ईद-उल-अज़हा: इस्लाम, यहूदी, ईसाई और हिंदू धर्म में पशुबलि क्यों दी जाती है

    • Author, ओर्ची ओतोन्द्रिला
    • पदनाम, बीबीसी न्यूज़ संवाददाता

इस्लाम मानने वालों के लिए शनिवार से ईद-उल-अज़हा यानी बकरीद या क़ुर्बानी का त्योहार शुरू हो रहा है. इस दिन मुसलमान याद करते हैं कि पैग़म्बर इब्राहिम अपना बेटा अल्लाह को क़ुर्बानी में देना चाहते थे लेकिन अल्लाह ने उन्हें रोक कर कहा कि वो बेटे के बजाय भेड़ की क़ुर्बानी दें.

इब्राहिम को ईसाई और यहूदी धर्म में अब्राहम के नाम से जाना जाता है.

माना जाता है कि पैग़म्बर इब्राहिम ने एक रोज़ सपना देखा कि अल्लाह ने उनसे कहा है कि वो उनके प्रति अपनी वफ़ादारी स्थापित करने के लिए अपने बेटे इस्माइल की बलि दें.

पैग़म्बर इब्राहिम ने इस सपने को अल्लाह का संदेश माना और अपने बेटे से इसके बारे में बात की. उनके बेटे ने कहा कि उन्हें अल्लाह के आदेश का पालन करना चाहिए.

जब इब्राहिम अपने अल्लाह के लिए बेटे की बलि देने ही जा रहे थे अल्लाह ने उन्हें रोक दिया. अल्लाह ने कहा कि उनका इरादा इम्तेहान लेने का था और बेटे की कुर्बानी देने की ज़रूरत नहीं है. अल्लाह ने उन्हें एक रैम (भेड़) दी और कहा कि वो बेटे के बजाय इस पशु की क़ुर्बानी दें.

कुर्बानी देने की ये परंपरा इस्लाम के उद्भव से पहले से चली आ रही है.

दुनिया भर में मुसलमान धार्मिक भावनाओं के कारण अलग-अलग तरह के पशुओं की बलि देते रहे हैं. पारंपरिक तौर पर अगर किसी व्यक्ति के पास उसकी ज़रूरत से अधिक संपत्ति है तो बलि बाध्यकारी होती है.

लेकिन दूसरे धर्म पशुबलि के बारे में क्या कहते हैं? यहूदी, ईसाई और हिंदू धर्म में पशुबलि को कैसे देखा जाता है?

यहूदी धर्म

इस्लाम के इतिहास और यहूदियों और ईसाइयों के इतिहास में काफी समानताएं हैं.

ब्रिटेन के लियो बेक कॉलेज में अकादमिक सेवाओं के प्रमुख रब्बी गैली सोमर्स कहते हैं कि यहूदियों के धर्मग्रंथों में कई तरह की बलियों का ज़िक्र है. इसके लिए विशिष्ट समय और विशिष्ट जगह का भी ज़िक्र है.

वो कहते हैं, "आजकल हम लोग बलि देने की इस सब प्रथाओं का पालन नहीं करते क्योंकि जिन जगहों पर बलि दी जाती थी वो अब मौजूद नहीं है. बलि देने की बजाय हम अपनी प्रार्थना में बलि की बात याद करते हैं."

रब्बी डॉक्टर ब्रैडली शेविट आर्टसन अमेरिकन ज्यूइश यूनिवर्सिटी के उपाध्यक्ष हैं. वो ज़िग्लर स्कूल ऑफ़ रब्बिनिक स्टडीज़ से भी जुड़े हैं.

वो कहते हैं, "रोमन लड़ाकों के दूसरे टेम्पल को नष्ट करने के वक्त से यहूदी धर्म में पशुबलि की इजाज़त नहीं है. कई लोगों का माना है कि इस पर हमेशा के लिए रोक लग गई है जबकि कई लोग ये मानते हैं कि मसीहा का अवतार होने के बाद इस परंपरा को फिर से मनाने का चलन शुरू होगा."

