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मुस्लिम बहुल देश जहाँ स्कूली छात्राओं को है हिजाब की मनाही
- Author, ऐसिम्बात तोकोयेवा
- पदनाम, बीबीसी वर्ल्ड सर्विस
कज़ाख़स्तान उन चुनिंदा मुस्लिम बहुल देशों में से एक है जिन्होंने स्कूली छात्राओं के हिजाब पहनने पर पाबंदी लगाई है.
साल 2016 में लगी पाबंदी पर अभी भी बहस जारी है. धर्म के प्रति गहरी आस्था रखने वाले कुछ माता-पिता अभी भी अपने बच्चों की शिक्षा के संवैधानिक अधिकार के बचाव की कोशिश में जुटे हुए हैं.
ये बहस कज़ाख़स्तान में पहचान की तलाश को दिखाती है, जहां देश की लीडरशिप इस्लाम को लेकर प्रतिबद्धता दिखाते हुए, अभी भी सोवियत संघ के समय से चले आ रहे धर्म पर नियंत्रण को कमज़ोर पड़ने देने के लिए तैयार नहीं है.
करागंडा में रहने वाली 13 साल की अनेलया का प्रतिष्ठित नज़रबायेव इंटलेक्चुअल स्कूल (एनआईएस) में दाख़िला लेने का सपना पूरा हो गया है. वह सातवीं कक्षा में पढ़ रही हैं. इस स्कूल का नाम कज़ाख़स्तान के पूर्व राष्ट्रपति नूरसुल्तान नज़रबायेव के नाम पर पड़ा है. अनेलया का सपना भी उनके नक्शेकदम पर चलते हुए देश की पहली महिला राष्ट्रपति बनना है.
लंबी, दुबली अनेलया ने स्थानीय और राष्ट्रीय स्तर की एकेडमिक प्रतियोगिताओं में बेहतर प्रदर्शन दिखाया. वह 800 प्रतिभागियों में 16वें नंबर पर रहीं. एनआईएस ने वादा किया है कि उनके पसंदीदा विषयों को और गहराई से पढ़ाया जाएगा.
बीती अगस्त में वह एनआईएस की तैयारी करने के लिए क्लास करने गईं. लेकिन एक दिन उनके माता-पिता को फ़ोन कर के स्कूल आने को कहा गया. यहां उन्हें बताया गया कि उनकी बेटी अब यहां नहीं पढ़ सकती.
कारण अनेलया का हिजाब था, जो उन्होंने 13 साल की उम्र में ही पहनना शुरू किया था. इस्लाम की परंपरा के अनुसार यौवनावस्था में आते ही लड़कियों को सिर ढंकना ज़रूरी होता है.
अनेलया कहती हैं, "जब मैं हिजाब पहनकर गई, मुझे ऐसा नहीं लगा कि मैं दूसरों से अलग हूं. वो सिर्फ़ एक कपड़ा था. इसका मेरी पढ़ाई या अन्य छात्रों के साथ मेरे रिश्तों पर कोई असर नहीं हो रहा था. मेरे सहपाठियों को भी इससे कोई दिक्कत नहीं थी."
कज़ाख़स्तान की आबादी
साल 2022 की जनगणना के अनुसार कज़ाख़स्तान में मुसलमानों की आबादी सबसे अधिक है.
यहां 69 फ़ीसदी लोग मुसलमान हैं. हालांकि, कई अन्य अध्ययन और शोध के अनुसार कज़ाख़स्तान में एक तिहाई ही ऐसे लोग हैं जो धर्म का कड़ाई से पालन करते हैं.
राष्ट्रपति कासिम जोमार्त तोकायेव खुलकर इस्लाम को लेकर अपनी प्रतिबद्धता दिखाते आए हैं. वह साल 2022 में मुस्लिमों के सबसे पवित्र धर्मस्थल मक्का गए थे और उन्होंने पिछले साल रमज़ान में अपने घर पर सरकारी अधिकारियों और चर्चित हस्तियों के लिए इफ़्तार का भी आयोजन किया था. हालांकि, संवैधानिक तौर पर कज़ाख़स्तान एक धर्मनिरपेक्ष देश है.
