वर्ल्ड कप महिला फ़ुटबॉल में कब नज़र आएगी भारतीय महिला टीम?

भारतीय महिला फुटबॉल टीम.

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    • Author, शिवकुमार उलगनाथन
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

इन दिनों आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में फ़ीफ़ा महिला वर्ल्ड कप खेला जा रहा है. इस टूर्नामेंट में दुनिया भर की 32 टीमों के घमासान में अंतिम आठ टीमों का फ़ैसला हो चुका है.

नॉकआउट राउंड मुक़ाबलों के बाद 20 अगस्त को टूर्नामेंट का फ़ाइनल खेला जाएगा. इस टूर्नामेंट ने एक बार फिर से भारतीय फ़ुटबॉल के पुराने जख़्म को कुरेद दिया है.

भारतीय फ़ुटबॉल में अब तक ना तो पुरुष और न ही महिला टीम वर्ल्ड कप के मुख्य ड्रॉ तक पहुंच सकी है.

वैसे ये दंश तो दोनों टीमों का है लेकिन भारत की अंडर-17 महिला टीम की सहायक कोच निवेथा रामदास को युवा महिला खिलाड़ियों के जज़्बे और जुनून को देखकर लगता है कि ऐसा भी दिन आएगा जब देश को महिला फ़ुटबॉल टीम पर गर्व होगा.

वह कहती हैं, "जब कोई खिलाड़ी मैदान पर खेल रहा होता है और दर्शक दीर्घा में कोई देखने वाला नहीं होता तो खिलाड़ी की पीड़ा और दर्द की कल्पना भी नहीं की जा सकती. यहां अपने देश में एक फ़ुटबॉलर का दर्द इसी तरह का है."

"राष्ट्रीय महिला टीम एक अंतरराष्ट्रीय मैच खेल रही थी और स्टेडियम में दर्शकों को बिना निशुल्क मैच देखने की घोषणा हुई लेकिन इसके बावजूद स्टेडियम में गिने चुने दर्शक थे. लेकिन ऐसा भी दिन आयेगा जब सब भारतीय महिला फ़ुटबॉल टीम की उपलब्धियों पर बधाई देने के लिए पहुंचेंगे."

भारतीय महिला फ़ुटबॉल टीम की अतीत की उपलब्धियों और गौरव की बात की जाए तो इसका इतिहास लंबा है.

1975 से लेकर 1991 तक देश में महिला फ़ुटबॉल का संचालन भारतीय महिला फ़ुटबॉल महासंघ (डब्ल्यूएफ़एफ़आई) करती थी जो एशियाई महिला फ़ुटबॉल परिसंघ (एएलएफ़सी) के अधीन था.

तब भारतीय टीम ने महिला एशियाई कप के 1980 और 1983 टूर्नामेंट में रजत पदक जीता था.

भारतीय महिला फ़ुटबॉल टीम

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लेकिन इसे विडंबना ही कहा जा सकता है कि एएलएफ़सी को फ़ीफ़ा और एशियाई फ़ुटबॉल परिसंघ से मान्यता प्राप्त नहीं था इसलिए राष्ट्रीय टीम ने जो मैच और टूर्नामेंट खेले, उनमें से कुछ को 'अनधिकृत' घोषित कर दिया गया.

1991 के बाद भारतीय महिला टीम को अखिल भारतीय फ़ुटबॉल महासंघ (एआईएफ़एफ़) से मान्यता मिली.

भारतीय महिला फ़ुटबॉल टीम दक्षिण एशियाई खेलों में 2010, 2016 और 2019 यानी तीन मौकों पर स्वर्ण पदक भी जीत चुकी है.

2018 में तो टीम ने पहली दफ़ा ओलंपिक क्वालिफ़ायर्स के दूसरे दौर में भी प्रवेश कर लिया था, हालांकि यह सफ़र इससे आगे नहीं बढ़ पाया.

पिछले साल फ़ीफ़ा अंडर-17 महिला वर्ल्ड कप का आयोजन भारत में ही हुआ लेकिन मेजबान टीम पहले दौर में अपने सभी मैच गंवा बैठी और अगले दौर में जगह बनाने से वंचित रह गयी.

लेकिन इस स्तर के टूर्नामेंट में खेलना ही महिला टीम के लिए किसी उपलब्धि से कम नहीं था.

भारतीय महिला टीम ने पेरिस ओलंपिक 2024 की दावेदारी के लिए महिला एएफ़सी ओलंपिक क्वालिफ़ायर्स के दूसरे दौर के लिए भी क्वालिफ़ाई कर लिया है.

हाल के दिनों में टीम ने कई टूर्नामेंट में अच्छी शुरुआत की और जोशीला प्रदर्शन दिखाया है.

लेकिन 1990 और इसके बाद वाले दशक के दौरान भारतीय महिला फ़ुटबॉल टीम के लिए खुशी मनाने के लिए ज़्यादा कुछ नहीं था.

ये वो दौर ता जब युवा महिलाएं फ़ुटबॉल को करियर बनाने के लिए दिलचस्पी भी नहीं दिखा रही थीं. वहीं माता-पिता भी नहीं चाहते कि उनकी बेटियां फ़ुटबॉल खेले.

भारत की अंडर-17 टीम के वर्ल्ड कप पदार्पण में सहायक कोच रहीं निवेथा रामदास से जब देश में फ़ुटबॉल को करियर के तौर पर शुरु करने में होने वाली बाधाओं के बारे में पूछा गया तो उन्होंने बताया, "एक खिलाड़ी को छह या अधिकतम आठ साल की उम्र से फ़ुटबॉल खेलना शुरु करना होता है. लेकिन काफ़ी भारतीय युवा 12 साल की उम्र में ही प्रतिस्पर्धी फ़ुटबॉल खेलना शुरु करते हैं."

उन्होंने कहा, "जब आप यूरोपीय और एशिया की अन्य शीर्ष टीमों से तुलना करेंगे तो सबसे बड़ा अंतर करियर की जल्दी शुरुआत करना ही है."

उन्होंने सवालिया लहजे में कहा, "इसके अलावा भारत में माता-पिता को लगता है कि अगर उनके बच्चे फ़ुटबॉल खेल को चुनेंगे तो उन्हें चोट लगने का ख़तरा होगा. लड़कों की तुलना में ये पाबंदियां लड़कियों पर अधिक हैं."

"कुछेक का तो यह भी मानना है कि विदेशी खिलाड़ी अपने खाने के पोषण की वजह से ही फ़ुटबॉल में सफलता प्राप्त करते हैं. जबकि यह मिथक है. भारत का खाना अपनी पौष्टिकता के लिए मशहूर है. मुद्दा यह नहीं है. अगर माता-पिता अपने बच्चों को खेलों में आने के लिए प्रोत्साहित करें और अगर मीडिया भी देश में उभरते हुए युवा फ़ुटबॉलरों पर ज़्यादा ध्यान लगाये तो हमारे लड़के और लड़कियां भी उपलब्धियां क्यों नहीं हासिल कर सकते?"

भारतीय महिला फ़ुटबॉल टीम की कप्तान आशालता देवी

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महान खिलाड़ियों के लिए कितना सम्मान

भारतीय महिला फ़ुटबॉल में अतीत में और वर्तमान में काफी प्रतिभाएं सामने आयी हैं. शांति मलिक से लेकर ओइनम बेमबेम देवी, बाला देवी और आशालता देवी जैसे नामों ने अपनी चमक बिखेरी है.

1980 के दशक में शांति मलिक देश का प्रतिनिधित्व करने वाली सर्वश्रेष्ठ फॉरवर्ड में शुमार थीं, बेमबेम देवी ने 85 बार देश का प्रतिनिधित्व किया, बाला देवी विदेशी फ़ुटबॉल क्लब के साथ पेशेवर अनुबंध पर हस्ताक्षर करने वाली पहली भारतीय महिला फ़ुटबॉल खिलाड़ी हैं.

आशालता देवी ने कई महत्वपूर्ण टूर्नामेंट में देश का नेतृत्व किया. इतनी सारी प्रतिभाएं इसी देश से ही निकलीं.

मौजूदा टीम में इंदुमति, मनीषा, युमनाम कमला देवी और अदिति चौहान जैसी खिलाड़ी अपने बेहतरीन प्रदर्शन की बदौलत सुर्ख़ियां बटोरती हैं. पर क्या उन्हें अपने शानदार प्रदर्शन के लिए उचित सम्मान मिल रहा है?

निवेथा ने कहा, "नहीं. वहीं एक क्रिकेटर देश के लिए अगर दो या तीन साल खेल ले जिसमें उसका थोड़ा बहुत ही अच्छा प्रदर्शन किया हो तो भी वह देश में जाना पहचाना नाम बन जाती है. मगर फ़ुटबॉल में भले ही खिलाड़ी लंबे समय तक देश के लिये प्रभावशाली प्रदर्शन करते रहें, उन्हें फ़ुटबॉल तबके के अलावा कहीं भी उस तरह का सम्मान नहीं मिलेगा. पर इस लिहाज से पुरुष फ़ुटबॉल थोड़ा बेहतर है."

भारत की मौजूदा महिला टीम की सदस्य संध्या रंगनाथन को भी लगता है कि फ़ुटबॉल को भी इसी तरह का सम्मान मिलना ही चाहिए.

संध्या ने बताया, "भारतीय महिला फ़ुटबॉल टीम ने पिछले पांच से अधिक वर्षों में काफी कुछ हासिल किया है. लेकिन जब भी टीम किसी बड़े टूर्नामेंट के लिए क्वालिफ़ाई करती है या फिर किसी कड़ी प्रतियोगिता में अच्छा खेलती है तो इसे यहां अन्य खेलों की तरह सुर्खियां नहीं मिलती."

संध्या भविष्य की उम्मीदों के बारे में कहती हैं, "भारतीय फ़ुटबॉल महासंघ खेल को बढ़ावा देने के लिए अच्छा काम कर रहा है. मुझे भरोसा है कि अगर ज़्यादा से ज़्यादा लोग महिला फ़ुटबॉल को प्रोत्साहित करना शुरु कर देंगे तो भारत भविष्य में एशियाई खेल और वर्ल्ड कप जैसे बड़े टूर्नामेंट के लिए क्वालिफ़ाई कर सकता है."

भारतीय महिला फ़ुटबॉल टीम

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भारतीय महिला फ़ुटबॉल का भविष्य

निवेथा से जब भारतीय महिला टीम के विश्व कप या ओलंपिक के लिए क्वालिफ़ाई करने की वास्तविक संभावनाओं के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा, "भारतीय महिला फ़ुटबॉल टीम से निश्चित रूप से बड़ी उपलब्धि हासिल करने की उम्मीद है. मौजूदा फ़ीफ़ा रैंकिंग में भारत 60वें स्थान पर मौजूद है जो यहां पर खेल के लिए इतने कम जुनून और समर्थन को देखते हुए अच्छा संकेत है. टीम निश्चित रूप से आगे बड़े टूर्नामेंट में जगह बनाने की उम्मीद जगा रही है."

उन्होंने कहा, "यहां इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) के मैचों को इतने जुनून और उत्साह से देखा जाता है. मैच के टिकट लेने के लिए लोग इतने घंटों तक लाइन में खड़े रहते हैं. अगर फ़ुटबॉल के मुकाबलों को अच्छा समर्थन मिले तो इससे खिलाड़ियों को काफ़ी प्रोत्साहन मिलेगा."

नंदिनी कई मौकों पर राज्य और क्षेत्रीय फ़ुटबॉल टीम का प्रतिनिधित्व कर चुकी हैं, उन्होंने भारतीय टीम के प्रदर्शन की सराहना की.

उन्होंने कहा, "महिला फ़ुटबॉल ने पिछले कुछ वर्षों में काफी प्रगति की है. बीते समय से तुलना की जाए तो अब हमारे पास बेहतर बुनियादी ढांचा और ट्रेनिंग की सुविधाएं मौजूद हैं. पहले कुछ ही युवा फ़ुटबॉल को करियर बनाने में दिलचस्पी दिखाती थीं. लेकिन अब चीज़ें बदल रही हैं. महिला टीम अधिकतर बेहतरीन प्रदर्शन कर रही है. पिछले कुछ समय में युवाओं को फ़ुटबॉल में रूचि दिख रही है."

तमिलनाडु की ओर से खेलने वाली नंदिनी कुछ मुश्किलों का भी जिक्र करती हैं, "कुछ ऐसे मुद्दे भी हैं जो महिला फ़ुटबॉल के लिए परेशानी भरे हैं. बड़े टूर्नामेंट से पहले खिलाड़ियों की बेहतरी के लिए ज़्यादा से ज़्यादा अंतरराष्ट्रीय मैत्री मुक़ाबले खेले जाने चाहिए. इसके इतर पुरुष और महिला खिलाड़ियों के साथ समान बर्ताव किए जाने की आवश्यकता है."

वैसे समय के साथ भारतीय फ़ुटबॉल में बदलाव भी देखने को मिला है. ऐसा भी समय था जब चार दशक पहले भारतीय खिलाड़ी जूतों के बिना खेले थे.

कई खिलाड़ियों के पास दूसरी जर्सी नहीं होती थी. तब देश में पर्याप्त मैदान नहीं होते थे. महिला टीम को एआईएफ़एफ़ से मान्यता तक नहीं मिली थी. लेकिन 1990 के दशक से देश में फ़ुटबॉल से संबंधित काफ़ी चीज़ें बेहतर हुई हैं.

हाल में अखिल भारतीय फ़ुटबॉल संघ की ओर से कई नए कार्यक्रम शुरू किए गए हैं, जैसे 'ब्लू कब्स' जिसका मक़सद भारतीय फ़ुटबॉल के लिए मजबूत आधार बनाना है. इसका उद्देश्य देश भर में चार से बारह साल की युवा प्रतिभाओं को ढूंढ़ना और उन्हें तराशना है.

फ़ुटबॉल खिलाड़ी और कोच भी इन बदलावों को महसूस करते हैं. लेकिन साथ वे मीडिया और लोगों से प्रेरित करने और समर्थन देने की भी उम्मीद करते हैं.

अखिल भारतीय फ़ुटबॉल संघ ने 2047 तक एशियाई फ़ुटबॉल में भारत को 'पावरहाउस' बनाने का लक्ष्य रखा है, भारतीय महिला फ़ुटबॉल से जुड़े लोगों को उम्मीद है कि ये लक्ष्य हासिल किया जा सकता है.

भारतीय महिला फ़ुटबॉल खिलाड़ी आगे बढ़ने के लिए और खुद से लगी उम्मीदों को पूरा करने के लिए उत्सुक हैं.

हालांकि मीडिया, आम लोगों और महासंघ से इन खिलाड़ियों की यही उम्मीद है कि उपलब्धियों के लिए ये उनका प्रोत्साहन और सराहना करें, साथ ही उनके साथ उसी स्तर का बर्ताव करें जैसे समकक्ष पुरुष खिलाड़ियों से होता है.

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