अधिकांश यहूदी अब पशुबलि की परंपरा का पालन नहीं करते लेकिन समरियाई जैसे यरूशलम के कुछ समूह अभी भी पासओवर त्योहार के दौरान इस प्रथा का पालन करते हैं. वहीं कुछ और समूह पशु की क़ीमत जितनी रक़म दान में देते हैं.

बलि चाहे भेड़, भैंस या फिर बकरे की हो, वो जानवर बलि के लिए धार्मिक तौर पर उपयुक्त यानी 'कोशर' होना चाहिए.

हिब्रू भाषा में 'कोशर' का मतलब होता है 'तैयार' या खाने के लिए उपयुक्त. वो खाद्य पदार्थ जो यहूदियों के आहार से जुड़े नियमों के अनुसार होते हैं, कोशर खाद्य पदार्थ कहलाते हैं.

बलि के इतिहास के बारे में डॉक्टर आर्टसन कहते हैं, "केवल उन्हीं जानवरों की बलि दी जा सकती थी जो कोशर हों. कुछ को बलि की वेदी पर जला दिया जाता था, कुछ को पुजारी के परिवारों को दे दिया जाता था और कुछ को बलि देने वाले लोग और उनके परिवार के लोग खुद खाया करते थे."

वक्त के साथ बलि देने की प्रथा कम होती गई है लेकिन अभी भी मीट खाना कई त्योहारों का अहम हिस्सा बना हुआ है.

पशु बलि के लिए यहूदियों के अलग-अलग तरह के धार्मिक अनुष्ठान हैं और ये बलि के उद्देश्य के हिसाब से अलग-अलग होते हैं.

पहले यहूदी धर्म में तीन धर्मिक त्योहार होते थे, जो पशु बलि के लिहाज़ से महत्वपूर्ण थे. ये त्योहार थे- पेस्साह (पासओवर), शावोत (सप्ताहों का त्योहार) और सुक्कोट (झोपड़ियों का त्योहार).

रब्बी गैरी सोमर्स बताते हैं कि रोश हशनाह (यहूदी नव वर्ष) और योम किप्पुर (प्रायश्चित का दिन) जैसे अन्य त्योहारों में भी पशु बलि दी जाती थी.

यहूदी धर्मग्रंथों में पैग़म्बर अब्राहम की कु़र्बानी की कहानी भी मिलती है. हालांकि इनमें पशुओं की बलि देने का आदेश बाद में आया था और ये यहूदियों के लिए थोड़ा अलग था.

ईसाई धर्म

ईसाई धर्म की जड़ें यहूदी धर्म में हैं और यहूदी धर्मग्रंथों में काफी कुछ ऐसा है जिनका ज़िक्र बाइबल के ओल्ड टेस्टामेन्ट में मिलता है.

बांग्लादेश के ढाका में मौजूद कफ़रुल कैथलिक चर्च के पादरी डॉक्टर प्रशांतो टी रीबेरो कहते हैं, "ओल्ड टेस्टामेन्ट की क़िताबों में, ख़ासकर लेविटिकस 17 और ड्युटरोनॉमी में विस्तार से बताया गया है कि पशु बलि कैसे दी जाती थी. अलग-अलग त्योहारों में अक्सर सवेरे या शाम को पशु बलि दी जाती थी."

उस समय नकारात्मतक प्रवृत्तियों के लिए माफ़ी और पछतावे के लिए पशुबलि दी जाती थी.

लेकिन धार्मिक तौर पर इस प्रथा का पालन करना ख़त्म हो गया क्योंकि यीशू मसीह की मौत को सबसे बड़ी बलि के रूप में देखा जाता है. यीशू मसीह को ईसाई धर्म में 'ईश्वर के मेमने' के तौर पर देखा जाता है.

डॉक्टर रीबेरो कहते हैं कि हालांकि बलि के लिए कोई धार्मिक प्रावधान नहीं है, लेकिन कई मामलों में "अगर कोई ईश्वर से वादा करता है या फिर उनसे कोई मन्नत मांगता है तो वो बलि देता है. इस तरह अलग तरीके से पशुबलि दी जाती है."

