नक़ाब खींच कर लड़की की तरक़्क़ी की उम्‍मीद क्‍यों- ब्लॉग

इल्तिजा मुफ़्ती

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इमेज कैप्शन, इल्तिजा मुफ़्ती ने हिजाब मामले में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के ख़िलाफ़ शिकायत दर्ज कराई है और वह इसका लगातार विरोध कर रही हैं
    • Author, नासिरुद्दीन
    • पदनाम, बीबीसी हिन्दी

स्‍त्री की मर्ज़ी के ख़‍िलाफ़ उसके साथ कुछ भी करना जुर्म के दायरे में आता है. इसल‍िए इसे व‍िवाद कहना सही नहीं होगा.

यहाँ बात ब‍िहार के मुख्‍यमंत्री नीतीश कुमार के एक स्‍त्री के साथ सार्वजन‍िक बर्ताव और इसके बाद एक दूसरे राज्‍य के मंत्री के बयान की हो रही है.

सोशल मीड‍िया पर तैर रहा वह वीड‍ियो ज़्यादातर लोगों ने देखा होगा. इसमें नीतीश कुमार नौकरी का कागज़ लेने आई एक स्‍त्री के चेहरे का नक़ाब हटाते हैं.

वह और वहां खड़े कुछ लोग मुस्‍कुराते और हँसते हैं. जैसे, उन्‍होंने कोई मासूम सी हरकत की हो.

इसके बाद बहस शुरू हो गई. पक्ष-व‍िपक्ष में तर्क द‍िए जा रहे हैं.

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कैसे-कैसे 'मर्दाना' बयान

यूपी के मंत्री संजय निषाद ने नीतीश कुमार के बचाव में जो बयान दिया वह और आपत्तिजनक था

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इमेज कैप्शन, यूपी के मंत्री संजय निषाद ने नीतीश कुमार के बचाव में जो बयान दिया वह और आपत्तिजनक था

उत्तर प्रदेश के मछली पालन मंत्री और निषाद पार्टी के संस्थापक संजय निषाद ने जो कहा, वह नीतीश कुमार के बर्ताव से और आगे बढ़ गया.

सोशल मीड‍िया पर घूम रहे वीड‍ियो के मुताब‍िक़ वह कहते हैं, "छू ल‍िया नक़ाब तो इतना हो गया... कहीं और छूते तब क्‍या होता."

वह नक़ाब से स्‍त्री के शरीर की ओर बढ़ जाते हैं. वह हँसते हैं और उनके साथ बैठे पत्रकार भी हँसते हैं. इसके दोनों शब्‍दों से स्‍त्री के शरीर को छूते हैं.

हालांक‍ि, बाद में उन्‍होंने सफ़ाई दी और कहा क‍ि किसी महिला या धर्म के प्रति दुर्भावना की कोई नीयत नहीं थी. मंत्री जी भले ही अपने शब्‍द वापस ले रहे हों लेक‍िन उनका बयान मर्दों की हरकत की सच्चाई तो बता ही देता है.

केंद्रीय मंत्री ग‍िर‍िराज स‍िंह ने मीड‍िया से बात करते हुए नीतीश कुमार के बर्ताव को सही ठहराया.

वह कहते द‍िखते हैं, "नीतीश कुमार ने कोई ग़लत काम नहीं क‍िया है. नीती‍श कुमार ने सही क‍िया. वह रिफ़्यूज़ करे या जहन्‍नम में जाए."

क्‍या बात ह‍िजाब या नक़ाब की है?

सोशल मीड‍िया पर इस पूरी बहस और बर्ताव के बचाव में उतरे लोग इन मंत्रि‍यों की ही तरह यह समझने में नाकाम रहे क‍ि मुद्दा ह‍िजाब या नक़ाब नहीं है.

नीतीश कुमार का बर्ताव स्‍त्री के फ़ैसले, उसकी पसंद, चुनाव, कपड़े पहनने की आज़ादी, गर‍िमा, इज़्ज़त के साथ जीने के मुद्दे से जुड़ा है. इसका र‍िश्‍ता नक़ाब नाम के कपड़े तक स‍िमटा नहीं है.

यह उसके अपने बदन पर ख़ुद के क़ाबू रखने से जुड़ा है. एक बड़ा तबक़ा खामख्‍़वाह इसे नक़ाब और स्‍त्री की आज़ादी का मुद्दा बना रहा है.

नक़ाब, हि‍जाब, घूंघट, पर्दा, पर बात होनी चाह‍िए. मगर इस वक़्त नहीं. इस मुद्दे से जोड़कर नहीं.

गिरिराज सिंह ने नीतीश कुमार का बचाव किया है (फ़ाइल फ़ोटो)

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इमेज कैप्शन, केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने नीतीश कुमार का बचाव किया है

कुछ लोगों को यह ग़लत क्‍यों नहीं लग रहा?

