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झारखंड चुनाव में यूसीसी का नाम क्या मुसलमान-आदिवासी गठजोड़ तोड़ने के लिए लिया जा रहा है?
- Author, मोहम्मद सरताज आलम
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए रांची से
झारखंड विधानसभा चुनाव में मतदान का दिन जैसे जैसे नज़दीक आ रहा है, वैसे वैसे राजनीतिक बयानबाज़ी घमासान रूप ले रही है. इस बहस में समान नागरिक संहिता का मुद्दा भी गरमा रहा है.
राज्य चुनाव में भारतीय जनता पार्टी का चुनावी घोषणा पत्र जारी करते हुए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा, "हमारी सरकार झारखंड में ‘समान नागरिक संहिता’ (यूसीसी) लागू करेगी, लेकिन आदिवासियों को इसके दायरे से बाहर रखा जाएगा."
उनकी इस टिप्पणी के जवाब में राज्य के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने कहा, “झारखंड में सिर्फ़ छोटा नागपुर काश्तकारी (सीएनटी) और संथाल परगना काश्तकारी (एसपीटी) अधिनियम ही चलेंगे, न कोई यूसीसी चलेगा न एनआरसी.”
इसको लेकर राज्य में दो तरह की चर्चा शुरू हो गई है, एक तो क्या बीजेपी राजनीतिक ध्रुवीकरण के लिए यूसीसी के मुद्दे को हवा दे रही है, और अगर ऐसा है तो इसके दायरे में आदिवासियों को क्यों बाहर रखा जा रहा है. ज़ाहिर है कि इन सबको चुनाव से भी जोड़कर देखा जा रहा है.
क्या कहते हैं जानकार?
क़ानून के जानकार अधिवक्ता शादाब अंसारी यूसीसी को परिभाषित करते हुए कहते हैं, "यूसीसी लागू होने पर विवाह, तलाक़, बच्चा गोद लेना और संपत्ति के बंटवारे जैसे विषयों में भारत के सभी नागरिकों वह चाहे किसी भी जाति या धर्म से हों, उनके लिए एक जैसे नियम होंगे."
उनका मानना है कि एक ही नियम सभी समाज पर लागू कर दिए जाएं, यह संभव नहीं.
वह कहते हैं, “हर समाज के जीवनयापन की अपनी शैली या प्रथा है. जिसमें यूसीसी के बहाने दख़ल हो, इसे कोई भी जाति या धर्म कतई स्वीकार नहीं करेंगे. यही वजह है कि अमित शाह ने आदिवासियों को यूसीसी से अलग रखा है, ताकि उनके विरोध का सामना न करना पड़े.”
जबकि अमित शाह के उस बयान पर झारखंड आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले आदिवासी नेता प्रभाकर तिर्की कहते हैं, “ऐसा नहीं है कि आदिवासियों को यूसीसी से अमित शाह ने बाहर रखा है. बल्कि यूसीसी से अलग रखने का अधिकार भारत सरकार द्वारा 1996 में लागू किया गया विशेष क़ानून पेसा एक्ट देता है.”
क्या है पेसा एक्ट?
पेसा क़ानून का पूरा नाम है- पंचायत एक्सटेंशन टू शेड्यूल्ड एरियाज़ एक्ट.
1986 में पंचायती राज व्यवस्था में अनुसूचित क्षेत्रों का विस्तार करते हुए पेसा क़ानून की शुरुआत हुई.
इस क़ानून में कहा गया है कि आदिवासी क्षेत्रों में आने वाले इलाक़ों में देश के सामान्य क़ानून लागू नहीं होंगे और यहां पेसा क़ानून लागू होगा.
इस क़ानून के तहत आदिवासी समाज की परंपराओं और रीति-रिवाजों, उनकी सांस्कृतिक पहचान, सामुदायिक संसाधनों और विवाद समाधान के प्रथागत तरीके की सुरक्षा और संरक्षण की ज़िम्मेदारी ‘ग्रामसभा’ को दी गई है.
प्रभाकर तिर्की कहते हैं, “क़ानून के कारण आदिवासी समाज को यूसीसी से अलग रखा जाएगा. लेकिन कैसे भरोसा किया जाए कि भविष्य में यूसीसी जबरन आदिवासियों पर लागू नहीं किया जाएगा?”
