राहुल गांधी को अमेरिका के दौरे से क्या हुआ हासिल?

ज़ुबैर अहमद

बीबीसी संवाददाता, दिल्ली

राहुल गांधी

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अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडन ने एक बार भारतीय मूल की अमेरिकी वैज्ञानिक स्वाति मोहन के साथ फ़ोन कॉल के दौरान कहा था कि ये क़ाबिले तारीफ़ है कि भारतीय मूल के अमेरिकी देश पर छा रहे हैं.

उन्होंने कहा था- आप, मेरी उपराष्ट्रपति कमला हैरिस और मेरा भाषण लिखने वाले विनय रेड्डी, आप लोग तारीफ़ के क़ाबिल हैं.

इसे भारतीय अमेरिकी डायस्पोरा के बढ़ते प्रभाव के रूप में देखा गया.

शायद इसलिए राष्ट्रपति बाइडन ने अपनी टीम में 130 भारतीय डायस्पोरा के लोगों को नियुक्त किया है.

भारतीय अमेरिकी वहाँ दूसरे सबसे बड़े प्रवासी समूह हैं.

अमेरिकी जनगणना ब्यूरो की ओर से 2018 में हुए अमेरिकी सामुदायिक सर्वेक्षण (एसीएस) के आँकड़ों के अनुसार अमेरिका में भारतीय मूल के 42 लाख लोग रहते हैं. इनमें एक बड़ा अनुपात (38 प्रतिशत) अमेरिकी नागरिक हैं.

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भारतीय प्रवासी अमेरिका की आबादी का एक प्रतिशत हैं, लेकिन वो कुल आयकर का छह प्रतिशत भुगतान करते हैं.

कुल मिलाकर आईटी, शिक्षा और फ़ाइनेंस के क्षेत्र में भारतीय समुदाय की कामयाबी अन्य अमेरिकी समुदायों के लिए एक मिसाल है.

भारतीय मूल के लोगों की अमेरिकी समाज और अमेरिका की राजनीति में बढ़ती इज़्ज़त और अहिमयत का अंदाज़ा अमेरिका के दौरे पर जाने वाले भारत के पूर्व प्रधानमंत्रियों को भी था.

लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि उनकी अहिमयत का सही अंदाज़ा और उन्हें भारत के और अपने हित में इस्तेमाल करना सबसे पहले नरेंद्र मोदी ने करना शुरू किया था, जब वो मई 2014 में प्रधानमंत्री बनने के बाद पहली बार सितंबर के महीने में अमेरिका के सरकारी दौरे पर गए थे.

कांग्रेस नेता राहुल गांधी भी ब्रिटेन और सिंगापुर जैसे देशों में भारतीय मूल के लोगों को संबोधित कर चुके हैं.

लेकिन उनका अमेरिका का ताज़ा दौरा ज़्यादा सार्थक माना जा रहा है.

उन्होंने पिछले सप्ताह अमेरिका के अपने छह दिवसीय दौरे को पूरा किया और उनकी यात्रा ने अमेरिका में भारतीय समुदाय के उन लोगों की शिकायत दूर कर दी है, जो कहते थे कि मोदी के अलावा उनसे मिलने देश के दूसरे नेता नहीं आते थे.

राहुल गांधी को अमेरिकी दौरे से क्या हासिल हुआ?

अखिलेश प्रताप सिंह

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अब सवाल ये है कि राहुल गांधी को अमेरिकी दौरे से क्या लाभ हुआ?

कांग्रेस पार्टी के प्रवक्ता अखिलेश प्रताप सिंह कहते हैं, "दुनिया ने उनको बड़े चाव से सुना और दुनिया में बहुत अच्छा असर छोड़ कर आए हैं राहुल जी."

राहुल गांधी कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष रह चुके हैं और संसद की सदस्यता गँवाने के बाद वो अमेरिका गए थे.

अखिलेश प्रताप सिंह आगे कहते हैं, "आज की तारीख़ में राहुल गांधी आधिकारिक तौर पर तो कुछ नहीं हैं. ना संगठन में, ना सरकार में और ना ही सदन में. लेकिन उनकी दुनिया में एक जगह है, उनकी एक आवाज़ है, एक विज़न है जिसे दुनिया जानना चाहती है."