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असल में मर्दों या मर्दाना व‍िचार वाले क‍िसी भी जेंडर को यह बर्ताव कई वजहों से ग़लत नहीं लग रहा है. इसमें सबसे बड़ी वजह है, यह इक़रार नहीं करना क‍ि स्‍त्री का भी उनकी तरह आज़ाद वजूद है.

उसका शरीर या कपड़ा ख‍िलवाड़ करने के सामान नहीं हैं. ये उसके वजूद का ह‍िस्‍सा हैं. यह 'छेड़' नहीं है. यह ह‍िंसा है. यौन या लैंग‍िक ह‍िंसा.

इस पर कोई बात, हँसी में उड़ाकर या मज़ाकि‍या अंदाज़ में हल्‍का-फुल्‍का बनाकर नहीं की जा सकती. इसील‍िए हमेशा की तरह इस मुद्दे ने भी मर्दाना व‍िचार और व्‍यवहार की कलई खोलकर रख दी है.

कुछ लोगों को नीतीश कुमार का व्‍यवहार 'प‍िता तुल्‍य' या 'बड़ों का प्‍यार' जैसा लग रहा है.

मर्दों को हमेशा लगता है क‍ि स्‍त्री को 'प‍िता तुल्‍य' यानी 'बाप जैसी' न‍िगरानी, न‍िर्देश, सलाह, आदेश, न‍ियंत्रण... वग़ैरह की ज़रूरत होती है. प‍िता या प‍िता तुल्‍य ही उसका भला सोच सकते हैं.

सवाल है, 'प‍िता तुल्‍य' जैसी भलमनसाहत स्‍त्री को चाह‍िए या नहीं. प‍िता तुल्‍य बर्ताव क‍िसी लड़की को कैसा लग रहा है.

एक ख़बर के मुताब‍िक़, लड़की ने नौकरी जॉइन करने से इनकार कर द‍िया है. उसने कहा कि‍ मैं यह नहीं कह रही क‍ि मुख्‍यमंत्री ने जो क‍िया वह इंटेनशनली क‍िया. लेक‍िन जो हुआ वह मुझे अच्‍छा नहीं लगा.

इसील‍िए जो हुआ क्‍या वह स्‍त्री की आज़ादी से जुड़ा नहीं है?

स्‍त्री अपनी देह को सार्वजन‍िक तौर पर कैसे पेश करेगी, वह कपड़े से भी तय करती है.

कई बार इसमें उसका ख़ुद का चुनाव होता है. कई बार इसमें सामाज‍िक, सांस्‍कृत‍िक, धार्म‍िक और यहां तक क‍ि क़ानूनी न‍ियम-क़ायदे भी काम करते हैं.

कपड़ों की राजनीत‍ि भी होती है. सूरत चाहे जो हो, स्‍त्री के साथ इस तरह का बर्ताव उसके बदन की गर‍िमा का उल्‍लंघन है.

वैसे, कपड़े की न‍िगरानी में हमेशा स्‍त्री ही क्‍यों रहती है? कभी कोई पुरुषों के कपड़े पर बोलता या टीका-ट‍िप्‍पणी क्‍यों नहीं करता है?

संवैधान‍िक गर‍िमा के ख़िलाफ़

बिहार के मुख्‍यमंत्री नीतीश कुमार

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इमेज कैप्शन, नीतीश कुमार के इस व्यवहार पर विपक्षी पार्टियों उनकी सेहत पर भी सवाल उठा रही हैं

क‍िसी मुख्‍यमंत्री या मंत्री का बयान या बर्ताव व्‍यक्‍त‍िगत नहीं होता. उसकी सोच, बड़े दायरे पर असर डालती है. बड़े समूह को ख़ास तरह से सोचने का नज़र‍िया देती है.

इसल‍िए ऊंची मानी जाने वाली जगहों पर बैठे व्‍यक्‍त‍ि जब क‍िसी स्‍त्री के कपड़े पर अपनी राय देते हैं तो वह बड़े दायरे का नज़र‍िया बनाने में मददगार होती है.

इसल‍िए मंत्र‍ियों की राय हँसी-मज़ाक वाली राय नहीं है. यह स्‍त्री के बारे में उनकी सोच बताती है और बड़े समूह की सोच बनाती है. यही नहीं, ज‍िनकी ऐसी सोच पहले से है, उसे खुलेआम ज़ाह‍िर करने का हौसला देती है.

स्‍त्र‍ियों के बारे में ऐसी राय देना संवैधान‍िक गर‍िमा के दायरे के ख़‍िलाफ़ है.

मुसलमान स्‍त्री की ज़‍िंदगी

इसे हम एक और नज़र से देख सकते हैं. मुसलमान स्‍त्री के चयन, आज़ादी, हक़ पर अक्‍सर दोतरफ़ा न‍ियंत्रण होता है. एक ओर, कुछ लोग कपड़ों से यह बताने की कोश‍िश करते हैं क‍ि वे क‍ितनी प‍िछड़ी और दबी-कुचली हैं.

दूसरी ओर, समुदाय के अंदर उन्‍हें कपड़े से 'अच्‍छी मज़हबी स्‍त्री' द‍िखने का भी दबाव होता है. इन दोनों दायरों में जो फ‍िट नहीं होता, उसे सुनना पड़ता है.

यहां भी उसके कपड़े के चुनाव की आज़ादी को अनदेखा क‍िया जाता है. इसल‍िए सवाल हमेशा यह होना चाह‍िए क‍ि क्‍या वे ब‍िना डर, बेइज्‍़ज़ती, दबाव के आज़ादी से अपने ल‍िए कपड़े चुन पा रही हैं?

यही नहीं, इसके ज़र‍िए मुसलमान मह‍िलाओं की एकरंगी छव‍ि बनाने की कोश‍िश होती है. हज़ारों-लाखों की तादाद में वे लड़क‍ियां और स्‍त्र‍ियां ग़ुम कर दी जाती हैं, जो इस खांचे में फ़िट नहीं हैं.

लड़क‍ियों की राह क‍ितनी आसान

हिजाब में पढ़ाई करतीं लड़कियां

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इमेज कैप्शन, आगे बढ़ने के ल‍िए कई लड़क‍ियों को तरह-तरह के तरीक़े न‍िकालने होते हैं. एक तरीक़ा, ह‍िजाब या नक़ाब भी है

एक और बात. लड़क‍ियों के आगे बढ़ने का रास्‍ता वैसा ही नहीं है, जैसा लड़कों का है. बाहर न‍िकलने, पढ़ने, नौकरी करने और उनकी तरक़्क़ी की राह में अनेक रोड़े हैं.

आगे बढ़ने के ल‍िए कई लड़क‍ियों को तरह-तरह के तरीक़े न‍िकालने होते हैं. एक तरीक़ा, ह‍िजाब या नक़ाब भी है.

कई के ल‍िए मज़हब एक वजह हो सकती है लेक‍िन कई के ल‍िए स‍िर्फ़ मज़हब ही वजह नहीं होती.

कई लड़क‍ियों के ल‍िए यह पढ़ने, आगे बढ़ने, कुछ करने, घर के दायरे से बाहर न‍िकलने का रास्‍ता भी है.

कई को इसी शर्त पर बाहर न‍िकलने का मौक़ा म‍िलता है.

आज से 100 साल पहले रुक़ैया सख़ावत हुसैन ने जब लड़क‍ियों के ल‍िए पहले ब‍िहार और बाद में कोलकाता में स्‍कूल शुरू क‍िया, तो उन्‍हें ज‍िस चीज़ से सबसे ज़्यादा दोचार होना पड़ा, वह लड़क‍ियों का पर्दा था.

लेक‍िन उन्‍होंने उपाय न‍िकाले. इसे लड़क‍ियों की पढ़ाई में बाधा नहीं बनने द‍िया. हालांक‍ि, तब से अब तक हालात में बहुत बदलाव आया है.

लेक‍िन सद‍ियों से लड़क‍ियां कई तरह के जद्दोजहद और समझौते करते आगे बढ़ रही हैं. इसमें पर्दा भी है. इसल‍िए क‍िसी लड़की की कामयाबी में यह पक्ष नज़रंदाज़ करेंगे तो उसकी ज़‍िंदगी की हक़ीक़त को हम नहीं समझ पाएंगे.

इसल‍िए अगर हम क‍िसी लड़की का ह‍िजाब या नक़ाब खींच रहे हैं, तो मुमक‍िन है क‍ि हम उसके और उस जैसी कई लड़क‍ियों को आगे बढ़ने से रोक रहे हों.

अगर क‍िसी मुख्‍यमंत्री या मंत्री जैसे ओहदेदारों को लगता है क‍ि लड़क‍ियां जबरन ऐसा कर रही हैं तो उन्‍हें उनके ल‍िए बेहतर सामाज‍िक-राजनीत‍िक माहौल बनाना चाह‍िए. ताक‍ि वे अपने बारे में बेख़ौफ़ फ़ैसले ले सकें.

उन्‍हें सरेआम 'बेपर्दा' करना बेइज़्ज़ती का अहसास कराना है. डराना है. इससे तो वे सार्वजन‍िक जीवन से अलग हो सकती हैं. उन्‍हें अलग क‍िया जा सकता है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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