जीएन साईबाबा को बॉम्बे हाई कोर्ट ने माओवादियों से संबंध के मामले में किया बरी, जानिए पूरा मामला

जीएन साईंबाबा

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बॉम्बे हाई कोर्ट की नागपुर बेंच ने माओवादियों से कथित संबंध के एक मामले में दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफ़ेसर 54 साल के जीएन साईबाबा को बरी कर दिया गया है.

जस्टिस विनय जोशी और जस्टिस एसए मेनेज़ेस की बेंच ने सेशन कोर्ट के साल 2017 के फ़ैसले को रद्द कर दिया है, जिसमें साईबाबा और अन्य को दोषी ठहराया गया था.

कोर्ट ने कहा कि जब तक सुप्रीम कोर्ट राज्य की अपील पर फ़ैसला नहीं कर लेता, तब तक अभियुक्त को 50,000 रुपये के बॉन्ड पर रिहा किया जा सकता है.

महाराष्ट्र ने अब तक फ़ैसले पर स्टे की मांग नहीं की है.

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इमेज कैप्शन, जीएन साईंबाबा के साथ पत्नी वसंता कुमारी

अक्टूबर 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाई कोर्ट के फ़ैसले पर स्टे लगाने सें इनकार करते हुए कहा था कि इस मामले में हाई कोर्ट फिर से सुनवाई करे.

अब दोबारा सुनवाई के बाद हाई कोर्ट की नागपुर बेंच ने फिर से जीएन साईबाबा को बरी करने का फ़ैसला सुनाया है.

54 साल के साईबाबा व्हीलचेयर से चलते हैं और 99 फ़ीसदी विकलांग हैं. वह पिछले 11 साल से नागपुर की सेंट्रल जेल में थे.

साईबाबा की पत्नी वसंता कुमारी ने बीबीसी से बात करते हुए कहा, “हमें इसके बारे में केवल मीडिया के माध्यम से पता चला है. मेरी बेटी मंजीरा और मैं ये ख़बर सुनकर बहुत ख़ुश हैं. उम्मीद है कि वो बिना किसी और अड़चन के रिहा हो जाएं. साईबाबा और हमने इन सालों में बहुत दुख झेले हैं. उम्मीद है इस केस में बाक़ी अभियुक्तों को भी जल्द न्याय मिले.”

जीएन साईबाबा

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जानी मानी वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जय सिंह ने साईबाबा को रिहा किया जाने के फ़ैसले पर ख़ुशी तो ज़ाहिर की है लेकिन गंभीर सवाल भी उठाए हैं.

उन्होंने एक्स पर लिखा, “साईबाबा बरी कर दिए गए हैं, लेकिन कितने समय बाद? उसके स्वास्थ्य को जो नुकसान हुआ उसे कौन लौटाएगा? कोर्ट? शर्म करिए. कितने और लोगों को ज़मानत के लिए इंतज़ार करना होगा? लोगों की आज़ादी को जिस तरह ख़त्म किया गया, उस नुकसान की क़ीमत कौन चुकाएगा?”

प्रोफ़ेसर जीएन साईबाबा बतौर सामाजिक कार्यकर्ता, रिवॉल्युशनरी डेमोक्रेटिक फ्रंट नाम की एक संस्था से भी जुड़े रहे हैं. वे 'रिवॉल्युशनरी डेमोक्रेटिक फ्रंट' के उपसचिव रहे हैं.

ये संगठन माओवादियों से संबंध के लिए ख़ुफ़िया एजेंसियों के निशाने पर रहा है.

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इससे पहले सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ था

सेशन कोर्ट ने कहा था कि साईबाबा और दो अन्य अभियुक्तों के पास नक्सली साहित्य था, जिसे वो गढ़चिरौली में अंडरग्राउंड नक्सलवादियों को बाँटने वाले थे और ज़िले में लोगों को बाँट कर हिंसा फैलाना चाहते थे.

सत्र अदालत के फ़ैसले के ख़िलाफ़ साईबाबा ने हाई कोर्ट में याचिका दायर की.

14 अक्टूबर 2022 को हाई कोर्ट ने साईबाबा को रिहा कर दिया और एनआईए को अपील करने की छूट दी थी.

हाई कोर्ट ने कहा था कि आतंकवाद राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक ख़तरा तो है और इसके ख़िलाफ़ हर संभव कोशिश होनी चाहिए लेकिन एक नागरिक को मिले अधिकार और उसकी प्रक्रिया को दरकिनार नहीं किया जा सकता.

हाई कोर्ट के फ़ैसले के ख़िलाफ़ राज्य ने तुरंत सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी.

इसके बाद अक्टूबर 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाई कोर्ट के फ़ैसले पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था और ममाले की दोबारा सुनवाई करने की बात कही थी.

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मामला क्या था?

  • 2013 में हेम मिश्रा और प्रशांत राही को गिरफ्तार किया गया था.
  • पुलिस का कहना था कि वो माओवादी नेताओं से मुलाक़ात करने वाले थे और ये मुलाक़ात प्रोफ़ेसर साईबाबा की मदद से तय हुई थी.
  • इसके बाद 2013 में प्रोफ़ेसर जीएन साईबाबा के घर पर गढ़चिरौली और दिल्ली पुलिस की संयुक्त टीमों ने छापा मारा.
  • उस समय प्रोफ़ेसर जीएन साईबाबा ने कहा था कि पुलिस उनका लैपटॉप, चार पेन ड्राइव, चार एक्सटर्नल हार्ड-डिस्क, कुछ किताबें अपने साथ ले गई.
  • 2014 में प्रोफ़ेसर जीएन साईबाबा को दिल्ली में उनके घर से महाराष्ट्र पुलिस ने गिरफ्तार किया था.
  • इसके बाद उन्हें यूनिवर्सिटी ने निलंबित कर दिया था.
  • महाराष्ट्र की गढ़चिरौली अदालत ने यूएपीए के सेक्शन 13, 18, 20 और 39 के तहत प्रोफ़ेसर साईबाबा को दोषी पाया था.
  • प्रोफ़ेसर साईबाबा पक्षाघात के मरीज़ हैं और 90 प्रतिशत विकलांगता की श्रेणी में आते हैं.
  • सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद बिगड़ती सेहत के आधार पर उन्हें जुलाई 2015 में जमानत पर रिहा किया गया था.
  • इसके बाद हाईकोर्ट ने उनकी ज़मानत रद्द करते हुए उन्हें आत्मसमर्पण करने को कहा था.

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