उन्होंने कहा कि इस बात को न तो भारत में नज़रअंदाज़ कर सकते हैं ना दुनिया में. कोई नेता ऐसा है जो सत्ता से हट जाए और इतने चाव से कोई उनसे सुनने जाता है? बीजेपी को ही देख लीजिए, किसी पूर्व पीएम को किसी ने पूछा है?

राहुल गांधी का अमेरिका का दौरा ऐसे समय में हुआ है, जब कर्नाटक विधानसभा चुनाव में कामयाबी से पार्टी का मनोबल बढ़ा है और पार्टी अगले साल आम चुनाव की तैयारी में अभी से जुट गई है.

तो क्या चुनाव में इसका उन्हें लाभ मिल सकता है?

बीजेपी के नेता का बयान

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दक्षिणपंथी राजनीतिक, विदेश नीति विशेषज्ञ और भाजपा के सदस्य डॉ. सुव्रोकमल दत्ता कहते हैं, "संक्षेप में राहुल गांधी की अमेरिका यात्रा का विश्लेषण किया जाए, तो ऐसा लगता है कि अमेरिका में भारत विरोधी और पाकिस्तान समर्थक दर्शकों के सामने कुछ सस्ते राजनीतिक आधारहीन स्टंट के अलावा उन्हें राजनीतिक रूप से कुछ भी हासिल नहीं हुआ है."

लेकिन अखिलेश प्रताप सिंह के मुताबिक़ अमेरिका के दौरे से राहुल गाँधी की बातें और उनके विचार दुनिया वालों तक पहुँचे हैं और इसलिए उनका ये दौरा कामयाब रहा.

वे कहते हैं, "राहुल गांधी को दुनिया के हर फ़ील्ड के लोग सुनना और उनकी राय जानना चाहते हैं. उनको सुनने के बाद सबको लगता है कि हर फ़ील्ड में उनकी जानकारी कितनी गहरी है. वो लोग भी राहुल जी को सुनने के बाद स्वीकार कर रहे हैं कि इस आदमी में देश और दुनिया को एक नई दिशा देने की क्षमता है और विज़न भी है."

लेकिन सत्तारूढ़ बीजेपी की नज़रों में राहुल गांधी के अमेरिका के दौरे से उन्हें कोई फायदा नहीं हुआ.

डॉ. दत्ता कहते हैं, "पश्चिम के साथ राहुल गांधी का रोमांस उन्हें कोई ख़ूबसूरत रोमांटिक कहानी नहीं देता, बल्कि उनकी भारत वापसी पर उन्हें आलोचनाओं का सामना करना पड़ता है. अतीत में ब्रिटेन के कैंब्रिज विश्वविद्यालय में भारत विरोधी नारे उनके लिए कोई आशीर्वाद नहीं थे."

वॉशिंगटन में मौजूद वरिष्ठ पत्रकार अजित साही कहते हैं कि भारतीय विपक्षी नेता राहुल गांधी का पिछले सप्ताह अमेरिका का दौरा दो मामलों में सफल रहा.

वे बताते हैं, "पहला, नौ वर्षों में पहली बार, उन्होंने वॉशिंगटन डीसी में भारतीय प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के अलावा एक और आवाज़ को नीति बनाने वालों के सामने लाया. दूसरा, उनके दौरे ने नौ वर्षों में पहली बार, उन हज़ारों भारतीय अमेरिकियों को एक अवसर प्रदान किया, जो मोदी की राजनीति से ख़ुद को अलग देखते हैं और अलग-अलग शहरों में बड़े समूहों में इकट्ठा होते हैं और एकजुटता और शक्ति का प्रदर्शन करते हैं."

लेकिन उनका ये भी मानना है कि ऐसा नहीं है कि बाइडन प्रशासन मोदी से मुँह मोड़ लेगा.

अजित साही कहते हैं, "निश्चित रूप से, कोई भी यह दावा नहीं कर रहा है कि अमेरिकी सरकार मोदी से मुँह मोड़ने जा रही है. जब तक वे अमेरिका की विदेश नीति के साथ चलते हैं. देखा जाए, तो भारत की यूक्रेन नीति को छोड़कर मोदी का अमेरिका को गले लगाना असाधारण रहा है."

