मुख्य चुनाव आयुक्त के ख़िलाफ़ महाभियोग की तैयारी में विपक्ष, क्या है सीईसी को हटाने की प्रक्रिया

कांग्रेस नेता राहुल गांधी और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार

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मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने के लिए इंडिया गठबंधन उनके ख़िलाफ़ महाभियोग लाने पर विचार कर रहा है. सोमवार को विपक्षी दलों के सांसदों की बैठक में इस पर चर्चा हुई.

शिवसेना (यूबीटी) के सांसद संजय राउत ने कहा कि विपक्ष ने चुनाव आयुक्त के ख़िलाफ़ महाभियोग लाने की तैयारी शुरू कर दी है.

विपक्षी गठबंधन की ओर से ये तैयारी ऐसे समय शुरू हुई है जब पहले ही लोकसभा में विपक्ष के नेता और कांग्रेस सांसद राहुल गांधी चुनाव आयोग पर 'वोट चोरी' का आरोप लगा रहे हैं. रविवार को कांग्रेस और राष्ट्रीय जनता दल ने बिहार के सासाराम से 'वोटर अधिकार यात्रा' की भी शुरुआत की है.

हालांकि, रविवार को मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने प्रेस कॉन्फ़्रेंस कर राहुल गांधी के सवालों का जवाब देते हुए कहा कि उनके आरोप बेबुनियाद हैं.

रविवार को मुख्य चुनाव आयुक्त की प्रेस कॉन्फ़्रेंस के बाद सोमवार को विपक्षी दलों के सांसदों की एक बैठक हुई.

कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल ने अंग्रेज़ी अख़बार द हिंदू को बताया, "उन्होंने (ज्ञानेश कुमार) मुख्य चुनाव आयुक्त की तरह नहीं बल्कि बीजेपी के नेता की तरह बात की."

केसी वेणुगोपाल ने कहा, "पूरी प्रेस कॉन्फ़्रेंस के दौरान उन्होंने नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और अन्य दलों के उठाए सवालों का जवाब नहीं दिया. बल्कि उन्होंने सवाल उठाने के लिए विपक्ष का ही मखौल उड़ाया. क्या ये सीईसी की ड्यूटी है कि वो राजनीति में शामिल हों?"

केसी वेणुगोपाल ने ये भी कहा कि विपक्ष के पास सीईसी के ख़िलाफ़ महाभियोग प्रस्ताव लाने के लिए पर्याप्त संख्याबल है. साथ ही उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के क़ानून के प्रावधानों पर भी सवाल किए.

हालांकि, इन सबके बीच ये जानना ज़रूरी हो जाता है कि भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त को नियुक्त करने और उन्हें पद से हटाने की प्रक्रिया क्या है.

साथ ही ये भी जानते हैं कि सीईसी को लेकर कांग्रेस क्या आरोप लगा रही है और रविवार को अपनी प्रेस कॉन्फ़्रेंस में सीईसी ने क्या कहा.

कांग्रेस के आरोप

वोटर अधिकार यात्रा के दौरान बिहार के गया में राहुल गांधी

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राहुल गांधी ने 7 अगस्त को वोटर लिस्ट में गड़बड़ी को लेकर एक घंटे से ज़्यादा का प्रज़ेंटेशन दिया था.

उन्होंने दावा किया कि लोकसभा चुनावों के साथ-साथ महाराष्ट्र और हरियाणा के विधानसभा चुनावों में भी 'वोटर लिस्ट में बड़े पैमाने पर धांधली' की गई है.

बिहार में हो रहे मतदाता गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर राहुल गांधी और बिहार विधानसभा में विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव चुनाव आयोग पर आरोप लगाते रहे हैं. दोनों नेताओं का कहना है कि ये वोट काटने की साजिश है.

उस वक्त चुनाव आयोग ने उनके आरोपों को 'गुमराह' करने वाला बताया था. चुनाव आयोग का कहना था कि अगर राहुल गांधी 'वोट चोरी' के अपने दावे को सही मानते हैं तो उन्हें शपथ पत्र पर हस्ताक्षर कर देना चाहिए.

