इस्लाम में जानवरों की क़ुर्बानी कैसे शुरू हुई?

    • Author, सैदुल इस्लाम
    • पदनाम, बीबीसी न्यूज बांग्ला

इस्लाम के विद्वानों का कहना है कि मक्का में हर साल क़ुर्बानी दी जाती थी लेकिन मक्का में रहने वाले उस समय विभिन्न देवी-देवताओं के नाम पर क़ुर्बानी देते थे.

इस्लाम के पैग़म्बर हज़रत मोहम्मद साहब के उस दौरान मक्का में रहने के बावजूद वो इस रिवाज का पालन नहीं करते थे.

पैग़म्बरी हासिल करने के लगभग 13 साल बाद मदीना में हिजरत (622-23 ईस्वी) के बाद औपचारिक रूप से क़ुर्बानी की प्रथा शुरू हुई.

इस्लामिक फ़ाउंडेशन के हलाल सनद डिवीज़न के उप-निदेशक मौलाना अबू-सालेह पटवारी ने बीबीसी बांग्ला से कहा, "इस्लाम के कई रीति-रिवाज रसूल (हज़रत मोहम्मद साहब) के मदीना आने के बाद लागू हुए. उन्होंने जब इस्लाम का प्रचार करना शुरू किया तो मक्का के लोगों के बीच एकता स्थापित करना ही सबसे पहला काम था. उनके मदीना हिजरत से लौटने के बाद इस्लाम के नियम जारी किए गए."

हिजरी के दूसरे वर्ष में रोज़ा रखने और ईद-उल-फ़ितर त्योहार मनाने की शुरुआत की गई थी.

हालांकि उसके पहले से ही मदीना के लोग लगभग इसी तरह के उत्सव और रोज़ा का पालन करते थे.

ढाका विश्वविद्यालय में इस्लामी इतिहास और संस्कृति विभाग के प्रोफ़ेसर मोहम्मद अताउर रहमान मियाजी का कहना है कि ईद की शुरुआत हिजरी के दूसरे साल से हुई थी.

बांग्लादेश के राष्ट्रीय विश्वकोश बांग्लापीडिया में पैग़ंबर मोहम्मद के अनस नामक एक साथी की ओर से सुनाई गई हदीस का हवाला देते हुए बताया गया है कि नबी ने मदीना जाने के बाद देखा कि वहां के लोग साल में दो बड़े उत्सव मनाते हैं.

उन्होंने तब जानना चाहा कि वो कौन से उत्सव हैं. वो उत्सव थे नौरोज और मिहिरजान. स्थानीय लोग धर्म और गोत्र के रीति-रिवाज के मुताबिक़ इनमें से एक को शरद ऋतु में मनाते थे और दूसरे को वसंत ऋतु में.

प्रोफ़ेसर मियाजी कहते हैं, "उसके बाद फिर उन दो उत्सवों की तर्ज़ पर मुसलमानों के लिए एक साल में दो धार्मिक, सामाजिक और राष्ट्रीय उत्सव शुरू किए गए."

उन दो ईदों में से एक ईद हज के दौरान मनाई जाती थी जिसे ईद-उल-अज़हा के नाम से जाना जाता है.

हालाँकि इसके बारे में सटीक जानकारी उपलब्ध नहीं है कि इस्लाम के प्रसार के बाद पहली क़ुर्बानी कब और कैसे दी गई.

कुछ इतिहासकारों का कहना है कि हज़रत मोहम्मद साहब ने मदीना आने के बाद पहले अपने हाथों से दो दुम्बाओं की क़ुर्बानी दी थी. उन्होंने तब कहा था कि इनमें से एक मेरी ओर से है और दूसरा उम्मत की ओर से.

मौलाना मोहम्मद अबू-सालेह पटवारी कहते हैं, "इस्लाम में कई चीज़ें पिछले पैग़म्बरों की परंपराओं के मुताबिक़ की गई हैं. मिसाल के तौर पर शुरू में बैतुल मुक़द्दस (यरूशलम स्थित मस्जिद-ए-अक़्सा) की ओर रुख़ करके नमाज़ पढ़ी जाती थी. लेकिन बाद में एक और पैग़म्बर हज़रत इब्राहीम के आदर्श के मुताबिक़ काबा (मक्का स्थित) की ओर रुख़ करके नमाज़ पढ़ी जाने लगी. क़ुर्बानी का मामला भी इसी तरह आया है."