उनका कहना है कि राहुल गांधी की एक यात्रा से अमेरिका का वो रुख़ नहीं बदलने वाला, जिस तरह वो भारत या नरेंद्र मोदी के साथ डील करता है.

न्यूयॉर्क में वरिष्ठ पत्रकार सलीम रिज़वी के मुताबिक़ राहुल गाँधी के दौरे का असल मक़सद आगामी लोकसभा चुनाव के लिए समर्थन हासिल करना था.

वे कहते हैं कि प्रधानमंत्री मोदी के बाद राहुल गांधी भी 2024 के लोकसभा चुनाव के लिए समर्थन जुटाने का प्रयास कर रहे हैं. वो और उनकी पार्टी उन्हें मुख्य विपक्षी नेता के तौर पर स्थापित करना चाहती है.

रिज़वी कहते हैं, ''कई भारतीय अमेरिकी और एनआरआई चुनावों के दौरान भारत में रहने वाले अपने परिवारों के संपर्क में रहते हैं. उन्हें प्रभावित करते हैं, अपने पसंदीदा नेताओं के लिए कैम्पेन भी करते हैं, तो इसे सीधे-सीधे समर्थन जुटाने के प्रयास के तौर पर देखा जाना चाहिए.''

अमेरिका में इंडियन डायस्पोरा इतना अहम क्यों है ?

अमेरिका में भारतीय समुदाय

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भारतीय डायस्पोरा के लोग ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया समेत कई देशों में कामयाब हैं लेकिन ये कहना ग़लत न होगा कि भारतीय नेता अमेरिका में भारतीय समुदाय के लोगों तक पहुँचने की ज़्यादा कोशिश करते हैं.

ऐसा इसलिए कि उनमें से कई के रिश्तेदार भारत में रहते हैं और चुनाव के समय वो ख़ुद देश आकर अपनी पार्टियों के लिए काम भी करते हैं.

लेकिन इससे भी अहम बात ये है कि भारतीय डायस्पोरा के ज़रिए दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश अमेरिका की सरकार तक उनकी पहुँच आसान हो सकती है. इस तरह का फ़ायदा किसी दूसरे देश की सरकार को नसीब नहीं.

अमेरिका में 'इंडिस्पोरा' नामी एक संस्था है, जिसका काम भारतीय मूल के लोगों से तालमेल बढ़ाना है.

इसकी एक सूची के अनुसार, 40 से अधिक भारतीय-अमेरिकी अमेरिका भर में विभिन्न कार्यालयों के लिए चुने गए हैं.

चार प्रतिनिधि सभा में हैं- डॉ. अमी बेरा, रो खन्ना, राजा कृष्णमूर्ति और प्रमिला जयपाल.

इस सूची में चार मेयर भी शामिल हैं. इसके अलावा, उद्योग और व्यापार जगत में भी भारतीय मूल के लोग छाए हुए हैं.

गूगल के चीफ़ भारतीय-अमेरिकी सुंदर पिचाई और माइक्रोसॉफ्ट के सत्या नडेला के साथ दो दर्जन से अधिक भारतीय-अमेरिकी अमेरिकी कंपनियों का नेतृत्व कर रहे हैं.

टेक्सस के ह्यूस्टन की फ़ातिमा अज़ीज़ पेशे से डॉक्टर हैं, लेकिन ख़ाली वक़्त में वे भारतीय समुदाय में सोशल वर्क करती हैं.

उनका कहना है कि अमेरिकी प्रशासन तक अगर किसी सरकार की इसके प्रवासियों के माध्यम से पहुँच हो,तो सरकार के कई काम आसान हो जाते हैं.

वे कहती हैं, "आप वॉशिंगटन डीसी आकर देखिए, दुनिया भर के नेता आते हैं और सब चाहते हैं कि व्हाइट हाउस के ओवल ऑफ़िस (राष्ट्रपति के दफ़्तर में) तक उनकी पहुँच हो. हर तरह के काम करवाने के लिए दुनिया भर की सरकारें यहाँ लॉबी कराती हैं. भारत भी करता है लेकिन उसका काम और आसान हो जाता है, क्योंकि भारतीय मूल के दर्जनों लोग बाइडन प्रशासन में काम करते हैं."