हालांकि इसके बाद भी कांग्रेस और विपक्ष चुनाव आयोग पर 'वोट चोरी' का आरोप लगाता रहे. मानसून सत्र के दौरान विपक्ष ने इस पर बहस की मांग भी की.

रविवार को चुनाव आयोग ने क्या कहा?

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार

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इमेज कैप्शन, 17 अगस्त 2025 को नई दिल्ली में प्रेस कॉन्फ़्रेंस के दौरान मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार, चुनाव आयुक्त विवेक जोशी और चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू
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मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने प्रेस कॉन्फ़्रेंस में राहुल गांधी के सवालों का जवाब देते हुए उनके आरोपों को बेबुनियाद करार दिया.

मुख्य चुनाव आयुक्त ने कहा, "इनकी जाँच बिना हलफ़नामा दाख़िल किए नहीं हो सकती है. या तो राहुल गांधी हलफ़नामा दें या फिर देश से माफ़ी माँगें. उन्हें 7 दिनों के अंदर हलफनामा देना होगा या पूरे देश से माफ़ी मांगनी होगी, नहीं तो समझा जाएगा कि ये आरोप (वोटर लिस्ट में गड़बड़ी) बेबुनियाद हैं."

उन्होंने कहा कि "वोट चोरी" जैसे शब्दों का इस्तेमाल करोड़ों मतदाताओं और लाखों चुनाव कर्मचारियों की ईमानदारी पर हमला है.

महाराष्ट्र को लेकर मुख्य चुनाव आयुक्त ने कहा कि समय रहते जब ड्राफ़्ट सूची थी, तो आपत्ति दर्ज क्यों नहीं कराई और नतीजों के बाद ही गड़बड़ी की बात क्यों सामने लाई गई.

बिहार पर उन्होंने कहा, "वहां 2003 में भी एसआईआर हुआ था और उसकी तारीख़ थी 14 जुलाई से 14 अगस्त. तब भी सफलतापूर्वक हुआ था और इस बार भी सफलतापूर्वक हुआ है. एसआईआर प्रक्रिया को चोरी या हड़बड़ी में कराने जैसी बातें कहकर भ्रम फैलाया जा रहा है."

रविवार को चुनाव आयोग की प्रेस कॉन्फ़्रेंस से पहले कांग्रेस और राष्ट्रीय जनता दल ने बिहार के सासाराम से 'वोटर अधिकार यात्रा' की शुरुआत की.

इस दौरान राहुल गांधी ने एक बार फिर आरोप लगाया, कि बीजेपी और चुनाव आयोग मिलकर 'वोट चोरी' कर रहे हैं और 'बिहार में स्पेशल इंटेंसिव रिवीज़न (एसआईआर) वोट चोरी करने की कोशिश' है.

कैसे होती है सीईसी की नियुक्ति?

देश में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने की ज़िम्मेदारी चुनाव आयोग की होती है. इसके प्रमुख यानी मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति भारत के राष्ट्रपति करते हैं.

इसके लिए तीन सदस्यों की एक चयन समिति सिफारिश करती है. इस समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता या लोकसभा में सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी के नेता और केंद्रीय मंत्रिपरिषद के एक सदस्य होते हैं.

चयन समिति को उम्मीदवारों के नामों के प्रस्ताव कैबिनेट सचिव की अगुवाई में एक सर्च कमिटी देती है.

चुनाव आयुक्त की नियुक्ति, उनका कार्यकाल और उन्हें पद से हटाने की प्रक्रिया संविधान के अनुच्छेद 324 और 'मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023' के प्रावधानों के तहत होती है.

इस क़ानून के अनुसार जिन्हें इन पदों पर नियुक्त किया जाता है, उनका अतीत में सरकार में सचिव-स्तर के पदों पर कार्यरत रहना ज़रूरी होता है. साथ ही उनके पास चुनाव प्रबंधन का अनुभव भी होना चाहिए.

