना पड़ा है.”

सुनील ज़्यादा सामने आने से बचते हैं. रविवार को जब हमारी उनसे बात हुई तो वह एक बैठक में जा रहे थे और उन्होंने वादा किया कि वापस कॉल करेंगे. अगर उनका फ़ोन आया तो इस रिपोर्ट को अपडेट करके उसका ज़िक्र किया जाएगा.

सुनील कर्नाटक के बेल्लारी से हैं. वह चेन्नई में पढ़े और उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका चले गए. बाद में उन्होनें मैनेजमेंट कंलस्टिंग कंपनी मैकिन्ज़ी में भी काम किया.

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