नरेंद्र मोदी को इसका अंदाज़ा 2014 से पहले हो चुका था, जब वहाँ की सरकार ने उनके अमेरिका आने पर प्रतिबंध लगा दिया था और प्रवासियों की कोशिशों से इस प्रतिबंध को हटाने में आसानी हुई थी.

राहुल गांधी और देश के दूसरे नेता भी अब इस समुदाय की अहमियत को बख़ूबी समझते हैं.

प्रवासी भारतीयों में मोदी का समर्थन

नरेंद्र मोदी

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भारत में बैठे और भारतीय मीडिया पर नज़र डालने से ऐसा लगता है कि अमेरिका में भारतीय मूल के सभी लोग मोदी समर्थक हैं. लेकिन क्या ये सही है?

लंदन में वरिष्ठ पत्रकार प्रसून सोनवलकर ये कहना उचित है कि प्रवासी भारतीयों में मोदी को व्यापक समर्थन हासिल है, जो आरएसएस से जुड़े संगठनों द्वारा कई सालों और दशकों तक विदेशों में किए कामों का भी परिणाम है.

लेकिन न्यूयॉर्क में भारतीय मूल के आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस क्षेत्र के माहिर योगेश शर्मा कहते हैं कि अमेरिका में भारतीय डायस्पोरा विचारों के आधार पर विभाजित है.

वो कहते हैं, "विचारधाराओं के आधार पर भारतीय डायस्पोरा को कई श्रेणियों में बाँटा जा सकता है: प्रवासी भारतीयों का एक वर्ग दक्षिणपंथी है और वे पिछली सरकार की अल्पसंख्यक तुष्टिकरण नीति से परेशान हैं और तब तक बीजेपी का समर्थन करते रहेंगे जब तक कि कांग्रेस पार्टी न्यूट्रल ग्राउंड पर नहीं आ जाती या देश में जारी धर्मांतरण की आलोचना नहीं करती और दो से अधिक बच्चों की नीति के लिए अल्पसंख्यक की आलोचना नहीं करती और समान नागरिक क़ानून का समर्थन नहीं करती."

वे आगे कहते हैं- दूसरी श्रेणी प्रवासी भारतीयों के उस वर्ग की है, जो ऑपरेशन ब्लू स्टार (कांग्रेस के समय 1984 में हुआ था) के कारण राहुल का समर्थन नहीं कर रहा है. या तो वे मोदी का समर्थन कर रहे हैं या केजरीवाल का.

योगेश शर्मा तीसरी श्रेणी उन लोगों की बताते हैं, जो ये समझते हैं कि वे बहुसांस्कृतिक, आपस में जुड़ी हुई दुनिया में रहते हैं और ये मानते हैं कि उन्हें शांतिपूर्ण तरीक़े से बढ़ने की आवश्यकता है.

वे कहते हैं, "वे समझते हैं कि भारत के बाहर दुनिया भारतीयों को महात्मा गांधी के नाम से जानती है और जो मोदी, भाजपा और इसके आईटी सेल द्वारा फैलाए गए झूठ से तंग आ चुके हैं. जो मोदी की मार्केटिंग की नौटंकी से तंग आ चुके हैं. यह वर्ग राहुल की तरफ़ से और भी अधिक "भारत जोड़ो जैसी यात्रा" देखना चाहता है. वे निश्चित रूप से मानते हैं कि राहुल में क्षमता है लेकिन उन्हें ज़मीन पर काम करने और भारतीय लोगों के साथ अधिक संपर्क विकसित करने की ज़रूरत है ताकि वे उनके नेता बन सकें."

वरिष्ठ पत्रकार प्रसून सोनवलकर बताते हैं कि कई बार चुनाव के दौरान, प्रवासी भारतीयों का समूह देश में वापस लौटता है और अपनी पार्टी और उम्मीदवार का प्रचार करता है.

