केन बेतवा लिंक परियोजना: जो गाँव कभी रोशन नहीं हुआ, अब दूसरों को उजाला देने के लिए डूबेगा

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- Author, विष्णुकांत तिवारी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, छतरपुर से
"हमने मिट्टी के तेल के दीप जलाकर जीवन बिताया है. अब तो अंधेरे में रहते-रहते आदत हो गई है."
यह दर्द 20 साल की लक्ष्मी आदिवासी का है. वह शाम होने से पहले घर की मुंडेर पर टंगे कपड़ों को उतार रही हैं.
मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से 370 किलोमीटर दूर छतरपुर ज़िले के धौड़न गाँव की रहने वाली लक्ष्मी ने अपने गाँव में कभी बिजली की रोशनी नहीं देखी.
इसे विडंबना ही कहेंगे कि कभी बिजली नहीं देखने वाला यह गाँव, अब देश के कई ज़िलों को रोशन करने के लिए डूबने जा रहा है.
गीत, संगीत और विरोध

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लक्ष्मी के घर से कुछ दूरी पर 46 साल के महेश आदिवासी हारमोनियम के साथ गाँव के बीचोबीच बने चबूतरे पर बैठे गा रहे हैं. गीत के बोल हैं, "केनबेतवा का ये बांध सरकार बनवा रही, हम ग्रामों को कछु नहीं दे रही, आफ़त में ये डाल रही और गाँवों को बिजली पानी, शासन दे रही पाने को, हम गाँवों को इस पानी में शासन जुटी डुबाने को…"
महेश के साथ गाँव के कुछ और लोग भी जुड़ते हैं. लगभग हज़ार मतदाताओं वाले इस गाँव के लोग गीत-संगीत के सहारे विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं.
यह विरोध कुछ दिनों में मूर्त रूप लेने वाले केन बेतवा लिंक परियोजना के ख़िलाफ़ हो रहा है.
केन बेतवा लिंक प्रोजेक्ट

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केन और बेतवा दो नदियां हैं. भारत सरकार की 'केन बेतवा लिंक प्रोजेक्ट' की चर्चा साल 1995 में सबसे पहले शुरू हुई थी और इसके साथ ही धौड़नगाँव के डूबने की नियति तय हो गई थी.
साल 2005 में मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश की सरकारों ने एक एमओयू पर हस्ताक्षर किया. इसके बाद साल 2024 के 25 दिसंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस परियोजना का शिलान्यास किया.
एक नदी से दूसरी नदी तक पानी पहुंचाने यानी कि रिवर लिंकिंग की इस परियोजना में लगभग 44 हज़ार करोड़ रुपए खर्च होंगे. इससे मध्य प्रदेश के छतरपुर और पन्ना ज़िलों के 21 गाँव डूब जाएँगे. लगभग सात हज़ार परिवार विस्थापित होंगे.
केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट के बारे में भारत सरकार के कई दावे हैं. इसके मुताबिक, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के क़रीब 13 ज़िलों को इसका फ़ायदा मिलेगा.
ग्यारह लाख हेक्टेयर जमीन में सिंचाई की सुविधा मिलेगी. 62 लाख लोगों को पीने का पानी मिलेगा. यही नहीं, 100 मेगावॉट से ज़्यादा बिजली का सृजन भी होगा.

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तो आख़िर इस परियोजना का विरोध क्यों हो रहा है?
महेश आदिवासी सवाल करते हैं, "जबसे देश आज़ाद हुआ, गाँव-गाँव में बिजली पहुँच गई. दूसरी ओर, हमारी पीढ़ियाँ ख़त्म हो गईं लेकिन हमें आज तक बिजली नहीं मिली. गर्मी में हम तो पंखे का सपना भी नहीं देख सकते."
धौड़न गाँव की 60 वर्षीय सरस्वती कहती हैं कि यहाँ कभी बिजली नहीं पहुँची. उनका कहना है, "यहाँ कोई चक्की तक नहीं है. गेहूँ और चावल पिसाने के लिए हमें 30 किलोमीटर दूर बमीठा जाना पड़ता है. गाँव में कुछ घरों में सोलर लाइट है. उससे चक्की नहीं चल सकती."
महेश कहते हैं कि, "हमारे गाँव में आज तक रोशनी नहीं आई. अब जब हमें विस्थापित किया जा रहा है. इसके बाद भी हमें बेहतर ज़िदगी का भरोसा नहीं है."
विस्थापन और मुआवजे की चिंता