इनकी नियुक्ति छह वर्ष के कार्यकाल या 65 वर्ष की आयु तक, जो भी पहले हो, के लिए की जाती है. हालांकि, अगर कोई शख़्स छह साल से पहले 65 साल का हो रहा हो तो उनका कार्यकाल तभी तक रहेगा.

मुख्य चुनाव आयुक्त को वही सुविधाएं और लाभ मिलते हैं जो सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को दिए जाते हैं.

इसी साल फ़रवरी महीने में ज्ञानेश कुमार को मुख्य चुनाव आयुक्त नियुक्त किया गया था. चुनाव आयोग के सदस्यों की नियुक्ति के लिए बने नए क़ानून के तहत पद संभालने वाले वो पहले सीईसी बने थे.

पहले कैसे होती थी नियुक्ति?

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2023 के अधिनियम से पहले चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति चुनाव आयोग (चुनाव आयुक्तों की सेवा शर्तें और कार्य संचालन) अधिनियम 1991 के तहत होती थी. मगर इस अधिनियम में चयन प्रक्रिया को परिभाषित नहीं किया गया था.

नतीजतन राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद की सलाह पर चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति किया करते थे. राष्ट्रपति के पास चुनाव आयुक्तों की संख्या समय-समय पर निर्धारित करने की ताकत होती थी.

पुराने अधिनियम के तहत चुनाव आयुक्तों का वेतन सुप्रीम कोर्ट के जजों के बराबर था.

क्या है सीईसी को पद से हटाने की प्रक्रिया?

संविधान के अनुच्छेद 324(5) में कहा गया है कि मुख्य चुनाव आयुक्त को सिर्फ़ 'सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के समान तरीके और समान आधारों पर' पद से हटाया जा सकता है.

ठीक ऐसी ही व्यवस्था 2023 में आए अधिनियम की धारा 11(2) में भी की गई है.

अनुच्छेद के अनुसार, "किसी अन्य चुनाव आयुक्त या क्षेत्रीय आयुक्त को मुख्य चुनाव आयुक्त की सिफारिश के बिना पद से नहीं हटाया जाएगा."

चुनाव आयोग को राजनीतिक दबाव से सुरक्षित रखने के लिए मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया को जानबूझकर बहुत कठिन बनाया गया है.

साल 2023 में सर्वोच्च न्यायालय ने इस मुद्दे की समीक्षा की और कहा कि चुनाव आयुक्तों को हटाने की प्रक्रिया में बदलाव करने के लिए संवैधानिक संशोधन आवश्यक होगा.

संविधान के अनुच्छेद 124 (4) के अनुसार, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाने की प्रक्रिया बताई गई है, सीईसी को हटाने की कार्रवाई केवल तभी हो सकती है जब "दुर्व्यवहार या अक्षमता सिद्ध हो."

दुर्व्यवहार में भ्रष्ट आचरण या पद के दुरुपयोग जैसी गतिविधियां शामिल हो सकती हैं. समय-समय पर अदालतों ने इसका दायरा बढ़ाया है और इसमें कामों को शामिल किया है जो सीईसी के पद की गरिमा के अनुकूल न हों या फिर ये साबित हो सके कि सीईसी अपने आधिकारिक कर्तव्यों या ज़िम्मेदारियों को निभाने में असफल रहे हों.

मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने की प्रक्रिया शुरू करने के लिए, संसद के दोनों सदनों के सदस्यों को स्पष्ट रूप से दुर्व्यवहार या अक्षमता का आरोप लगाते हुए एक प्रस्ताव लाना होगा.

प्रस्ताव स्वीकार होने के बाद, आरोपों की वैधता की जाँच की जाती है. इसके लिए एक समिति का गठन किया जाता है.

सीईसी को पद से हटाने के लिए प्रस्ताव को संसद के दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत से पारित होना ज़रूरी है. सदन में प्रस्ताव के पारित होने के बाद सीईसी को हटाने के आदेश पर राष्ट्रपति को अंतिम मुहर लगानी होती है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित