पाकिस्तान का वह गांव जहां सुन्नी-शिया समुदाय एक ही मस्जिद में पढ़ते हैं नमाज़

- Author, इफ़्तिख़ार ख़ान
- पदनाम, बीबीसी अफ़गान सेवा
कई मुस्लिम देशों में इस्लाम की अलग-अलग शाखाओं के बीच तनाव होना आम बात है. यह सीरिया में हालिया संघर्ष के पीछे एक कारक रहा है और पाकिस्तान में सुन्नी और शिया समुदायों के बीच हिंसक झड़पें बढ़ रही हैं. लेकिन उत्तरी पाकिस्तान में ही एक गांव ऐसा भी है, जहां ये दोनों समुदाय मिल-जुलकर शांति से रहते हैं.
पाकिस्तान के उत्तरी-पश्चिमी ख़ैबर पख़्तूनख़्वा प्रांत में स्थित पीरा गांव में पैर रखते ही सबसे पहले वहां की मस्जिद दिखाई देती है. जिसकी स्टील की मीनार और उसकी छत पर लगे लाउडस्पीकर दूर से ही दिखाई देते हैं.
यह मस्जिद गांव के लिए सिर्फ एक इबादतगाह नहीं, बल्कि सौहार्द्र का प्रतीक भी है, क्योंकि यहां सुन्नी और शिया, दोनों समुदाय एक ही मस्जिद में इबादत करते हैं, जो बहुत ही दुर्लभ बात है.
जब अज़ान होती है, तो पहले एक समुदाय के लोग मस्जिद में जाकर नमाज़ पढ़ते हैं. क़रीब पंद्रह मिनट बाद, जब वे बाहर आ जाते हैं, तो दूसरा समुदाय अंदर जाकर अपनी नमाज़ अदा करता है. इस तरह, बिना किसी विवाद के, दोनों समुदाय मिल-जुलकर शांति से अपनी इबादत करते हैं.

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मस्जिद में शिया धर्मगुरु सैयद मज़हर अली अब्बास बताते हैं कि इबादत का ये तरीका सौ साल पहले शुरू हुआ था. इस दौरान मस्जिद को फिर से बनाया गया, लेकिन किसी ने इस तरीके को बदलने की ज़रूरत नहीं समझी.
कागज़ों पर यह मस्जिद शिया समुदाय की संपत्ति है लेकिन दोनों समुदाय बिजली और बाकी खर्चों का मिलकर भुगतान करते हैं. मज़हर अली इस बात पर ज़ोर देते हैं कि सुन्नियों को भी यहां इबादत करने का उतना ही हक़ है जितना शियाओं को.
सुन्नी और शिया दोनों समुदाय अपने-अपने तरीके से नमाज़ पढ़ते हैं और दोनों समुदाय का अज़ान देने का तरीका भी अलग होता है.
दोनों समुदाय के बीच बिना कागज़ों में दर्ज एक समझौता यह है कि सुबह, दोपहर और शाम की अज़ान शिया समुदाय देता है, जबकि दोपहर बाद और रात की अज़ान सुन्नी समुदाय देता है.
हालांकि, रमज़ान के दौरान, सुन्नी समुदाय शियाओं से कुछ मिनट पहले रोज़ा खोलता है, इसलिए इस पवित्र महीने में वे अलग से शाम की अज़ान देते हैं.
अगर कोई व्यक्ति अपने समुदाय की नमाज़ में शामिल नहीं हो पाता, तो वो दूसरे समुदाय की नमाज़ में शामिल होकर अपने तरीके से नमाज़ पढ़ सकता है. इस तरह, दोनों समुदाय एक-दूसरे के साथ शांतिपूर्वक इबादत करते हैं.
शादियां भी होती हैं दोनों समुदाय में