जो देश में आकर प्रचार नहीं कर पाते हैं, वो फ़ोन कॉल और दूसरे संचार माध्यमों से अपने परिवार और दोस्तों से बात करके प्रचार करते हैं. अब तो विदेश में रहने वाले भारतीय भी वोट के लिए रजिस्ट्रेशन कर सकते हैं और देश आकर वोट डाल सकते हैं इसलिए इन्हें वोट बैंक की तरह भी देखा जाता है.

प्रसून सोनवलकर कहते हैं, ''भारतीय डायस्पोरा हमेशा से अहम रहा है. ख़ासकर व्यापार, निवेश और सांस्कृतिक संबंधों के संदर्भ में. मीडिया और सूचना तकनीक अब दुनियाभर में है, जिसकी वजह से भारतीय मूल के लोगों को वैश्विक पहचान मिली है. भारतीयों ने दूसरे देशों के सार्वजनिक जीवन में अपनी भागीदारी बढ़ाई है. भारतीय डायस्पोरा के लिए अब भारत में घट रही घटनाओं ख़ासतौर पर राजनीतिक घटनाओं को जानना, उन्हें फ़ॉलो करना और उन पर रिस्पॉन्स करना आसान है.''

अब 21 जून को प्रधानमंत्री मोदी भी अमेरिका के दौरे पर निकलेंगे, जहाँ वो भारतीय समुदाय के लोगों को भी संबोधित करेंगे.

उनकी पिछली सभाओं में हज़ारों लोग आए थे. डायस्पोरा में भरपूर जोश था, लोग "मोदी, मोदी" के नारे लगा रहे थे. इस बार भी कुछ ऐसा ही होने की उम्मीद है.

इसके अलावा 21 जून को योग दिवस में भी नरेंद्र मोदी बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेंगे.

तो क्या मोदी के दौरे के बाद राहुल का दौरा फीका पड़ जाएगा?

अमेरिका में मोदी

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योगेश शर्मा कहते हैं कि मोदी की सभाओं में गुजरातियों की एक बड़ी भीड़ होती है और उन्हें उनका पूरा समर्थन होता है.

वो कहते हैं, "राहुल की सभाएँ कॉन्फ्रेंस हॉल और विश्वविद्यालयों तक ही सीमित थीं. ये मोदी के विपरीत है, जो स्टेडियम में भीड़ जुटाना पसंद करते हैं और गुजराती समुदाय के लोग अपने साथी गुजराती का समर्थन करने के लिए बड़ी संख्या में आते हैं."

योगेश आगे कहते हैं, "इसलिए सतही तौर पर यह लग सकता है कि मोदी राहुल के दौरे पर भारी पड़ रहे हैं. साथ ही, राहुल का कोई भी कार्यक्रम उप राष्ट्रपति, राष्ट्रपति या किसी अन्य विपक्षी रिपब्लिकन पार्टी के नेताओं के साथ नहीं था. ऐसा लग सकता है कि मोदी बढ़त हासिल कर रहे हैं, लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त धीरे-धीरे बदल रही है. दक्षिणपंथियों के अलावा, प्रवासी भारतीयों का एक वर्ग मोदी या उनके किसी भी मार्केटिंग हथकंडे या भाषणों से प्रभावित नहीं है."

फ़ातिमा अज़ीज़ कांग्रेस की समर्थक हैं, लेकिन वो कहती हैं कि वो रियलिस्टिक भी हैं.

उन्हें लगता है कि राहुल गाँधी के दौरे को लोग शायद अधिक दिनों तक याद न रखें, क्योंकि 21 और 22 जून को नरेंद्र मोदी अमेरिका में छाए रहेंगे.

वे कहती हैं कि मोदी का ये स्टेट विज़िट है और पूरा अमेरिका मीडिया इसे दिखाएगा. भारतीय मीडिया में भी शोरग़ुल काफ़ी होगा और लोगों को वो दृश्य ज़्यादा याद रहेगा.

(वरिष्ठ पत्रकार प्रसून सोनवलकर और सलीम रिज़वी से बीबीसी संवाददाता कुमारी प्रेरणा ने बात की है)

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