उनका कहना है कि इस्लाम के पवित्र ग्रंथ क़ुरान और हदीस (हज़रत मोहम्मद के बयान) के मुताबिक़, हज़रत आदम (इस्लामी विश्वास के अनुसार दुनिया पर आने वाले पहले व्यक्ति) से क़ुर्बानी की शुरुआत हुई है.

हालांकि, क़ुर्बानी के निर्देश सूरह कौसर और सूरह हज में मिलते हैं. यह सूरह कौसर पैग़ंबर के मक्का में रहने के दौरान हिजरत से पहले प्रकट हुआ था. माना जाता है कि सूरा हज मक्का और मदीना में अवतरित हुआ था.

इन दोनों में क़ुर्बानी का निर्देश दिया गया है.

पटवारी का कहना था, "इससे पता चलता है कि हज़रत मोहम्मद साहब के मक्का में रहने के दौरान ही क़ुर्बानी का मामला सामने आया था. लेकिन इस बात का कोई सटीक तथ्य नहीं मिलता कि उन्होंने पहली बार क़ुर्बानी कब दी थी."

"तिर्मिज़ी हदीस में ज़िक्र है कि अब्दुल्लाह इब्न-ए- उमर ने कहा है कि हिजरत के बाद पैग़बर मोहम्मद ने 10 साल मदीना में रहते हुए हर साल क़ुर्बानी दी है. अनस इब्न-ए-मालिक ने कहा है कि पैग़ंबर मोहम्मद ने दो सींग वाले भेड़ों की क़ुर्बानी देते हुए कहा था कि एक उनकी ओर से है और एक उनकी उम्मत की ओर से."

पटवारी बताते हैं कि एक अन्य हदीस में कहा गया है कि वो हमेशा दो भेड़ों की क़ुर्बानी देते थे.

विद्वानों का कहना है कि उस समय क़ुर्बानी का मुद्दा काफ़ी हद तक हज पर केंद्रित था.

हज या उमरा करने के लिए जाने वाले लोग कु़र्बानी के लिए ऊंट या दुम्बा जैसे पशुओं को अपने साथ ले जाते थे. इन पशुओं को हादी कहा जाता था.

ढाका विश्वविद्यालय में इस्लामिक इतिहास और संस्कृति विभाग के प्रोफ़ेसर मोहम्मद अताउर रहमान मियाजी बीबीसी बांग्ला से कहते हैं, "जब पैग़ंबर छठी हिजरी या 628 ईस्वी में उमरा के लिए निकले तो हुदैबिया (एक जगह का नाम) में रोके जाने पर वह एक तंबू में रुके थे. हुदैबिया का समझौता होने के बाद उन्होंने अपने और अपने परिवार के लिए ऊंट की क़ुर्बानी दी थी. कहा जाता है कि उन्होंने तब 63 ऊंटों की क़ुर्बानी दी थी."

उस समय इस्लाम के रीति-रिवाजों में ऊंट, भैंस, गाय, बकरी, भेड़ और बकरियों की क़ुर्बानी देने की जानकारी मिलती है.

इस मुद्दे पर मौलाना मोहम्मद अबू सालेह पटवारी बताते हैं, "छठी हिजरी में उमरा के लिए जाने पर साथ में पशुओं को ले जाने का नियम था. उस समय कुर्बानी के अलावा एक और रिवाज था. जानवरों के सीने पर निशान बनाकर उनको मक्का की ओर छोड़ दिया जाता था ताकि यह समझा जा सके कि वो कुर्बानी के पशु हैं. हुदैबिया के समझौते के बाद कुछ पशुओं की क़ुर्बानी दी गई और कुछ के सीने पर दाग़ लगा कर छोड़ दिया गया."

पटवारी का कहना है, दसवीं हिजरी में पैग़ंबर के मक्का विजय के बाद उन्होंने ख़ुद औपचारिक रूप से हज किया और क़ुर्बानी दी.

उससे एक साल पहले मोहम्मद साहब के एक क़रीबी साथी (जिन्हें इस्लामिक शब्दावली में सहाबी कहा जाता है) अबू-बकर के नेतृत्व में एक समूह को हज करने के लिए भेजा गया था. उस समूह के साथ भी क़ुर्बानी के लिए हादी या पशु थे.

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