पीरा गांव में कुछ और मस्जिदें भी हैं, लेकिन सबसे बड़ी मस्जिद वह है जहां शिया और सुन्नी मिलकर नमाज़ अदा करते हैं.
इस गांव में क़रीब पांच लोग रहते हैं और इनमें शिया और सुन्नी बराबर संख्या में हैं. वे न केवल एक ही मस्जिद में नमाज़ पढ़ते हैं, बल्कि एक ही क़ब्रिस्तान में अपने परिवार के सदस्यों को दफ़नाते हैं और आपस में शादियां भी करते हैं.
मोहम्मद सिद्दीक़ सुन्नी समुदाय से आते हैं लेकिन उन्होंने एक शिया महिला से शादी की है. उन्होंने बताया कि शुरुआत में उनके ससुराल वालों को यह रिश्ता मंज़ूर करने में समय लगा, लेकिन इसकी वजह उनका सुन्नी होना नहीं था. असल में, समस्या यह थी कि यह एक प्रेम विवाह था, जो पाकिस्तान में आम तौर पर कम देखा जाता है.
अब उनकी शादी को क़रीब 18 साल हो चुके हैं और मोहम्मद सिद्दीक़ बताते हैं कि दोनों अपने-अपने तरीके से अपने धर्म का पालन करते हैं.
अमजद हुसैन शाह भी इसी गांव के रहने वाले हैं. वो बताते हैं कि कुछ घरों में माता-पिता शिया हैं लेकिन उनके बच्चे सुन्नी या अगर माता-पिता सुन्नी हैं तो उनके बच्चे शिया हैं.
उन्होंने आगे बताया, "यहां के लोग मानते हैं कि धार्मिक आस्था एक निजी मामला है."
धार्मिक त्योहार गांव में आपसी एकता की मिसाल पेश करते हैं.
ईद-उल-अज़हा के मौके पर, शिया और सुन्नी कभी-कभी मिलकर एक जानवर खरीदते हैं और उसकी कुर्बानी देते हैं.
सुन्नी समुदाय के धार्मिक गुरु सैयद सज्जाद हुसैन काज़मी बताते हैं कि जब सुन्नी समुदाय पैग़म्बर मोहम्मद के जन्मदिन का जश्न मनाता है, जिसे मिलाद-उन-नबी कहा जाता है, तो इस जश्न में शिया समुदाय के लोग भी शामिल होते हैं.
इसी तरह, मुहर्रम के दौरान, जब शिया समुदाय इमाम हुसैन (हज़रत मोहम्मद के नाती) की शहादत की याद में मजलिसें आयोजित करता है, तो सुन्नी भी उनमें शामिल होते हैं.
इस तरह, गांव के लोग एक-दूसरे के त्योहारों और दुःख-सुख में शामिल होते हैं.
जिस दिन बीबीसी की टीम गांव में आई, उस दिन गांव के बुजुर्ग ज़कात समिति के अध्यक्ष चुनने के लिए मतदान कर रहे थे. यह समिति दान जमा करके ज़रूरतमंदों में बांटती है.
पिछले कई सालों से यह पद एक सुन्नी के पास था, लेकिन इस बार एक शिया उम्मीदवार को चुना गया.
शिया धर्मगुरु मज़हर अली ने बताया कि उनके परिवार ने एक हारे हुए उम्मीदवार का समर्थन किया था, जो कि सुन्नी था.
उन्होंने कहा, "हमने कभी धर्म के आधार पर किसी का समर्थन या विरोध नहीं किया. हम हमेशा उसी व्यक्ति को चुनते हैं जो हमें लगता है कि समुदाय की भलाई के लिए सबसे अच्छा काम करेगा."
एक बार हुई थी फूट डालने की कोशिश

क़रीब 20 साल पहले, कुछ लोगों ने इलाके में फूट डालने की कोशिश की थी. यह पीरा गांव में नहीं, बल्कि आसपास के 11 गांवों में हुआ था.
पीरा गांव में शिया और सुन्नी बराबर संख्या में रहते हैं, लेकिन बाकी 11 गांव की सारी आबादी सुन्नी है. उस समय, एक शिया उम्मीदवार, सैयद मुनिर हुसैन शाह, इन सभी गांवों का प्रतिनिधित्व करने के लिए स्थानीय चुनाव लड़ रहे थे.
उनके एक विरोधी ने इसे सांप्रदायिक मुद्दा बनाने की कोशिश की.
मुनिर शाह बताते हैं, "वे कराची से एक ऐसे व्यक्ति को लाए, जो पूरे देश में शिया-विरोधी भाषण देने के लिए मशहूर था. उसने रैलियों में लोगों को भड़काने की कोशिश की और कहा कि वे किसी शिया उम्मीदवार को वोट न दें."
लेकिन यह साजिश नाकाम रही. लोगों ने फिर भी मुनिर शाह को ही चुना.
शाह आगे बताते हैं, "ज़्यादातर लोगों ने कहा कि वे किसी धर्मगुरु को नहीं, बल्कि एक योग्य नेता को चुन रहे हैं, जो उनके मुद्दों को उठा सके—फिर चाहे वह किसी भी समुदाय से हो."
मुनिर शाह मानते हैं कि गांव में यह आपसी भाईचारा और एकता साझी मस्जिद की वजह से ही संभव हुआ है.
साझी मस्जिद की नींव कैसे पड़ी?

क़रीब सौ साल पहले पीरा गांव की बड़ी आबादी सूफ़ी सुन्नी थी. ये लोग उस व्यक्ति के वंशज थे, जिसने 17वीं सदी में इस गांव की स्थापना की थी.
लेकिन स्थानीय इतिहासकार डॉ. सिब्तैन बुखारी के मुताबिक़, समय के साथ यह बड़ा परिवार धीरे-धीरे शिया इस्लाम अपनाने लगा. हालांकि गांव की बाक़ी आबादी सुन्नी ही बनी रही और दोनों समुदाय पहले की तरह एक ही मस्जिद में नमाज़ अदा करते रहे.
1980 के दशक के अंत में, एक शिया बुजुर्ग ने मस्जिद को फिर से बनाने का सुझाव दिया. इस पर एक सुन्नी धर्मगुरु मौलवी गुलाब शाह ने सहमति दी. लेकिन उन्होंने शर्त रखी कि यह मस्जिद दोनों संप्रदायों के लिए साझा बनी रहेगी.
शिया बुजुर्गों ने मस्जिद के निर्माण का खर्च उठाया, जिससे मस्जिद आधिकारिक रूप से उनके नाम हो गई. लेकिन व्यवहार में इससे कोई फर्क नहीं पड़ा, क्योंकि यह मस्जिद पूरे गांव के लिए आपसी एकता का केंद्र बनी हुई है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित
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