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धौड़न की समस्या सिर्फ़ बिजली न होने तक सीमित नहीं है. यहाँ के रहवासी अब केन बेतवा लिंक परियोजना से विस्थापन के एवज में मिलने वाली सहायता से भी नाख़ुश हैं.
गाँव के 31 साल के तुलसी कहते हैं कि उन्हें सरकार से एक नोटिस मिला है. उसके हिसाब से उनके मकान की कीमत 46 हज़ार रुपए है.
उन्होंने सवाल किया, "सर, हमारे गाँव के मकान के बदले सरकार 46 हज़ार रुपए दे रही है. क्या यहाँ से बाहर इतने रुपयों में मकान बन जाएगा?"
तुलसी का आरोप है कि 'सरकार उनके साथ धोखा कर रही है' और जितने भी केन बेतवा परियोजना से प्रभावित गाँव हैं, उनको 'छला' जा रहा है.
क्या कहते हैं ज़िलाधिकारी
ग्रामीणों के इन आरोपों के बारे में हमने छतरपुर के ज़िला अधिकारी पार्थ जायसवाल से बात की.
उन्होंने बताया, "रिहैबिलिटेशन पैकेज के तहत सरकार द्वारा दो विकल्प दिए गए थे. या तो हितग्राही जिनका मकान जा रहा है, वे एक ज़मीन का टुकड़ा ले लें और इसके साथ साढ़े सात लाख रुपए भी या एकमुश्त साढ़े बारह लाख रुपए की राशि ले लें.''
उनके मुताबिक, "इसमें 90% लोगों ने एकमुश्त राशि लेने का विकल्प चुना है. जो बचे हुए 10% लोग हैं, उनकी बसाहट के लिए हम कुछ सरकारी ज़मीन तलाश रहे हैं. उन्हें सर्व सुविधा युक्त व्यवस्था प्रदान की जाएगी."
हालाँकि, धौड़न गाँव के गौरीशंकर यादव कुछ और ही कहते हैं. उनके मुताबिक, सरकार द्वारा दिया जा रहा पुनर्वास पैकेज जीवन यापन और विस्थापन से उबरने के लिए पर्याप्त नहीं है.
गौरीशंकर कहते हैं, "हमारे मकान का मुआवज़ा 40-50 हज़ार रुपए है. इतने में क्या मकान बनेगा? यहाँ से जाने के बाद हमारे बच्चों का क्या होगा? हम ग़रीब और अशिक्षित हैं. इसलिए हमारी सुनवाई नहीं हो रही."
वहीं, तुलसी आदिवासी कहते हैं, "अगर सरकार 50 हज़ार रुपए में मकान बनाकर दे सकती है तो हम सरकार को 50 हजार देंगे. बदले में वह हमें मकान दे दें."
शिक्षा और बुनियादी सुविधाओं से दूर है धौड़न

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धौड़न गाँव के बच्चों की शिक्षा भी अँधेरे में है. लक्ष्मी आदिवासी कहती हैं, "हम पढ़ाई करना चाहते हैं, लेकिन अगर विस्थापन के बाद भी वही हालात रहेंगे तो हम क्यों जाएँ? हमें घर, पानी, बिजली और पढ़ाई की सुविधा चाहिए."
इस गाँव में आज तक कोई बच्चा दसवीं तक पढ़ाई नहीं कर पाया है. गाँव के पास एक प्राथमिक स्कूल है. इसके बारे में ग्रामीण बताते हैं, "अक्सर ये स्कूल बंद ही रहता है. काफी दूर है, इसलिए शिक्षक भी नहीं आते हैं. गाँव में लाइट भी नहीं है. इसलिए भी शिक्षा में कोई तरक़्क़ी नहीं कर पा रहा है.''
बीबीसी ने ज़िलाधिकारी पार्थ जायसवाल से जानना चाहा कि क्या प्रशासन को धौड़न गाँव में बिजली न होने की जानकारी है?
उन्होंने जवाब दिया, "हाँ, जब हम वहाँ गए थे तो यह पता चला था. वहाँ गाँव में बहुत सारी बुनियादी सुविधाएँ नहीं हैं. कुछ लोगों की पेंशन और किसान क्रेडिट कार्ड की भी माँग थी. इसमें से हमने पेंशन के मामले पर तुरंत कार्रवाई की. हम किसान क्रेडिट कार्ड नहीं बनवा सकते हैं. अब ज़मीन सरकारी हो गई है. सरकारी ज़मीन पर यह योजना संभव नहीं है."
दूसरी ओर, गाँव के लोग चाहते हैं कि सरकार उन्हें ऐसी जगह बसाए जहाँ शिक्षा, स्वास्थ्य और दूसरी बुनियादी सुविधाएँ आसानी से उपलब्ध हों.
हालाँकि इन लोगों को कहाँ बसाया जाएगा, इसको लेकर भी तस्वीर स्पष्ट नहीं है. छतरपुर के ज़िलाधिकारी पार्थ जायसवाल कहते हैं कि अभी वैकल्पिक जगहों को तलाशने की प्रक्रिया चल रही है.
केन बेतवा लिंक परियोजना और पर्यावरणविदों की चिंताएँ

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इस परियोजना को लेकर पर्यावरण संबंधी चिंताएं भी उठ रही हैं.
पर्यावरणविद अमित भटनागर का कहना है, "यह परियोजना पन्ना टाइगर रिज़र्व, गिद्ध पुनर्वास केंद्र और घड़ियाल अभयारण्य को खतरे में डाल देगी. 46 लाख पेड़ या तो कटेंगे या डूब जाएँगे. इससे पर्यावरण को भारी नुकसान होगा."
अमित यह भी आरोप लगाते हैं, "सर्वोच्च न्यायालय ने एक कमिटी से इस परियोजना की जांच कराई थी. उस कमिटी ने भी इस परियोजना के विकल्प तलाशने की बात की थी. यह मामला अभी नेशनल ग्रीन ट्राइब्यूनल में भी लंबित है.''
इसी मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने साल 2017 में केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति (सीईसी) का गठन किया गया था. इसकी रिपोर्ट 2019 में दाखिल की गई.
इस कमिटी ने सरकार द्वारा केन बेतवा लिंक प्रोजेक्ट के विकल्पों को न तलाशने की बात कही थी.
इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि केन बेतवा लिंक प्रोजेक्ट से पन्ना टाइगर रिज़र्व पर असर पड़ेगा.
ज़ाहिर है कि इन चिंताओं को दरकिनार करते हुए प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाने का काम शुरू हो चुका है.
ऐसे में ग्रामीणों में चिंता और आक्रोश दोनों का मिला जुला रूप दिख रहा है.
महेश कहते हैं, "हम विकास चाहते हैं लेकिन विनाश की क़ीमत पर नहीं. अगर हमारी माँगें नहीं मानी गईं, तो हम इस बांध में आंदोलन करते हुए डूब जाएँगे."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़ रूम की ओर से प्रकाशित















