स्विट्ज़रलैंड से मिले एमएफ़एन का दर्जा ख़त्म होने का भारत पर कितना असर हो सकता है?

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- Author, चंदन कुमार जजवाड़े
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
स्विट्ज़रलैंड ने भारत को दिए 'सर्वाधिक तरजीही देश' यानी मोस्ट फ़ेवर्ड नेशन (एमएफ़एन) का दर्ज़ा रद्द कर दिया है. स्विट्ज़रलैंड ने यह फ़ैसला नेस्ले विवाद पर सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद लिया है.
हम जानने की कोशिश करेंगे कि स्विट्ज़रलैंड के इस फ़ैसले का भारत के साथ उसके आपसी व्यापार पर क्या असर हो सकता है. ख़ासकर एक-दूसरे देश में उनके निवेश पर इसका कितना असर हो सकता है.
भारतीय दूतावास के आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक़ साल 2000 से साल 2023 के बीच भारत में स्विट्ज़रलैंड का निवेश 9.77 अरब अमेरिकी डॉलर का रहा है.
ख़ास बात यह है कि हाल के समय में यह निवेश काफ़ी बढ़ा है. भारत में स्विट्ज़रलैंड का निवेश साल 2015 से साल 2022 के बीच 53 फ़ीसदी बढ़ा है.

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भारत सरकार के विदेश व्यापार महानिदेशालय मेंएडिशनल डायरेक्टर जेनरल फ़ॉरेन ट्रेड (एडीजीएफ़टी) के पद पर रहे और ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इंस्टीट्यूट के संस्थापक अजय श्रीवास्तव कहते हैं, "यह विवाद निवेश से शुरू हुआ है और आगे चलकर इसका असर दोनों देशों के आपसी व्यापार पर पड़ेगा."
अजय श्रीवास्तव बताते हैं, "अब स्विट्ज़रलैंड में काम करने वाली भारतीय कंपनियों को अपने डेविडेंड पर 5 प्रतिशत की जगह 10 प्रतिशत टैक्स देना होगा और स्विस कंपनियों को भी 10 प्रतिशत टैक्स देना जारी रखना होगा. यह टैक्स 5 प्रतिशत नहीं होगा, जैसा कि स्विस कंपनियों ने सोचा था."
"ज़ाहिर तौर पर भारत में स्विस निवेश ज़्यादा बड़ा है इसलिए इसका असर उन पर ज़्यादा होगा तो वो भारत में निवेश पर विचार कर सकते हैं."
क्या है विवाद?

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स्विट्ज़रलैंड सरकार ने घोषणा की है कि वो भारत को डीटीएए (डबल टैक्स अवॉइडेंस एग्रीमेन्ट) समझौते के तहत दिए गए 'मोस्ट फ़ेवर्ड नेशन' का दर्ज़ा वापस ले रहा है और यह 1 जनवरी 2025 से लागू हो जाएगा.
'डबल टैक्स अवॉइडेंस एग्रीमेंट' का मतलब है कि किसी एक देश की कंपनी किसी दूसरे देश में निवेश और व्यापार कर रही हो तो उसे दोनों देशों में अपने लाभ पर टैक्स न देना पड़े.
स्विटज़रलैंड ने भारत के संबंध में ताज़ा फ़ैसला साल 2023 के सुप्रीम कोर्ट के एक फ़ैसले के आधार पर लिया है.
दरअसल स्विट्ज़रलैंड की कंपनी नेस्ले ने सुप्रीम कोर्ट में दलील दी थी कि भारत ने स्लोवानिया, लिथुआनिया और कोलंबिया जैसे देशों को टैक्स में ज़्यादा बेहतर छूट दी है, जो एमएफ़एन के तहत स्विट्ज़रलैंड की कंपनियों को भी मिलनी चाहिए.
अजय श्रीवास्तव कहते हैं कि ऐसा माना जाता है कि अगर कोई देश किसी अन्य 'मोस्ट फ़ेवर्ड नेशन' वाले देश को कोई ख़ास छूट देता है तो यह एमएफ़एन के तहत आने वाले सभी देशों को अपने आप मिल जाता है.
वो बताते हैं कि भारत और स्विट्ज़रलैंड के बीच एएफ़एन समझौते में भी ऐसा ही माना जाता था. हालाँकि यह स्पष्ट तौर पर लिखा नहीं था और यही समस्या की वजह है. अगर समझौते में सब कुछ लिखा हो तो ऐसी समस्या नहीं आएगी.