अनेलया की तरह ही करागंडा में रहने वाली दर्जनों छात्राओं को इसी तरह की समस्या का सामना करना पड़ा. ये कज़ाख़स्तान का एक इंडस्ट्रियल शहर है जहां रूसी भाषा बोलने वालों की संख्या अधिक है. बीते साल अक्टूबर में ये बात सामने आई थी कि 47 स्कूली छात्राओं के माता-पिता को कज़ाख़स्तान में शिक्षा से जुड़े क़ानूनों के तहत तय ज़िम्मेदारियां पूरी करने में विफल रहने की वजह से सिविल मुकदमों का सामना करना पड़ रहा है.
साल 2016 में शिक्षा मंत्रालय ने एक निर्देश जारी किया जिसमें कहा गया, "स्कूल की वर्दी के साथ किसी भी तरह के धार्मिक पहचान वाले कपड़े पहनने की मंज़ूरी नहीं है."
कई माता-पिता और मानवाधिकार के लिए आवाज़ उठाने वाले कार्यकर्ताओं की नज़र में स्कूलों का शिक्षा मंत्रालय के निर्देश को नागरिकों को मुक़्त शिक्षा का अधिकार देने वाले कज़ाख़स्तान के संविधान से ऊपर रखना अस्वीकार्य है.
अनेलया के पिता ने अभियोजक कार्यालय और शिक्षा मंत्रालय से इस मामले में स्पष्टीकरण मांगा, लेकिन अभी तक उनके हाथ खाली हैं.
बच्चियों के हिजाब पहनने पर माता-पिता को मिलने वाली सज़ा के ये मामले सालों से पूरे देश में कई बार सामने आए हैं. साल 2018 में देश के अकतोब क्षेत्र में स्कूल की यूनिफॉर्म से जुड़े नियमों का ठीक से पालन न करने पर एक बच्ची के माता-पिता पर जुर्माना लगाया गया. वहीं, अकमोला क्षेत्र में ज़िला प्रशासन ने इसी तरह के एक मामले को सुलझाने के लिए एक आयोग बनाया था.
इस तरह के मामलों में परिवारों की मदद करने वाले मानवाधिकार कार्यकर्ता ज़ासुलन एतमागमबेतोव ने कहा, "ऐसे बहुत से मामले हैं जहाँ स्कूल प्रशासन के दबाव में लड़कियों को हिजाब हटाना पड़ा."
"कुछ ने विरोध किया लेकिन कुछ ने क्लास में आना बंद कर दिया. ये दबाव धर्म के अनुयायियों की संख्या क्लास में घटाने का एक तरीका है."
क्या कहती है सरकार?
स्कूल में हिजाब के सवाल पर कज़ाख़स्तान की सरकार देश के धर्मनिरपेक्ष होने पर ज़ोर देती है, जिसकी गारंटी संविधान में है.
राष्ट्रपति तोकायेव ने बीते अक्टूबर में कहा, "हमें ये हमेशा याद रखना चाहिए कि स्कूल सबसे पहले एक शैक्षिक संस्थान है जहां बच्चे शिक्षा लेने के लिए आते हैं. मेरा मानना है कि एक बार ये बच्चे जब बड़े हो जाएं और दुनिया देखने का उनका एक नज़रिया हो, तब उन्हें अपनी पसंद-नापसंद तय करनी चाहिए."
अल्माती के इंस्टीट्यूट ऑफ़ फ़िलॉसफ़ी में पॉलिटिकल साइंस एंड रिलिजियस स्टडीज़ में शोधार्थी असीलते तसबोलत ने कहा, "विशेषज्ञों या अधिकारियों के बीच धर्मनिरपेक्ष देश के अर्थ को लेकर कोई स्पष्ट या ठोस परिभाषा नहीं है."
