क्या वंदे भारत ट्रेन में कुछ रूटों पर किराये में छूट की वजह यात्रियों की कमी है?

वंदे भारत ट्रेन

इमेज स्रोत, ANI

    • Author, चंदन कुमार जजवाड़े
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

पिछले सप्ताह प्रधानमंत्री मोदी ने दो वंदे भारत ट्रेनों को हरी झंडी दिखाने के बाद दावा किया था कि भारत के मध्यम वर्ग में वंदे भारत ट्रेन इतनी लोकप्रिय हो गई है कि कोने-कोने से इसकी मांग आ रही है और वो दिन दूर नहीं है जब वंदे भारत ट्रेन देश के कोने-कोने को जोड़ेगी.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 अगस्त 2021 को लाल क़िले से अपने भाषण में 75 वंदे भारत ट्रेनें चलाने का एलान किया था.

इन सभी ट्रेनों को भारत की आज़ादी के 75 साल पूरे होने के मौक़े पर यानी 15 अगस्त 2023 तक चलाने की बात की गई थी.

वंदे भारत ट्रेन के आधुनिक डिज़ाइन और उसकी अपेक्षाकृत तेज़ गति के कारण एक तबका इसकी तारीफ़ कर रहा है जबकि कई लोगों का कहना है कि उसका किराया अधिक है.

‘वंदे भारत’ ट्रेन से जुड़े दावे और सोशल मीडिया पर इसके प्रति दिखने वाली दीवानगी अपनी जगह है लेकिन सवाल ये है कि क्या ट्रेन यात्रियों के बीच सचमुच लोकप्रिय है?

रेलवे के दस्तावेज़ बताते हैं कि कई रूटों पर वंदे भारत ट्रेन में मुसाफ़िरों की संख्या कम है, माना जा रहा है कि इसलिए रेलवे ने मुसाफ़िरों को आकर्षित करने के लिए किराये में छूट की योजना पेश की है.

रेलवे इसके लिए किस तरह की योजना लेकर आया है, उस पर भी बात करेंगे लेकिन पहले वंदे भारत ट्रेन के बारे कुछ ख़ास बातों पर ग़ौर करते हैं.

ये भी पढ़ें -

वंदे भारत ट्रेनों का मॉर्डन लुक

वंदे भारत ट्रेन

इमेज स्रोत, ANI

भारत में पहली वंदे भारत ट्रेन फ़रवरी, 2019 में चलाई गई थी और अब तक 25 रूटों पर कुल 50 वंदे भारत ट्रेनें दौड़ रही हैं.

इसी महीने यानी जुलाई 2023 में चार नई वंदे भारत ट्रेनें शुरू होने की संभावना है.

भारत में जिस गति से वंदे भारत ट्रेनें चलाई जा रही हैं, उससे यह भी सवाल उठता है कि क्या इन ट्रेनों की मांग सच में इतनी ज़्यादा है?

कई वंदे भारत ट्रेनों में तो केवल 8 कोच हैं, और कई बार उनमें भी सीटें खाली होती हैं.

रेलवे आंकड़े बताते हैं कि रानी कमलापति स्टेशन (भोपाल) से जबलपुर जाने वाली वंदे भारत ट्रेन आठ कोच की ट्रेन है, फिर भी एक अप्रैल 2023 से 29 जून 2023 के बीच इस ट्रेन की औसतन ऑक्यूपेंसी 32 फ़ीसदी ही रही. इस दौरान वापसी में भी इस ट्रेन को केवल 36 फ़ीसदी यात्री ही मिले.

माना जा रहा है कि ट्रेन के आधुनिक और आकर्षक होने के बावजूद उसका किराया कम माँग की वजह है.

किराये में छूट पर रेलवे की अधिसूचना
इमेज कैप्शन, सीटें खाली रहने पर किराये में छूट देने की रेलवे की अधिसूचना

लेकिन कुछ रूटों पर है भारी माँग

ऐसा हर रूट पर नहीं है कि यात्रियों की कमी हो, कुछ रूटों पर मुसाफ़िरों के बीच वंदे भारत काफ़ी लोकप्रिय है.

इसी दौरान यानी एक अप्रैल 2023 से 29 जून 2023 के बीच कासरगोड- त्रिवेंद्रम सेंट्रल वंदे भारत की ऑक्यूपेंसी 182 परसेंट रही जबकि वापसी में इसके यह. 176% रही.

इसका मतलब है कि ट्रेनें पूरी तरह भरकर चलीं और क्रमश 82 और 76 प्रतिशत यात्रियों को बुकिंग नहीं मिली.

इसी तरह मुंबई सेंट्रल- गांधीनगर वंदे भारत 129 प्रतिशत ऑक्यूपेंसी के साथ चली और वापसी में यह 134 प्रतिशत रही.

सिकंदराबाद- विशाखापट्टनम वंदे भारत की ऑक्यूपेंसी 114 परसेंट रही, इस तरह से कई वंदे भारत ट्रेनें हैं जिनकी मांग उपलब्ध सीटों से कहीं ज़्यादा भी है.

वंदे भारत और शताब्दी एक्सप्रेस ट्रेनों में किराये का अंतर
इमेज कैप्शन, वंदे भारत और शताब्दी एक्सप्रेस ट्रेनों में किराये का अंतर
छोड़कर पॉडकास्ट आगे बढ़ें
कहानी ज़िंदगी की

मशहूर हस्तियों की कहानी पूरी तसल्ली और इत्मीनान से इरफ़ान के साथ.

एपिसोड

समाप्त

रेलवे के आंकड़ों के मुताबिक, केएसआर बेंगलुरु से धारवाड़ के बीच चलने वाली वंदे भारत ट्रेन की क़रीब 60 फ़ीसदी सीटें ही बुक हो सकीं.

जबकि यह ट्रेन भी केवल 8 कोच की ट्रेन है. वापसी में भी इस ट्रेन की क़रीब इतनी ही सीटें भरी पाई गई हैं.

इस समय सबसे बुरी हालत इंदौर से भोपाल के बीच चलने वाली 8 कोच की वंदे भारत ट्रेन में देखी गई है.

इस ट्रेन की महज़ 21 फ़ीसदी सीटों पर ही मुसाफ़िरों ने सफर किया. वापसी में इस ट्रेन की भी केवल 29 फ़ीसदी सीटें भरीं.

यही हालत दिल्ली कैंट से अजमेर के बीच चलने वाली वंदे भारत ट्रेन की रही, जिसमें केवल 61 फ़ीसदी सीटों की ही बुकिंग हो सकी.

जबकि मडगांव से मुंबई के शिवाजी टर्मिनस तक चलने वाली वंदे भारत को भी केवल 55 फ़ीसदी सीटों पर यात्री मिले.

इस तरह से कई वंदे भारत ट्रेनों को क्षमता से काफ़ी कम मुसाफ़िर मिल रहे हैं जबकि यह भारत की सबसे आधुनिक ट्रेन है.

हालांकि भारतीय रेलवे ने बीबीसी को बताया कि 25 वंदे भारत ट्रेनों में औसतन 93 प्रतिशत सीटें भरी रहती हैं और जहां तक नई ट्रेनों की बात है अपनी पूरी क्षमता में आने में इन्हें औसतन डेढ़ महीने का वक़्त लगता है.

ट्रेनों में ऑक्यूपेंसी से जुड़े आंकड़े

इमेज स्रोत, Indian Railway

ये भी पढ़ें -

कैसे चलती हैं नई ट्रेनें

वंदे भारत ट्रेन

इमेज स्रोत, ANI

दरअसल, रेलवे में कोई भी नई ट्रेन शुरू करने के पहले कई बातों पर ग़ौर किया जाता है.

रेलवे बोर्ड के एक पूर्व मेंबर (ट्रैफिक) के मुताबिक़ राजनीतिक मांग के अलावा भी रेलवे को पता होता है कि किस रूट पर ट्रेनों की मांग ज़्यादा है.

इसका आकलन रूट पर मौजूदा ट्रेनों में होने वाली बुकिंग और भीड़ से तो लगाया ही जाता है, रेलवे में डेली यूजर्स कंसल्टेटिव कमिटी की भी स्थानीय स्तर पर डीआरएम के साथ मीटिंग होती है. फिर इस पर ज़ोनल रेलवे में चर्चा होती है और फिर मामला मंत्रालय तक आता है.

कई बार मांग के मुताबिक़ रेलवे मौजूदा ट्रेनों में कोच की संख्या भी बढ़ाता है और उसके बाद भी मांग बरक़रार होने पर नई ट्रेन चलाई जाती हैं.

इसके लिए ट्रेन के कंपोज़िशन (यानी किस क्लास की मांग ज़्यादा है) और टाइमिंग तय होने के बाद ट्रेनें चलाई जाती हैं.

इसके अलावा सांसदों या जनप्रतिनिधियों और नेताओं/ मंत्रियों की मांग पर भी ट्रेनें चलाई जाती हैं.

लेकिन इसके लिए रूट पर मांग और नई ट्रेनों को चलाने पर सारी संभावना का पूरा अध्ययन किया जाता है.

ऑल इंडिया रेलवे मेंस फ़ेडरेशन के महामंत्री शिव गोपाल मिश्रा कहते हैं, “रूट पर डिमांड सर्वे वगैरह अब पुरानी बात हो गई है, अब चुनाव के मुताबिक़ ट्रेनें चलती हैं और इनका उद्घाटन होता है.”

ये भी पढ़ें -

वंदे भारत का किराया

वंदे भारत ट्रेन

इमेज स्रोत, ANI

शताब्दी की तरह ही मानी जानी वाली वंदे भारत ट्रेन का किराया तुलनात्मक रूप से ज़्यादा है और माना जाता है कि इससे कई रूटों पर मुसाफ़िरों को यह महँगी लगती है.

शताब्दी एक्सप्रेस ट्रेन के चेयर कार में 100 किलोमीटर का न्यूनतम बेसिक किराया जहां 215 रुपये है, वहीं वंदे भारत ट्रेन में इस दूरी का बेसिक किराया 301 रुपये है.

जबकि इसी दूरी के लिए एग्जीक्यूटिव क्लास में शताब्दी एक्सप्रेस ट्रेन का बेसिक किराया 488 रुपये है तो वंदे भारत ट्रेन के इसी क्लास का बेसिक किराया 634 रुपये है.

अगर 500 किलोमीटर की दूरी के किराये की बात करें तो शताब्दी एक्सप्रेस के चेयर कार का न्यूनतम किराया 658 रुपये जबकि वंदे भारत ट्रेन में यह किराया है 921 रुपये है.

वहीं इस दूरी के लिए शताब्दी एक्सप्रेस के एग्जीक्यूटिव क्लास का किराया 1446 रुपये है, जबकि वंदे भारत ट्रेन के लिए यह किराया 1880 रुपये है.

यही नहीं, इस किराये के बाद मुसाफ़िरों को रिज़र्वेशन चार्ज, सुपरफ़ास्ट चार्ज, ज़रूरत के मुताबिक़ खान-पान का चार्ज और जीएसटी भी चुकाना होता है.

रेलवे का दावा है कि वह मुसाफ़िरों को क़रीब 45 फ़ीसदी की सब्सिडी देता है.

शिवगोपाल मिश्रा कहते हैं, “वंदे भारत ट्रेन का किराया इतना ज़्यादा है कि अगर चार लोगों को सफर करना हो तो ट्रेन के मुक़ाबले कार से कहीं कम ख़र्च पर सफर कर सकते हैं. लेकिन रेलवे का फ़ोकस आम लोगों की ट्रेनें चलाना नहीं, बल्कि महंगी ट्रेनें चलाना ही हो गया है.”

ये भी पढ़ें -

‘वंदे भारत’ बनाम शताब्दी एक्सप्रेस

शताब्दी एक्सप्रेस

इमेज स्रोत, Getty Images

आईसीएफ़ चेन्नई में बनाई गई वंदे भारत ट्रेन का नाम शुरू में ट्रेन-18 रखा गया था क्योंकि रेलवे की योजना में यह ट्रेन साल 2018 शुरू होने वाली थी.

इसके अलावा इसी तकनीक पर ट्रेन-20 भी साल 2020 में शुरू होनी थी.

ट्रेन-20 में एसी क्लास के स्लीपर कोच होंगे और रेलवे के मुताबिक़ इस तरह की ट्रेन अब मार्च 2024 तक शुरू हो सकती है.

वंदे भारत ट्रेनों को शताब्दी एक्सप्रेस के विकल्प के तौर पर देखा जाता है. इसमें भी शताब्दी की तरह चेयर कार वाले डिब्बे होते हैं.

भारत में पहली शताब्दी एक्सप्रेस ट्रेन 10 जुलाई 1988 को चलाई गई थी.

यह ट्रेन शुरू में ग्वालियर तक चली थी, बाद में इसे भोपाल तक बढ़ा दिया गया था.

वरिष्ठ पत्रकार और ‘भारतीय रेल’ पत्रिका के संपादक रहे अरविंद कुमार सिंह शताब्दी एक्सप्रेस ट्रेन के पहले सफ़र के गवाह रहे हैं.

अरविंद कुमार सिंह कहते हैं, “माधव राव सिंधिया उस वक़्त रेल मंत्री थे और वह ट्रेन भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की जन्म शताब्दी के मौक़े पर शुरू की गई थी. हालांकि ट्रेन में नेहरू जी की फ़ोटो नहीं लगाई गई थी, बल्कि इस ट्रेन को आधुनिक और 21वीं सदी का ट्रेन बताकर प्रचारित किया गया था.”

नेहरू

इमेज स्रोत, ARVIND KUMAR SINGH

इमेज कैप्शन, कई बार जवाहरलाल नेहरू ट्रेन से ही इलाहाबाद जाते थे

अब वंदे भारत ट्रेन को भारत की सबसे आधुनिक ट्रेन का दर्ज़ा दिया गया है और अब तक हर वंदे भारत ट्रेन को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हरी झंडी दिखाई है.

बीते 35 साल में भारत में महज़ 19 रूटों पर शताब्दी एक्सप्रेस ट्रेनें चलाई गई हैं. जबकि अब शताब्दी एक्सप्रेस की जगह वंदे भारत ट्रेनों पर रेलवे का सबसे ज़्यादा फ़ोकस नज़र आता है.

16 कोच की वंदे भारत ट्रेनों को बनाने में जहां क़रीब सौ करोड़ का ख़र्च आता है, वहीं 20 कोच की शताब्दी एक्सप्रेस ट्रेनें क़रीब 55 करोड़ रुपये में तैयार हो जाती हैं.

वंदे भारत ट्रेन को सबसे ज़्यादा पहचान इसकी रफ़्तार के लिए मिली है, लेकिन हक़ीकत यह है कि भारतीय रेल के ट्रैक पर वंदे भारत और शताब्दी एक्सप्रेस यानी दोनों ट्रेनों की अधिकतम ऑपरेशनल स्पीड 160 किलोमीटर प्रति घंटे है.

हालांकि दोनों ही ट्रेनों की औसत स्पीड इससे काफ़ी कम ही होती है, फ़िर भी किसी रूट पर वंदे भारत एक्सप्रेस ट्रेन को सफर पूरा करने में शताब्दी एक्सप्रेस के मुक़ाबले थोड़ा कम समय लगता है.

इसके पीछे बड़ी वजह है वंदे भारत ट्रेन का जल्दी से रफ़्तार पकड़ना और ब्रेक लगने पर कम समय में रुकना.

दरअसल वंदे भारत ट्रेन शताब्दी एक्सप्रेस की तरह इंजन की मदद से नहीं चलती हैं, बल्कि यह ‘ट्रेन सेट’ है.

इसमें हर एक कोच के बाद दूसरे कोच में बैटरी लगी होती है, जो ट्रेन को ज़्यादा ताक़त से ख़ींचती है. इससे ट्रेन जल्दी से स्पीड पकड़ती है और ब्रेक लगाने पर जल्दी रुकती है.

ये भी पढ़ें -

रेलवे का नया ऑफ़र

वंदे भारत ट्रेन

इमेज स्रोत, ANI

भारतीय रेल के एक सर्कुलर के मुताबिक़ जिन रूटों या सेक्शन पर वंदे भारत ट्रेन की ऑक्यूपेंसी 50 फ़ीसदी से कम होती है, वहां मुसाफ़िरों को किराये में अधिकतम 25 फ़ीसद तक छूट दी जा सकती है.

हालांकि, यह योजना विस्टाडोम (कांच की दीवार और छत वाले) कोच, अनुभूति कोच और अन्य एसी सीटिंग कोच पर लागू होगी.

इसके लिए ज़ोनल रेलवे को किराये में छूट निर्धारित करने का अधिकार दिया गया है.

रेल मंत्रालय के प्रवक्ता अमिताभ शर्मा ने बीबीसी को बताया है, “यह योजना साल 2019 में लाई गई थी लेकिन कोविड की वजह से आगे नहीं बढ़ पाई. रेलवे उसी योजना को नए सिरे से लेकर आया है. यह न तो नई योजना है और न ही केवल वंदे भारत ट्रेन के लिए लाई गई है.”

ज़ोनल स्तर पर रेलवे को किसी भी रूट या सेक्शन पर सफ़र के दूसरे माध्यमों पर भी ग़ौर करना है और उससे तुलना करने के बाद ही वंदे भारत और बाक़ी कुछ ट्रेनों के किराये में छूट की योजना तैयार करनी है.

वंदे भारत ट्रेनें दो शहरों को जोड़ने वाली ट्रेनें हैं और भारत में बेहतर सड़कों के निर्माण ने भी बड़ी संख्या में लोगों को सड़क के रास्ते सफर करने को प्रोत्साहित किया है.

इस तरह के सफर में मुसाफ़िरों को डोर-टू-डोर कनेक्टिविटी भी मिल जाती है.

इसलिए रेलवे को हर नई ट्रेन चलाने और नए ऑफ़र पेश करने में इस चुनौती का सामना भी करना पड़ सकता है.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)