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लोकसभा चुनाव: संसद में आदिवासी महिलाओं का प्रतिनिधित्व इतना कम क्यों है?
- Author, प्रेरणा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, रांची से
साल 2022 में द्रौपदी मुर्मू भारत की पहली आदिवासी महिला राष्ट्रपति बनीं.
देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद पर एक आदिवासी महिला का बैठना कई मायनों में ऐतिहासिक था.
इसी का एक दूसरा पहलू ये भी है कि आदिवासी महिला राष्ट्रपति होने के बावजूद, राजनीति में अनुसूचित जनजाति की महिलाओं की हिस्सेदारी काफ़ी कम है.
वर्तमान में देश की संसद में आदिवासी महिलाओं की भागीदारी महज़ 1.8 प्रतिशत है.
इसके पीछे की वजह क्या है और साधारण पृष्ठभूमि से आने वाली आदिवासी महिलाओं के लिए राजनीति में अपनी जगह बना पाना कितना चुनौतिपूर्ण है?
पढ़िए झारखंड के तीन अलग-अलग जगहों से, तीन अलग-अलग आदिवासी महिलाओं की कहानी. ये तीनों महिलाएं राज्य में जल,जंगल, ज़मीन से जुड़े आंदोलनों का मुख्य चेहरा रही हैं.
हमारी इस यात्रा की शुरुआत झारखंड के संथाल परगना क्षेत्र से हुई. हमें यहां मुन्नी हांसदा नाम की एक महिला से मिलना था.
वो दुमका के काठिकुंड में रहती हैं और संथाल के इस क्षेत्र में एक जाना-पहचाना नाम हैं.
वो प्रदेश की उन आंदोलनकारी महिलाओं में शामिल हैं, जो पिछले कई सालों से राज्य की ख़निज संपदा को कॉरपोरेट घरानों से बचाने की लड़ाई लड़ रही हैं और अपनी एक राजनीतिक पहचान बनाना चाहती हैं.
पहली बार उनका नाम सुर्खियों में तब आया था, जब साल 2005-07 में दुमका के काठीकुंड में कोलकाता की एक बड़ी कंपनी अपना पावर प्लांट स्थापित करने वाली थी.
झारखंड की तत्कालीन सरकार के साथ कंपनी ने एमओयू पर हस्ताक्षर भी कर लिए थे पर ग्रामीणों के विरोध और लंबे चले आंदोलन के बाद कंपनी और सरकार दोनों को बैकफुट पर जाना पड़ा.
मुन्नी हांसदा इसी आंदोलन का मुख्य चेहरा बनकर उभरी थीं. उन्होंने कंपनी के प्रस्ताव के ख़िलाफ़ तक़रीबन सात महीने जेल में भी बिताए थे.
इससे पहले वो लंबे समय तक आदिवासियों को पेसा क़ानून, फॉरेस्ट राइट्स, संथाल परगना टेनेन्सी एक्ट के बारे में जागरूक करती रही थीं. कोलकाता की कंपनी के ख़िलाफ़ हुए आंदोलन में मिली जीत शायद इसी का नतीजा था.
मुन्नी हांसदा ने इसके बाद भी कई आंदोलनों का नेतृत्व किया और हक़ के लिए लड़ती रहीं.
बतौर सामाजिक कार्यकर्ता एक सफल पारी खेलने के बाद मुन्नी हांसदा ने जब राजनीति में अपनी किस्मत आज़माने की कोशिश की, तो उन्हें लोगों का अपेक्षित समर्थन नहीं मिला.
वो कहती हैं, ''चुनाव के समय में जिसके पास पैसा है और वो गाँव में पैसा फेंकता है, दारू पिलाता है तो उसको वोट मिल जाता है. हमारे समाज में वोट को लेकर जागरूकता नहीं है. वो नहीं समझते कि किसको जिताने से हमारी आवाज़ लोकसभा या विधानसभा में उठेगा.''
साल 2009 में तृणमूल कांग्रेस, साल 2015 में मार्कसिस्ट कोऑपरेशन और साल 2020 के विधानसभा चुनाव में भी टीएमसी से शिकारीपाड़ा सीट से चुनाव लड़ चुकी हैं. इन तीनों ही पार्टियों का झारखंड में कोई जनाधार नहीं है.
वो मानती हैं कि उनकी जैसी साधारण पृष्ठभूमि से आने वाली महिलाओं के लिए राजनीति में अपने बूते जगह बना पाना बहुत मुश्किल है.
