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ग्रीस नाव हादसा: 'हमारे अधिकतर लड़के यूरोप पहुंचने की जगह मछलियों की ख़ुराक बनते हैं'- ब्लॉग
मोहम्मद हनीफ़
लेखक और पत्रकार
कोई पच्चीस साल पहले, यही यूनान (ग्रीस) था. यही समंदर था और इसी तरह का एक जहाज़ था. जहाज़ में ज़्यादातर पाकिस्तानी और बांग्लादेशी सवार थे.
गिनती कभी किसी ने पूरी नहीं की, लेकिन 150-200 लोग डूब गए. जो 50-60 लोग बचे वो यूनान के छोटे से गांव के एक थाने में बंद थे.
मैं रिपोर्टिंग करते हुए थाने के अंदर चला गया. अंदर जाकर पता चला कि जो बच गए हैं और उनमें जितने पाकिस्तानी हैं वे सभी पंजाबी भाई हैं.
ज़्यादातर का संबंध गुजरात, वज़ीराबाद और सियालकोट से था. लड़कों ने अपने दोस्तों, करीबियों को आंखों के सामने डूबते हुए देखा था.
लड़के डरे हुए थे. वे रोते भी थे और फिर अपनी कहानी भी सुनाते थे और फिर रोने लग जाते थे.
कहानियां लगभग एक जैसी ही थीं. किसी के पिता ने ज़मीन का आखिरी टुकड़ा बेचकर, किसी की मां-बहन ने अपना ज़ेवर बेचकर तो कोई अपने दोस्त या रिश्तेदार से कर्ज़ लेकर जहाज़ पर चढ़ा था.
यह सब इस उम्मीद में कि एक बार यूरोप पहुंच जाएंगे तो कर्ज़ भी उतर जाएगा और आने वाली पीढ़ियों की किस्मत भी चमक जाएगी.
जिस दिन मैं लड़कों से मिला, उससे अगले दिन यूनान की सरकार को लड़कों को डिपोर्ट करना था.
कुछ लड़के मुझे कोने में ले गए और कहने लगे कि भाई साहब अगर आप थाने के अंदर आ सकते हो ज़रूर आपकी कुछ न कुछ ऊपर तक पहुंच तो होगी. कुछ हमारी मदद कर दो.
कुछ ऐसा कर दो कि हम पाकिस्तान वापस न जाकर यहीं कहीं रह जाएं. मैंने कहा कि यार मेरी इतनी जान पहचान तो नहीं है, आप लोग अल्लाह का शुक्र करो कि आप लोगों की जान बच गई है.
'गांव में भूखे तो नहीं मरते'
मैंने पूछा कि वापिस जाकर आप लोग क्या करोगे? दो-तीन लड़कों ने कहा कि इरादा एक ही है कि एक बार फिर से कोशिश करेंगे.
मैंने कहा कि अभी तुम लोगों ने मौत को इतने करीब से देखा है, डर नहीं लगता. एक लड़का कहने लगा कि 'भाई साहब आप तो लंदन से यूनान आ गए हो. खुले में घूम रहे हो. क्या आपने वहां की जिंदगी देखी है जहां से हम आए हैं? उससे भी डर लगता है. पिछले पांच सालों में हमारे कितने पंजाबी लड़कों ने डोंकी लगाकर यूरोप पहुंचे हैं. उससे कहीं ज़्यादा समंदर में मछलियों की खुराक बन गए हैं.'
ये गिनती कभी किसी ने नहीं की, लेकिन मेरे जैसे फिर भी कहते रहते हैं कि अपने गांव में भूखे तो नहीं मरते.
अगर 15-20 लाख रुपये किसी एजेंट को देने की ताकत है, तो फिर उस पैसे से अपने देश में कोई काम धंधा क्यों नहीं कर लेते.
'मां-बाप के इंटरव्यू देखे नहीं गए'
भूख से ज्यादा बेइज्जती का डर होता है. जवानी कुछ रंग चाहती है. माता-पिता के कच्चे घर की जगह पर हवेली बनाना चाहते हैं.
यहां हमारे लड़कों की जिंदगी से सारे रंग गायब कर दिए हैं कि खाते-पीते लड़के भी मोटरसाइकिलों पर चक्कर लगा लेते हैं या फिर अब्बे की हट्टी पर बैठ जाते हैं.
दुनिया पता नहीं कहां की कहां पहुंच गई है, लेकिन हम लड़कों ने इन्हीं गलियों में धक्के खाते रहना है और फिर बूढ़े होकर अब्बे के बिस्तर पर लेट कर मर जाना है.
लड़के समझते हैं कि इस ज़िंदगी से अच्छा है कि एक बार ज़िंदगी का जुआ लगा लेते हैं. जो हमें कानून-कानून का सबक पढ़ाते हैं उन्हें लड़कों की हर चाह को गैरकानूनी कर दिया है.
मेरे अपने शहर उकाले में एक 12-13 साल के लड़के ने सोशल मीडिया पर पोस्ट किया कि सिद्धू मूसेवाला की पुण्यतिथि होगी, जाटों के लड़कों को खास दावत और उसके बाद फायरिंग का भी इंतज़ाम है.
शाम तक पुलिस ने लड़के को पकड़कर थाने में बंद कर दिया और तस्वीरों को सोशल मीडिया पर वायरल कर दिया, जिसके बाद हर व्यक्ति उसकी बेइज्जती करने लगा.
लड़के ने अपनी पूरी ज़िंदगी न कभी बदमाशी की, न कभी किसी हथियार को हाथ लगाया. जिस जगह पर इतनी छोटी सी शरारत पर पुलिस घर पहुंच जाए वहां लड़के कुछ दूसरा न सोचें तो क्या करें.
यूनान के एक जहाज़ में डूबने वाले लोगों के माता-पिता के इंटरव्यू देखे, तो मुझसे देखे नहीं गए. सारे यही कहते हैं कि हमने अपने लड़कों को बहुत समझाया, लेकिन वह माना नहीं.
अब उन लोगों को नसीहत देने का समय नहीं है, जिन्होंने अपने बेटे गवाएं और सारी ज़िंदगी का साथ भी.
अगर कोई नसीहत देनी है तो यूरोप के इन गोरे लोगों को दो जो दुनिया में प्रधान बने बैठे हुए हैं. अपने आप को सभ्य बताते हैं. सारी दुनिया को कानून और मानवाधिकार समझाते हैं.
इनके सामने 700 लोग डूबने लगे तो ये अपनी जगह से हिलते नहीं हैं, क्योंकि वो डूबने वाले गोरे नहीं हैं.
इनके लिए दिल से ऐसी ऐसी गाली निकलती है, जो व्यक्ति अपने घर वालों के सामने नहीं दे सकता और बीबीसी की एडिटोरियल पॉलिसी भी इजाज़त नहीं देती, लेकिन व्यक्ति दिल ही दिल में ‘दूर फिटे मुंह’ तो कह ही सकता है.
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