प्रभाकर तिर्की से सहमत गिरिडीह के विधायक सुदिव्य कुमार सोनू कहते हैं कि भारतीय जनता पार्टी आदिवासियों को यूसीसी से अलग रखने का जितना भी दावा करे, लेकिन यूसीसी लागू होने के बाद सबसे अधिक असर आदिवासियों और उनके अपने परंपरागत क़ानून पर पड़ेगा.
लेकिन भाजपा प्रवक्ता प्रतुल शहदेव इस आरोप पर कहते हैं कि “हमने पहले ही कह दिया है कि आदिवासी समाज यूसीसी से बाहर है, ऐसे में उनके कस्टमरी लॉ से कोई छेड़छाड़ नहीं होगी.”
झारखंड हाईकोर्ट के अधिवक्ता शादाब अंसारी पूछते हैं कि “अगर यूसीसी बना रहे हैं तो उससे कुछ समाज/धर्म को अलग रखे जाने की बात कही जा रही है, ऐसे में सिविल कोड यूनिफार्म कहाँ रहा?”
इस सवाल पर भाजपा प्रवक्ता कहते हैं, "आदिवासी समाज का इतिहास दस हज़ार साल पुराना है. लेकिन वे तरक्की नहीं कर सके."
उन्होंने कहा, "ऐसे में उनके विकास के लिए आवश्यक है कि उनको उनके कस्टमरी लॉ के अनुसार जीवनयापन की आज़ादी मिले. जबकि शेष नागरिकों को यूसीसी के तहत यूनिफॉर्म करने की कोशिश है."
लेकिन इन सबके बीच सबसे बड़ा सवाल यह भी उठ रहा है कि झारखंड में यूसीसी की आवश्यकता क्यों है?
इस सवाल पर भाजपा प्रवक्ता प्रतुल शाहदेव का मानना है कि जनसंघ के समय से ही यूसीसी भाजपा के नेशनल एजेंडा में रहा है.
वह कहते हैं कि “झारखंड में यूसीसी क़ानून न होने के कारण बांग्लादेशी घुसपैठिये आदिवासी समाज की भोली-भाली युवतियों को बहलाकर चार-चार शादी करते हुए लव-जिहाद करते हैं.”
उन्होंने कहा, “उसके बाद वे आदिवासियों की ज़मीन पर लैंड जिहाद करते हैं. साथ ही ये बांग्लादेशी घुसपैठिये आदिवासियों की रिज़र्व सीट पर अपनी आदिवासी पत्नी को चुनाव लड़वा कर पॉलिटिकल जिहाद करते हैं.”
वह यह भी कहते हैं कि इन 'बांग्लादेशी घुसपैठियों' के कारण ही झारखंड में यूसीसी लागू होना बहुत ज़रूरी है.
कथित बांग्लादेशी घुसपैठियों के सवाल पर झारखंड मुक्ति मोर्चा के विधायक सुदिव्य कुमार सोनू कहते हैं कि “संथाल के जिन नागरिकों को बांग्लादेशी बताया जा रहा है उनका कसूर बस इतना है कि पहले तो वे मुसलमान हैं, उस पर से वे बांग्ला भाषी हैं. इसलिए उनको बांग्लादेशी बताया जाता है, जबकि वे पीढ़ी दर पीढ़ी से संथाल में रहते आ रहे हैं, न कि वे कोई बांग्लादेशी हैं.”
ऐसे में सवाल उठता है कि झारखंड चुनाव के दौरान यूसीसी का ज़िक्र क्यों हो रहा है?
इस सवाल पर प्रभाकर तिर्की कहते हैं कि “झारखंड में यूसीसी की कोई ज़रूरत नहीं है. यूसीसी के नाम से आप मुसलमानों को निशाना बनाएंगे, और गैर-मुस्लिम वोटों का ध्रुवीकरण भाजपा के हित में करेंगे.”
यूसीसी को लेकर क्या सोचते हैं मुसलमान?
सुन्नी मुस्लिमों की संस्था इदारा-ए-शरिया के नायब काज़ी और मुस्लिम स्कॉलर मौलाना शमशादुल क़ादरी प्रभाकर तिर्की के इस बयान से सहमति जताते हुए कहते हैं कि “यूसीसी के बहाने झारखंड के मुसलमानों को डराने-धमकाने की कोशिश मात्र है.”
लेकिन, अल्पसंख्यक समुदाय के सामाजिक कार्यकर्ता शमीम अली का मानना है कि मुसलमानों पर यूसीसी से कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा, इसलिए इस समाज को खौफ़ज़दा होने की आवश्यकता नहीं.