वो बताती हैं, ''इसके पीछे वो दो-तीन मुख्य वजहें हैं. पहला कि कोई भी बड़ी पार्टी आपको टिकट नहीं देती. आपके पास पैसे हों, संसाधन हो, मज़बूत राजनीतिक बैकग्राउंड हो, तभी टिकट मिलने की उम्मीद है लेकिन अगर आपके पास इन तीनों में से कुछ भी नहीं है और आप महिला हैं, तो आपका कुछ नहीं हो सकता.''
इसके बावजूद मुन्नी हांसदा ने आगामी लोकसभा चुनाव में दुमका लोकसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ने की इच्छा जताई है.
वो कहती हैं कि इस सीट से सबसे अधिक बार चुनकर आए शिबू सोरेन आदिवासी समुदाय से ही आते हैं लेकिन उन्होंने आदिवासियों के लिए कुछ काम नहीं किया. वो जानबूझकर आदिवासी युवाओं को वो मौक़े नहीं देना चाहते, जिनके वो हक़दार हैं क्योंकि वो जानते हैं कि अगर उन्होंने इस समुदाय के लोगों का आगे बढ़ाया तो वो राजनीति में भी हस्तक्षेप करेंगे.
इन दिनों मुन्नी हांसदा ग्रामसभा को संबोधित कर आदिवासियों को उनके वोट की अहमियत समझा रही हैं.
उन्हें उम्मीद है कि एक दिन उनके समुदाय के लोगों को ये बात ज़रूर समझ आएगी और वो उनके जैसी महिलाओं पर भरोसा जताएंगे.
वो कहती हैं, ''हमारे यहाँ के आदिवासियों के पास राजनीतिक ज्ञान नहीं है. पैसा पर बिका, वोट दिया दूसरे को, हमको सपोर्ट नहीं किया. आंदोलन में साथ देता है लेकिन चुनाव के वक़्त पैसा पर बिक जाता है, लेकिन हम आज भी लोगों के साथ हैं, आज भी लड़ रहे हैं.''
आदिवासी बहुल राज्यों में आदिवासी महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी
बिहार से अलग होकर झारखंड राज्य का गठन साल 2000 में किया गया.
साल 2000 से 2019 तक इस प्रदेश ने कुल चार लोकसभा चुनाव देखे हैं लेकिन इन चार चुनावों में प्रदेश से चुनकर देश की संसद तक का रास्ता चार महिलाएं भी पूरा नहीं कर सकी हैं.
रही बात आदिवासी महिलाओं की तो आदिवासी बहुल राज्य होते हुए भी इस समुदाय से आने वाली केवल दो महिलाएं ही सदन में प्रवेश कर पाई हैं.
साल 2004 में खूँटी से चुनी गईं सुशीला केरकेट्टा और साल 2019 में सिंहभूम सीट से जीतकर आईं गीता कोड़ा.
गीता कोड़ा झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा की पत्नी हैं, वहीं सुशीला केरकेट्टा प्रदेश से चुनी गईं इकलौती आदिवासी महिला सांसद है, जो साधारण पृष्ठभूमि से ताल्लुक रखती हैं.
झारखंड से इतर हम अगर दूसरे प्रदेशों की बात करें तो मध्य प्रदेश में जनजाती समुदाय की सबसे अधिक आबादी रहती है.
आज़ादी के बाद हुए पहले आम चुनाव से लेकर पिछले 2019 के आम चुनाव तक इस प्रदेश से 12 आदिवासी महिला संसद चुनी गई हैं.
आंध्रप्रदेश, ओडिशा से आठ, महाराष्ट्र-राजस्थान से तीन, छत्तीसगढ़-गुजरात जैसे राज्यों से दो और कर्नाटक-पश्चिम बंगाल से एक-एक आदिवासी महिला सांसद चुनी गई हैं.
डॉ वासवी किड़ो ख़ुद विस्थापन से जुड़े कई आंदोलनों का मुख्य चेहरा रही हैं. किसी बड़ी पार्टी कि तरफ़ से टिकट न मिलने पर साल 2019 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने बतौर स्वतंत्र उम्मीदवार हटिया सीट से चुनाव लड़ा.
वो कहती हैं, ''राजनीतिक दलों का एक करैक्टर जो दिखायी दे रहा है…चाहे झारखंड हो या राष्ट्रीय स्तर पर, वो ये है कि बहुत पढ़ी-लिखी, बहुत संघर्ष की हुई, बहुत काम की हुई औरतें उनको बिल्कुल पसंद नहीं हैं. कम बोलो, कम बात करो, ख़ूबसूरत चेहरा रखो और अच्छी साड़ियाँ पहनों…तो ऐसी औरतों को वो ज़्यादा तवज्जो देते हैं कि भई ये औरतें ज़्यादा मुँह नहीं लगेंगी, ज़्यादा हक़ की बात नहीं करेंगी, ज़्यादा मुद्दे नहीं उठाएंगी''.