वह कहते हैं, "हमारा समाज अभी परिपक्व नहीं है और हर पक्ष की बहस में धर्मनिरपेक्षता की व्याख्या अपने-अपने हिसाब से की गई है. कुछ नागरिकों के लिए धर्मनिरपेक्षता का मतलब नास्तिकता है."
कई देशों में प्रतिबंध
कई देशों ने महिलाओं के हिजाब पहनने पर पाबंदी लगाई है. आमतौर पर ये प्रतिबंध चेहरा ढंकने वाले नकाब पर है न कि सिर ढंकने वाले हिजाब पर. हालांकि, किसी मुस्लिम बहुल देश में इस तरह के प्रतिबंध बेहद कम देखने को मिलते हैं लेकिन इन देशों में कज़ाख़स्तान के पड़ोसी उज़्बेकिस्तान और ताजिकिस्तान शामिल हैं.
कज़ाख़स्तान में धर्म को सरकार के नियंत्रण में रखने का चलन सोवियत संघ के समय से बना हुआ है. इससे पहले पांच मध्य एशियाई देशों में धार्मिक मामलों की निगरानी 1943 में स्थापित स्पिरिचुअल एडमिनिस्ट्रेशन ऑफ़ मुस्लिम्स ऑफ़ सेंट्रल एशिया के ज़िम्मे थी. इस संगठन को धार्मिक गतिविधियों के दमन के मकसद से बनाया गया था.
आज़ादी के बाद कज़ाख़स्तान के प्रशासन ने धर्म मानने वालों को सज़ा देना बंद कर दिया. इससे धर्म से अधिक लोग जुड़ने लगे और मस्जिदें बनने लगीं. सोवियत काल में सिर्फ़ दर्जनभर के आसपास मस्जिदें हुआ करती थीं, जिनकी संख्या आज करीब 3000 तक पहुंच गई हैं.
लेकिन स्पिरिचुअल एडमिनिस्ट्रेन ऑफ़ मुस्लिम्स की जगह अब डीयूएमके (स्पिरिचुअल एडमिनिस्ट्रेशन ऑफ़ द मुस्लिम्स ऑफ़ कज़ाख़स्तान) ने लेली. ये सरकार समर्थित एक इकाई है जिसे इस्लाम के उस पारंपरिक रूप को बढ़ावा देना है जो कज़ाख़स्तान की संस्कृति और एक धर्मनिरपेक्ष देश के सिद्धांतों के अनुरूप हो.
कज़ाख़स्तान की सरकार के लिए धर्म पर नियंत्रण राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा मुद्दा है. शोधकर्ताओं का कहना है कि साल 2005 से अफ़ग़ानिस्तान-पाकिस्तान क्षेत्र और सीरिया और इराक़ में हुए इस्लामी आंदोलनों के प्रभाव में आकर, कज़ाख़स्तान में भी धार्मिक कट्टरपंथियों की ओर से हिंसा के मामले बढ़े हैं.
साल 2011 में कज़ाख़स्तान में पहली बार आत्मघाती हमला हुआ और साल 2016 में एक सैन्य अड्डे और हथियारों की दुकान पर हुए सशस्त्र हमले में 25 लोगों की जान गई. तत्कालीन राष्ट्रपति नूरसुल्तान नज़रबायेव ने घोषणा की थी कि हमलावर इस्लाम की सलाफ़ी शाखा के अनुयायी थे.
इसके बाद के सालों में सरकार ने धार्मिक आस्थाओं से जुड़े कई मामलों में प्रतिबंध लगाए. इसमें धार्मिक समुदायों का पंजीकरण करने कानूनी बाध्यता और अपने घरों में धार्मिक आयोजनों पर रोक भी शामिल थे.
सरकार इन प्रतिबंधों के बचाव में ये तर्क देती है कि इससे देश को 'कट्टर' विचारों से बचाया जा सकेगा लेकिन मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि ये क़ानून धर्म को मानने वालों के अधिकारों को सीमित करते हैं और देश को धार्मिक मुद्दों पर सख्ती से नियंत्रण का हक़ देते हैं.
'हिजाब पर प्रतिबंध का इरादा नहीं'
बीते साल अक्तूबर में, सरकार ने सरकार ने घोषणा की थी कि वह आतंकवाद और धार्मिक चरमपंथ को बढ़ावा देने के ख़िलाफ़ क़ानून लाएगी. संस्कृति और सूचना मंत्री एडा बलायेवा के अनुसार ये क़ानून सार्वजनिक जगहों पर नक़ाब या अन्य किसी भी तरह से चेहरा ढंकने पर प्रतिबंध लगाएगा. उन्होंने कहा कि सरकार का हिजाब पर प्रतिबंध लगाने का कोई इरादा नहीं है.
जहां तक बात अनेलया की है तो हिजाब पर स्कूल से कई बार फटकार लगने के बाद अब उन्हें निष्कासित कर दिया गया है. उनके पिता बोलात मसिन का मानना है कि उनकी बेटी का निष्कासन क़ानून के ख़िलाफ़ है. उन्होंने अपनी बेटी को स्कूल से निष्कासित किए जाने के निर्देश के ख़िलाफ़ केस दर्ज कराया है. उन्होंने अपनी बेटी को वापस स्कूल बुलाने और उनको हुई क्षति के एवज़ में मुआवज़े की मांग भी की है.
वह कहते हैं, "अधिकारियों ने हमें या तो एक से दूसरी जगह भटकाया या फिर कहा कि हिजाब हटाएं. हमें सरकार से स्पष्ट जवाब चाहिए. हमें एक धार्मिक व्यक्ति होने के नाते क्या करना चाहिए, क्या नहीं, इसपर दिशानिर्देश दे दीजिए. हमें इस च्वाइस के साथ मत छोड़िए, जिसमें समाज में जीने के लिए धर्म को छोड़ना हो."
एनआईएस स्कूल प्रशासन ने अनेलया के निष्कासन पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया. इस ख़बर को छापते वक्त तक शिक्षा मंत्रालय ने बीबीसी के सवालों का जवाब नहीं दिया है.
डीयूएमके ने सरकार की आलोचना किए बगैर टिप्पणी की है. उसने कहा है कि शरिया में लड़कियों के यौवनावस्था में पहुंचने पर उनका हिजाब पहनना ज़रूरी है. डीयूएमके ने उम्मीद जताई कि सरकार इन तर्कों पर ध्यान देगी.
मानवाधिकार कार्यकर्ता ज़ासुलन एतमागमबेतोव कहते हैं कि करांगडा में धर्म के अनुयायी परिवारों के पास उनकी बच्चियों को पढ़ाने का कोई विकल्प नहीं है. देश के अन्य हिस्सों में कई प्राइवेट गर्ल्स स्कूल हैं लेकिन इसकी फ़ीस एक साल में 1500 डॉलर (सवा लाख रुपये के आसपास) से भी अधिक है. कज़ाख़स्तान में नौ मदरसे भी हैं, लेकिन इनमें से कुछ लड़कियों को दाख़िला नहीं देते.
ज़ासुलन एतमागमबेतोव कहते हैं, "हम लगातार ये मामला उठा रहे हैं. वे हिजाब बैन की बात करते हैं लेकिन शिक्षा पाने की वैकल्पिक व्यवस्था के बारे में नहीं बताते."
अनेलया के एनआईएस से निष्कासन के बाद उनके माता-पिता को ऑनलाइन रूसी भाषा बोलने वाला एक ट्यूटर मिला है. लेकिन अगर अनेलया स्कूल वापस जाने के लिए अपना हिजाब हटाने का तय करती हैं, तो उनके पिता कहते हैं कि परिवार बेटी का साथ देगा.
अनेलया कहती हैं, "मैं बहुत से ऐसे लोगों को जानती हूं जो कहते हैं हिजाब हटा दो, इसमें कौन सी बड़ी बात है. स्कूल वापस जाओ. लेकिन ये मेरे साथ कभी नहीं हुआ. हिजाब मेरा हिस्सा है."
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