वह कहते हैं कि तीन तलाक़ पर सरकार पहले ही क़ानून बना चुकी है, रही बात शादी-ब्याह की तो अब कौन से मुस्लिम चार शादी करते हैं.
मौलाना शमशादुल क़ादरी का मानना है, "भारत के अधिकांश क़ानूनों में यूनिफ़ॉर्मिटी बाबा साहेब के दौर से ही है."
उदाहरण देते हुए वह कहते हैं कि “क्रिमिनल लॉ सभी के लिए एक समान हैं, ऐसा तो है नहीं कि हत्या की सज़ा मुसलमान की तुलना में गैर-मुस्लिम को अलग है या चुनाव लड़ने के नियम दोनों समाज के लिए भिन्न हैं.”
मौलाना क़ादरी का मानना है कि यूसीसी के बहाने मुसलमानों के जीवनयापन में दख़ल देने की कोशिश हो रही है.
लेकिन, इस आरोप को ख़ारिज करते हुए भाजपा प्रवक्ता प्रतुल शहदेव कहते हैं कि “यूसीसी देशहित में लिया गया एक फ़ैसला है, ना कि ये कोई चुनावी लाभ के लिए किया गया स्टंट है.”
झारखंड में मुस्लिम
लगभग 15 फ़ीसदी मुस्लिम आबादी वाले झारखंड में विधानसभा की कुल 81 सीटें हैं.
इनमें से दो दर्जन सीटें ऐसी हैं, जहां मुस्लिम मतदाताओं की आबादी 20 से 40 फ़ीसदी के बीच है. जिनका परिणाम तय करने में मुस्लिम मतदाता निर्णायक भूमिका में हैं.
सामाजिक कार्यकर्ता शमीम अली कहते हैं, "मोटे तौर पर अनुमान यही है कि जामताड़ा, पाकुड़ और राजमहल में मुसलमानों की आबादी लगभग 35 फ़ीसदी से अधिक है. जबकि गोड्डा और मधुपुर में 26, टुंडी और गांडेय में 23 फ़ीसदी के क़रीब मुस्लिम आबादी है."
एक्टिविस्ट शमीम अली का मानना है कि यूसीसी जैसे शब्दों के प्रयोग के कारण ध्रुवीकरण होता है.
वह कहते हैं, "ध्रुवीकरण से डर कर सेकुलर पार्टी मुसलमानों को टिकट देने से घबराती है. यही कारण है कि 2019 विधानसभा चुनाव में महागठबंधन ने मात्र आठ मुसलमानों को टिकट दिया, जबकि इस विधानसभा चुनाव में मात्र पांच मुस्लिमों को इंडिया गठबंधन का प्रत्याशी बनाया गया."
ज्ञात हो कि बिहार से अलग होकर नए राज्य के रूप में आए झारखंड में पहली बार चुनाव 2005 में हुए. तब दो ही मुस्लिम विधानसभा के लिए निर्वाचित होकर विधायक बने थे.
जबकि साल 2009 में मुस्लिम विधायकों की संख्या बढ़कर पांच हुई, लेकिन 2014 में दो ही मुस्लिम विधायक बन सके.
लेकिन 2019 के विधानसभा चुनाव में चार मुस्लिम नेता विधानसभा के लिए निर्वाचित हुए थे.
चुनाव पर यूसीसी का क्या असर पड़ेगा?
चुनाव पर यूसीसी से पड़ने वाले प्रभाव को लेकर पूछे गए सवाल पर वरिष्ठ पत्रकार सुरेन्द्र सोरेन का मानना है कि झारखंड के ग्रामीण आदिवासियों में एक फ़ीसदी को भी यूसीसी के बारे में जानकारी नहीं होगी.
वह कहते हैं कि “ये सच है कि यूसीसी जैसे शब्दों का इस्तेमाल मतदाताओं के ध्रुवीकरण के लिए किया जाता है.”
वरिष्ठ पत्रकार की बात से सहमत विधायक सुदिव्य कुमार सोनू कहते हैं कि 'भाजपा की नज़र मुस्लिम-आदिवासी गठजोड़ को तोड़ने पर थी. जिसे यूसीसी के बहाने मुसलमानों को टारगेट करते हुए ध्रुवीकरण की कोशिश की गई, जो कि प्रभावहीन रही. अत: यूसीसी का असर न आदिवासी-मुस्लिम मतों पर पड़ेगा और न ही दूसरे समाज पर.'