वो कहते हैं कि यहूदियों के साथ संबंध के अलावा ईसाई धर्म में ईश्वर के नाम पर जानवरों की बलि को लेकर कोई ख़ास प्रथा नहीं है.

हालांकि ईसाई धर्म में मीट खाने को लेकर किसी तरह की कोई रोक-टोक नहीं है.

कई मुल्कों में यहूदियों के पासओवर त्योहार के दौरान परंपरागत रूप से मीट खाया जाता है.

रीबेरो कहते हैं कि उन्होंने अपनी इटली यात्रा के दौरान देखा कि ईस्टर त्योहार से पहले मेमने का मीट खाना लगभग बाध्यकारी था.

हालांकि धार्मिक उद्देश्यों के कारण जिस तरह यहूदी धर्म में पशुबलि है, उस तरह ईसाई धर्म में क़ुर्बानी को लेकर कोई प्रथा नहीं है.

हिन्दू धर्म

हिंदू धर्म में पशुबलि के मुद्दे पर विवाद है, लेकिन हिंदुओं में कुछ वर्ग पशुबलि की प्रथा का पालन करते हैं.

उदाहरण के तौर पर, भारत और बांग्लादेश के कई हिस्सों में दुर्गा पूजा और काली पूजा जैसे धार्मिक अनुष्ठानों के दौरान पशुबलि दी जाती है.

बांग्लादेश की चिटगांव यूनिवर्सिटी के संस्कृत विभाग में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर डॉक्टर कुशल वरन चक्रवर्ती कहते हैं, "हिंदुओं की कई धर्मिक किताबों जैसे रामायण और महाभारत और पुराण जैसे पवित्र ग्रंथों में पशुबलि का ज़िक्र है."

"हिंदू धर्म में प्राचीन माने जाने वाले ग्रंथ ऋग्वेद में इस बात का ज़िक्र किया गया है कि जिस पशु की बलि दी जाती है वो बंधन से मुक्त हो जाता है."

माना जाता है कि 500 ईसा पूर्व से लेकर 1500 ईसा पूर्व तक पशुबलि सामान्य हुआ करती थी. बलि दिए गए पशु का मांस पहले ईश्वर को चढ़ाया जाता था जिसके बाद भोज में लोग उसे खाते थे. हालांकि आधुनिक भारत में पशुबलि की प्रथा को लेकर जानकारों की राय अलग-अलग है.

डॉक्टर चक्रवर्ती कहते हैं, "कुछ प्राचीन मंदिरों में आज भी पशुबलि देने की प्रथा है."

वो बांग्लादेश में ठाकेश्वरी और भारत में त्रिपुरा सुंदरी, कामाख्या और कालीघाट काली मंदिरों का उदाहरण देते हैं.

हालांकि हिंदू धर्म की एक और जानकार डॉक्टर रोहिणी धर्मपाल कहती हैं कि उन्हें व्यापक स्तर पर आधुनिक भारत में पशुबलि की प्रथा की कोई जानकारी नहीं है.

डॉ. चक्रवर्ती कहते हैं कि हिंदू धर्म में पशुबलि की आधुनिक प्रथाओं की वजह अक्सर आत्म-संतुष्टि, प्रतियोगिता और भोग विलास से होता है, न कि उसका आध्यात्मिक महत्व. वे कहते हैं कि उनका मानना है कि इस तरह इसकी पवित्रता कम हो जाती है.

भारत में कई समूहों ने स्वेच्छा से विभिन्न मंदिरों में पशुबलि बंद कर दी है और ये समूह धार्मिक उद्देश्यों से पशुबलि पर प्रतिबंध लगाने का समर्थन करते हैं.

श्रीलंका हिंदुओं के पशुबलि देने पर प्रतिबंध लगाया गया है.

नेपाल में कई लोगों ने स्वेच्छा से त्योहारों के दौरान पशुओं की बलि बंद कर दी है.

पूर्व में हिंदू राज्य का हिस्सा रहा नेपाल अब एक स्वतंत्र सार्वभौम गणतंत्र है. यहां पशुबलि पर प्रतिबंध नहीं लगाया गया है.

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