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भारत ने स्लोवानिया के साथ साल 2016, लिथुवानिया के साथ साल 2011 और कोलंबिया के साथ साल 2011 में एमएफ़एन का समझौता किया था.
ये देश भारत के साथ समझौते के साथ ही ऑग्रेनाइज़ेशन फ़ॉर इकोनॉमिक कोऑपरेशन एंड डेवलपमेंट यानी ओईसीडी के सदस्य बन गए, जिसका सदस्य स्विट्ज़रलैंड भी है.
भारत के साथ समझौते में इन देशों को ख़ास तौर पर डेविडेंड्स पर कम टैक्स देने की छूट दी गई, जो 5 फ़ीसदी थी.
नेस्ले की दलील थी कि ओईसीडी के नए सदस्यों को मिलने वाली छूट एमएफ़एन के तहत स्विट्ज़रलैंड को भी मिलनी चाहिए.
सुप्रीम कोर्ट ने 19 अक्तूबर 2023 को अपने एक फ़ैसले में कहा था कि नेस्ले को यह लाभ भारत-स्विट्ज़रलैंड एमएफ़एन समझौते के तहत अपने आप नहीं मिल सकता है. इसके लिए भारत सरकार को इनकम टैक्स एक्ट के सेक्शन-90 के तहत इसकी अधिसूचना अलग से जारी करनी होगी.
टैक्स और बिज़नेस मामलों के जानकार शरद कोहली कहते हैं, "पहले दिल्ली हाई कोर्ट ने नेस्ले के पक्ष में फ़ैसला सुनाया था, लेकिन इनकम टैक्स विभाग ने इसके ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में अपील कर दी."
शरद कोहली कहते हैं, "नेस्ले और स्विट्ज़रलैंड की शिकायत यह है कि भारत सरकार उनके लिए एक नोटिफ़िकेशन तक नहीं निकाल सकती."
क्या हो सकता है असर?

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मोस्ट फ़ेवर्ड नेशन का दर्जा छिन जाने के बाद भारत और स्विट्ज़रलैंड आम देशों की तरह आपस में कारोबार करेंगे.
शरद कोहली कहते हैं, "आप जब एमएफ़एन में शामिल होते हैं तो टैक्स में छूट के अलावा भी कई सहूलियतें मिलती हैं, मसलन आपको लाइसेंस से लेकर कई तरह की मंज़ूरी जैसे मामलों में भी सहूलियत दी जाती है और आपको इस तरह की प्रक्रिया में कम समय लगता है."
शरद कोहली के मुताबिक़ ज़्यादा टैक्स चुकाने की वजह से कंपनियों का आरओआई यानी रिटर्न ऑन इन्वेस्टमेंट घट जाता है, इससे कंपनियां अपना निवेश कम कर सकती हैं या अपने निवेश पर दोबार विचार कर सकती हैं.
वो कहते हैं, "स्विस कंपनियों को भारत में भले ही बड़ा बाज़ार मिल जाता है, लेकिन बहुत ज़रूरी न हो तो स्विस कंपनियां यहां निवेश से पहले विचार कर सकती हैं."