लेकिन पत्रकार सुरेन्द्र सोरेन कहते हैं कि अगर भाजपा यूसीसी की जगह सरना कोड लागू करने की बात करती, तब आदिवासी मतदाताओं का रुख़ भाजपा की तरफ़ ज़रूर होता.
लेकिन भाजपा प्रवक्ता प्रतुल शहदेव कहते हैं कि “हमने कभी सरना कोड का विरोध नहीं किया. लेकिन हमारी मांग ये भी है कि सरना कोड लागू होगा तो ऐसे आदिवासी जिन्होंने धर्मांतरण कर ईसाई धर्म अपना लिया हो, तो उनको भी आदिवासी समाज से बाहर किया जाना चाहिए.”
क्या कहते हैं झारखंड वासी?
खूंटी ज़िले के रहने वाले ग़ुलाम गौस कहते हैं कि इस चुनाव में यूसीसी को लेकर दिया गया बयान मुस्लिम-आदिवासी मतों को विभाजन करने की ओर एक कोशिश है, जो असफल होने वाली है. इसलिए मुसलमान बहुत चिंतित नहीं हैं.
उन्होंने यह भी दावा किया कि 'आज भी आदिवासी मुसलमानों के साथ हैं कल भी वे हमारे साथ इसका विरोध करेंगे.'
वहीं दुमका के रहने वाले सुनील कुमार मरांडी कहते हैं, “इस चुनाव में यूसीसी को सामने रखकर मुस्लिम को निशाना बनाया जा रहा है. लेकिन इसे लागू किया गया तो भविष्य में ये आदिवासियों के लिए भी ख़तरा है. क्योंकि यूसीसी लागू होने के बाद सीएनटी-एसपीटी एक्ट से भी छेड़छाड़ की संभावना है, ऐसे में हमारी खनिज सम्पदा के छीन लिए जाने का डर भी है. जितना भी दवा किया जाए कि हम आदिवासी इससे बाहर हैं, लेकिन हमें उन दावों पर भरोसा नहीं है.”
जबकि हज़ारीबाग के प्रोफेसर गजेंद्र कुमार सिंह का मानना है कि मौजूदा चुनाव में यूसीसी एक टिकाऊ मुद्दा नहीं है और इसके नाम पर ध्रुवीकरण होने की संभावना भी नहीं दिखाई दे रही है. लेकिन वे साथ ही मानते हैं कि झारखंड में घुसपैठियों की संख्या को कम करने के लिए यूसीसी लागू किया जाना चाहिए.
यूसीसी का विभिन्न धर्म की मान्यता और परंपरा पर क्या असर पड़ेगा?
अगर यूसीसी को लागू किया गया, तो हिंदू विवाह अधिनियम (1955), हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम (1956) जैसे मौजूदा क़ानून, शरीयत क़ानून के तहत मुसलमानों में विवाह, सिखों की शादी संबंधित क़ानून 1909 के आनंद विवाह अधिनियम, पारसी विवाह और तलाक़ अधिनियम 1936, पारसी धर्म में संरक्षकता का क़ानून, ईसाई समाज में विरासत, गोद लेने और उत्तराधिकार संबंधित क़ानून आदि में क्या असर पड़ेगा?
इस सवाल का जवाब देते हुए क़ानून के जानकार अधिवक्ता शादाब अंसारी कहते हैं, "फ़िलहाल यूसीसी मात्र चुनावी जुमला है. इसका कोई ड्राफ़्ट अभी बना नहीं है. इसलिए किस धर्म के लिए यूसीसी कितना बदलाव ला सकता है, अनुमान लगाकर ये कहना बिल्कुल गलत है."
उनका मानना है कि "उत्तराखंड या असम में यूसीसी लागू हुआ, उस पर गौर किया जाए तो उसका ड्राफ्ट हिन्दू लॉ के बेस पर बना है. आइडियली ये होना चाहिए था कि हर धर्म-जाति की पॉजिटिव प्रैक्टिस को यूसीसी में जगह दी जाए."
उदाहरण देते हुए वह कहते हैं कि जैसे 'मुस्लिम लॉ में निकाह के समय काज़ी पहले लड़की से इजाज़त मांगते हैं, उसके द्वारा हाँ किए जाने पर ही लड़के से इजाज़त ली जाती है, तब निकाह की प्रकिया पूरी होती है. यूसीसी में ऐसी शक्ति सभी धर्म की महिलाओं को दी जानी चाहिए.'
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित