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यूक्रेन का निडर और जोखिम भरा क़दम, रूस की ज़मीन पर वो कब तक टिका रह पाएगा?
- Author, फ़्रैंक गार्डनर
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
यूक्रेन के विदेश मंत्रालय ने एलान किया है कि उनकी सेना ने रूस के जिन इलाक़ों पर क़ब्ज़ा किया है, उन पर स्थाई क़ब्ज़े की कोई मंशा नहीं है.
लेकिन इस बयान के बावजूद यूक्रेन के सामने एक मुश्किल चॉयस है- क्या अब अपनी फ़ौज को वापस बुला लें या रूस पर दबाव डालने के लिए उसे वहीं जमा रहने दें.
हर दिन रूसी ड्रोन्स, मिसाइलों और ग्लाइड बमों से यूक्रेन की फ़्रंटलाइन टुकड़ियां परेशान थीं. यूक्रेन की सेना फ़्रंट को छोड़ पीछे हट रही थीं. ऐसे निराशा भरे माहौल में यूक्रेन को किसी अच्छी ख़बर का बेताबी से इंतज़ार था.
रूस के कुर्स्क इलाक़े पर हमला कर क़ब्ज़ा करने के निडर और सफल क़दम ने ये इंतज़ार ख़त्म कर दिया है.
'बेजोड़ समन्वय का कमाल'
अपना नाम न बताने की शर्त पर एक वरिष्ठ ब्रितानी मिलिट्री अधिकारी ने बीबीसी को बताया, "इस हमले की सबसे दिलचस्प बात यूक्रेनी सेना के अलग-अलग अंगों के बीच बेजोड़ समन्वय है. पैदल फ़ौज के साथ-साथ, एयर डिफ़ेंस, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफ़ेयर और तोपखाने ने भी इस ऑपरेशन में हिस्सा लिया. ये अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि है."
ऐसा लगता है कि यूक्रेन ने पश्चिमी देशों से मिले अत्याधुनिक हथियारों का भी इस्तेमाल किया है. इनमें जर्मनी मार्डर और अन्य बख़्तरबंद वाहन शामिल हैं. यूक्रेनी सेना पिछले वर्ष की तुलना में इस बार इन संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल कर पाई है.
तो रूसी सीमा में घुसने के बाद यूक्रेन का अगला क़दम क्या होगा?
एक विचार ये है कि यूक्रेन जो हासिल करना चाहता था वो कर चुका है. इस बात से इत्तफ़ाक रखने वालों का मत है कि यूक्रेन जंग के पुतिन के घर तक ले जाना चाहता था ताकि उनके लोग भी लड़ाई के दर्द को झेलें.
साथ ही हाल के दौर में डोनबास में मिली शिकस्त के बाद यूक्रेन ये दिखाना चाहता था कि अब भी सफल हमले कर सकता है. इस क़दम से यूक्रेन ने दिखा दिया है कि वो अत्याधुनिक हथियारों की मदद से एक सफल मॉडर्न वॉर को अंजाम दे सकता है.
जानकार कहते हैं कि अब यूक्रेन को रूसी इलाक़ों से इज़्ज़त के साथ लौट आना चाहिए जिससे पहले रूस अपनी पूरी ताकत झोंककर चढ़ाई करने आए यूक्रेनी सैनिक को मार दे या क़ैद कर ले.
लेकिन अगर यूक्रेन की सेना पीछे हटी तो उसके दो लक्ष्यों की पूर्ति नहीं होगी. ये दो लक्ष्य हैं- रूस पर इतना दबाव बनाया जाए कि वो डोनबास से अपने कुछ सैनिकों से पीछे हटाए और दूसरा रूसी ज़मीन पर कब्ज़ा कर उसे भविष्य की शांति वार्ताओं में अपने पक्ष में इस्तेमाल किया जाए.
तो क्या यूक्रेन की चाल सफल हुई है?
इंग्लैंड की एक्सेटर यूनिवर्सिटी के डॉक्टर डेवि ब्लागडेन का कहना है, "अगर यूक्रेन रूसी ज़मीन पर कब्ज़ा बनाए रखता है तो वो रूस से अपनी ज़मीन वापस लेने के लिए बेहतर दबाव बना सकता है. यूक्रेन रूसी लोगों के बीच पुतिन के शक्तिशाली होने की इमेज को भी तोड़ने का प्रयास करेगा."
लेकिन एक बात साफ़ है. जिस देश के अस्तित्व को ही रूसी राष्ट्रपति पुतिन स्वीकार न करते हों, उसकी सेना का रूसी ज़मीन पर क़ब्ज़ा करना सहन नहीं किया जाएगा.
पुतिन इससे बचने के लिए अपनी पूरी ताक़त झोंक देंगे और वो ये भी चाहेंगे की डोनबास में उनकी सेना डटी रहे. वे वहां मिसाइल और ड्रोन हमले कर डोनबास के स्थानीय लोगों को यूक्रेन के हमले की सज़ा दे सकते हैं.
मंगलवार को मॉस्को में एक इमरजेंसी मीटिंग के दौरान पुतिन काफ़ी झुंझलाहट में दिख रहे थे.
ऐसा कहना जल्दबाज़ी ही होगा. अगर यूक्रेन की सेना रूसी इलाकों में जमी रही तो उन्हें रूस की बेतहाशा ताक़त का सामना करना पड़ेगा.
डॉक्टर ब्लागडेन चेतावनी देते हैं कि इतने बड़े इलाक़े पर कब्ज़े को डिफ़ेंड करने के लिए यूक्रेन को बहुत अधिक संसाधनों की ज़रूरत पड़ेगी
लेकिन एक बात से इनकार नहीं किया जा सकता - ये यूक्रेन का सबसे निडर क़दम है...और सबसे जोखिम भरा भी.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित
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