भारत में मौजूदा समय में 323 स्विस कंपनियां काम कर रही हैं. इनमें से 287 कंपनियां साल 1991 के आर्थिक उदारीकरण के बाद भारतीय बाज़ार में आई हैं. भारत में इन कंपनियों में क़रीब 1.35 लाख़ लोग नौकरी करते हैं.
इनमें बैंकिंग और फ़ाइनेंस, इन्फ़्रास्ट्रक्चर, मशीन, इंजीनियरिंग, कंस्ट्रक्शन और सूचना तकनीक जैसे कई क्षेत्र शामिल हैं, जहां स्विस कंपनियाँ कारोबार करती हैं.
वहीं अजय श्रीवास्तव कहते हैं, "इस विवाद का असर दो तरीके से होगा- पहला, तात्कालिक असर होगा. कंपनियों का लाभ घटेगा और वो निवेश पर विचार कर सकती हैं. जबकि दूसरा, दूरगामी असर होगा, जिसके तहत भारत में 15 साल में 100 अरब डॉलर के निवेश पर असर पड़ सकता है."
दरअसल यूरोपियन फ्री ट्रेड एसोसिएशन यानी ईएफ़टीए में शामिल चार देशों ने भारत में 15 साल में 100 अरब डॉलर के निवेश करने का लक्ष्य रखा है. इन देशों में आइसलैंड, लिश्टेन्स्टाइन, नॉर्वे और स्विट्ज़रलैंड शामिल हैं.
इन देशों ने यह वादा इसी साल मार्च में भारत के साथ हुए एक व्यापार समझौते के तहत किया था. अगर इन देशों को भारत में टैक्स में ख़ास छूट नहीं मिलेगी तो वो अपने निवेश पर दोबारा विचार कर सकते हैं.
भारत और स्विट्ज़रलैंड के बीच व्यापार

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भारत और स्विट्ज़रलैंड के बीच मित्रता का समझौता साल 1948 में हुआ था. भारत की आज़ादी के बाद स्विट्ज़रलैंड इस तरह का समझौता करने वाले शुरुआती देशों में शामिल था.
दोनों देशों के बीच दोहरे टैक्स को लेकर समझौता साल 1994 में हुआ था, जिसमें साल 2010 में संशोधन भी किया गया, जबकि भारत और स्विट्ज़रलैंड के बीच निवेश को लेकर समझौता साल 1997 में हुआ था.
भारत का स्विट्ज़रलैंड में प्रत्यक्ष निवेश अप्रैल 2020 से नवंबर 2022 के बीच 7.2 अरब डॉलर का रहा है. इसमें बड़ा हिस्सा भारत की आईटी कंपनियों का है. इसके अलावा लाइफ़ साइंस, इंजीनियरिंग और कैमिकल से जुड़ी कंपनियाँ भी इस निवेश में शामिल हैं.
मौजूदा समय में भारत की 140 कंपनियों ने स्विट्ज़लैंड में 179 जगहों पर निवेश किया है, जिनमें क़रीब पांच हज़ार लोगों को नौकरी भी मिली है.
जबकि साल 2023-24 में स्विट्ज़रलैंड भारत का 15वां सबसे बड़ा ट्रेड पार्टनर है.
भारत में जिन राज्यों में स्विट्ज़रलैंड का सबसे ज़्यादा निवेश हैं उनमें महाराष्ट्र, कर्नाटक, हरियाणा, दिल्ली और तमिलनाडु शामिल हैं, जहां इस निवेश का क़रीब 90 फ़ीसदी हिस्सा लगा हुआ है.
भारत और स्विट्ज़रलैंड के बीच आपसी व्यापार में भारत का हिस्सा काफ़ी छोटा है. साल 2021 के आंकड़ों के मुताबिक़ दोनों देशों में इस साल क़रीब 30.8 अरब डॉलर का आपसी व्यापार हुआ था.
इसमें भारत ने क़रीब 29.5 अरब डॉलर का आयात किया था, जबकि उसका निर्यात महज़ 1.2 अरब डॉलर के क़रीब था.
उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक़ साल 2022 में दोनों देशों के बीच हुए क़रीब 17.6 अरब डॉलर के आपसी व्यापार में भारत ने क़रीब 16.3 अरब डॉलर का आयात किया था.
मौजूदा समय में भारत जिन चीजों का स्विट्ज़रलैंड का निर्यात करता है उनमें ऑर्गेनिक कैमिकल, मोती, कीमती रत्न, ज्वैलरी, कपड़े, कपड़ों को रंगने वाली डाई, चमड़े के उत्पाद, कॉटन, प्लास्टिक, कॉफ़ी जैसी चीजें शामिल हैं.
जबकि स्विट्ज़रलैंड से भारत आने वाले सामानों में सोने-चांदी, कैमिकल, दवाएं, मशीन, ट्रांसपोर्ट के सामान, घड़ी और इंजीनियरिंग के सामान शामिल हैं.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित
