आदिवासी महिलाओं की न के बराबर भागीदारी पर वो कहती हैं, ''आदिवासी महिलाओं को टिकट नहीं देते क्योंकि समझते हैं कि इनके पास नॉलेज नहीं है. ये लड़ती ज़्यादा हैं, बोलती हैं, इनके पास में जो बैकग्राउंड होना चाहिए वो नहीं है.''
''उनको सशक्त करना, सही जगह दिलाना ये काम नहीं हो रहा है. राजनीतिक दलों के द्वारा और इसलिए आदिवासी औरतों को ज़्यादा चुनौती फेस करना पड़ रहा है कि वो राजनीति में अपनी जगह बना पाएं.''
हालांकि एक वर्ग मानता है कि दो साल पहले द्रौपदी मुर्मू के राष्ट्रपति चुने जाने के बाद आदिवासी महिलाओं में ये विश्वास पनपा है कि वो भी देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद पर पहुंच सकती हैं. डॉ वासवी किड़ो भी इस बात से सहमत नज़र आती हैं.
उन्होंने कहा, ''निश्चित तौर पर महिलाओं में विश्वास तो आया है और वो इस बात से खुश हैं कि एक आदिवासी महिला देश की राष्ट्रपति हैं लेकिन ये काफ़ी नहीं है. आप एक आदिवासी औरत को बैठाके वन संरक्षण संशोधन अधिनियम में साइन करा रहे हो, पूरे जंगल उजाड़ रहे हो…आदिवासी औरत को बिठाकर आप आदिवासी औरतों को जेल भेज रहे हो तो आदिवासी औरतें ये भी समझ रही हैं.
क्या कहते हैं आंकड़े?
एक बार आंकड़ों की तरफ़ नज़र डालें तो साल 1952 से लेकर साल 2019 तक हुए लोकसभा चुनावों में कुल 51 आदिवासी महिला सांसद चुनी गई हैं.
इनमें सबसे अधिक यानी 30 कांग्रेस पार्टी से चुनकर आई हैं. वहीं भारतीय जनता पार्टी से 12 अनुसूचित जनजाति की महिलाएँ संसद पहुंची हैं. तीसरे नंबर पर ओडिशा की बीजू जनता दल है, जिससे आज तक दो आदिवासी महिला सांसद चुनी गई हैं.
वर्तमान में देश के निचले सदन में 77 महिला सांसद हैं. इनमें से दस आदिवासी समुदाय से आती हैं.
यानी कुल 543 सदस्यों वाले निचले सदन में आदिवासी महिलाओं की भागीदारी महज 1.8 प्रतिशत है.
संसद पहुँचीं ये सभी महिलाएं अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीटों से जीतकर आई हैं, जिनकी संख्या कहने को लोकसभा चुनावों के इतिहास में सबसे अधिक है लेकिन अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित देशभर की 47 सीटों में से अभी भी 20 सीटें ऐसी हैं, जिससे आज तक एक भी महिला उम्मीदवार चुनकर नहीं आईं.
झारखंड की आयरन लेडी के नाम से मशहूर दयामनी बारला की पहचान देश- दुनिया में है…पिछले एक दशक से वो नई और स्थानीय पार्टियों के सहारे चुनावी लड़ाई लड़ रही हैं.
कुछ महीने पहले ही उन्होंने कांग्रेस की सदस्यता ली है. वो खूंटी या लोहरदगा लोकसभा सीट से चुनाव लड़ने की इच्छुक हैं. लेकिन इस बात की संभावना कम ही है कि पार्टी उन्हें टिकट दे.
वो कहती हैं, ''टिकट की गारंटी कोई करे या ना करे, चाहे लोकसभा टिकट की गारंटी करे ना करे, विधानसभा टिकट की गारंटी करे ना करे, लेकिन राजनीतिक हस्तक्षेप में आना है और संघर्ष करना है एक दिन आपको कामयाबी मिलेगा, हमलोग हमेशा बोलते हैं कि लड़ेंगे और जीतेंगे…हमलोगों ने कई आंदोलन लड़ा है और जीता है, बाक़ी आंदोलन भी लड़ेंगे और जीतेंगे.''
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